डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
विश्व के अग्रणी चिंतकों मे डा. राममनोहर लोहिया का मुर्धण्य स्थान है।
विश्व के अग्रणी चिंतकों मे डा. राममनोहर लोहिया का मुर्धण्य स्थान है। फ्रांस के जीनपौल सात्र्रे इंग्लैंउ के बरटड रसल अमेरिका के हावर्ड माकर््यु एवं मैक्लूहान आदि ख्याति प्राप्त चिंतक हैं परन्तु कार्ल माक्र्स महात्मा गांधी और डा. राममनोहर लोहिया ने अपने चिंतनसे देश और काल को जैसा और जितना प्रभावित किया हे न भूतो न भविष्यति। कार्लमाक्र्स के चिंतन को अमली जामा लेनिन और माओत्से तुगं ने अपने अपने ढ़ंग से पहनाया। महात्मा गांधी एवं डा. लोहिया चिंतक ही नहीं थे कर्म योगी भी थे। दोनों ने अपने चिंतन का प्रयोग अपने जीवनकाल मे स्वयं किया और विश्व पर शास्वत प्रभाव छोड़ गये। डा. लोहिया पर माक्र्स का कम और गांधी का ज्यादा प्रभाव रहा।
डा. लोहिया ने देश काल और परिसिथति के आलोेक में अपने चिंतन और कर्म को विकसित किया और उसे धरातल पर उतारने का काम किया। माक्र्स जहां आर्थिक विषमता तक ही सीमित रह गये वहीं डा. लोहिया ने सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक विषमता को भी अपने चिंतन का आधार बनाया। डा. लोहिया ने शोषण के सर्वव्यापी आयामों को उदघाटित किया और प्रथम बार सप्तक्रांति की अवधारणा प्रतिपादित की शोषण के सभी आयामों के विरूद्ध संघर्ष का आहवान किया। उन्होंने सर्वप्रथम विश्व सरकार और विश्व संसद की परिकल्पना की तथा विकसित राष्ट्रों का हथियार पर न खर्च करके विश्व से भूखमरी गरीबी तथा तंगहाल समाप्त करने का आहवान किया। विश्व में उत्पादन की क्षमता पर आघारित शोषण की समापित पर बात की। रामायण मेला नदियों को साफ करो उर्वसीयम का स्वरूप बदलो तिब्बत को चीन के आधिपत्य से मुक्त करो आदि क्रानितकारी नारा दिया। डा. लोहिया से ही प्रेरणा लेकर मकबूल फिदा हुसैन कला के क्षेत्र मे शिखर पर पहुंचे और उन्होंने सम्पूर्ण रामायण का चित्रांकन किया था। हिमालय बचाओ आंदोलन की परिकल्पना औ तदनुरूप कार्य कम संचालन उनकी देन है।
विदेश नीति में स्वतंत्र गुटनिरपेक्ष की अवधारणा भ्ी उन्हीं की थी। दो ध्रुवीय विश्व में ध्रवों के बीच मे दासताबोध से ग्रसित गुटनिरपेक्ष की उन्होंने निन्दा की। मुसलमानों को देशी मुसलमान और हमलावर मुसलमान में भेद करना उन्होंने सिखाया। उन्होंने परम्परागत समाजवाद से हटकर नये समाजवाद को नया आयाम दिया। सम्पूर्ण बराबरी की जगह सगुण रूप में संभव बराबरी की बात की खर्चपर सीमा लगाने की बात की सिविल नाफरमानी की बात की और उसको अमल में लाया। सत्ता के प्रभावकारी विकेन्द्रीकरण के लिए चौखम्भा राज्य स्थापित करने की बात की। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिगत रहकर आंदोलन को जिन्दा बनाये रखा और भूमिगत रहकर आजाद रेडियो का संचालन किया। उन्होंने शुरू से अंत तक एक फकीर की जिन्दगी बितार्इ। वे अत्यन्त ही प्रभावशाली वक्ता थे। उन्होंने अपने पहले भाषण से ही संसद को सम्मोहित कर लिया और केन्द्रीय सरकार की चूलें हिला दीं। 2012 उनके शताब्दी वर्ष का समापन का वर्ष है। उन्होंने कहा था ''लोग मेरी बात सुनेंगे जरूर लेकिन मेरे मरने के बाद उन्होंने यह भी कहा था कि ''मेरे पास कुछ भी नहीं है सिवाय इसके कि हिन्दुस्तान का आम आदमी मुझे अपना आदमी समझता है आम आदमी की इसी पीड़ा से त्रस्त होकर उन्होंने रंग भेद के खिलाफ अमेरिका में भी गिरफतारी दी। नेपाल की राणाशाही के खिलाफ भी सर्वप्रथम उन्होंने ही संघर्ष छेड़ा और जेल गये। गोवा कोआजाद कराने हेतु जेल गये तब महात्मा गांधी नेकहा कि डा. राममनोहर लोहिया जेल में है तो मैं कैसे बैठ सकता हूं। उन्होंने अपने पीछे लोहियावादियों की बड़ी जमात देश मे खड़ा किया जिसमें तत्कालीन बड़े-बड़े बुद्धिजीवी और साहित्यकार भी थे।
1967 मे पहली बार हिन्दुस्तान के आठ राज्यों से कांग्रेस सरकार को हटाकर गैर कांग्रेसी सरकार का गठन कराया। डा. लोहिया ने देश को जो दिशा और दृषिट दी है वह आज भी प्रासंगिक है और आज के बीमार विश्व एवं बीमार भारत के लिए डा. लोहिया की विचारधारा ही मात्र एक विकल्प है। जिस तरह से संतों में कबीर अनूठे है इसी तरह से डा. लोहिया राजनेताओं में अनूठे हैं। उनकी तुलना किसी से नहीं हो सकती है। माक्र्स के कथन ''धर्म अफीम है के विपरीत धर्म की अच्छार्इ को लेकर डा. लोहिया समाजवाद को चलाना चाहते थे। इस देश का यह दुर्भाग्य है कि आजादी के तुरन्त बाद महात्मा गांधी की हत्या कर दी गर्इ और जब देश मे परिवर्तन की लहर पैदा हुर्इ तो डा. लोहिया को चिकित्सा के दौरान हत्या कर दी गयी।
अत: डा. लोहिया के व्यकितत्व एवं कृतित्व को समग्रता में आज के युग में इंटरनेट पर लाना जरूरी है ताकि दुनिया समझ सके कि डा. लोहिया क्या थे और चाहते थे एवं किस षडयंत्र के शिकार हुए। इसी उददेश्य से डा. लोहियावाणी बेवसार्इट लांच कर असितत्व में लाया जा रहा है।