महात्मा गांधी एवं डा. राममनोहर लोहिया चिंतक ही नहीं थे, कर्मयोगी भी थे। मार्क्स जहां आर्थिक विषमता तक ही सीमित रह गये, वहीं डा. लोहिया ने सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विषमता को भी आधार बनाया। डा. लोहिया ने शोषण के सर्वव्यापी आयामों को उद्धाटित किया और प्रथम बार सप्तकांति की अवधारणा प्रतिपादित किया। रामायण मेला, नदियों को साफ करो, हिमालय बचाओ का नारा दिया और तिब्बत पर चीनी कब्जा का विरोध किया। विदेश नीति में स्वतंत्र गुटनिरपेक्ष की अवधारणा भी उन्हीं की थी। 1942 के स्वतंत्रता आंदोलन में भूमिगत रहकर आंदोलन को जिंदा बनाये रखा। नेपाल की राणाशाही के खिलाफ भी सर्वप्रथम उन्होंने ही संघर्ष छेड़ा और जेल गये। गोवा को आजाद कराने हेतु जेल गये, तब महात्मा गांधी ने कहा कि डा. राममनोहर लोहिया जेल मे है तो मैं कैसे चैन से बैठ सकता हूं।