डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
लोहिया विचार माला-2
लोहिया विचार माला- 2 प्रथम संस्करण: जुलाई,1993 प्रकाषकः राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद- 500195 उनको या उनके बच्चों को हिन्दी पढ़ाने के लिए स्कूल चलाओ। लेकिन हिन्दी का प्रचार कि तमिल को, तेलुगु को, बंगाली को हिन्दी जाननी चाहिए और जगह-जगह लोग लेक्चर दे देते हैं कि हिन्दी हिन्दुस्तान की भाशा बननी चाहिए, यह सब बंद हो जाना चाहिए। इससे बहुत नुकसान हो रहा है, क्योंकि पैसा और इज्जत और षान आज अंग्रेजी में है। एक तरफ दिल्ली की सरकार और दूसरी सरकारें हिन्दी का प्रचार करने के लिए करोड़ों रूपया खर्च करती हैं लेकिन वह करोड़ रूपये तो एक धेले के बराबर है। उस प्रचार का कोई मतलब ही नहीं क्योंकि नौकरी किसको बढि़या मिलेगी? हिन्दी जानता है उसको, या उसको जो अंग्रेजी जानता है? इनसाफ के लिए आदमी को खड़ा होना चाहिए, जहां भी हो। मैं नहीं जानता कि ईष्वर है या नहीं है लेकिन मैं इतना जानता हूं कि सारे जीवन और सृश्टि को एक में बांधने वाली ममता की भावना है, हालांकि अभी वह एक दुर्लभ भावना है। इस भावना को सारे कामों, यहां तक कि झगड़ों की भी पृश्ठ भूमि बनाना षायद व्यवहार में मुमकिन न हो। लेकिन यूरोप केवल सगुण, लौकिक सत्य को स्वीकार करने के फलस्वरूप उत्पन्न हुए झगड़ों से मर रहा है तो हिन्दुस्तान केवल निर्गुण, परम सत्य को ही स्वीकार करने के फलस्वरूप निश्क्रियता से मर रहा है। मैं बेहिचक कह सकता हूं कि मुझे सड़ने की अपेक्षा झगड़े से मरना ज्यादा पसन्द है। लेकिन विचार और व्यवहार के क्या यही दो रास्ते मनुश्य के सामने हैं? क्या खोज की वैज्ञानिक भावना का एकता की रागात्मक भावना से मेल बैठाना मुमकिन नहीं है, जिसमें एक दूसरे के अधीन न हों और समान गुणों वाले दो क्रमों के रूप में दोनों बराबरी की जगह पर हों। वैज्ञानिक भावना वर्ण के खिलाफ और स्त्रियों के हक में सम्पत्ति के खिलाफ और सहिश्णुता के हक में काम करेगी और धन पैदा करने के ऐसे तरीके निकालेगी जिससे भूख और गरीबी दूर होगी। एकता की सृजनात्मक भावना वह रागात्मक षक्ति पैदा करेगी जिसके बिना मनुश्य की बड़ी से बड़ी कोषिषें लाभ, ईश्या और घृणा में बदल जाती है। एक अधर्मी आदमी, या जो षायद ईष्वर के मामले में समझा जाता है कि नास्तिक है, षायद कुछ हद तक सही भी है, मैं उस बहस में नहीं पड़ना चाहता-वह इन सब चीजों को उठाता है कि नदियां साफ करो, तीर्थस्थानों को साफ करो, कैलाष मानसरोवर को या तो तिब्बत की रखवाली में रखो या हिन्दुस्तान को दो, लेकिन जो धर्म वाले लोग हैं, उनके दिमाग में ये बातें नहीं आतीं। हिन्दुस्तान में चोर को भी, डाकू को भी, देषद्रोही को भी कायदा-कानून मिलना चाहिए। उसके साथ मनमानी नहीं करनी चाहिए। एक सप्तवर्शीय योजना के अन्तर्गत देष के सभी किसानों को सब खेती के लिए सिंचाई का पानी वैसे ही मुफ्त दिया जाए जैसे नगर-वासियों को पीने का पानी। . रू 2 रू. कृश्ण एक बड़ा अद्भूत पुरूश था, अद्भूत जीव था। उसकी सभी चीजें दो या दो से ज्यादा थीं। दो नाम हैं कृश्ण के। जरा देखना, चमड़ी के बाहर निकलने की यह कैसी कोषिष है। यहां तक कि आज दुनिया, जो उसकी असली मां थी उसको षायद कभी भूल भी जाए लेकिन उसकी दूध पिलाने वाली मां थी, उसको नहीं भूल पाती-यषोदानन्दन ज्यादा हैं, देवकीनन्दन कम हैं। उसी तरह से उसके दो बाप थे। असली बाप से बाद वाला बाप ज्यादा मषहूर है। रह गयी स्त्रियां और प्रेमिकाएं, मैं उसका हिसाब तो नही लगाउंगा। षहर भी उसके दो थे, और बाद वाली द्वारका षायद मथुरा से कुछ ज्यादा ही हो गयी कुछ मामलों में। कैलाष पर्वत पर, जिसको कि आप अपने सत्संग में अक्सर षिव-पार्वती का पर्वत कहा करते हो, 10बरस पहले चीनियों ने अपना पंजा मारा और उसको अपने कब्जे में लिया। मैं समझता हूं, हिन्दुस्तान में धर्म, अधर्म के जो कुछ भी लोग हैं उनमें सिर्फ मैं ही था कि जिसने इस चीज के उपर हल्ला मचाया कि देखो, यह क्या हो रहा है, और जो धर्म के संगठित सम्प्रदाय हैं, उनकी तरफ से इस संबंध में कुछ भी नहीं कहा गया। एक तो चरित्र का दोश और दूसरे समझ का दोश। ये दो बिलकुल अलग-अलग हैं। मैं यह नहीं कहता कि चरित्र का दोश आज के उसूली धोखों में नहीं होता। होता है। जब आदमी या राजनीतिक पार्टी या कोई सरकार लालच से, घमंड से, गुस्से से, या दूसरे के उपर राज्य कायम करने की नीयत से बुरा काम करे, तो चरित्र का दोश है। लालच घमंड, गुस्सा, वगैरह चित्तवृत्ति के दोशों को हटाने के बाद भी, जो कोई समझ की कमी के कारण बुरा काम करता है वह समझ का दोशी होता है। जातिप्रथा ने कमाल किया है इसमें कोई षक नहीं- कमाल अच्छा नहीं, बुरा कमाल। देष के प्राण को एक मानी में खतम करने का काम किया है, जितना संसार में और कहीं नहीं हुआ। निष्चित तिथियां वैसी ही हैं जैसे दिया हुआ वचन। अपने देष में जीभ का बड़ा निरादर हो रहा है, खुद अपनी जीभ का। जीभ को पलटने का महान कुकर्म स्वाभाविक समझा जाने लगा है कि यह तरीका बदलना है। समय क्रम बांध कर हर कार्यक्रम पूरा करना चाहिए। हिन्दुस्तान के जो तीर्थस्थान हैं जहां हिन्दुस्तान की जनता करोड़ों-लाखों की तायदाद में हर साल इकठ्ठा हुआ करती है- द्वारका, रामेष्वरम्, गया, काषी और एक चीज पर ध्यान रखना, इन्हीं के साथ-साथ में अजमेर भी जोड़ता हूं। मुझे इससे विषेश मतलब नहीं कि वे तीर्थस्थान किसी एक विषेश धर्म और सम्प्रदाय के होते हैं। मुझे इससे मतलब है कि वे तीर्थस्थान ऐसे हैं कि जहां पर करोड़ों-लाखों की तायदाद में लोग इकट्ठा होते हैं। उन तीर्थस्थानों को साफ सुथरा बनाया जाए जिससे ये लाखों आदमी हर साल देखें कि किस तरह से सफाई की जिन्दगी चला सकते हैं। यह बात भी मुझ जैसे अधार्मिक आदमी के मुंह से निकली; धार्मिक ने नहीं कहा कि हमारे तीर्थस्थानों को सुन्दर, साफ और पवित्र बनाओ। विचार-जगत में हिन्दुस्तानी के दो दिल होते हैं, एक निर्गुण दूसरा सगुण, जिनका आपस में कोई सम्बन्ध नहीं। दुनिया में हर एक उसूल के दो रूप होते हैं एक सगुण और दूसरा निर्गुण, एक साधारण तथा व्यापक और दूसरा ठोस। ऐसा कोई उसूल नहीं है, जिसके ये दो रूप नहीं होते हों। सिर्फ धर्म या दर्षन में ही सगुण और निर्गुण नहीं हुआ करते। वहां तो ब्रह्म को सगुण और निर्गुण कहा गया है, दोनों षकलों को अलग-अलग बताने की कोषिष की गयी है। . रू 3 रू. अगर किसी उसूल को सिर्फ साधारण व्यापक और निर्गुण षकल में रख दिया जाता है, उसका ठोस मतलब नहीं बताया जाता है, तो वह धोखा और बेमतलब हो जाया करता है। अगर मैं अपने पुराने ऋशियों की जबान बोलूं, जैसे सुअर को कीचड़ में मजा आता है, उसी तरह लोगों की निर्गुण सिद्धान्तों में फंसे रहने से मजा आता है। अगर किसी देष और काल से बंधे हुए ठोस रूप पर अटक जाता है आदमी, असल षब्द है अटक जाता है, तब वह पिछड़ जाता है। लेकिन अगर ठोस रूप आ ही नहीं पाता, सिर्फ साधारण और निर्गुण रूप के दलदल में ही फंसा रहा जाता है, तब वह कहीं का रहता ही नहीं। यहां के नेता चाहे गांव के चाहे देष के, नेतागिरी का अर्थ समझते हैं कि निगरानी करें। हिन्दुस्तान के लिए यह एक बड़ा खतरा है। हिदायतों की एक आदमी से दूसरे आदमी और फिर तीसरे आदमी पर और इसके बाद भी लगातार एक षृंखला बंधती रहती है। यह बदलना चाहिए। अपनी ताकत भर काम तुरन्त और लगातार करना चाहिए। गांव से लेकर देष अथवा विष्व तक जब किसी सिद्धान्त या उसूल के नेता मर्यादा-पुरूश के रूप में काम कर लेते हैं तब जीवन-ज्योति, संगठन, षक्ति और संघ सभी बढ़ते हैं। किसी बीते युग के पिछड़े लोग कई बार नये युग के अगुआ बनते हैं, क्योंकि पुराने के लिए इनको ज्यादा मोह नहीं होता। हर एक बच्चे को सिखाया जाए, हर एक स्कूल में, घर-घर में, क्या हिन्दू क्या मुसलमान बच्ची-बच्चे को कि रजिया, षेरषाह, जायसी वगैरह हम सबके पुरखे हैं, हिन्दू और मुसलमान दोनों के। मैं यह कहना चाहता हूं कि रजिया, षेरषाह और जायसी को मैं अपने मां-बाप में गिनता हूं। यह कोई मामूली बात इस वक्त मैंने नहीं कही है। लेकिन, उसके साथ-साथ मैं चाहता हूं कि हममें से हर एक आदमी, क्या हिन्दू क्या मुसलमान, यह कहना सीख जाए कि गजनी, गोरी और बाबर लुटेरे थे और हमलावर थे। यह दोनों जुमले साथ-साथ हों, हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए कि गजनी, गोरी और बाबर हमलावर और लुटेरे थे, सारे देष के लिए, परदेषी होते हुए देषी लोगों की स्वाधीनता को खतम करने वाले लोग थे और रजिया, षेरषाह और जायसी वगैरह हमारे सबके पुरखे थे। पूंजीवादी दुनिया टिकी हुई है डर पर। मालिक को डर है दिवाले का और मजदूर को डर है बरखास्तगी का। इन दोनों डरों को नफे की उमंग और तरक्की की चाह कहा जा सकता है। कम्युनिस्ट दुनिया में एक तरफ गिरफ्तारी और मौत का डर और दूसरी तरफ अनुषासन की कार्यवाही। मुमकिन है कि बराबरी का जो मतलब सौ बरस पहले होना चाहिए था, वह आज न हो कर कोई दूसरा हो। सौ बरस के बाद कोई दूसरा हो जाए। लेकिन कोई यह कहे कि बराबरी हवा में रह सकती है बिना कोइ्र्र एक ठोस मतलब के तो यह नामुमकिन बात है। बेवकूफी और बेईमानी में फर्क है। मैं किसी को कम बुरा या ज्यादा बुरा नहीं कहता। लेकिन एक दृश्टि से बेवकूफी बेईमानी से ज्यादा बुरी चीज है, क्योंकि वह बेवकूफी मंत्रियों तक ही नहीं महदूद रहती, बल्कि वह बेवकूफी अपनी फांस में पकड़ कर सारे मुल्क के दिमाग को गंदा कर दिया करती है। . रू 4 रू. आलोचना की भाशा, तीव्र और कड़ी भाशा में और गाली में बड़ा अंतर है। चुनाव में दूसरों को गिराने के लिए जो लोग किस्से-कहानी सुनाते हैं वे तो अधम होते ही हैं, उन किस्सों को सुनने वाले और भी अधम हैं। ऐसी भाशा को सुन कर और ऐसे कामों को देख कर रूठ जाने वाले लोक अथवा काम और चुनाव के मैदान से भाग जाने वाले लोग भी अच्छे नहीं हैं। ऐसे लोग अपने मन ही मन में नहीं रूठते, वे अपनी रूठाई को बोते-बोते गन्दगी वहां फैलाते हैं। यह भी पूरी तरह समझना चाहिए कि किसी भी दल के आंतरिक चुनाव में हारने वाले लोग जीतने वाले की अपेक्षा प्रजातन्त्र की अधिक रक्षा करते हैं। नोट: राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाषित किये जाएंगे। बदरीविषाल पित्ती