डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
लोहिया विचार माला-4
लोहिया विचार माला- 3 प्रथम संस्करणः दिसम्बर, 1993 प्रकाषकः राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद-500 195 हर वक्त, हर देष-काल के मुताबिक अपने साधारण सिद्धान्तों को अमली रूप, ठोस रूप देने की कोषिष जब तक इन्सान करता रहेगा, तब तक वह अपने सगुण और निर्गुण दोनों को चलाएगा। जहां कर्म विभाजन नहीं, वहां संगठन हो ही नहीं सकता। ज्यादा से ज्यादा लोग लायक बनें और काम अपने अंग-अंग में पूरा हो, इसलिए कर्म विभाजन जरूरी है। आखिर जज में और षहरी में ऐसा रिष्ता होना चाहिए कि जज को षहरी की इज्जत करनी चाहिए तभी तो षहरी जज की इज्जत करेगा। मैं समझता हूं, गांधी जी ने भी धर्म को या ईष्वर को या सत्य को दरिद्रनारायण में देखा था और विषेश करके दरिद्रनारायण की रोटी में, क्योंकि दरिद्रनारायण का हित और अहित जो है, उसे ही यदि किसी अर्थ में आप धर्म समझो तो फिर करोड़ों लोगोंके फायदे और नुकसान की जो बातें हैं वह हमेषा दिमाग पर टकराती रहती हैं। वरना, हम लोग एक अलग-सी, हवाई दुनिया बसा लिया करते हैं, चाहे धर्म की, चाहे भोग की, चाहे काम की, चाहे मोक्ष की। केवल हिन्दुस्तान में दर्षन संगीत रूप मेंकहा गया। जब दर्षन और संगीत का जोड़ हो जाए तो मजा ही आएगा। मैं कुछ चीजें आपके सामने रखता हूं, जैसे नदियां साफ करना, खास तौर से गंगा, कावेरी, जमुना, कृश्णा वगैरह नदियां। आजकल इनमें कारखानों का गंदा पानी और षहरों का पेषाब-पाखाना सब बहाया जाता है। आप जब तीर्थयात्रा करने जाते होंगे तो वृन्दावन में आपने देखा होगा, जो वह पेड़ है जहां पर आज भी हिन्दुस्तान की औरतें एक छोटा सा चीर का टुकड़ा बांध दिया करती हैं। कृश्ण की चीरहरण लीला हुई थी। अभी तक वह प्रसंग चल रहा है। देखने में मुझे खुषी हुई, अच्छा सा लगता है, कुछ हंसी भी आती है। औरतों को मालूम हो जाए कि वे क्या कर रही हैं तो षायद थोड़ी देर के लिए लजा जाएं। खैर, उसी के ठीक नीचे वृन्दावन षहर का गंदा नाला बहता हुआ जमुना में गिरता है। लोग उसमें स्नान करते हैं। नदियों के साफ करने की बात किसके मुंह से निकली? जो धर्म के लोग हैं, उनमें से किसी ने नहीं कहा। नासमझ तो बेईमान से ज्यादा मुसीबत दुनिया के लिए पैदा करता है। . रू 2 रू. इन सभी हल न होने वाले झगड़ों के पीछे निर्गुण और सगुण सत्य के सम्बन्ध का दार्षनिक सवाल है। इस सवाल पर उदार और कट्टर हिन्दुओं के रूख में बहुत कम अन्तर है। मोटे तौर पर, हिन्दू धर्म सगुण सत्य के आगे निर्गुण सत्य की खोज में जाना चाहता है, वह सृश्टि को झूठा तो नहीं मानता लेकिन घटिया किस्म का सत्य मानता है। एक तरफ तो निर्गुण ब्रह्म है जिसके मुताबिक दुनिया में हर एक चीज एक है। और जब एक है तो बराबर भी है, क्योंकि गैर-बराबर हों तो दो हो जाते हैं जहां इकाई होगी वहां बराबरी जरूर रहेगी। जहां इकाई नहीं है, वहीं पर तो गैर-बराबरी हो सकती है। दुनिया और दुनिया के बाहर भी सारा विष्व, जो कुछ भी कहो उसको, सिर्फ एक सच्चाई है। चाहे घास, चाहे गधा, चाहे आदमी, चाहे सितारा, चाहे आसमान, सब एक हैं, बराबर। और उसे वे सच्चिदानन्द वगैरह के नाम से भी पुकारा करते हैं, सब एक हैं। यह तो निर्गुण ब्रह्म। और उधर सगुण ब्रह्म का मामला उठता है। तब घास और गधे को कौन कहे, आदमी में भी फर्क हो जाया करता है। कोई ब्राह्मण आदमी, कोई है ठाकुर-बनिया आदमी, कोई है रेड्डी और कापू आदमी। और तरह-तरह की बातें आ जाती हैं। कहो सच्चिदानन्द कहां हैं? बराबरी कहां है? इकाई कहां है? सब एक निर्गुण ब्रह्म है। और जहां सगुण वाला मामला उठता है तो घास और गधे की कौन कहे, आदमी में भी गैरबराबरी हो जाती है। ये दो खाने सबके दिमाग में कम और ज्यादा हैं। इतना जान लेना चाहिए कि निर्गुण सम्पूर्ण आदर्ष है, एक हवा, एक भीनी किन्तु सर्वव्यापी महक, एक सपना जो बहुत जल्दी टूट भी सकता है, लेकिन जिसमें यह भी ताकत है कि दुनिया को पलट दे, और सगुण है एक ठोस तथा पकड़ में आने वाली चीज, एक इंतजाम, घटना या रस उभारने वाली प्रक्रिया, खून में प्रेम या, गुस्से की गर्मी लाने वाला किस्सा, लेकिन ऐसा भी जो आदमी को तेली के बैल की तरह एक बंधी हुई लीक पर चला दे। निर्गुण है आदर्ष या सपना, सगुण है उसके अनुरूप मनुश्य या घटना। दोनों अलग हैं। दोनों को अलग रहना चाहिए। किन्तु दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं और एक-दूसरे के साथ सब कोर जुड़े हुए हैं। दिमाग में दोनों के खाने अगल-अलग रहना चाहिए, लेकिन दोनों में निरन्तर आवागमन होना चाहिए। मैंने बराबरी वाली मिसाल दी, एक और दस की। उसकेमानी यह नहीं हैं कि एक ओर दस का रिष्ता हमेषा के लिए हो गया। मुमकिन है सौ, पचास, चालीस बरस के बाद यह रिष्ता बदला जा सके, एक और दस की जगह एक और पचास हो जाए। फिर मुमकिन है एक और दो हो सके। मुमकिन है, नहीं हो सके। ब्रह्मज्ञान में जो चीज मुझे अच्छी लगती है, वह यह कि आदमी अपने संकुचित षरीर और मन से हट कर सब लोगों से अपनापन महसूस करे। यह है असली ब्रह्मज्ञान। . रू 3 रू. एक ब्रह्मज्ञान वह है जिसमंे घंटे, आध घंटे के लिए तप करके, या साधन लगा करके ब्रह्म को प्राप्त करने की कोषिष की जाती है, वह जो कुछ भी ब्रह्म होता हो। बाकी जो 23 घंटे रहते हैं, उसमें उसका कुछ पता नहीं रहता। ऐसा ब्रह्मज्ञान किसी काम का नहीं होता। एक घंटे के लिए तो ब्रह्म का खूब दर्षन कर लिया, बाकी 23 घंटे में अपनी जिन्दगी, अपना व्यापार, अपना कामकाज ठीक उसी ढंग से चलाया कि जैसे कोई ब्रह्म हो ही नहीं। फिर वह तो एक नकली जिन्दगी हो जाती है। मर्द-औरत के प्रकाष-व्यवहार की मर्यादाएं भी रखना जरूरी है। स्वच्छन्द और उच्छृखंल में फर्क है। आमने-सामने और रजामन्दी से बातें करना कुछ और है और पीछे से छेड़खानी करना, तिरछे घूरना और उलजलूल बकना अनुचित काम है। मर्यादा केवल न करने की नहीं होती, करने की भी होती है। बुरे की लकीर को मत लांघो, लेकिन अच्छे की लकीर तक चहल-पहल तो होनी ही चाहिए। हिन्दुस्तान की जिन्दगी के जो सबसे बड़े पांच मकसद हैं उनको अपनी समझ के मुताबिक मैं गिनाउंगा। एक बराबरी, दूसरा जनतंत्र, तीसरा विकेन्द्रीकरण, चैथा अहिंसा और पांचवां समाजवाद। साफ-सी बात है कि मुसलमान जैसी चीज नहीं रहनी चाहिए राजनीति में। टूट जाना चाहिए। जैसे हिन्दू टूटते हैं अलग-अलग पार्टियों में, वैसे मुसलमानों को भी टूटना चाहिए। लेकिन यह बात कुछ मानी हुई-सी है कि मुसलमान जाएगा तो एक साथ जाएगा। हमेषा वह कोई न कोई इत्तेहाद बनाएगा। वक्त की पाबन्दी अभी पूरी तरह नहीं की जाती, षायद इसलिए कि वक्त की पाबन्दी नौकरों की निषानी है। जब विद्यार्थी राजनीति नहीं करते तब वे सरकारी राजनीति को चलने देते हैं और इस तरह परोक्ष में राजनीति करते हैं। एक साधारण और दूसरा ठोस, एक सगुण और दूसरा निर्गुण, और उन दोनों का आपस में रिष्ता कायम होना चाहिए। लेकिन अगर कोई यह समझे कि दोनों मिटाये जा सकते हैं या एक ही किये जा सकते हैंः तो वह गलती करेगा। ठोस रूप को ही हमेषा के लिए साधारण रूप समझ लिया जाए तो हम फंसे रह सकते हैं, पिछड़ जाते हैं, किसी चीज की रट में पड़ जाते हैं, दकियानूसी बन जाते हैं। इसलिए दो खाने तो रहने ही चाहिए। लेकिन इन दो खानों में, आपस में , आमद-रफ्त होनी चाहिए। दुनिया में गंदे विचार के पीछे कहीं कोई छोटा-सा सच छिपा हुआ रहता है जिसको मौका मिल जाता है। . रू 4 रू. जिस देष में समता अथवा षांति के अर्थ न केवल बाहरी और आर्थिक समता रहे हों बल्कि सुख-दुःख के हेर-फेर में आंतरिक समता, वहां ज्ञान सुलभ होना चाहिए। आज कोसों दूर है-दुनिया में हम सबसे गरीब और सबसे अज्ञानी देष हैं। किसी भी सिद्धान्त को गेंद की तरह सगुण और निर्गुण दोनों दिमागी कितों में लगातार फेंकते रहने से ही एक सजीव आदर्ष गढ़ा जाता है। पूरा अलगाव करने से पाखंड और असचता की सृश्टि होती है। पूरा एकत्व कर देने से क्रूरता या बेमतलब दौड़ की सृश्टि होती है। सिर्फ सगुण में ही फंस जाने से आदमी दकियानूसी हो जाता है। सगुण को पूरी तरह निर्गुण ही मान लेने से आदमी के क्रूर होने की सम्भावना है। केवल निर्गुण में फंसे रहने से आदमी के निश्क्रिय होने की सम्भावना है। निर्गुण को पूरी तरह और एकदम सगुण बनाने का प्रयत्न पागल कर सकता है। देष और काल को भुला देने वाली आदर्षवादिता पागलपन है। देष और काल में फंसी व्यवहारिकता तेली का बैल है। पागलों में और लीक के फकीरों में अन्तर नहीं, कम से कम फल की मोटी दृश्टि से। जो है, उसे सपना कभी नहीं समझना चाहिए। सपने को देष-काल के चैखटे के बाहर की कभी नहीं गढ़ना चाहिए। दिमाग में आदर्ष और असलियत के दोनों खानों के बीच में लगातार आवागमन होता रहना चाहिए, और एक को दूसरे की कसौटी पर कसते रहना चाहिए। आदर्ष की कसौटी है असलियत, और असलियत की कसौटी है आदर्ष। लेकिन दोनों को एक करने में भी उतना ही खतरा है, जितना दोनों को बिन-सम्बन्ध अलग कर देने में। जब तक हिन्दुओं के दिमाग से वर्ण भेद बिलकुल ही खतम नहीं होते, या स्त्री को बिलकुल पुरूश के बराबर ही नहीं माना जाता, या सम्पत्ति और व्यवस्था के सम्बन्ध को पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता तब तक कट्टरता भारतीय इतिहास में अपना विनाषकारी काम करती रहेगीऔर उसकी निश्क्रियता को कायम रखेगी। अन्य धर्मों की तरह हिन्दू धर्म सिद्धान्तों और बंधे हुए नियमों का धर्म नहीं है बल्कि सामाजिक संगठन का एक ढंग है, और यही कारण है कि उदारता और कट्टरता का युद्ध कभी समाप्ति तक नहीं लड़ा गया और ब्राह्मण-बनिया मिल कर सदियों से देष पर अच्छा या बुरा षासन करते आये हैं जिसमें कभी उदारवादी ऊपर रहते हैं कभी कट्टर पंथी। हिन्दुओं को अपना मन अब साफ कर लेना चाहिए कि आखिर इस मुल्क के हम सब नागरिक हैं। अगर मान लो कि थोड़ा-बहुत मामला षक का है और कभी किसी टूट के मौके पर कुछ मुसलमानों का भरोसा नहीं किया जा सकता कि टूट के मौके पर वे यह या वह रूख अख्तियार करेंगे, तो एक बात अच्छी तरह समझ लेना है कि जितना ज्यादा हिन्दू मुसलमानों के लिए षक करेंगे, मुसलमान उतना ही ज्यादा खतरनाक बनेगा और हिन्दू जितनी ज्यादा सद्-भावना या प्रेम के साथ मुसलमान के साथ बर्ताव करेंगे, उतना कम खतरनाक मुसलमान बनेगा। . रू 5 रू. हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में जैसे और दो मुल्कों में दोस्ती होती है वैसे तो दोस्ती हो ही नहीं सकती, क्योंकि जहां हमारी दोस्ती षुरू होगी, वह रूक नहीं सकती, दोस्ती बढ़ती ही चली जाएगी और बढ़ती चली जाएगी। कहीं न कहीं वह महासंघ या एके पर रूकेगी। उसके पहले नहीं। और अगर वह दोस्ती नहीं होती तो दुष्मनी, युद्ध की जैसी स्थिति बनेगी, चाहे युद्ध हो न हो लेकिन युद्ध जैसी स्थिति रहेगी। हम दोनों एक ही जिस्म के दो टुकड़े हैं, इसलिए हमारे बीच में मामूली दोस्ती के सवाल को मत उठाना। अतः हिन्दू व्यक्तित्व दो हिस्सों में बंट गया है। अच्छा हालत में हिन्दू सगुण सत्य को स्वीकार करके भी निर्गुण परम सत्य को नहीं भूलता और बराबर अपनी अन्तर्दृश्टि को विकसित करने की कोषिष करता रहता है, और बुरी हालत में उसका पाखंड असीमित होता है। हिन्दू षायद दुनिया का सबसे बड़ा पाखंड़ी होता है, क्योंकि वह न सिर्फ दुनिया के सभी पाखंडियों की तरह दूसरों को धोखा देता है बल्कि अपने को धोखा दे कर खुद अपना नुकसान भी करता है। सगुण और निर्गुण सत्य के बीच बंटा हुआ उसका दिमाग अक्सर इसमें उसे प्रोत्साहन देता है। पहले, और आज भी हिन्दू धर्म एक आष्चर्य जनक दृष्य प्रस्तुत करता है। हिन्दू धर्म अपने मानने वालों को, छोटे से छोटे को भी, ऐसी दार्षनिक समानता, मनुश्य और अन्य वस्तुओं की एकता प्रदान करता है जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलता। दार्षनिक समानता के इस विष्वास के साथ ही गन्दी से गन्दी सामाजिक विशमता का व्यवहार चलता है। मुझे अक्सर लगता है कि दार्षनिक हिन्दू खुषहाल होने पर गरीबों और षूद्रों से पषुओं जैसा, पषुओं से पत्थरों जैसा और अन्य वस्तुओं से दूसरी वस्तुओं की तरह व्यवहार करता है। षाकाहार और अहिंसा गिर कर छिपी हुई क्रूरता बन जाते हैं अब तक की सभी मानवीय चेश्टाओं के बारे में यह कहा जा सकता है कि एक न एक स्थिति में हर जगह सत्य क्रूरता में बदल जाता है और सुन्दरता अनैतिकता में, लेकिन हिन्दू धर्म के बारे में यह औरों की अपेक्षा ज्यादा सच है। हिन्दू धर्म ने सच्चाई और सुन्दरता की ऐसी चोटियां हासिल की जो किसी और देष में नहीं मिलती, लेकिन वह ऐसे अंधेरे गढ़ों में भी गिरा है जहां तक किसी और देष का मनुश्य नहीं गिरा। जब तक हिन्दू जीवन की असलियतों को, काम और मषीन, जीवन और पैदावार, और जनसंख्या वृद्धि, गरीबी और अत्याचार और ऐसी अन्य असलियतों को वैज्ञानिक और लौकिक दृश्टि से स्वीकार करना नहीं सीखता, तब तक वह अपने बंटे हुए दिमाग पर काबू नहीं पा सकता और न कट्टरता को ही खतम कर सकता है, जिसने अक्सर उसका सत्यानाष किया है। नोटः राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाषित किये जाएंगे। बदरीविषाल पित्ती