डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
लोहिया विचार माला-6
लोहिया विचार माला- 5 प्रथम संस्करण: अगस्त, 1996 प्रकाषक: राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद- 500 095 जबतक सेना रहती है, यह सिद्धान्त आप याद रखना, तबतक उसको षक्तिषाली बनाकर और अगर सेना को खतम करना है तब दूसरे प्रयोग करो। दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकती कि सेना को रखो भी और उसको कमजोर रखो। या तो सेना रखो मत, और रखते हो तो उसको षक्तिषाली बना कर रखो जिससे दुष्मन कनखियों से भी देष को देख न पाए। यह निष्चित बात है कि जब तक संसार में अन्याय है तब तक हथियार का खतम होना असम्भव है क्योंकि हथियार क्या होता है? हथियार होता है या तो अन्याय करने के लिए या अन्याय से लड़ने के लिए। दूसरे पर कब्जा करना है, दूसरे का माल लूटना है, दूसरे के ऊपर राज चलाना है, तो हथियार चाहिए, और अत्याचारी को अगर खतम करना है तब हथियार चाहिए। अतः अन्याय खतम करना पडे़गा। इसीलिए मैं आपको एक षुभ सन्देष देना चाहता हूं कि सारे संसार में आज एक साथ अन्यायों के खिलाफ लड़ाई चल रही है। यही हमारी षताब्दी की खूबी है। हमारी षताब्दी बड़ी क्रूर है, बड़ी बेरहम है। इसमें इतना अत्याचार होता है जितना दुनिया में कभी नहीं हुआ। लेकिन हमारी षताब्दी की एक खूबी यह भी है कि मनुश्य पहली दफा सभी अन्यायों के साथ एक साथ लड़ रहा है, और अगर कहीं जीत गया, तो षायद अगले 25-30 बरस में जो भी अन्याय है, कई किस्म के अन्याय हैं, जाति-बिरादरी वाला अन्याय, कोई ऊँची जाति, कोई छोटी जाति, गरीब-अमीर का अन्याय है, नर-नारी का अन्याय है, गोरे-रंगीन लोगों का अन्याय है, इन सब अन्यायों के खिलाफ संसार में लड़ाई चल रही है। अगर यह लड़ाई सफल हो गयी तो ऐसा समय आएगा जब हमसब लोग, संसार के आदमी पहली दफा समता, सम्भव समता, सम्पूर्ण समता नहीं, और सुख की साँस ले सकेंगे। मानवीय इतिहास के दो ढ़ूर हैंः तर्क और हथियार। सिविल नाफरमानी में तर्क और हथियार दोनों का मिश्रण है। इसमें एक ओर तो तर्क का माधुर्य है, दूसरी ओर हथियार का बल भी। षिक्षा के साथ तर्क और एक प्रकार की दृश्टि का निर्माण भी जरूरी है, अन्यथा षिक्षा जिन्दगी में किसी भी प्रकार की चेतना नहीं ला सकती। तर्क जानकारी और दृश्टि मंे तारतम्य स्थापित करता है। . रू 2 रू. 26 जुलाई, 1956 विष्व इतिहास की महान घटना है। उस दिन मिश्र ने स्वेज नहर का राश्ट्रीयकरण कर दिया। विदेषी पूंजी जो 20-30 दफे मूलधन को ब्याज के रूप में ले चुकी थी, उसका राश्ट्रीयकरण हुआ। मैंने इसे विष्व घटना कहा है। 15 अगस्त, 1947 विष्व-घटना नहीं है, भले ही वह हिन्दुस्तान के लिए महत्वपूर्ण हो। हाँ, 1 अगस्त, 1920 विष्व-घटना है। उस दिन अन्याय के खिलाफ लड़ाई का नया रास्ता निकला। इसी तरह 1905 का षुमार, जब जापान ने रूस का यानी एक काले मुल्क ने गोरे मुल्क को हराया, विष्व-घटना में होगा। किसी भी सभ्यता में कौषल अभी तक सम्पूर्ण कौषल की दिषा में नहीं बढ़ा है। मानव सभ्यता ने अभी तक एक दिषा-विषेश में ही अधिकतम कौषल हासिल करने की कोषिष की है। उदाहरण के लिए, यूरोप की आधुनिक सभ्यता में विज्ञान का प्रयोग निरंतर बढ़ते जीवन स्तर के लिए होता आ रहा है, लेकिन राश्ट्रीयसीमाओं के अन्दर ही। इसीलिए मैं कहता हूँ कि फोर्ड और स्टालिन में कोई अन्तर नहीं। सभ्यता तभी कायम रह सकती है, जब उसका प्रभाव सर्वव्यापी हो, और वह भी यथासम्भव समान रूप से व्याप्त हो। इसलिए अधिकतम कौषल की जगह, सम्पूर्ण कौषल की सभ्यता बनानी है। केवल देष की अन्दरूनी समानता ही नहीं, बल्कि देषों के बीच आपस में भी समानता हो। इतिहास की दो गतियाँ हैः एक तो षक्ति का क्षेत्रीय परिवर्तन, और दूसरा समाज का वर्ग से जाति में, और जाति से वर्ग में परिवर्तन। अब तक की सभ्यताओं में यही गति रही है। सतह की जानकारी को ज्ञान मानना अच्छा नहीं होता है। समाजवाद समाजवाद है, उसे किसी विषेशण की जरूरत नहीं। हम षब्दों पर नहीं, उसके पीछे के अर्थ पर जाते हैं। पुष्तैनी गुलाम ये हैं, जो चाहे जिसका राज हो, जितनी बार राज बदले, हमेषा किसी-न-किसी तरह राजगिरी में हिस्सा बंटाने लगते हैं। ये जिसका राज होता है, उसकी भाशा बोलते हैं। क्या सचमुच भूख-हड़ताल से आत्मा सुधरती है। अगर कोई आदमी बिना बताए प्राण छोड़ दे, तो आत्मा षुद्ध होने की बात समझ में आ सकती है। मिसाल के लिए जैनी मुनियों को लें, 70-80 साल की उम्र में वे ऐसा करते हैं। इसे हम व्यक्तिगत उपवास कहेंगे। इनके बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। यह तो निजी विष्वास की चीज है। . रू 3 रू. दूसरा उपवास जेल में अपमान होने पर किया जा सकता है। वहां षरीर के अतिरिक्त मन पर भी बंधन लगाया जाता है। ऐसी हालत में उपवास के अलावा कोई चारा नहीं रहता। यतीनदास ने ऐसा ही किया। वे अपनी जगह पर दुरुस्त थे। तीसरी स्थिति है जनता के बीच बता कर भूख हड़ताल की। यह बड़ी खतरनाक स्थिति है। सोषलिस्ट-आन्दोलन भी इसके चंगुल से मुक्त नहीं है। आंध्र के श्रीरामुलू को छोड़ कर, अब तक मुझे कोई सच्चा अनषन करने वाला नहीं दिखाई दिया। स्वयं गाँधी जी के उपवासों में षक किया जाता है, और करने की गुंजायष भी है। इस सिलसिले में एक बार मेरी उनसे बातें हुई थीं। मैंने कहा, ‘‘आपके उपवास से देष मंे कमजोरी फैलेगी। यदि इससे देष को आजादी मिल भी गयी, तो वह एक व्यक्ति का पराक्रम माना जाएगा।‘‘ गाँधी जी ने कहा- ‘‘ तुम बीच की एक कड़ी भूल रहे हो। जनता मेरे साथ सहयोग करेगी।‘‘ इसे वे अहिंसात्मक षक्ति का तरीका मानते थे। मैंने फिर पूछा, ‘‘ क्या अनषन से आप मुल्क में धोखा नहीं फैला रहे हैं? ‘‘ इस बार गाँधी जी हँसे, उन्होंने कहा, ‘‘ सारे संसार की बेईमानी के कारण मुझे क्यों बेईमान कहते हो? ‘‘ इतना तो साफ है कि अनषन से धोखेबाजी और व्यक्तिवाद फैलता है, साथ ही लक्ष्य भी गौण हो जाता है। परमार्थ के लिए कानून तोड़ना अनुषासन हीनता नहीं है। कर्तव्य करने वाला एक होता है। सैकड़ों उसकी स्तुति करने वाले होते हैं। आज हिन्दुस्तान को ऐसे ही कर्तव्य-परायण कानून तोड़ने वालों की जरूरत है, जो हर स्थिति में मुसीबत और तकलीफ उठा कर अन्याय का विरोध करने के लिए कमर कस के तैयार रहें। इतिहास में अब तक जनता के दो रूप देखने को मिले हैंः गाय या षेर के। या तो वह गाय बन कर जालिम के जुल्म को बरदाष्त करती है, या षेर की तरह हिंसक बन जाती है। मैं इन दोनों स्वरूपों को नापसन्द करता हूं, क्योंकि इसके द्वारा कोई बुनियादी परिवर्तन नहीं हो सकता। हथियारी इन्कलाब गाय-षेर के बीच की चीज है। मगर सिविल नाफरमानी का मतलब है मामूली इंसान की मामूली वीरता के साथ काम चलाना। सिविल नाफरमानी नया इंसान पैदा करती है, जो जालिम के सामने घुटने नहीं टेकता, लेकिन साथ ही उसकी गर्दन भी नहीं काटता। इसके प्रयोग से एक नई सभ्यता का निर्माण हो सकता है। जालिम वहीं होते हैं, जहां दब्बू होते हैं। जालिम का कहामत मानो, यही सिविल नाफरमानी का मतलब है। सिविल नाफरमानी सबसे पहले हिन्दुस्तान में ही जन-साधारण के लिए सुलभ हुई। मगर यहीं जम कर उसका निरादर होता है। षायद ही संसार के किसी बच्चे ने अपनी मां के पेट को इतना ठुकराया हो, जितना इस राज्य ने। . रू 4 रू. सही कसौटी कड़े परिश्रम की नहीं है, बल्कि ईमानदारी से काम करने की है, जो बहुत कठोर है। अमरीकी, रूसी, अंग्रेज जो रोज के काम और जीवन में एक दूसरे से झूठ बोलते वे सामूहिक रूप में अपने देष से बाहर की दुनिया के सम्बन्ध में झूठ और क्रूरता के बहुत अधिक अभ्यस्त हैं। वे बहुत बड़े पैमाने पर विध्वंस करते हैं, रोग फैलाते हैं, और कुकर्म करते समय, कुकर्म के पहले और बाद भी झूठ बोलते हैं। वे अपने राज्य और उसके चलाने वालों को यह सब करने देते हैं, और यह सोच कर संतोश कर लेते हैं या मन और आत्मा को विक्षिप्त होने से बचा लेते हैं कि उनका व्यक्तिगत तौर पर या सीधे इससे कोई संबंध नहीं है। जब तक निगरानियों और मध्यवर्गीय सभ्यता का निर्ममता से विनाष नहीं किया जाता, तब तक हिन्दुस्तान और रंगीन दुनिया के एक बड़े हिस्से का कोई भविश्य नहीं है। जिसमानी और दिमागी श्रम से होने वाले फायदे के बीच न्यायपूर्ण और बराबरी का रिष्ता कायम करना होगा और निगरानीकार तथा नियंत्रण करने वालों की संख्या निर्ममता से घटानी होगी। राजनीतिक सफलता अक्सर ऐसे लोगों को मिलती है जो सच के साथ झूठ को मिलाना जानते हैं, और जिनके लिए उदारता और सहयोग के साथ-साथ अलगाव और निर्ममता का व्यवहार आदर्ष है। क्रान्ति के लिए विचार-दर्षन की जरूरत होती है। इसलिए क्रान्ति करने वालों के लिए विचार-दर्षन हर हालत में जरूरी है। सच, कर्म और चरित्र को क्रान्ति के बाद की चीज नहीं समझना चाहिए। इन्हें तो क्रान्ति के साथ-साथ चलना चाहिए। यही वजह है कि कुछ हद तक आधुनिकमानव पर राजनीतिक दल का बहुत निर्णायक असर पड़ता है। अगर राजनीतिक दल क्रान्ति के साथ-साथ चरित्र निर्माण का काम भी अपना लें तो राजनीति पवित्रता प्राप्त करेगी जो अभी उसको नहीं मिलती है। ऊँची गद्दी के लोगों की सुविधाएं खास कर ऐसे देष में जहां गरीबी ने सामाजिक चेतना मन्दी कर दी हो और जहां राजनीतिक गद्दी के साथ षानषौकत और ऐयाषी स्वाभाविक मानी जाती हो, वहां धनी से धनी लोगों को भी ईश्र्या होगी। राजनीति में लगे लोग जीवन में स्वतंत्रता, रूतबे और अधिकार से सन्तुश्ट भी होते हैं, जो उन्हें दूसरे पेषे में नहीं मिल पाते और इसके लिए वे दूसरी सुविधाओं और आराम को भी छोड़ते हैं। अवज्ञा की आदत सम्भव है, हिंसा की आदत असम्भव। . रू 5 रू. शडयन्त्र और हथियार से निरन्तर क्रान्ति असंगत बात है। सिविल नाफरमानी के जरिये निरन्तर क्रान्ति की सम्भावना निष्चित है। जीत लाजिमी तौर पर सफलता नहीं है, और न हार असफलता। अत्याचार और ऐयाषी के खिलाफ सिविल नाफरमानी की सौ वर्शीय योजना के जरिये आदमी अब भी रूतबे को अत्याचार और आराम को ऐयाषी का विकराल रूप लेने से बचा सकता है। अपने विषुद्ध रूप में अच्छाई की खोज करना सिविल नाफरमानी है। सिद्धान्त में ंव्यक्तिगत प्रतिश्ठा या पद का असर इसे दूशित नहीं करता। अगर ऐसा मुमकिन हो कि सिविल नाफरमानी करने वालों के झुण्ड तैयार हो और वे बढ़ते रहें, जिन्हें अन्याय की अवज्ञा के सिवा और कोई महत्वाकांक्षा न हो और न्याय का अमल वेदूसरों पर छोड़ दें, तो बहुत अच्छा। इन सिविल नाफरमानी करने वालों का स्वरूप अनुपम और षुद्ध होगा। जब तक बड़े पैमाने पर ऐसा चमत्कार नहीं हो जाता राजनीतिक क्रिया में न्याय पर अमल करने के साथ रूतबा हासिल करने के लिए गद्दी की चाह जरूरी होगी। अत्याचार की अवज्ञा, न्याय पर अमल और रूतबे की खोज, ये तीन स्थायी तत्व मिल कर राजनीति में आदमी को अच्छे काम के लिए प्रेरित करते रहेंगे। सत्ता प्राप्त करने की सात वर्शीय योजना अच्छी है अगर, कम-से-कम मन में अन्याय से लड़ने और सच का निर्माण करने की सौ वर्शीय योजना से वह पुश्ट की जाए। जिसका ध्यान एक क्षण के लिए भी डँावाडोल नहीं होता, उसकी जीत होती है। मन और चित की ऐसी एकाग्रता अन्दरूनी भी हो सकती है। सम्पूर्ण अनुषासन वह है, जिसमें अन्दरूनी और बाहरी एकाग्रता की जरूरत होती है। हिन्दुस्तान में हमेषा से बड़े लोगों का साथ और छोटे लोगों का अलग कर देना, उनसे नफरत करना, उनको आदमी नहीं समझना, यह कम से कम पिछले हजार-डेढ़ हजार बरस से चला आ रहा है। अब वह और मजबूत हो गया है। हिन्दुस्तान में एक सबसे बड़ा रोग इस वक्त यह है कि जब आदमी हिन्दुओं के बीच बोलता है तो थोड़ा सा हिन्दू मामलों में दबक के बोलता है ताकि सुनने वाले थोड़ा खुष हों और जब मुसलमानों के बीच है तो मुसलमानी मामलों में थोड़ा सा दबक के बोलता है। हिन्दू और मुसलमान दोनों के दिमागों के अन्दर जो खराब बातें हुई हैं, निकल नहीं पातीं। ज्यादातर हिन्दू यह सोचता है कि अपने मुल्क में आज का मुसलमान, नादिरषाह, तैमूरलंग, गजनी-गोरी के लिए जिम्मेदार है। जब तक उसके दिमाग में यह बात धँसी हुई है, तब तक वह मुसलमानों को अपना भाई समझ नहीं सकता। यह है मोटी बात। इसको पकड़ो। इसके साथ-साथ मुसलमान-दिमाग में भी खराबी है। आम तौर से मुसलमान सोचता है कि वह तो तैमूरलंग, नादिरषाह और गजनी-गोरी की औलाद है और अगर ये न आते तो वह होता कहां से। . रू 6 रू. बुनियादी बात और असलियत यह है कि आज के मुसलमान को तैमुरलंग या नादिरषाह से क्या मतलब पड़ा हुआ है, क्या वास्ता है। तैमुरलंग या नादिरषाह ने जो कत्लेआम किया तो कौन मरे? नादिरषाह ने करीब डेढ़ लाख आदमी 24 घंटे के अन्दर मारे थे दिल्ली में। वे सब हिन्दू नहीं थे, उनमें से एक लाख तो मुसलमान थे। नादिरषाह ईरानी मुसलमान था। उसने जिन्हें मारा था वे थे मुगल मुसलमान। तैमूरलंग को चार दिन तक गुस्सा आया था। नादिरषाह का गुस्सा तो 24 घंटे में खतम हो गया। चार दिन में उसने 4-5 लाख आदमियों का कत्लेआम किया था। उसमें तीन-साढे़ तीन लाख पठान मुसलमान थे। न हिन्दुओं को, न मुसलमानों को किसी को यह बात नहीं समझायी जाती। कौन हिन्दू है जो हिन्दुओं को जा कर कहेगा कि तुम मुसलमानों को अपना भाई समझो और कि रजिया, षेरषाह, जायसी, रहिमन वगैरह को अपना पुरखा समझो। अगर हिन्दुस्तान को एक कौम समझते हैं तो फिर आज का जो हिन्दुस्तानी है, चाहे हिन्दू, चाहे मुसलमान, उसके मां बाप में रजिया का नाम लिया जाना चाहिए। उसके मां-बाप में षेरषाह का नाम होना चाहिए। असली हिन्दुस्तानी हैं, रजिया, षेरषाह, जायसी वगैरह। हिन्दू के दिमाग में यह धंसना चाहिए कि आज का मुसलमान तो किसी जमाने का हिन्दू है और कि हमारे पुरखे इतने कमजोर थे, इतने दब गये थे, इतने नामकूल हो गये थे कि जब कोई परदेसी आता था उसके सामने टिक नहीं पाते थे। गुस्सा किससे करना चाहिए? गजनी से। आज के मुसलमान का तो गजनी से कोई ताल्लुक है नहीं। धर्म तो है लम्बे पैमाने की राजनीति और राजनीति है छोटे पैमाने का धर्म। इनको और ज्यादा सोचें तो इस तरह से चलेगा कि मजहब का काम है अच्छाई को करे और राजनीति का काम बुराई से लड़े। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन फर्क कभी भूल नहीं जाना चाहिए कि एक बुराई से लड़ता है, एक अच्छाई को करता है। दोनों को अगर एक दूसरे के लिए हमदर्दी हो, प्रेम हो, तो मामला अच्छा चल जाएगा। लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज दोनों में बहुत खींचातानी है। इसीलिए मजहब जब सिर्फ अच्छाई करने बैठ जाता है तो कुछ-कुछ बेजान हो जाता है, क्योंकि बुराई से वह लड़ता नहीं और बुराई से लड़ते-लड़ते सियासत जब बिलकुल बुराई की लड़ाई में फँस जाती है, तो वह कुछ कलही हो जाती है। सुलह फिर उसमें नहीं रहती, कलह आ जाती है। आज की सियासत में कलह आ गयी है और आज के मजहब में एक सुस्ती या मुर्दनी आ गयी है। यह बीसवीं सदी बहुत बेरहम सदी है। षायद इससे ज्यादा बेरहम सदी दुनिया में कभी हुई नहीं। फाँसी के मामले में मेरी राय अलग है कि जब इनसान को किसी को जिन्दगी देने का तरीका नहीं मालूम है, तो फिर उसे जान लेने का भी हक नहीं होना चाहिए। ये जो हिन्दू-मुसलमान दंगों में लोग मरे थे तो आमने-सामने की लड़ाई में नहीं। ऐसा नहीं हुआ था कि हिन्दुओं का एक गिरोह ओर मुसलमानों का एक गिरोह एक दूसरे से लड़ रहे हों। दंगों में आमने-सामने की लड़ाई कभी नहीं हुई। जब लड़ाई होती थी, तो हिन्दुओं का एक गुट बन जाता था, उसमें से चार-छह के हाथ में हथियार होते थे, उनका दिमाग खराब हो जाता था और वे मोहल्लों में निकल कर जहां कहीं कोई इक्का-दुक्का मुसलमान, औरत और बच्चे मिल जाते उनका कत्ल कर देते थे। उसी तरह से मुसलमानों के गुट बन जाते थे। इन गुटों का आमने-सामने मुकाबला नहीं हुआ। हमेषा बेसहारा आदमी को पकड़ के मारा गया है। इससे बेरहम चीज और क्या हो सकती है। इस बेरहम सदी में एक बात बड़ी अजीब हो रही है, अनोखी हो रही है कि करीब-करीब सब तरह की नाइंसाफियों के खिलाफ इनसान एक साथ उठ रहा है। ऐसा कभी पहले नहीं हुआ। वह चाहे मर्द-औरत के बीच की गैरबराबरी हो, अमीर-गरीब के बीच की गैरबराबरी हो, चाहे उँची जाति, छोटी जाति के बीच की गैरबराबरी हो, चाहे गोरे और काले के बीच की गैरबराबरी हो। दुनिया में यह बहुत अच्छा रूझान चल रहा है कि एक नाइंसाफी के खिलाफ नहीं, सभी नाइंसाफियों के खिलाफ इनसान एक साथ उठा है। हथियार कैसे खतम होंगे? मुझे खुद बहुत मुष्किल मालूम होता है। बड़े हथियार, मान लो खतम कर दिये जाएं, तो छोटे कैसे खतम होंगे? क्योंकि छोटे हथियार खतम होने का मतलब है, पूरी तरह से नाइंसाफी खतम होना। वहीं मुझको थोड़ी आषा दिखाई देती है कि हथियार पूरी तरह से तब खतम होते हैं जब नाइंसाफी खतम होगी। अबकी दफे, क्योंकि सब नाइंसाफियों के खिलाफ आदमी एक साथ उठ खड़ा हुआ है, ये नाइंसाफियां भी खतम हों और षायद इस बीसवीं सदी के खतम होने तक एक अच्छी दुनिया बने। पीछे देखू दिमाग खराब होता है और बगल देखू भी खराब होता है। आज वे सब बगल-देखू हैं, जो अपने को समझते हैं कि हम आधुनिक हो गये हैं, नयी दुनिया के हो गये हैं। असल में वे सिर्फ रूस और अमरीका की नकल करते हैं, जो बगल में ताकतवर मुल्क हैं उनकी नकल करना। हमको आगे-देखू बनना है। आगे-देखू दिमाग न तो बगल-देखू होगा और न तो पीछे-देखू होगा। . रू 8 रू. अच्छी चीज जो हिन्दुस्तान में हो रही है वह यह कि हमारे अन्दर से डर धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे कम हो रहा है। जब मैं ‘हमारे‘ कहता हूं तो मेरा मतलब सिर्फ बड़े लोगों से नहीं है। ऐसे लोग हैं, जो जनता को जाहिल समझते हैं जब कि प्रायः पढ़े-लिखे लोग ही जाहिल हुआ करते हैं। अभी जो मैंने कहा है उसे इतना तो षायद साबित हुआ होगा कि हम लोग कितना पुराना नया कूड़ा मिला कर कैसा जहर पैदा करते हैं। मैं मानता हूं कि हिन्दुस्तान की जनता इस वक्त बहुत गिरी हुई है, दिमागी और जिस्मानी, दोनों हालत में। लेकिन जब यह उँचा उठेगी, तभी तो हिन्दुस्तान बन पाएगा। इधर बहुत बरसों से हिन्दुस्तान के साधारण आदमी में डर, कोई अंग्रेजी बोलता है तो उससे डर, अंग्रेजी से डर, गोरे से डर, सबसे डर। अब धीरे-धीरे जनता निडर हो रही है, बहुत धीरे-धीरे। और यही हिन्दुस्तान में एक नया रूझान अच्छा आ रहा है। इसमें अगर कुछ खराबी भी आ जाए लेकिन निडराई आ जाए तो बहुत अच्छा होगा। मैं इसको पसन्द करूंगा। इसलिए हिन्दू-मुसलमान के मामले में मैं बराबर यही कहा करता हूं कि मुसलमानों को हिन्दुस्तान में अगर डरा कर रखना चाहते हो तो अच्छा नहीं होगा। घर में डरे हुए आदमी को कभी मत रखो, बड़ा खतरनाक हुआ करता है। डर बहुत खतरनाक चीज है, डर घर को तबाह किया करता है। वह डर धीरे-धीरे कम हो रहा है, बहुत धीरे-धीरे। अफसोस यही है कि पूरा डर खतम होने में षायद अभी 30-40 बरस और लगे। लेकिन, हम निडर बनते जा रहे हैं। यही हिन्दुस्तान का एक बढि़या रूझान है। नोटः- राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाषित किये जाएंगे। बदरीविषाल पित्ती