डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
लोहिया विचार माला-1
लोहिया विचार माला-1 प्रथम संस्करण: 1993 प्रकाषकः राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद- 500195 अगर हम सभी अंग्रेजी अखबार पढ़ना बन्द कर दें तो चार-पांच महीनों के अन्दर हिन्दी अखबार सुधर जाएं। अध्यात्मवाद और भौतिकवाद का झगड़ा नकली है। अमल को लम्बे पैमाने पर देखने से सिद्धान्त बनता है और सिद्धान्त को टुकड़ों में देखने पर कार्यक्रम या अमल होता है। अलजीरिया और कीनिया में गुंडा, रूस और अमरीका में दब्बू और एषिया में नपुंसक समाजवाद रहा है। आदत एक दिन में नहीं बदलती लेकिन संकल्प एक ही दिन में किया जाता है। बुरी आदतें धीरे-धीरे नहीं छूटती बल्कि एक झटके में छूटती हैं। आदमी अन्याय को देखते-देखते जड़ बन जाता है। इतिहास कभी चलता है रजामन्दी से, कभी चलता है संघर्श से और अक्सर दोनों के मिश्रण से। खोपड़ी को बाहर से रंगना आसान होता है। पिछले पांच हजार वर्शों से चेला गद्दी पर और गुरू गद्दी की बगल में बैठता आया है। गरीब देष में भूत की कहानी अधिक होती है और धनी देष में भूत समाप्त हो जाता है। घूस देने वाला भी अपराधी होता है। वक्ती चीजों पर खुषी और नाराजगी जाहिर करना गलत है। चलायमान जाति को वर्ग और जड़ वर्ग को जाति कहते हैं। 10 करोड़ लोगों के घर एक षाम चूल्हा भी नहीं जलता। जाति का गुण-कर्म से सम्बन्ध नहीं है, वर्ग जड़ हो कर जाति का गुण ले लेता है। जाति प्रथा वाले देष में जाति के अन्दर उपजाति बन जाने के कारण ममता नहीं रहती है। पुरानी जाति प्रथा और कम्युनिज्म में समानता है। . रू 2 रू. जीभ के मूल्य में और जीवन की कीमत में हम जितनी ज्यादा सादृष्यता ला सकें, लाने की कोषिष करें। झूठ बोलने की कोई लकीर नहीं हुआ करती है। दिमाग और आत्मा एक है। कोई दुःख असह्य नहीं है। सारी दुनिया के गरीब, खास कर हिन्दुस्तान के, दूसरों के सुख में अपना सुख समझते हैं। मुझे ऐसा लगता है कि अपने देष में एक अजीब तरह की दिमागी फूट है। एक तरफ जीभ के मामले में तो हम समतावादी हैं, अद्वैतवादी, जीव का मूल्य, और दूसरी तरफ जीवन की कीमत के मामले में हमसे ज्यादा गैर-बराबर देष कोई है ही नहीं। जब किसी के दोश की ओर इषारा करते हैं तो वह दुष्मन बन जाता है। दौलत, बुद्धि, स्थान के हिसाब से समाज में गिरोह बनते हैं, जिन्हें वर्ग कहते हैं। द्विज में चिल्लाने और सिद्धान्त बनाने की अजीब षक्ति है और स्वार्थ करते हुए भी उसे परमार्थ साबित कर डालते हैं। जिसके हाथ में दंड रहता है उसका दिमाग बर्फ की तरह षान्त रहना चाहिए। निश्क्रियता का कारण है कि 4-5 हजार वर्शों की हमारी संस्कृति कर्म के खिलाफ जाती है। प्रस्ताव काफी सोच समझ कर पास करना चाहिए। प्रेम में थोड़ा गुस्सा भी आता है। पंडित लोग पांडव को अच्छा समझते हैं। मैं कौरव-पांडव दोनों को समान अच्छा-बुरा मानता हूं। पूंजीषाही और साम्यवादी विचार सारी दुनिया पर कब्जा नहीं कर सकेंगे। पर्वत में हमेषा दो सभ्यताएं टकराई हैं। बहती धारा के खिलाफ तय करके कुछ कामयाबी हासिल कर लेना मुषकिल होता है। बहिष्त और जहन्नुम, स्वर्ग और नरक, जैसी चीज नहीं है मेरी राय में। बेईमानी केवल लालच से नहीं होती, सिद्धान्त और कार्यक्रम के अलगाव से भी होती है। भारतीय संस्कृति में सच-झूठ के प्रति उदारता है। जब भूख और जुल्म दोनों चीजें बढ़ जाती है तो चुनाव के पहले भी सरकार बदली जा सकती है। भूखा सच्चा नहीं हो सकता। नकली भूत पर बाण चलाने से क्या फायदा। . रू 3 रू. बेषर्म, नालायक, पाजी मर्द ही अपनी औरत के उपर हाथ उठाएगा। कोई भला मर्द किसी भी हालत में औरत पर हाथ नहीं उठाएगा। मुकदमेबाजी से राजनीति चैपट हो जाती है। मनुश्य और मानवता का सम्मिश्रण ही समाज को बदल सकता है। मनुश्य जब दुःखी होता है, अन्दर का समाज टूटता है। अगर मुसलमान की जान अपनी जान दे कर नहीं बचा सकते तो हिन्दू की जान ले कर भी मुसलमान की जान बचाना आज हमारे देष में हमारा परम कर्तव्य है। यूरोपीय समाजवाद और साम्यवाद जाति बनाने का आन्दोलन है। योगबल को युद्ध, आजादी षान्ति से जोड़ना धोखा है। राग, जिम्मेदारी की भावना और मात्रा भेद-ये तीनों जहां होंगे वहां कुषल राजनीति होगी। राग-द्वेश हमारे सोचने के ढंग को खराब कर देते हैं। राजनीति में अगर बीमार आदमी अफसरी करे तो वह अपने को और अपनी पार्टी को चैपट करता है। लकीर पर नहीं, बल्कि दिमाग खोल कर चलना चाहिए। षान्तिपूर्ण वर्ग संघर्श का सबसे अच्छा रूप सामूहिक सिविल-नाफरमानी है। जब वर्ग संघर्श तीव्र हो जाता है तब समाज का चलाना दुश्कर हो जाता है। समाज में चल रहे वर्ग संघर्श को समाप्त करने के लिए सबसे अच्छा रास्ता है दौलत का न्याय पूर्ण वितरण। वाणी को इतनी महत्ता मिल जाए कि कर्म खतम होता चले तो वाणी स्वयं महत्वहीन हो जाती है। आज तक किसी एक विचार ने दुनिया पर कब्जा नहीं किया। षराब पीना जितना बुरा है उतना ही अंगरेजी के दैनिक अखबार पढ़ना। षारीरिक मिलन रजामन्दी, युद्ध और जबरदस्ती से होता है। सच भरे पेट का आभूशण है। सच-झूठ में स्थितप्रज्ञता अच्छी नहीं। स्थापत्य कला में भारत, गायन-वाद्य में यूरोप, और चित्रकला में जापान हमारे ख्याल से सबसे अच्छा देष है। स्थितप्रज्ञ रहना जीत-हार, सुख-दुःख, सर्दी-गर्मी में एक-सा रहना, लाभ-हानि में बराबरी की भावना कठिन काम है। . रू 4 रू. सत्याग्रह के द्वारा ही विष्व पंचायत सम्भव है। सदाचार और विधान की मर्यादा तोड़ने वाला अनाचारी होता है। जब समूह का बाहरी दुनिया में कमजोर स्थान होता है तो अन्दर का संघर्श जोर पकड़ कर या तो जाति का स्थान ले लेगा या फिर टूट जाएगा। समूह का बाहरी और आंतरिक स्थान में सम्बन्ध रहता है। समाजवाद की वर्तमान विचारधारा गंुडा और दब्बू की है। समाजवाद का एक बड़ा मतलब है आर्थिक बराबरी। न सम्पन्न राश्ट्रों की सम्पन्नता ही नित्य और अनादि रही है, न गरीब राश्ट्रों की गरीबी ही अनन्त रहेगी। अगर संसार में साम्यवाद का विस्तार होता भी चले तो अमरीका और रूस वाले अपनी बढ़ी सम्पत्ति को मिश्र और भारत के साथ बांटने को तैयार नहीं होंगे। समूहवादी नेतृत्व मौका पा कर व्यक्तिवादी राक्षस बन जाता है। संगठन को सुधारना कठिन है लेकिन नौकरषाही के सहारे हिन्दुस्तान नहीं बन सकता। सिद्धान्ततः नौकरषाह चतुर, जी हुजूरी करने वाला, तत्पर, कार्यकुषल, साफ-सुथरा, हद के अन्दर झूठ बोलने वाला और उद्देष्यहीन होता है। संसार के सारे राजनीतिज्ञ मानवता से प्रेम करते हैं लेकिन मनुश्य पर ध्यान नहीं देते। संसार में राजपुरूश और राजभाशा, देवपुरूश और देवभाशा से बलषाली होता है। हंसी उसी को आ सकती है जो अपने अतीत से लड़ने की सामथ्र्य नहीं रखता। हिन्दुस्तान की चोटी-दाढ़ी वाली जाति आफत के सामने झुक जाने वाली जाति है। पिछले हजार वर्श का हिन्दुस्तान का इतिहास मेरी राय में हिन्दू-मुसलमान के झगड़े का नहीं है, बल्कि देषी-परदेषी के झगड़े का है। बाहरी कारणों से हिन्दुस्तान नहीं हारता है विदेषियों के मुकाबले में, बल्कि भीतरी कारणों से हारता है। हिन्दू धर्म की बुनियाद है मोक्ष और कर्म हीनता। मैं नहीं चाहता कि अपने देष में हिंसा चले। क्रूर, नृषंस, जंगली हिंसा से बचने का एक मात्र तरीका रह गया है कि संगठित हिंसा की जाए। उदारता और कट्टरता एक दूसरे से जुड़ी रहेंगी जब तक हिन्दू अपनी स्त्री को अपने समान ही इन्सान नहीं मानने लगता। . रू 5 रू. मैं भारतीय इतिहास का एक भी ऐसा काल नहीं जानता जिसमें कट्टरपंथी हिन्दू धर्म भारत में एकता या खुषहाली आयी, तो हमेषा वर्ण, स्त्री, सम्पत्ति आदि सहिश्णुता के सम्बन्ध में हिन्दू धर्म में उदारवादियों का प्रभाव अधिक था। हिन्दू धर्म में कट्टरपंथी जोष बढ़ने पर हमेषा देष सामाजिक और राजनीतिक दृश्टियों से टूटा है और भारतीय राश्ट्र में, राज्य और समुदाय के रूप में बिखराव आया है। मैं नहीं कह सकता कि ऐसे सभी काल जिनमें देष टूट कर छोटे-छोटे राज्यों में बंट गया, कट्टरपंथी प्रभुता के काल थे लेकिन इसमें कोई षक नहीं कि देष में एकता तभी आयी जब हिन्दू दिमाग पर उदार विचारों का प्रभाव था। केवल उदारता ही देष में एकता ला सकती है। हिन्दुस्तान बहुत बड़ा और पुराना देष है। मनुश्य की इच्छा के अलावा कोई षक्ति इसमें एकता नहीं ला सकती। कट्टरपंथी हिन्दुत्व अपने स्वभाव के कारण ही ऐसी इच्छा नहीं पैदा कर सकता, लेकिन उदार हिन्दुत्व कर सकता है, जैसा पहले कई बार कर चुका है। हिन्दू धर्म, संकुचित दृश्टि से, राजनीतिक धर्म, सिद्धान्तों और संगठन का धर्म नहीं है। लेकिन राजनीतिक देष के इतिहास में एकता लाने की बड़ी कोषिषों को इससे प्रेरणा मिली है और उनका यह प्रमुख माध्यम रहा है। हिन्दू धर्म में उदारता और कट्टरता के महान युद्ध को देष की एकता और बिखराव की षक्तियों का संघर्श भी कहा जा सकता है। नोट: राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाषित किये जाएंगे। बदरीविषाल पित्ती