डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी लड़ार्इ ंिहंदू धर्म में उदारवाद और कटटरता की लड़ार्इ
भारतीय इतिहास की सबसे बड़ी लड़ार्इ ंिहंदू धर्म में उदारवाद और कटटरता की लड़ार्इ, पिछले पाँच हजार सालों से भी अधिक समय से चल रही है और उसका अंत अभी भी दिखार्इ नहीं पड़ता। इस बात की कोर्इ कोशिश नहीं की गर्इ, जो होनी चाहिए थी, कि इस लड़ार्इ को नजर में रखकर हिंदुस्तान के इतिहास को देखा जाये। लेकिन देश में जो कुछ होता है, उसका बहुत बड़ा हिस्सा इसी के कारण होता है।
सभी धर्मों में किसी न किसी समय उदारवादियों और कटटरपंथियों की लड़ार्इ हुर्इ है। लेकिन हिंदू धर्म के अलावा वे बंट गये, अकसर उनमें रक्तपात हुआ और थोड़े या बहुत दिनों की लड़ार्इ के बाद, वे झगड़े पर काबू पाने में कामयाब हो गये। हिंदू धर्म में लगातार उदरवादियों और कटटरपंथियों का झगड़ा चला आ रहा है जिसमें कभी एक की जीत होती है कभी दूसरे की और खुला रक्तपात तो कभी नहीं हुआ, लेकिन झगड़ा आजतक हल नहीं हुआ और झगड़े के सवालों पर एक धुन्ध छा गर्इ है।
र्इसार्इ, इस्लाम और बौद्ध सभी धर्मों में झगड़े हुए। कैथोलिक मत में एक समय इतने कटटरपंथी तत्व इकटठा हो गये कि प्रोटेस्टेन्ट मत ने, जो उस समय उदारवादी था, उसे चुनौती दी। लेकिन सभी लोग जानते हैं कि सुधार आंदोलन के बाद प्रोटेस्टेन्ट मत में खुद भी कटटरता आ गर्इ । कैथोलिक और प्रोटेस्टेन्ट मतों के सिद्धांतों में अब भी बहुतेरे फर्क हैं, लेकिन एक को कटटरपंथी और दूसरे को उदारवादी कहना मुशिकल है। र्इसार्इ धर्म में सिद्धांत और संगठन का भेद है तो इस्लाम धर्म में शिया-सुन्नी का बँटवारा इतिहास के घटना क्रम से संबंधित है। इसी तरह बौद्ध धर्म हिनयान और महायान के दो मतों में बंट गया और उनमें कभी रक्तपात तो नहीं हुआ, लेकिन उनका मतभेद सिद्धांत के बारे में है, समाज की व्यवस्था से उनका कोर्इ संबंध नहीं ।
हिंदू धर्म में ऐसा कोर्इ बँटवारा नहीं हुआ। अलबत्ता वह बराबर छोटे-छोटे मतों में टूटता रहा है। नया मत उतनी ही बार उसके ही एक नये हिस्से के रूप में वापस आ गया है। इसीलिये सिद्धांत के सवाल कभी साथ-साथ नहीं उठे और सामाजिक संघर्षों का हल नहीं हुआ। हिंदू धर्म नये मतों को जन्म देने में उतना ही तेज है जितना प्रोटेस्टेन्ट मत, लेकिन उन सभी के ऊपर वह एकता का एक अजीब आवरण डाल देता है जैसी एकता कैथोलिक संगठन ने अंदरूनी भेदों पर रोक लगाकर कायम की है। इस तरह हिंदू धर्म में जहाँ एक और कटटरता और अंधविश्वास का घर है, वहीं वह नयी-नयी खोजों की व्यवस्था भी है।
हिंदू धर्म अब तक अपने अंदर उदारवाद और कटटरता के झगड़े का हल क्यों नहीं कर सका, इसका पता लगाने की कोशिश करने के पहिले, जो बुनियादी दृषिट भेद हमेशा रहा है, उस पर नजर डालना जरूरी है। चार बड़े और ठोस सवालों, वर्ण, स्त्री, संपत्ति और सहनशीलता के बारे में हिंदू धर्म बराबर उदारवाद और कटटरता का रूख बारी-बारी से लेता रहा है।
चार हजार साल या उससे भी अधिक समय पहिले कुछ हिंदुओं के कान में दूसरे हिंदुओं के द्वारा सीसा गलाकर डाल दिया जाता था और उनकी जबान खींच ली जाती थी क्योंकि वर्ण व्यवस्था का नियम था कि कोर्इ शूद्र वेदों को पढ़े या सुने नहीं। तीन सौ साल पहिले शिवाजी को यह मानना पड़ा था कि उनका वंश हमेशा ब्राह्राणों को ही मंत्री बनायेगा ताकि हिंदू रीतियों के अनुसार उनका राजतिलक हो सके। करीब दो सौ बर्ष पहिले, पानीपत की आखिरी लड़ार्इ में, जिसके फलस्वरूप हिंदुस्तान पर अंग्रेजों का राज्य कायम हुआ, एक हिंदू सरदार दूसरे सरदार से इसलिये लड़ गया कि वह, अपने वर्ण के अनुसार ऊँची जमीन पर तंबू लगाना चाहता था। करीब पन्द्रह साल पहिले एक हिंदू ने हिंदुत्व की रक्षा करने की इच्छा से महात्मा गाँधी पर बम फेंका था, क्योंकि उस समय वे छुआछुत का नाश करने में लगे थे। कुछ दिनों पहिले एक, और कुछ इलाकों में अब भी हिंदू नार्इ अछूत हिंदुओं की हजामत बनाने को तैयार नहीं होते, हालाँकि गैर हिंदुओं का काम करने में उन्हें कोर्इ एतराज नहीं होता।
इसके साथ ही प्राचीन काल में वर्ण व्यवस्था के खिलाफ दो बड़े विद्रोह हुए। एक पूरे उपनिषद में वर्ण व्यवस्था को सभी रूपों में पूरी तरह खत्म करने की कोशिश की गर्इ है। हिंदुस्तान के प्राचीन साहित्य में वर्ण व्यवस्था का जो विरोध मिलता है, उसके रूप, भाषा और विस्तार से पता चलता है कि ये विरोध दो अलग-अलग कालों में हुए-एक आलोचना का काल और दूसरा निन्दा का। इस सवाल को भविष्य की खोजों के लिये छोड़ा जा सकता है, लेकिन इतना साफ है कि मौर्य और गुप्त वंशों के स्वर्ण-काल वर्ण व्यवस्था के एक व्यापक विरोध के बाद हुए। लेकिन वर्ण कभी पूरी तरह खत्म नहीं होते। कुछ कालों में बहुत सख्त हेाते हैं और कुछ अन्य कालों में उनका बंधन ढीला पड़ जाता है। कटटरपंथी और उदारवादी, वर्ण व्यवस्था के अंदर ही एक दूसरे से जुड़े रहते हैं और हिंदू इतिहास के दो कालों में एक या दूसरी धारा के प्रभुत्व का ही अंतर होता है। इस समय उदारवादी का जोर है और अपने को बचाने की कोशिश कर रही है। अगर जन्मना वर्णों की बात करने का समय नहीं तो कर्मणा जातियों की बात की जाती है। अगर लोग वर्ण व्यवस्था का समर्थन नहीे करते तो उसके खिलाफ काम भी शायद ही कभी करते हैं और एक वातावरण बन गया है जिसमें हिंदुओं की तर्क बुद्धि और उनकी दिमागर आदतों में टकराव है। व्यवस्था के रूप में वर्ण कहीें-कहीं ढीले हो गये हैं लेकिन दिमागी आदत के रूप में अभी भी मौजूद हैं। इस बात की आशंका है कि हिंदू धर्म में कटटरता और उदारता का झगड़ा अभी भी हल न हो।
आधुनिक साहित्य ने हमें यह बताया है कि केवल स्त्री ही जानती है कि उसके बच्चे का पिता कौन है, लेकिन तीन हजार वर्ष या उसके भी पहले जबाल को स्वयं भी नहीं मालूम था कि उसके बच्चे का पिता कौन है और प्राचीन साहित्य में उसका नाम एक पवित्र स्त्री के रूप में आदर के साथ लिया गया है। हालाँकि वर्ण व्यवस्था ने उसके बेटे को ब्राह्राण बनाकर उसे भी हजम कर लिया। उदार काल का साहित्य हमें चेतावनी देता है कि परिवारों के स्रोत की खोज नहीे करनी चाहिए क्योंकि नदी के स्रोत की तरह वहाँ भी गंदगी होती है। अगर स्त्री बलात्कार का सफलता पूर्वक विरोध न कर सके तो उसे कोर्इ दोष नहीं होता क्योंकि इस साहित्य के अनुसार स्त्री का शरीर हर महीने नया हो जाता है । स्त्री को भी तलाक और संपत्ति का अधिकार है। हिंदू धर्म के स्वर्ण युगों में स्त्री के प्रति यह उदार दृषिटकोण मिलता है जब कि कटटरता के युग में उसे केवल एक प्रकार की संपत्ति माना गया है जो पिता, पति या पुत्र के अधिकार में रहती है।
इस समय हिंदू स्त्री एक अजीब सिथति में है, जिसमें उदारता भी है और कटटरता भी। दुनिया के और भी हिस्से से यहां स्त्री के लिये सम्मान पूर्ण पद पाना आसान है लेकिन संपत्ति और विवाह के संबंध में पुरूष के समान ही स्त्री के भी अधिकार हों, इसका विरोध अब भी होता है। मुझे ऐसे पर्चे पढ़ने को मिले जिनमें स्त्री को संपत्ति का अधिकार न देने की वकालत इस तर्क पर की गर्इ थी कि वह दूसरे धर्म के व्यकित से प्रेम करने लग कर अपना धर्म न बदल दे, जैसे यह दलील पुरूषों के लिये कहीं ज्यादा सच न हो। जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े न हो, यह अलग सवाल है, जो स्त्री व पुरूष दोनों वारिसों पर लागू होता है, और एक सीमा से छोटे टुकड़ों के और टुकड़े न होने पायें, इसका कोर्इ तरीका निकालना चाहिये। जब तक कानून या रीति रिवाज या दिमागी आदतों में स्त्री और पुरूष के बीच विवाह और संपत्ति के बारे में फर्क रहेगा, तब तक कटटरता पूरी तरह खत्म नहीं होगी। हिंदुओं के अंदर स्त्री को देवी के रूप में देखने की इच्छा, जो अपने उच्च स्थान से कभी न उतरे, उदार से उदार लोगों के दिमाग में भी बेमतलब के संदेहास्पद ख्याल पैदा कर देती है। उदारता और कटटरता एक दूसरे से जुड़ी रहेंगी जब तक हिंदू अपनी स्त्री को अपने समान ही इन्सान नहीं मानने लगता।
हिंदू धर्म में संपत्ति की भावना संचय न करने और लगाव न रखने के सिद्धांत के कारण उदार है। लेकिन कटटरपंथी हिंदू कर्म सिद्धांत की इस प्रकार व्याख्या करता है कि धन और जन्म या शकित में बड़े व्यकित का स्थान ऊँचा है और जो कुछ भी है वही ठीक है। संपत्ति का मौजूदा सवाल के मिलिकयत निजी हो या सामाजिक हाल ही का है। लेकिन संपत्ति की स्वीकृत व्यवस्था या संपत्ति से कोर्इ लगाव न रखने के रूप में यह सवाल हिंदू दिमाग में बराबर रहा है। अन्य सवालों की तरह संपत्ति और शकित के सवालों पर भी हिंदू दिमाग अपने विचारों को उनकी तार्किक परिणति तक कभी नहीं ले जा पाया। समय और व्यकित के साथ हिंदू धर्म में इतना ही फर्क पड़ता है कि एक या दूसरे विचार को प्राथमिकता मिलती है।
आमतौर पर यह माना जाता है कि सहिष्णुता हिंदुओं का विशेष गुण है। यह गलत है, सिवाय इसके कि खुला रक्तपात अभी तक उसे पसंद नहीं रहा। हिंदू धर्म में कटटरपंथी हमेशा प्रभुताशाली मत के अलावा अन्य मतों और विश्वासों का दमन करके एक रूपता के द्वारा एकता कायम करने की कोशिश करते रहे हैं लेकिन उन्हें कभी सफलता नहीं मिली। उन्हें अब तक आम तौर पर बचपना ही माना जाता था क्योंकि कुछ समय पहिले तक विविधता में एकता का सिद्धांत हिंदू धर्म के अपने मतों पर ही लागू किया जाता था। इसलिए हिंदू धर्म में लगभग हमेशा ही सहिष्णुता का अंश बल प्रयोग से ज्यादा रहता था। लेकिन यूरोप की राष्ट्रीयता ने इससे मिलते-जुलते जिस सिद्धांत को जन्म दिया है, उससे इसका अर्थ समझ लेना चाहिये। वाल्टेयर जानता था कि उसका विरोधी गलती पर है, फिर भी वह सहिष्णुता के लिये, विरोध के खुलकर बोलने के अधिकार के लिए लड़ने को तैयार था। इसके विपरीत हिंदू धर्म में सहिष्णुता की बुनियाद यह है कि अलग-अलग बातें अपनी जगह पर सही हो सकती हैं । वह मानता है कि अलग-अलग क्षेत्रों में वर्गों में अलग-अलग सिद्धांत और चलन हो सकते हैं, और उनके बीच वह कोर्इ फैसला करने को तैयार नहीं। वह आदमी की जिंदगी में एकरूपता नहीं चाहता, स्वेच्छा से भी नहीं, और ऐसी विविधता में एकता चाहता है जिसकी परिभाषा नहीं की जा सकती, लेकिन जो अब तक उसके अलग-अलग मतों को जिंदगी में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। इस विश्वास के कारण कि अलग-अलग बातें गलत ही हों यह जरूरी नहीं है, बलिक वे सच्चार्इ को अलग-अलग ढंग से व्यक्त कर सकती हैं।
कटटरपंथियों ने अक्सर हिंदू धर्म में एकरूपता की एकता कायम करने की कोशिश की है। उनके उधेश्य कभी बुरे नहीं रहे। उनकी कोशिशों के पीछे अक्सर शायद स्थायित्व और शकित की इच्छा थी, लेकिन उनके कामों के नतीजे हमेशा बहुत बुरे हुए। मैं भारतीय इतिहास का एक भी ऐसा काल नहीं जानता जिसमें कटटरपंथी हिंदू धर्म भारत में एकता या खुशहाली ला सका हो। जब भी भारत में एकता या खुशहाली आर्इ, तो हमेशा वर्ण, स्त्री, संपत्ति आदि सहिष्णुता के संबंध में हिंदू धर्म में उदारवादियों का प्रभाव अधिक था। हिंदू धर्म में कटटरपंथी जोश बढ़ने पर हमेशा देश सामाजिक और राजनीतिक दृषिटयों से टूटा है और भारतीय राष्ट्र में, राज्य और समुदाय के रूप में बिखराव आया है। मैं नहीं कह सकता कि ऐसे काल जिनमें देश टूट कर छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया, कटटरपंथी प्रभुता के काल थे लेकिन इसमें कोर्इ शक नहीं कि देश में एकता तभी आर्इ जब हिंदू दिमाग पर उदार विचारों का प्रभाव था।
आधुनिक इतिहास में देश में एकता लाने की कर्इ बड़ी कोशिशें असफल हुर्इ। ज्ञानेश्वर का उदार मत शिवाजी और बाजीराव के काल में अपनी चोटी पर पहुँचा, लेकिन सफल होने के पहले ही पेशवाओं की कटटरता में गिर गया। फिर गुरू नानक के उदार मत से शुरू होनेवाला आंदोलन रणजीत सिंह के समय अपनी चोटी पर पहुँचा, लेकिन जल्दी ही सिक्ख सरदारों के कटटरपंथी झगड़ों में पतित हो गया। ये कोशिशें, जो एक बार असफल हो गर्इं, आजकल फिर से उठने की बड़ी तेज कोशिशें करती हैं, क्योंकि इस समय महाराष्ट्र और पंजाब से कटटरता की जो धारा उठ रही है, उसका इन कोशिशों से गहरा और पापपूर्ण आतिमक संबंध है। इन सब में भारतीय इतिहास के विधार्थी के लिए पढ़ने और समझने की बड़ी सामाग्री है जैसे धार्मिक संतों और देश में एकता लाने की। राजनीतिक कोशिशों के बीच ऐसा गड़बड़ी में या कि इन समूहों द्वारा अपनी कटटरपंथी असफलताओं को दुहराने की कोशिशों के पीछे क्या कारण है? इसी तरह विजयनगर की कोशिश और उसके पीछे प्रेरणा निम्बार्क की थी या शंकराचार्य की, और हुम्फी की महानता के पीछे कौन सा सड़ा हुआ बीज था, इन सब बातों की खोज से बड़ा लाभ हो सकता है। फिर, शेरशाह और अकबर की उदार कोशिशों के पीछे क्या था और औरंगजेब की कटटरता के आगे उनकी हार क्यों हुर्इ?
देश में एकता लाने की भारतीय लोगों और महात्मा गाँधी की आखिरी कोशिश कामयाब हुर्इ है, लेकिन आंशिक रूप में ही। इसमें कोर्इ शक नहीं कि पाँच हजार वर्षों से अधिक की उदारवादी धाराओं ने इस कोशिश को आगे बढ़ाया, लेकिन इसके तत्कालीन स्रोत में, यूरोप के उदारवादी प्रभावों के अलावा क्या था, तुलसी या कबीर और चैतन्य और संतों की महान परंपरा या अधिक हाल के धार्मिक राजीनतिक नेता जैसे राम मोहन राय और फैजाबाद के विद्रोही मौलवी। फिर, पिछले पाँच हजार सालों की कटटरपंथी धारायें भी मिलकर इस कोशिश को असफल बनाने के लिये जोर लगा रही हैं, और अगर इस बार कटटरता की हार हुर्इ, तो वह फिर नहीं उठेगी।
केवल उदारता ही देश में एकता ला सकती है। हिंदुस्तान बहुत बड़ा और पुराना देश है। मनुष्य की इच्छा के अलावा कोर्इ शकित इसमें एकता नहीं ला सकती। कटटरपंथी हिंदुत्व अपने स्वभाव के कारण ही ऐसी इच्छा नहीं पैदा कर सकता, लेकिन उदार हिंदुत्व कर सकता है, जैसा पहिले कर्इ बार कर चुका है। हिंदू धर्म संकुचित दृषिट से राजनीतिक धर्म, सिद्धांतों और संगठन का धर्म नहीं है। लेकिन राजनीतिक देश के इतिहास में एकता लाने की बड़ी कोशिशों को इससे प्रेरणा मिली है और उनका यह प्रमुख माध्यम रहा है। हिंदू धर्म में उदारता और कटटरता के महान युद्ध को देश की एकता और बिखराव की शकितयों का संघर्ष भी कहा जा सकता है।
लेकिन उदार हिंदुत्व पूरी तरह समस्या का हल नहीं कर सका। विविधता में एकता के सिद्धांत के पीछे सड़न और बिखराव के बीज छिपे हैं! कटटरपंथी तत्वों के अलावा, जो हमेशा ऊपर से उदार हिंदू विचारों में घुस आते हैं और हमेशा दिमागी सफार्इ हासिल करने में रूकावट डालते हैं, विविधता में एकता का सिद्धांत ऐसे दिमाग को जन्म देता है जो समृद्ध और निषिक्रय दोनों ही है। हिंदू धर्म का बराबर छोटे-छोटे मतों में बँटते रहना बड़ा बुरा है, जिनमें से हर एक अपना अलग शोर मचाये रखता है और उदार हिंदुत्व उनको एकता के आवरण में ढँकने की चाहे जितनी भी कोशिश करे, वे अनिवार्य रूप से राज्य के सामूहिक जीवन में कमजोरी पैदा करते हैं। एक आश्चर्य जनक उदासीनता फैल जाती है। कोर्इ न बराबर होनेवाले बँटवारों की चिन्ता नहीं करता जैसे सब को यकीन हो कि वे एक दूसरे के ही अंग हैंं। इसी से कटटरपंथी हिंदुत्व को अवसर मिलता है और शकित की इच्छा के रूप में चालक शकित मिलती है, हालाँकि उसकी कोशिशों के फलस्वरूप और भी ज्यादा कमजोरी पैदा होती है।
उदार और कटटरपंथी हिंदुत्व के महायुद्ध का बाहरी रूप आजकल यह हो गया है कि मुसलमानों के प्रति क्या रूख हो। लेकिन हम एक क्षण के लिये भी यह न भूलें कि यह बाहरी रूप है और बुनियादी झगड़े जो अभी तक हल नहीें हुए, कहीं अधिक निर्णायक हैं। महात्मा गाँधी की हत्या, हिंदू-मुसिलम झगड़े की घटना उतनी नहीं थी जितनी हिंदू धर्म की उदार और कटटरपंथी धाराओं के युद्ध की। इसके पहिले भी किसी हिंदू ने वर्ण, स्त्री संपत्ति और सहिष्णुता के बारे में कटटरता पर इतनी गहरी चोटें नहीं की थीं। इसके खिलाफ सारा जहर इकटठा हो रहा था। एक बार पहिले भी गांधी जी की हत्या करने की कोशिश की गर्इ थी। इस समय उसका खुला और साफ उधेश्य यही था कि वर्ण व्यवस्था को बचा कर हिंदू धर्म की रक्षा की जाय। आखिरी ओर कामयाब कोशिश का उधेश्य ऊपर से यह दिखार्इ पड़ता था कि इस्लाम के हमले से हिंदू धर्म को बचाया जाय, लेकिन इतिहास के किसी भी विधार्थी को कोर्इ संदेह नहीं होगा कि यह सबसे बड़ा और सबसे जघन्य जुआ था, जो हारती हुर्इ कटटरता ने उदारता से अपने युद्ध में खेला । गाँधी जी का हत्यारा वह कटटरपंथी तत्व था जो हमेशा हिंदू दिमाग के अंदर बैठा रहता है, कभी दबा हुआ और कभी प्रकट, कुछ हिंदुओं में निषिक्रय और कुछ में तेज। जब इतिहास के पन्ने गाँधी जी की हत्या को कटटरपंथी उदार हिंदुत्व के युद्ध की एक घटना के रूप में रखेंगे और उन सभी पर अभियोग लगायेंगे जिन्हें वर्णों के खिलाफ और सित्रयों के हक में, संपत्ति के खिलाफ और सहिष्णुता के हक में गाँधीजी के कामों से गुस्सा आया था, तब शायद हिंदू धर्म की निषिक्रयता और उदासीनता नष्ट हो जाय।
अब तक हिंदू धर्म के अंदर कटटर और उदार एक दूसरे से जुड़े क्यों रहे और अभी तक उनके बीच कोर्इ साफ और निर्णायक लड़ार्इ क्यों नहीं हुर्इ, यह एक ऐसा विषय है जिस पर भारतीय इतिहास के विधार्थी खोज करें तो बड़ा लाभ हो सकता है। अब तक हिंदू दिमाग से कटटरता कभी पूरी तरह दूर नहीं हुर्इ इसमें कोर्इ शक नहीं। इस झगड़े का कोर्इ हल न होने के विनाशपूर्ण नतीजे निकले, इनमें भी कोर्इ शक नहीं । जब तक हिंदुओं के दिमाग से वर्ण भेद बिल्कुल ही खत्म नहीं होते, या स्त्री को बिल्कुल पुरूष के बराबर ही नहीे माना जाता, या सपंत्ति और व्यवस्था के संबंध को पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता तब तक कटटरता भारतीय इतिहास में अपना विनाशकारी काम करती रहेगी और उसकी निषिक्रयता को कायम रखेगी। अन्य धर्मों की तरह हिंदू धर्म सिद्धान्तों और बंधे हुए नियमों का धर्म नहीं बलिक सामाजिक संगठन का एक ढंग है। और यही कारण है कि उदारता और कटटरता का युद्ध कभी समापित तक नहीें लड़ा गया और ब्राह्राण-बनिया मिल कर सदियों से देश पर अच्छा या बुरा शासन करते आये हैं जिसमें कभी उदारवादी ऊपर रहते हैं कभी कटटरपंथी ।
उन चार सवालों पर केवल उदारता से काम न चलेगा। अंतिम रूप से उनका हल करके हिंदू दिमाग से इस झगड़े को पूरी तरह खत्म करना होगा। इन सभी हल न होनेवाले झगड़ों के पीछे निगर्ुण और सगुण सत्य के संबंध का दार्शनिक सवाल है। इस सवाल पर उदार और कटटर हिंदुओं के रूख में बहुत कम अंतर है। मोटे तौर पर, हिंदू धर्म सगुण सत्य के आगे निगर्ुण सत्य की खोज में जाना चाहता है, वह सृषिट को झूठा तो नहीं मानता लेकिन घटिया किस्म का सत्य मानता है। दिमाग से उठकर परम सत्य तक पहुंचने के लिये वह इस घटिया सत्य को छोड़ देता है। वस्तुत: सभी देशों का दर्शन इसी सवाल को उठाता है। अन्य धर्मों और दर्शनों से हिंदू धर्म का फर्क यही है दूसरे देशों में यह सवाल अधिकतर दर्शन में ही सीमित रहा है, जबकि हिंदुस्तान में यह जनसाधारण के विश्वास का एक अंग बन गया है। दर्शन को संगीत की धुनें देकर विश्वास में बदल दिया गया है। लेकिन दूसरे देशों में दार्शनिकों ने परम सत्य की खोज में आमतौर पर सांसारिक सत्य से बिल्कुल ही इंकार किया है। इस कारण आधुनिक विश्व पर उसका प्रभाव बहुत कम पड़ा है। वैज्ञानिक और सांसारिक भावना ने बड़ी उत्सुकता से प्रकृति की सारी जानकारी को इकटठा किया, अलग-अलग करके क्रमबद्ध किया और उन्हें एक में बांधने वाले नियम खोज निकाले। इससे आधुनिक मनुष्य को, जो मुख्यत: यूरोपीय है, जीवन विचार कर एक खास दृषिटकोण मिला है वह सगुण सत्य को, जैसा है वैसा ही बड़ी खुशी से स्वीकार कर लेता है। इसके अलावा र्इसार्इ मत की नैतिकता ने मनुष्य के अच्छे कामों को र्इश्वरीय काम का पद प्रदान किया है। इन सब के फलस्वरूप जीवन की असलियतों का वैज्ञानिक और नैतिक उपयोग होता है। लेकिन हिंदू धर्म कभी अपने दार्शनिक आधार से छुटकारा नहीं पा सका। लोगों का साधारण विश्वास भी व्यक्त और प्रकट सगुण सत्य से आगे जाकर अव्यक्त और अप्रकट निगर्ुण सत्य को देखना चाहता है। यूरोप में भी मध्य युग में ऐसा ही दृषिटकोण था लेकिन मैं फिर कह दूं कि यह दार्शनिकों तक ही सीमित था और सगुण सत्य से इन्कार करके उसे नकली मानता था जबकि आम लोग र्इसार्इ मत को नैतिक विश्वास के रूप में मानते थे और उस हद तक सगुण सत्य को स्वीकार करते थे। हिंदू धर्म ने कभी जीवन की असलियतों से बिल्कुल इंकार नहीं किया बलिक वह उन्हें एक घटिया किस्म का सत्य मानता है और आज तक हमेशा ऊँचे प्रकार के सत्य की खोज करने की कोशिश करता रहा है। यह लोगों के साधारण विश्वास का अंग है।
एक बड़ा अच्छा उदाहरण मुझे याद आता है। कोणार्क के विशाल लेकिन आधे नष्ट मंदिर में पत्थरों पर हजारों पर हजारों मूत्तियाँ खुदी हुर्इ मिलती हैं। जिंदगी की असलियतों की तस्वीरें देने में कलाकार ने किसी तरह की कंजूसी या संकोच नहीं दिखाया। जिंदगी की सारी विभिन्नताओं को उसने स्वीकार किया है। उसमें भी एक क्रमबद्ध व्यवस्था मालूम पड़ती है। सबसे नीचे की मूत्र्तियों में शिकार, उसके ऊपर प्रेम, फिर संगीत और फिर शकित का चित्रण है। हर चीज में बड़ी शकित और क्रियाशीलता है लेकिन मंदिर के अंदर कुछ नहीं है, और जो मूर्तियाँ हैं भी उनमें शांति और खामोशी का चित्रण है। बाहर की गति और क्रियाशीलता से अंदर खामोशी और सिथरता, मंदिर में बुनियादी तौर पर यही अंकित है। परम सत्य की खोज कभी बंद नहीं हुर्इ।
चित्रकला की अपेक्षा वास्तुकला और मूत्र्तिकला के अधिक विकास की भी अपनी अलग कहानी है। वस्तुत: जो प्राचीन चित्र अब भी मिलते हैं, वास्तुकला पर ही आधारित हैं। संभवत: परम सत्य के बारे में अपने विचारों को व्यक्त करना चित्रकला की अपेक्षा वास्तुकला और मूत्र्तिकला में ज्यादा सरल है।
अत: हिंदू व्यकितत्व दो हिस्सों में बँट गया है। अच्छी हालत में हिंदू सगुण सत्य को स्वीकार करके भी निगर्ुण परम सत्य को नहीं भूलता और बराबर अपनी अन्तदर्ृषिट को विकसित करने की कोशिश करता रहता है, और बुरी हालत में उसका पाखंड असीमित होता है। हिंदू शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाखंडी होता है, क्योंकि वह न सिर्फ दुनिया के सभी पाखंडियों की तरह दूसरों को धोखा देता है बलिक अपने को धोखा दे कर खुद अपना नुकसान भी करता है। सगुण और निगर्ुण सत्य के बीच बंटा हुआ उसका दिमाग अक्सर इसमें उसे प्रोत्साहन देता है। पहिले और आज भी हिंदू धर्म एक आश्चर्य जनक दृश्य प्रस्तुत करता है। हिंदू धर्म अपने मानने वालों को, छोटे से छोटे को भी, ऐसी दार्शनिक समानता, मनुष्य और अन्य वस्तुओं की एकता प्रदान करता है जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलती। दार्शनिक समानता के इस विश्वास के साथ गंदी से गंदी सामाजिक विषमता का व्यवहार चलता है। मुझे अक्सर लगता है कि दार्शनिक हिंदू खुशहाल होने पर गरीबों और शूद्रों से पशुओं जैसा, पशुओं से पत्थरों जैसा और अन्य वस्तुओं से दूसरी वस्तुओं की तरह व्यवहार करता है। शाकाहार और अहिंसा गिर कर छिपी हुर्इ क्रूरता बन जाते हैंं बि तक की सभी मानवीय चेष्टाओं के बारे मं यह कहा जा सकता है कि एक न एक सिथति में हर जगह सत्य क्ररता में बदल जाता है और सुंदरता अनैतिकता में, लेकिन हिंदू धर्म के बारे में यह औरों की अपेक्षा ज्यादा सच है। हिंदू धर्म ने सचार्इ और सुंदरता की ऐसी चोटियां हासिल की जो किसी और देश में नहीं मिलती लेकिन वह ऐसे अंधेरे गढढों में भी गिरा है जहां तक किसी और देश का मनुष्य नहीं गिरा। जब तक हिंदू जीवन की असलियतों को, काम और मशीन, जीवन और पैदावार, परिवार और जनसंख्या वृद्धि, गरीबी और अत्याचार और ऐसी अन्य असलियतों को वैज्ञानिक और लौकिक दृषिट से स्वीकार करना नहीं सीखता, तब तक वह अपने बँटे हुए दिमाग पर काबू नहीं पा सकता और न कटटरता को ही खत्म कर सकता है, जिसने अक्सर उसका सत्यानाश किया है।
इसका यह अर्थ नहीं कि हिंदू धर्म अपना भावाधार ही छोड़ दे और जीवन और सभी चीजों की एकता की कोशिश न करे। यह शायद उसका सबसे बड़ा गुण है। अचानक मन में भर जाने वाली ममता, भावना की चेतना और प्रसार, जिसमें गाँव का लड़का मोटर निकलने पर बकरी के बच्चे को इस तरह चिपटा लेता है जैसे उसकी जिंदगी हो, या कोर्इ सूखी जड़ों और हरी शाखों के पेड़ को ऐसी देखता है जैसे वह उसी का एक अंश हो, एक ऐसा गुण है जो शायद सभी धर्मों में मिलता है लेकिन कहीं उसने ऐसी गहरी और स्थायी भावना का रूप नहीं लिया जैसा हिंदू धर्म में। बुद्धि का देवता, दया के देवता से बिल्कुल अलग है। मैं नहीं जानता कि र्इश्वर है या नहीं है लेकिन मैं इतना जानता हूं कि सारे जीवन और सृषिट को एक में बाँधने वाली ममता की भावना है, हालाँकि अभी वह एक दुर्लभ भावना है। इस भावना को सारे कामों, यहां तक कि झगड़ों की भी पृष्ठ-भूमि बनाना शायद व्यवहार में मुमकिन न हो। लेकिन यूरोप केवल सगुण, लौकिक सत्य को स्वीकार करने के फलस्वरूप उत्पन्न हुए झगड़ों से मर रहा है। मैं बे हिचक कह सकता हूं कि मुझे सड़ने की अपेक्षा झगड़े से मरना ज्यादा पसंद है। लेकिन विचार और व्यवहार के क्या यही दो रास्ते मनुष्य के सामने हैं? क्या खोज की वैज्ञानिक भावना का एकता की रागात्मक भावना से मेल बैठाना मूमकिन नहीं है? जिसमें एक दूसरे के अधीन न हों और समान गुणों वाले दो क्रमों के रूप में दोनों बराबरी की जगह पर हों। वैज्ञानिक भावना वर्ण के खिलाफ और सित्रयों के हक में संपत्ति के खिलाफ और सहिष्णुता के हक में काम करेगी और धन पैदा करने के ऐसे तरीके निकालेगी जिससे भूख और गरीबी दूर होगी। एकता की सृजनात्मक भावना वह रागात्मक शकित पैदा करेगी जिसके बिना मनुष्य की बड़ी से बड़ी कोशिशें लाभ,र्इष्या, घृणा, और क्रोध में बदल जाती है।
यह कहना मुशिकल है कि हिंदू धर्म यह नया दिमाग पा सकता है और वैज्ञानिक और रागात्मक भावनाओं में मेल बैठ सकता है या नहीं। लेकिन हिंदू धर्म दर असल है क्या? इसका कोर्इ एक उत्तर नहीं बलिक कर्इ उत्तर हैं। इतना निशिचत है कि हिंदू धर्म कोर्इ खास सिद्धांत या संगठन नहीं है न विश्वास और व्यवहार का कोर्इ नियम उसके लिये अनिवार्य ही है। स्मृतियों और कथाओं, दर्शन और रीतियों की एक पूरी दुनिया है जिसका कुछ हिस्सा बहुत ही बुरा है और कुछ ऐसा है जो मनुष्य के काम आ सकता है। इन सबसे मिलकर हिंदू दिमाग बनता है जिसकी विशेषता कुछ विद्वानों ने सहिष्णुता और विविधता में एकता बतार्इ है। हमने इस सिद्धांत की कमियां देखीं और यह देखा कि दिमागी निषिक्रयता दूर करने के लिये कहां उसमें सुधार करने की जरूरत है। इस सिद्धांत को समझाने में आम तौर पर यह गलती की जाती है कि उदार हिंदू धर्म हमेशा अच्छे विचारों और प्रभावों को अपना लेता है चाहे वे जहां से भी आये हों, जब कि कटटरता ऐसा नहीं करती। मेरे ख्याल में यह विचार अज्ञानपूर्ण है। भारतीय इतिहास के पन्नों में मुझे ऐसा कोर्इ काल नहीं मिला जिसमें आजाद हिंदू ने विदेशों में विचारों या वस्तुओं के नाम जान पाया हूं जिनमें सिंदूर भी है, जो चीन से भारत लार्इ गर्इ। विचारों के क्षेत्र में कुछ भी नहीं आया।
आजाद हिंदुस्तान का आम तौर पर बाहरी दुनिया से एक तरफा रिश्ता होता था जिसमें कोर्इ विचार बाहर से नहीं आते थे और वस्तुएं भी कम ही आती थीं, सिवाय चाँदी आदि के। जब कोर्इ विदेशी समुदाय आकर यहां बस जाता और समय बीतने पर हिंदू धर्म का ही एक अंग या वर्ण बनने की कोशिश करता तब जरूर कुछ विचारों और कुछ चीजें अंदर आतीं।इसके विपरीत गुलाम हिंदुस्तान और उस समय का हिंदू धर्म विजेता की भाषा उसकी आदतों और उसके रहन-सहन की बड़ी तेजी से नकल करता है। आजादी में दिमाग की आत्मनिर्भरता के साथ गुलामी में पूरा दिमागी दीवालियापन मिलता है। हिंदू धर्म की इस कमजोरी को कभी नहीं समझा गया और यह खेद की बात है कि उदारवादी हिंदू अज्ञानवश, प्रचार के लिये इसके विपरीत बातें फैला रहे हैं। आजादी की हालत में हिंदू दिमाग खुला जरूर रहता है, लेकिन केवल देश के अंदर होनेवाली घटनाओं के प्रति। बाहरी विचारों और प्रभावों के प्रति तब भी बंद रहता है। यह उसकी एक बड़ी कमजोरी है और भारत के विदेशी शासन का शिकार होने का एक कारण है। हिंदू दिमाग को अब न सिर्फ अपने देश के अंदर की बातों बलिक बाहर की बातों के प्रति भी अपना दिमाग खुला रखना होगा और विविधता में एकता के अपने सिद्धांत को सारी दुनिया के विचार और व्यवहार पर लागू करना होगा।
आज हिंदू धर्म में उदारता और कटटरता की लड़ार्इ ने हिंदू मुसिलम झगड़े का ऊपरी रूप ले लिया है लेकिन हर ऐसा हिंदू जो अपने धर्म और देश के इतिहास से परिचित है, उन झगड़ों की ओर भी उतना ही ध्यान देगा जो पाँच हजार साल से भी अधिक समय से चल रहे हैं और अभी तक हल नहीं हुए। कोर्इ हिंदू मुसलमानों के प्रति सहिष्णु नहीं हो सकता जबतक कि वह उसके साथ ही वर्ण और संपत्ति के विरूद्ध और सित्रयों के हक में काम न करे। उदार और कटटर हिंदू धर्म की लड़ार्इ अपनी सबसे उलझी हुर्इ सिथति में पहुँच गर्इ है और संभव है कि उसका अंत भी नजदीक ही हो। कटटरपंथी हिंदू अगर सफल हुए तो चाहे उनका उधेश्य कुछ भी हो भारतीय राज्य के टुकड़े कर देंगे न सिर्फ हिंदू मुसिलम दृषिट से बलिक और प्रान्तों की दृषिट से भी। केवल उदार हिंदू ही राज्य को कायम कर सकते हैं। अत: पाँच हजार वर्षों से अधिक की लड़ार्इ अब इस सिथति में आ गर्इ है कि एक राजनीतिक समुदाय और राज्य के रूप में हिंदुस्तान के लोगों की हस्ती ही इस बात पर निर्भर है कि हिंदू धर्म में उदारता की कटटरता पर जीत हो ।
धार्मिक और मानवी सवाल आज मुख्यत: एक राजनीतिक सवाल है। हिंदू के सामने आज यही एक रास्ता है कि अपने दिमाग में क्रांति लाये, या फिर गिर कर दब जाय। उसे मुसलमान और र्इसार्इ बनना होगा और उन्हीं की तरह महसूस करना होगा। मैं हिंदू-मुसिलम एकता की बात नहीं कर रहा क्योंकि वह एक राजनीतिक, संगठनात्मक या अधिक से अधिक सांस्कृतिक सवाल है। मैं मुसलमान और र्इसार्इ के साथ हिंदू की रागात्मक एकता की बात कर रहा हूं, धार्मिक विश्वास और व्यवहार में नहीं, बलिक इस भावना में कि ''मैं वह हूँ। ऐसी रागात्मक एकता हासिल करना कठिन मालूम पड़ सकता है, या अक्सर एक तरफा हो सकता है और उसे हत्या और रक्तपात की पीड़ा सहनी पड़ सकती है। मैं यहां अमेरिकन गृह युद्ध की याद दिलाना चाहूंगा जिसमें चार लाख भार्इ ने भार्इ को मारा और छह लाख व्यकित मरे लेकिन जीत की घड़ी में अब्राहम लिंकन और अमेरिका के लोगों ने उत्तरी और द़िक्षणी भाइयों के बीच ऐसे ही रागात्मक एकता दिखार्इ। हिंदुस्तान का भविष्य चाहे जैसा भी हो, हिंदू का अपने आपको पूरी तरह बदल कर मुसलमान के साथ ऐसी रागात्मक एकता हासिल करनी होगी। सारे जीवों और वस्तुओं की रागात्मक एकता में हिंदू का विश्वास भारतीय राज्य की राजनीतिक जरूरत भी है कि हिंदू मुसलमान के साथ एकता महसूस करे। इस रास्ते पर बड़ी रूकावटें और हारें हो सकती हैं, लेकिन हिंदू दिमाग को किस रास्ते पर चलना चाहिये, यह साफ है।
कहा जा सकता है कि हिंदू धर्म में उदारता और कटटरता की इस लड़ार्इ को खत्म करने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि धर्म से ही लड़ा जाय। यह हो सकता है लेकिन रास्ता टेढ़ा है और कौन जाने कि चालाक हिंदू धर्म, धर्म विरोधियों को भी अपना एक अंग बना कर निगल न जाय। इसके अलावा कटटरपंथिें को जो भी अच्छे समर्थक मिलते हैं, वह कम पढ़-लिखें लोगों में और शहर में रहने वालों मेंं गाँव के अनपढ़ लोगों में तत्काल चाहे जितना भी जोश आ जाय वे उसके स्थायी आधार नहीं बन सकते। सदियों की बुद्धि के कारण पढ़े-लिखे लोगों की तरह गाँव वाले भी सहिष्णु होते हैं। कम्युनिज्म या फासिज्म जैसे लोकतंत्र विरोधी सिद्धांतों से ताकत पाने की खोज में जो वर्ण और नेतृत्व के मिलते-जुलते विचारों पर आधरित हैं, हिंदू धर्म का कटटरपंथी अंश भी धर्मविरोधी का बाना पहिन सकता है। अब समय है कि हिंदू सदियों से इकटठा हो रही गंदगी को अपने दिमाग से निकाल कर उसे साफ करे। जिंदगी की असलियतों और अपनी परम सत्य की चेतना, सगुण सत्य और निगर्ुण सत्य के बीच उसे एक सच्चा फलदायक रिश्ता कायम करना होगा। केवल इसी आधार पर वह वर्ण, स्त्री, संपत्ति और सहिष्णुता के सवालों पर हिंदू धर्म के कटटरपंथी तत्वों को हमेशा के लिये जीत सकेगा जो इतने दिनों तक उसके विश्वासों को गंदा करते रहे हैं और उसके देश के इतिहास में बिखराव लाते रहे हैं। पीछे हटते समय हिंदू धर्म में कटटरता अक्सर उदारता के अंदर छिप कर बैठ जाती है। ऐसा फिर न होने पाये। सवाल साफ है। समझौते से पुरानी गलतियां फिर दुहरार्इ जाएँगी। इस भयानक युद्ध को अब खत्म करना ही होगा। भारत के दिमाग की एक नर्इ कोशिश तब शुरू होगी जिसमें बौद्धिक का रागात्मक से मेल होगा, वे विविधता में एकता को निषिक्रय नहीं बलिक सशक्त सिद्धांत बनायेगी और जो स्वच्छ लौकिक खुशियों को स्वीकार करके भी सभी जीवों और वस्तुओं की एकता को नजर से ओझल न होने देगी।