डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
क्रानित बहुधा अपनी शुरूआत के उददेश्य भूल जाते हैं
क्रानित बहुधा अपनी शुरूआत के उददेश्य भूल जाते हैं। अपनी कौम या मनुष्य जाति में सच, कर्म और उदारता के गुण उभारने के लिए क्रानित की आवश्यकता की उनकी दिमागी तैयारी शायद हो जाती है। परिवर्तन करने की आवश्यकता वे महसूस करते हैं। जब राजनैतिक, आर्थिक या सामाजिक क्रानित करने मे वे लग जाते हैं तो बुनियादी उददेश्यों को, जो उन्हें प्रेरित करते हैं, वे भूल जाते हैं। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) समाजिक क्रानित समाजिक क्रानित और चरित्र निर्माण साथ-साथ हों और एक दूसरे के सहायक हों और उन दोनों में से किसी को अथवा दूसरे के परिणाम के रूप में नहीं देखना चाहिए। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) कर्म, चरित्र, क्रानित सच, कर्म और चरित्र को क्रानित के बाद की चीज नहीं समझना चाहिए। इन्हें तो क्रानित के साथ-साथ चलना चाहिए। यही वजह है कि कुछ हद तक आधुनिक मानव पर राजनीतिक दल का बहुत निर्णायक असर पड़ता है। अगर राजनीतिक दल क्रानित के साथ-साथ चरित्र निर्माण का काम भी अपना लें तो राजनीति पवित्रता प्राप्त करेगी जो अभी तक उसको नहीं मिलती है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) अन्याय के विरूद्ध : सिविल नाफरमानी आदमी को अन्याय और अत्याचार पूर्ण रूतबे से लड़ने के लिए हमेशा तैयार रहना होगा। दरअसल अन्याय का विरोध करने की आदत बन जानी चाहिए। आज ऐसा नहीं है। आदमी लम्बे अरसे तक गददी की गुलामी और बहुत थोड़े अरसे के लिए उससे नाराजी के बीच एकान्तर करता रहता है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) अन्याय के विरूद्ध गलत अधिकार और अत्याचारी शासन के खिलाफ आदतन अवज्ञा सम्भव है, क्योंकि इसकेलिए चौड़ी छाती के अलावा और किसी हथियार की जरूरत नहीं। सिविल नाफरमानी करने वालों की रिले-रेस जैसी हो ताकि एक के थकने पर दूसरा उसकी जगह ले ले। इतिहास के हाली एजेंडा पर एक बड़ा सवाल खड़ा है कि क्या मनुष्य जाति समर्थ होगी ऐसे आदमी पैदा करने में जो आदतन सिविल नाफरमानी करें। षडयन्त्र और हथियार से निरंतर क्रानित असंगत बात है। सिविल नाफरमानी के जरिये निरंतर क्रानित की सम्भावना निशिचत है। सत्ता के दूसरे पहलू, अययाशी और रूतबे की भूख की यह एकमात्र दवा है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) सत्ता की लड़ार्इ सत्ता से लड़ार्इ में जीवटता और कार्यशकित आती है, जिससे व्यकितगत और व्यकित-निरपेक्ष मनोभावों का विस्फोटक मिश्रण पैदा होता है। इसका उददेश्य केवल सत्ता का नियंत्रण नहीं होता। गददी का इस्तेमाल करके कानून बदलना और भला करना इसका उददेश्य होता है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) क्रानित की इच्छा-शकित यह मान लेना चाहिए कि निरन्तर क्रानित करनेवालों की इच्छा-शकित में दम, मजबूती तभी तक बनी रहती है, जब तक प्रासंगिक क्रानित के द्वारा लोगों का भला करने के लिए सत्ता हासिल करने की उम्मीद दिखार्इ पड़ती है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) राजनीति का संत राजनीति मे संत वही है जिसे सत्ता में परोपकारिता और व्यकितगत पहलुओं की पूरी जानकारी हो और जो यह जातना हो कि इन दोनों को साथ चलना चाहिए, और यह कि आदमी अधिक-से-अधिक इतना कर सकता हे कि व्यकितवाद अनुशासित होकर कम हो जाए। राजनीति में और किस तरह का संत केवल धोखेबाज होता है, जो त्याग की चिकनी-चुपड़ी बातें करता है लेकिन जिसके दिल में यदि आराम की नही ंतो रूतबे की भटटी धधकती रहती है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) विश्व-बन्धुत्व जब इन गुणों का ऐसा फैलाव हो कि समूची मनुष्य-जाति पर छा जाय तब ऐसा जमाना आयेगा कि आदमी विश्व-बन्धुत्व के आनन्द का अनुभव करेगा और इसके अनुसार काम करेगा। आदमी तब अपने में और आपस में शानित का अनुभव करेगा। इसलिए राजनीति में सफलता ऐसे आंकना चाहिए कि किस हद तक कोर्इ कौम या मनुष्य-जाति सच्ची, साहसी, सहयोगी और मन से काम करने वाली है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) पराजय का दर्शन निरन्तर अवज्ञा एक मायने में निरंतर हार है। हार जिसका अंत होता है, वह निर्मुला भी कर सकती है, हार जो निरन्तर हो और जिसमें प्रयास हमेशा होता रहे, लाजमी तौर से श्रेष्ठ बनाती है। आदमी, अफसोस है कि अभी इतना कमजोर है कि अपने कन्धे पर पराजय के इस दर्शन का भार नहीं ढो सकता। जब तक कि प्रासंगिक जीत के सहारे भलार्इ और अन्याय पर अमल करने का मौका न मिले। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) राजनीति में अनुशासन राजनीति में अनुशासन अन्दरूनी उतना ही होना चाहिए जितना बाहर हो। अनुशासित या सिथर बुद्धि के बादमी की तुलना बहुत पहले एक स्मरणीय श्लोक कछुए से की गर्इ है, जो अपने शरीर के हिस्सों पर पूरा नियंत्रण कर सकता है, और उन्हें समेट सकता है। बाहरी उददेश्यों को हासिल करने के लिए अन्दरूनी अनुशासन बहुत जरूरी है। मन और चित्त की ऐसी एकाग्रता अन्दरूनी भी हो सकती है। सम्पूर्ण अनुशासन वह है, जिसमें अन्दरूनी और बाहरी एकाग्रता की जरूरत होती है। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) राजनीति में विचार और कर्म आज के जमाने में राजनीति पूर्ण रूप से तुषिटकारक पेशा नहीं है। कुछ न कुद अधूरापन उसमें महसूस होता है। यह पैसा, लड़ार्इ या जीत की समस्याओं से उलझी रहती है। इसकी जबान में जब कटुता नहीं होती, तब कलह और गुस्सा होता है। इस तरह की क्षणिक चीजों और उनसे पैदा होने वाले तीव्र कलह से बचने का कोर्इ रास्ता नहीं दिखार्इ देता। राजनीति में रहते हुए इनसे बचने की कोशिश करना ढ़ोंग है। लेकिन राजनीतिक विचार और कर्म में एक नये अध्याय को जोड़ने का तरीका निकालना होगा। (सच, कर्म, प्रतिकार और चरित्र निर्माण) भारत में वर्ण-व्यवस्था भारत में वर्ण-व्यवस्था का उदय कैसे हुआ और क्या समस्त जातियों को, जिन्हें जीता गया, जीतकर अलग-अलग वर्णों के रूप में भारतीय वर्ण-व्यवस्था में मिला लिया गया, यह भारतीय इतिहासकारों के लिये विववाद का विषय होगा क्योंकि वे तथ्यों एवं असलियतों से परिचित नहीं हैं। पृथ्वी पर के प्रत्येक व्यकित का प्रारम्भ का इतिहास रहस्यमय तथा काल्पनिक कथाओं में गुम या छिपा हुआ है। जातियों के इधर-उधर जाने, उनके आपसी टकराव और महाद्वीपों में बसने आदि के बारे में विखरे हुए तथ्यों का इकटठा करने में पुरातत्व और साहित्य से सहायता अवश्य मिलती है पर उसमें भी बहुत कुछ काल्पनिक और अनिशिचत है। मानव इतिहास पर दृषिट डालते हुए इसे अच्छी तरह याद रखना होगा कि ऐतिहासिक खोजों में अभी बहुतेरी असलियतों का पता लगाना है और उनमें बहुत एक ऐसी हैं जिनका तो पता लग ही नहीं सकता। (जाति-व्यवस्था) कथनी और करनी कोर्इ भी महान व्यकित अगर सार्वजनिक जीवन से पचास या उससे ज्यादा साल तक जुड़ा रहा हो तो उसके कथनों मे परस्पर विरोधी बातें मिल जायेंगी। महात्मा गांधी ने अपनी अप्रतिम दृषिट के बावजूद बि्रटिश साम्राज्य, जाति-व्यवस्था और श्रम व पूंजी सम्बन्धों के बारे में कर्इ ऐसी बातें कहीं जो बेमेल या एक दूसरे को काटने वाली हैं। (जाति-व्यवस्था) राजनीति का शुद्धीकरण अपने देश में साथ उठने-बैठने के अलावा हमेशा कोर्इ लगा रहता है, कभी किसी को नौकरी मिलनी है या और कोर्इ सिफारिश करनी रहती है। ऐसे राजकाजी लोगों में, जिनमें जाति की खुली लड़ार्इ भी रहती है, अगर सीधा सम्बन्ध नहीं तो तिकोनिया सम्बन्ध तो होता ही है। राजनीति कभी साफ हो ही नहीं पाती, हमेशा अपने रिश्तेदारों, बिरादरी का खयाल रखना, जैसे बन्द पड़े वैसे काम निकालना, सब तरह के लोगों को खुश रखना और मुंह देखी बातचीत करना तथा सच्चार्इ के अलग-अलग पहलुओं को इस तरह देखना कि सच और झूठ में फर्कन रह जाय। बार-बार राय बदलना और सिद्धान्तों की जैसी जरूरत पड़े, वैसी टीका करना कि अकृतज्ञ चरित्र का लक्षण बन जाय। जब सरकारी ओहदे पर रहे तो उदारवादी और विरोधी राजनीति चलार्इ तो क्रानितकारी। ये सब द्विजों के अवगुण हैं और जहां द्विज नेता रहे वहां भी ये बहुतायत से रहे। जब तक द्विज लोग अपने ओर शूद्रों के बीच की खार्इ को लगातार सचेत होकर नहीं पाटते तब तक उनके यह दोष रहेंगे। (जाति-व्यवस्था) जाति और नौकरियां एक बहुत ही मामूली कसौटी पर उसे परखा जा सकता है। जिस दिन प्रशासन और फौज में भर्ती के लिए और बातों के साथ-साथ शूद्र और द्विज के बीच विवाह को योग्यता और सहभोज के लिए इनकार करने पर अयोग्यता माना जायेगा, उस दिन जाति पर सही मायनों में हमला शुरू होगा। वह दिन अभी आना है। (जाति-व्यवस्था) तीन आने रोज मैं चाहता हूं कि यह हमेशा याद रखा जाय कि 27 करोड़ आदमी तीन आने रोज के खर्च पर आज जिन्दगी चला रहे हैं, जबकि प्रधानमंत्री के कुत्ते पर तीन रूपये रोज खर्च करना पड़ता है। यह है आज हमारे हिन्दुस्तान की हालत खर्च तो और ज्यादा होगा लेकिन मैं जानबूझ कर कम कर रहा हूं ताकि कोर्इ मेरी जबान न पकड़े। (लोकसभा में लोहिया: प्रथम भाषण) गैरबराबरी का देश हमारे देश में गैर-बराबरी जितनी थी, उससे ज्यादा बढ़ती चली जा रही है। मैं खाली यह बताउंगा कि हमारे देश में खेतिहर मजदूर 12 आने रोज कमाता है क, ख, ग, या अलिफ, बे, पे पढ़ाने वाला अध्यापक 6 रूपये रोज कमाता है और जो सरकार मे सबसे बड़ा आदमी है, यानी प्रधानमंत्री, उसके उपर पच्चीस, तीस हजार रूपये रोज खर्च होते हैं। (लोकसभा में लोहिया: प्रथम भाषण) नारी प्रताड़ना लोग मुझसे पूछते हैं कि अपने देश में सित्रयों को क्यों पीटा जाता है। यह सचमुच एक दयनीय अवस्था है। लेकिन इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण है जिससे मनुष्य इतना निम्न स्तर को प्राप्त हो जाता है। मैंने इस प्रश्न पर बहुत सोचा। मैं करीब सात-आठ वर्षों तक प्रयत्नशील रहा किन्तु मुझे इसका उत्तर नहीं मिल सका। किन्तु अब मुझे इसका उत्तर प्राप्त हो गया है। हमारे देश के हजारों लोग कारखानों, उधोग-धन्धों, दुकानों में कार्यरत हैं, उन्हें अपने उपर के लोगों से प्रताड़ना एवं गालियां सुननी पड़ती हैं और ऐसा दिन भर होता रहता है। किन्तु वे कार्यमुक्त किए जाने और गन्दे इल्जामों में फंसाये जाने के परिणामस्वरूप चुप रहते हैं। किन्तु उनका मसितष्क घबराया हुआ रहता है और घर लौटने पर वे क्रुद्ध हो जाते हैं और तब भी वे अपने मालिकों को कुछ नहीं कहते या करते। उनकी यह क्रुद्धता एवं गुस्सा नारियों के उपर शान्त होता है। अगर सित्रयां ऐसी अवस्था में परिवार से सम्बनिधत कुद बातें करती हैं तो मर्दों का पारा गर्म हो जाता है, ऐसी परिसिथति में सित्रयां अपना गुस्सा बच्चों को पीटकर शान्त करती हैं। इस तरह यह युग भी आज बर्बाद हो रहा है इस गन्दी प्रथा से। (21.06.63 चौखम्भा) भारतीय नारी की मजबूरियां सम्पूर्ण भारत कष्टों में रहता है। इसमें दस में तीन पुरूष और ग्यारह में आठ सित्रयां हमारे देश में भूखे रहते हैं। हमारी परम्परा ऐसी है कि सित्रयां अन्त में खाती हैं। जब सबको खिला लेती हैं तब। सम्पन्न परिवारों मे कोर्इ तकलीफ नहीं किन्तु निर्धन परिवारों मे सित्रयों को अधिक कष्ट सहना पड़ता है। साधारणत: वैसे भी चीजें कम रहती हैं। अगर अतिथि आ गए, तो परिवार की स्त्री को बचा-खुचा खाकर रहना पड़ता है या भूखे ही रह जाना पड़ता है। (मैनकाइंड) नारी स्वतंत्रता कितनी औरत को किस तरह की आजादी देना चाहते हो? मैं तो बिल्कुल गोली की तरह जवाब दे दूंगा। मेरा जवाब है कि मैं औरत को उस हद तक आजादी देना चाहता हूं, जितनी कि मर्द को देना चाहता हूं। बिल्कुल और पूरी बराबर। दिमाग के अन्दर औरत और मर्द के जो भी कीड़े हैं उनको हमेशा के लिए खत्म करो। (इतिहास चक्र) राजनीति का सत्य राजनीति का सत्य एवं राजय पर नियंत्रण दो चीजें एवं दो विरोधी चीजें हैं। राजनीति खासतौर पर एवं मानी हुर्इ बात है कि लोगों को भलार्इ पहुंचाने का ढंग है या सभी लोगों के लिए-दल, लोग एवं मनुष्य, जाति के कल्याण का साधन है। (माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म) निरक्षरता, रूढि़ परम्परा निरक्षरता, रूढि़, परम्परा, जाति इत्यादि के प्रभाव के कारण चौखम्भा व्यवस्था का हवार्इ प्रतीत होना सम्भव है। लेकिन जतना की अकर्मण्यता नष्ट करने का और भ्रष्ट व बोझिल कारोबार से उनकी मुकित का, चौखम्भा राज ही अकेला रास्ता है। नारी और घर मर्द के मुकाबले एक औरत अपने घर में ज्यादा देर रहती है, बाहर नहीं निकलती है, तो कम-से-कम प्रधानमंत्री इतना कराएं कि फर्श सेलेकर छत तक धुआं निकलने केलिए नाली या चिमनी का इन्तजाम किया जाए जिससे औरतों की आंखें बचें। इसके अलावा पानी निकालने या दूर से ले जाने मे बहुत तकलीफ होती है। देहात के लोग इस बात को जानते हैं कि भारत की औरतों का पाखाने के मामले में कितनी तकलीफ होती है। तो इस सम्बन्ध मे भी प्रधानमंत्री कुछ करें। जहां तक अन्न का सम्बन्ध है, यह सही है कि सभी भूखों मरते हैं लेकिन औरतों और बच्चों पर यह आफत ज्यादा आती है। (लोकसभा में लोहिया: 2.8.1966) नारी-क्रूरता लेकिन समाज क्रूर है और औरतें तो बेहद क्रूर बन सकती हैं। उन औरतों के बारे में विशेषत: अगर वे अविवाहित हों और अलग-अगल आदमियों के साथ घूमती-फिरती हों, तो विवाहित सित्रयां उनके बारे में जैसा व्यवहार करती हैं और कानाफूसी करती हैं, उसे देखकर चिढ़ होती है। इस तरह के क्रूर मन के रहते मर्द का औरत से अलगाव कभी खत्म नहीं होगा। (जाति-व्यवस्था) परिवर्तन के तरीके कानून का उल्लंघन करना, गिरफतारी देना, सत्ता द्वारा दण्ड पाने को, यहां तक कि मृत्यु प्राप्त करने की दावत देना ही परिवर्तन करने का सबसे संतोषजनक तरीका है, यधपि मृत्यु वाली बात कोर्इ अच्छी चीज नहीं। पर मेरा विश्वास है कि किसी भी सिद्धान्त या दान को, जो कोर्इ सार्थक चीज हासिल करना चाहता है, मृत्यु तक के लिए तैयार रहना चाहिए, केवल वचन में नहीं बलिक जीवन की तरह एक वास्तविकता के रूप में जब किसी को मरना होता है तो उस क्षण मृत्यु बहुत खराब लगती है। पर किसी दल की सार्थकता इसी में है कि उचित अवसर पर मरने साथ-साथ हुर्इ है। संसार को आज इस अवस्था मे ला छोड़ा है कि जहां अमेरिका, रूस एवं पशिचमी यूरोप के लोग 5,000 से 10,000 रूपयों के औजार से कार्य कर संतुष्ट हो जाते हैं, अन्य देशों के लोगों को 150 से 300 रूपये के औजारों से कार्य कर संतुष्ट हो जाना पड़ता है। यह पूंजीवादी विकास है, और यह सत्य है कि हमें लक्ष्य एवं वर्ग-संघर्ष की बातो ंपर पुर्नविचार करना पडे़गा। (माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म) पूंजीवादी विकास का अर्थ माक्र्स ने आरम्भ मेंही गलती की किउसने पूंजीवाद को उसके साम्राज्यवादी प्रसंग से अलग करके देखा। माक्र्स साम्राज्यवादी शोषण से अनभिज्ञ नहीं थे और उनके अनुयायी लेनिन ने उसे और भी अधिक महसूस किया, लेकिन उनकी दृषिट में साम्राज्यवाद एक बाद की चीज थी, एक गन्दा अतिरिक्तांग था और इस कारण उन्होंने केवल ओपनिवेशिक जातियों के प्रति एक साधारण सहानुभूति दिखार्इ, जिसमें अधिक गहरार्इ की छानबीन नहीं थी। अत: माक्र्सवाद पूंजीवादी विकास की तर्कोचित पूरी व्याख्या प्रस्तुत नहीं कर सकता। उसके पूंजीवाद की तस्वीर पशिचमी यूरोप की तस्वीर है, जिसमें अमरीकी और जापानी पूंजीवाद बाद में जुड़ गया। वह बाकी दुनिया से अलग अपने आप में विकसित हुआ है। (समाजवाद के आर्थिक आधार) पूंजीवाद और समाजवाद माक्र्सवाद ने मनुष्य जाति के इतिहास को कर्इ भागों में विभक्त किया है साम्यवाद के पूर्व का गुलामों पर सामन्तों द्वारा विभिन्न पूंजीवादी तरीकों से वर्ग-संघर्ष एक खास सभ्यता का एक नर्इ दिशा की ओर बढ़ना है। माक्र्सवाद कहता है कि पूंजीवादी व्यवस्था समाप्त हो रही है क्योंकि इसके श्रमिक वर्ग के लोग कब्र खोदने का सा कार्य कर रहे हैं। यह जितना संगठित एवं अच्छी तरह मिला रहेगा, यह शकित एवं सम्पतित प्राप्त करेगा। जो श्रमिक इसके उत्थान में मदद देता है वह एक नये वर्ग का सृजन भी करता जाता है। जो समाजवादी तरीकों से कार्य समाज के पैमाने पर किया जायेगा वह उतनी ही जल्दी अपना लक्ष्य प्राप्त कर लेगा। जो पूंजीवाद को सबसे उपरी स्तर पर ले जाते हैं, वे सर्वप्रथम इसकी समापित में ही योगदान देते हैं और वे समाजवाद का मार्ग प्रशस्त करते हैं। इसका मतलब पशिचमी यूरोप, जो पूंजीवाद का पोषक है, अंततोगत्वा समाजवाद की राह में ही आयेगा। (माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म) आमदनी का स्रोत मान लो कि ऐसी सरकार बन जाए जो मेरे कहने में चले तो मैं कहूंगा कि न्यूनतम सीमा को उठाने में तो पांच वर्ष या सात वर्ष लग सकते हैं, लेकिन जो उंचा है, उसको गिराने में दो-तीन महीने से ज्यादा वक्त नहीं लगना चाहिए। (लोकसभा में लोहिया) 16.03.65 समाजवाद का लक्ष्य समाजवाद को दो कार्य करना है एक ही समय में। किन्तु साम्यवादी को एक काम करना होता है। वह केवल पूंजीवादी व्यवस्था को समाप्त करना चाहता है, और वहीं वह अपने कार्य को समाप्त मान लेता है, जबकि समाजवादियों को पंूजीवादी वर्ग और पूंजीवादी उत्पादन प्रणाली को, जिसे पंूजीवाद ने संसार को दिया है, समाप्त करना होगा। ये दो कार्य हो जाने चाहिए, जिससे आज अच्छे आर्थिक नतीजे हासिल किये जा सकते हैं। (बिल टू पावर एण्ड अदर राइटिंग्स) अहिंसा अहिंसा को छोटी-छोटी स्थानीय जगहों में प्रसारित करें एवं व्यकितयों की अभिरूची को जगायें, झूठ का परित्याग करें। यह सोच लेना है कि हिंसा का भी विरोध कर रहा हूं। इस तरह जबकि आज सभी लोग हिंसक बने हैं एवं सरकार की संगीनें भी हिल चुकी हैं, इसलिए एक अलग रास्ते का निर्माण करना होगा। (बिल टू पावर एण्ड अदर राइटिंग्स) समाजवाद : संभव बराबरी समाजवाद को एशिया और सम्पूर्ण संसार में अधिक से अधिक संभव बराबरी लोगोंको दिलानी चाहिए। इनमें भूमि का पुन: वितरण, एवं उधोग-धन्धों पर सामाजिक नियंत्रण शामिल होना चाहिए। इसकी राजनीतिक बनावट का प्रारम्भ विकेनिद्रत राज्य से होना चाहिए एवं इसका तकनीकी ढंग यह होना चाहिए कि लघु मशीनों से प्रगति करें। यह समाजवाद लोगों को अच्छा जीवन-स्तर प्रदान कर सकता है। तभी वे एक शानितप्रिय सभ्यता के विकास में अग्रसर हो सकते हैं, इसके विरूद्ध कठिनाइयां भी हैं। आज केन्द्रीकरण की प्रवृतित बड़े जोरों से पनप रही है। एशिया इस तरह के समाजवाद के अभाव में सभी लोगों को रोटी भी उपलब्ध नहीं करा सकता। (माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म) समाजवादी मार्ग समानता, प्रजातन्त्र, अहिंसा, विकेन्द्रीकरण एवं समाजवाद (हम औधोगीकरण की छोटी-मोटी बातों को छोड़ दें) ये पांच बातें भारतीय रााजनीति का ही लक्ष्य नहीं हैं बलिक सम्पूर्ण विश्व के लिए ये सिद्धान्त अत्यन्त महत्वपूर्ण और सर्वोपरि है। सभी तरह के दल और लोग इन बातों को स्वीकार करेंगे। संसार में जहां कि लोगों के विचार मेल नहीं खाते, यह एक ऐसा विचार है जिस पर अधिक से अधिक लोग सैद्धानितक दृषिट से सहमति व्यक्त करते हैं। (माक्र्सवाद, गांधी एण्ड सोशलिज्म) माक्र्सवाद की सीमायें माक्र्सवाद अपन पूंजी संचयीकरण के सिद्धान्त में बिल्कुल सही है, औधोगिक संकट के प्रश्न पर, एकाधिकार एवं श्रम के समाजीकरण पर अधिक सही है। किन्तु निर्धनता के मूल्यांकन में आकसिमक वर्ग-संघर्ष एवं विश्व क्रानित के सिद्धान्त का गलत मूल्यांकन करता है। उत्पादन और वितरण में यहीं पर संकट खड़ा होता है। यह मैं नहीं कहता हूं कि माक्र्स को इन बातों की जानकारी नहीं थी या उनके अनुयायी इन बातों को नहीं जानते थे। किन्तु सच्चार्इ यह है कि माक्र्सवाद इतना मजबूत नहीं था कि वह इन चीजों को पंूजीवाद सम्बन्धी अपने सिद्धान्त में रखकर इसका निराकरण पाते थेा इसलिए इसको जानते हुए भी उन्होंने अपने पूंजीवाद सम्बन्धी सिद्धान्तों में स्थान नहीं दिया। सर्वप्रथम हम प्रासंगिक तथ्यों का पता लगायेंं। (फ्रैग्मेन्टस आफ वल्र्ड मार्इण्ड) पूंजीवाद और कम्युनिज्म आज के युग की पंूजीवाद और कम्युनिज्म की दो जुड़वां राक्षसी शकितयों के खिलाफ लड़ार्इ छेड़ती हुर्इ, सोशलिस्ट पार्टी अपनी लड़ार्इ में अक्सर बर्बाद हो सकती है मगर वह बार-बार जिवित होती रहेगी। इसलिए कि इंसान जिंदा रहेगा और आखिरकार जीत समाजवाद की ही होगी। सम्पूर्ण बराबरी : संभव बराबरी समाजवाद से एक सीढ़ी नीचे उतरो, उस सीढ़ी का नाम है बराबरी। उस बराबरी से एक सीढ़ी और नीचे उतरो, आर्थिक बराबरी, सामाजिक बराबरी, राजकीय बराबरी, धार्मिक बराबरी। उससे एक सीढ़ी और नीचे उतरो तब उसके बाद आयेगी समता, सम्पूर्ण समता, सम्भव समता। सम्पूर्ण समता का सपना देखो। समाजवाद का सपना समाजवाद एक सुन्दर शब्द है ओर जहां तक मेरी जानकारी है, समाज के सभी लोग बराबर होते हैं, न तो कोर्इ उंचे न कोर्इ नीचे। व्यकित के शरीर में सिर उपर रहता है, इसलिए वह सबसे उंचा नहीं होता और पैर सबसे नीचे भूमि को छूता है इसलिए वह सबसे नीचा नहीं होता। जिस तरह से शरीर के अंग बराबर हैं, समाज में व्यकित भी बराबर है। यही समाजवाद है। सत्याग्रह सत्याग्रह एक अस्त्र के रूप में हमेशा रहेगा, जब तक अन्याय एवं तंगी की हालत रहेगी। और अगर यह नहीं रहेगा तो बन्दूक और गोली रहेगी। यही उसका विकल्प है जो गत 30 वर्षों से भारत ने विश्व के सामने रखा है। नागरिक अवज्ञा या बन्दूक? विकल्प संसद और संघर्ष विप्लव मे नहीं बलिक बन्दूक और मताधिकार में है। (माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म) सत प्रकार की गैर बराबरियां गैर बराबरी सात प्रकार की विशेष तौर से हैं:- 1. नर-नारी के बीच की गैरबराबरी, 2. गरीब-अमीर के बीच की गैरबराबरी, 3. जाति के कारण गैरबराबरी, 4. गोरे-काले की गैरबराबरी, 5. गुलाम देश और शाही देश के बीच की गैरबराबरी, 6. अस्त्रों के कारण गैरबराबरी यानी अस्त्रों का नाश और 7. व्यकित और समाज या समूह या राज्य सरकार उनके आपस के सम्बन्धों की मर्यादा को तोड़ देने के कारिण उत्पन्न गैरबराबरी और अन्याय। (समाजवादी आन्दोलन का इतिहास) बीसवीं सदी बीसवीं सदी के दो गुण हैं। एक तो यह दुनिया का शायद सबसे बेरहम युग है, बिल्कुल निर्दयी, और दूसरे अन्याय के खिलाफ जितना यह युग लड़ रहा है, उतना शायद पहले वाला और कोर्इ नहीं लड़ा। एक तरह से निदर्यता मे यह पीढ़ी बहुत बढ़ी हुर्इ है, तो दूसरी तरफ न्याय की इच्छा मे भी। (सप्त क्रानित से) क्रानित का लक्ष्य मैं यह बताना चाहता हंू कि राजनीतिक काम का कभी भी यह लक्ष्य नहीं होना चाहिए कि वह दूसरी पार्टियों को सुधारे। अपने अन्य लक्ष्यों से प्रासंगिक रूप में वह हो जाय तो यह अलग चीज है। राजनीतिक दल को, खुद को और देश को सुधारने और ताकतवर बनाने का लक्ष्य अपने सामने रखना चाहिए। (क्रानित के लिए संगठन) क्रानित का अनुशासन अनुभव से हमने सीखा है योग्य बनना और ज्यादा अधिकारों के लिए लड़ना। एक दूसरे पर निर्भर करते हैं और आगे के लिए भी हमें इसी तरीके का इस्तेमाल करना चाहिए। (क्रानित के लिए संगठन) गरीबी अमेरिका और रूस में बच्चों को औसत करीब आधा सेर दूध रोज मिलता है और हिन्दुस्तानी बच्चे को शायद आधा दर्जन बूंदों से भी कम। खर्च पर सीमा मुझे इससे मतलब नहीं कि किन चीजों का राष्ट्रीकरण करते हो। जरूरत पड़े तो सब चीजों का राष्ट्रीकरण करो। मुझे इससे मतलब नहीं कि खर्च के उपर केवल सीमा कानून सेलगाते हो या आयकर से लगाते हो या किस तरह से लगाते हो। लेकिन सीमा बांधों, खर्चा करने के लिए, चाहे जैसे भी हो। आज के हिन्दुस्तान में 1500 रूपये से ज्यादा किसी को नहीं खर्च करने देना चाहता हूं। (प्र्रस्ताव एवं बहस) कलमघिस्सू पढ़ा-लिखा व्यकित कृषि भी एक मूर्ख की अपेक्षा अधिक वैज्ञानिक और बुद्धिमतापूर्ण ढंग से करेगा। कोर्इ वजह नहीं है कि देश की प्रगति में व्यकित अपना योगदान, कृषि के क्षेत्र मे मदद करना नहीं चाहे। आवश्यकता इस बात की है कि इसे एक नवीन और मौलिक दृषिटकोण प्रदान किया जाए। (माक्र्स, गांधी और सोशिलिज्म) खर्च की सीमा जाहिर है कि जब सभी लोगों के निजी खर्चे-राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री और करोड़पति के भी एक सीमा के नीचे रहेंगे, तो चीजों के दाम अपने आप कम होंगे और कम आमदनी वाले लोग भी अपनी मेहनत का फायदा उठा सकेंगे। (माक्र्स, गांधी और सोशलिज्म) स्ांतुष्ट जीवन एक जीवन बिना विचित्रताओं के असन्तुष्ट होता है, लेकिन जिस जीवन मे विचित्रताओं को स्थान दिया जायेगा चाहे वह जिस किसी भी रूप में दिया जाये, वह निश्चय रूप से छोटा रहेगा। (सोशलिज्म और मानवता) खर्चा बोनस का सवाल जब मनित्रयों के घरों में नमक, दाल, हल्दी के दामों की फिक्र होने लग जायेगी तब जाकर चीजों के दाम गिरेंगे, उससे पहले गिरने वाले नहीं हैं। तो पहले बड़े लोगों के खर्चे गिराओ। (प्रस्ताव और बहस) जनतंत्र और लोकसभा जनतंत्र का अर्थ है लोकसभा। लोकसभा का अर्थ है बहस ओर तर्क। बहस का अर्थ है, सच्चार्इ यानी जिस तरह तौलते समय तराजू के बटखरों का वनज बदलना अपराध है, उसी तरह तर्क के अर्थों को अपनी सुविधा के अनुसार बदलना, स्वीकारना, झुठलाना अपराध मानना चाहिए। जहां सच नहीं है, वहां बहस नहीं हो सकती। जहां बहस नहीं है वहां लोकसभा नहीं हो सकती। जहां लोकसभा नहीं हो सकती, वहां जनतंत्र नहीं हो सकता। (लोकसभा-वादवृत) हिन्दुस्तान की राजनीति में बचनबद्धता हिन्दुस्तान की आज की राजनीति में वचन निभाना भी एक बड़ी चालाकी है। वचन बदलने वाले तो सभी दल हो गए हैं। यदि किसी दल ने वचन निभाना शुरू कर दिया तो जनता का ध्यान बिजली की तरह उसकी तरफ खिंचेगा। इससे बड़ी चालाकी क्या होगी? उन लोगों से भी, जो ताकता हासिल करने के बाद वचन तोड़ना चाहेंगे। मैं कहूंगा कि कम-से-कम उसके हासिल करने के लिए तो वचन निभाओ। शायद ऐसा करते-करते वचन निभाने की आदत भी पड़ जाए। (जन-दस्तावेज) अशिक्षित समाजवादी अफसोस है कि सोशलिस्ट पाटी्र के बड़े-बड़े नेताओं को भी अखबार पढ़ने के अलावा और कोर्इ चीज पढ़ना अच्छा नहीं लगता। यह मारक दोष है। जानकारी और सिद्धान्त दोनों की पुस्तकें, विशेषकर अपने दल से छपी हुर्इ पुस्तकें पढ़ना बहुत जरूरी है। जो न पढ़ सकें उन्हें किसी और से पढ़वा कर सुन लेना चाहिए। दिमाग ही अगर नहीं बदला और नया रूप नहीं बना तो समाजवाद कैसे आयेगा। (माक्र्स, गांधी और सोशलिज्म) लोकसभा एक शीशा है लोकसभा या विधानसभा, अक्सर मैं कह चुका हूं एक शीशा है, एक आर्इना हे कि जिसमें जनता अपने चेहरे को देख सके। चेहरे पर किस वक्त कैसी सिकुड़नें हैं, कैसी आफतें हैं, कैसी तकलीफ है, कैसे अरमान हैं, क्या सपने हैं, ये सब उस शीशे में दिख सकते हैं। (लोकसभा, विधानसभा एक आइना) हृदय परिवर्तन का दर्शन हृदय-परिवर्तन गांधी जी का केवल बड़े लोगों के लिये नहीं था बलिक ज्यादा या कमजोर लोगों के लिये, करोड़ों लोगों के लिये। जिससे उनके दिल की कमजोरी दूर हो, और वे जुल्म करने वाले के खिलाफ तन कर खड़े हो सकें। मारो अगर मार सकते हो लेकिन हम तो अपने हक पर अड़े रहेंगे। यह है सिविल नाफरमानी का मतलब। (राष्ट्रवासी, लोहिया अंक, 1 मर्इ, 1971) बुरार्इ का निराकरण आप याद रखना कि हिन्दुस्तान ओर दुनिया मे ंबुरार्इ तब तक दूर नहीं होगी, जब तक बुरे को बुरा मानने वाले लोग पैदा नहीं हो जाते हैं। आज बुरार्इ को बुरार्इ मानने वाले लोग नहीं रह गये या कम हो गए हैं। (राष्ट्रवासी, लोहिया अंक) सरकार परिवर्तन जिस तरह तवे के उपर रोटी उलटते-पुलटते सेंक लेते हैं, उसी तरह से हिन्दुस्तान की सरकार को उलटते-पुलटते र्इमानदार बना कर छोड़ेंगे। यह भरोसा हिन्दुस्तान की जनता में अगर आ जाय किसी तरह से, तो फिर रंग आ आयेगा अपनी राजनीति में। (लोहिया अंक) मेरी परम्परा मैं तो उस परम्परा की कड़ी हूं जो प्रहलाद से शुरू होकर सुकरात होते हुए गांधी तक पहुंच चुकी है। मैं चाहता हूं कि मनुष्य हथियारों या ताकत का उपयोग किये बिना अन्याय एवं शोषण का विरोध करने की कला सीखे। (राष्ट्रवासी, लोहिया अंक) जनजीवन और गन्दगी जिस प्रकार सड़क या अपने घर की गंदगी को जनता प्रतिदिन झाडू लगाकर साफ करती है उसी तरह से जन-जीवन की गंदगी झाडू लगाकर साफ करनी चाहिए। (राष्ट्रवासी, लोहिया अंक) साधारण क्रमिक विचार और क्रानित साधारण विचार या क्रमिक विचारऔर क्रानित, दोनों के मेलजोल से मामला आगे बढ़ता है। मेरा तो यह निशिचत मत है कि खाली चुनाव अथवा प्रचार से उसको जनतंत्र मानना या लोकशाही मानना गलत है। यह मैं बहुत नयी बातनहीं कर रहा हूं। इसके कर्इ रूपों मे यूरोप वालों ने, अमरीका वालों ने बहुत अच्छे ढंग से लिखा है। एक बड़ा अच्छा वाक्य है कि कभी भी किसी भी समाज में बहादुर एक होगा, 999 इसका गान करने वाले होंगे। 999 को गाने की खुराक मिलती रहे इसलिए एक बहादुर को अपना काम जारी रखना पड़ेगा। बदलाव का अंतिम अस्त्र किसी एक की अति कर देना और कहना कि अनितम बदलाव तो खाली विधानसभा, लोकसभा, चुनाव सभाओं से होगा, गलत होगा। ठीक उसी तरह से यह कह देना भी गलत होगा कि अनितम बदलाव तो खाली सत्याग्रह से, सिविल नाफरमानी से या क्रानित से होगा। अतिवाद की सीमा मैं कहना चाहूंगा कि अतिवाद खराब है, बंदूक का अतिवाद खराब है। यह सब एक ही चीज के दो पहलू हैं। व्यकित का अतिवाद खराब है, समषिट का अतिवाद खराब है, तोड़ का अतिवाद खराब है। जोड़ का अतिवाद खराब है, शिखर राजनीति का अतिवाद खराब है। धरातल राजनीति का भी अगर अतिवाद हो सकता है, तो वह भी खराब है। वैसे, मुझे यह कहना नहीं चाहिए क्योंकि धरातल राजनीति को मैं ज्यादा पसन्द करता हूं, फिर भी इसका अतिवाद खराब है। एक ऐसा दिमाग बनाने का प्रयत्न होना चाहिए, जिसमें एक ही तत्व के ये दो पहलू दिखार्इ पड़े। हथियार अभिशाप हैं हथियारों की व्यर्थता, कम से कम न्यूक्लीय हथियारों की उस संयोजित प्रणाली का व्यर्थता अब सिद्ध हो चुकी है, जो लगभग सभी कुछ का विनाश कर सकती है। इस प्रणाली के प्रयोग का साहस भी नहीं है। इसकी उपयोगिता उसी सीमा तक बंधी है, जहां तक उसका उपयोग न हो। यह उपयोगिता भी संशयपूर्ण है। न्यूक्लीय हथियारों का उददेश्य अपने को आश्वस्त करने, शत्रु को आतंकित करने और निष्पक्ष लोगों पर रोब गालिब करने तक ही सीमित लगता है। जब दो लगभग बराबर की शकितयां लगातार इसी उददेश्य से काम करती रहें तो कालान्तर में उसका महत्व कम हो ही जायेगा। फिर भी, नये-नये हथियार खोजें व बनाये जाते हैं, उनका परीक्षण होता है और उन्हें अधिकाधिक संख्या में बनाना जारी रहता है। जिन हथियारों को कभी इस्तेमाल नहीं होने है वे भी लगातार बनाये जाते हैं और उनका संग्रह किया जाता है। यदि कभी इन हथियरों का उपयोग हो ही गया तो वे ओर उनके साथ यह अदुनिया भी समाप्त हो जायेगी। (माक्र्स, गांधी एण्ड सोशलिज्म) सविनय प्रतिरोध प्रश्न यह है कि क्या संकल्पबद्ध तर्क कभी इतना सशक्त हो सकेगा? क्या ऐसे लोगोंकी कल्पना संभव है जिनके लिए तर्क हीनता और उत्पीड़न के विरूद्ध सविनय प्रतिरोध एक आदत बन जाये। यह तो प्रमाणित है कि समुदाय के स्तर पर सार्वजनिक सविनय प्रतिरोध संभव है, यधपि सभी परिसिथतियों मे और अंतिम रूप से यह भी प्रमाणित नहीं है। व्यकित के स्तर पर सविनय अवज्ञा अभी तक तो बिरलों तक ही सीमित है। उस समय की कल्पना करना कठिन है जब सभी मनुष्यों या अधिकतर मनुष्यों में से हर एक अकेले और किसी संगठन के बिना, बिल्कुल अकेले और बिना किसी व्यकित के जिसका कि सहारा लिया जा सके, संगठित शकित का भीषण प्रतिरोध मात्र अपनी अवज्ञा से करे। जब स्थानीय सत्ता के विरूद्ध आदतन सविनय अवज्ञा की सिथति की कल्पना नहीं की जा सकती, किसी आक्रमण करने वाले के विरूद्ध ऐसा प्रतिरोध केवल एक सपना ही कहा जा सकता है। यदि दस प्रतिशत लोग भी कभी भीतरी उत्पीड़न के खिलाफ व्यकित स्तर पर आदतन सविनय प्रतिरोध करने वाले बन जाये ंतो उनके, आक्रमण के खिलाफ एक अच्छी निवारक शकित बन सकने की उम्मीद की जा सकती है। मनुष्य जाति ने सोचना-विचारना बन्द कर दिया है। विचारधारा संसबंधी बडे़ बहस-मुबाहिसों में पुरानी अवधारणाओं की पूर्णता और सृजनात्मकता होती है और नये सारे गढ़े जाते हैं, पर विचारों की दरिद्रता रहती है। चिन्तन सृजनात्मक नहीं रहा। वह प्रचारात्मक हो गया है। दो शकित-समूहों मे से किसी एक के लिए उपयचोग की दृषिट से विचार गढ़े और परखे जाते हैं। (माक्र्सवाद, गांधी एण्ड सोशलिज्म) समाजवाद और गांधी जी दुनिया आज दो प्रणालियों की जकड़ में है और एक तीसरी प्रणाली भी उभर रही है। पूंजीवाद और साम्यवाद लगभग पूरी तरह से विकसित प्रणालियां हैं और सारा विश्व उनके चंगुल में है और इसका नतीजा है गरीबी, युद्ध और आतंक। तीसरा विचार अब विश्व-मंच पर उभर रहा है। यह अब भी अपर्याप्त है, पूरी तरह विकसित नहीं हुआ है, पर यह खुला हुआ है। खुली प्रणाली में सत्य और प्रगति की तब भी कुछ संभावना रहती है, बन्द प्रणाली तथ्यों को तोड़ती-मरोड़ती है और उन्हें सारहीन साबित करने के लिए उनकी उपेक्षा करती है। खुली प्रणालियां तथ्यों के अनुरूप चलती हैं और हर हालत में हम अपेक्षरा करते हैं कि वे बदलती हुर्इ या हठीली परिसिथतियों से फिर-फिर स्फूर्ति पाती रहेंगी। यह विचार समाजवाद का विचार है। गांधीवाद का एक नया मत या सिद्धान्त प्रतिपादित करने की जगह यह बेहतर होगा कि गांधी जी के जीवन तथा कृतित्व को विश्व मंच पर पहिले से मौजूद प्रणालियों पर लागू किया जाये। जहां तक पूंजीवाद और साम्यवाद का सम्बन्ध है, उन पर गांधीवाद को कोर्इ प्रभाव पड़ेगा, इसमें संशय है क्योंकि वे बन्द प्रणालियां हैं। किन्तु, समाजवाद के लिए गांधी जी का कृतित्व उस छलनी की तरह काम कर सकता है जिससे समाजवादी विचार छाने जायें और कूड़ा-करकट छनकर अलग हो जायेया उसके सामान्य रंग को साफ करने का काम करें। संगठनों और हथियारों की मदद के बिना आधुनिक सभ्यता में व्यकित नगण्य होते हैं। आधुनिक सभ्यता के इस ससन्दर्भ में महात्मा गांधी आये और कहा कि अगर तुम्हारे पास तुम्हारी मदद के लिए संगठन न भी हो, तुम्हारे पास हथियार न भी हों, तुम्हारे भीतर ही ऐसा कुद हे जिससे तुम्हें दमन और अन्याय यका प्रतिरोध करने की सामथ्र्य मिलती हे और इन्सान की तरह, मर्द की तरह, दुख और कष्ट सहने की शकित मिलती है। गांधी जी के अनितम तीस वर्षों में उनके कृतित्व के इस सविलक्षण और सशक्त गुण ने आधुनिक मनुष्य का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया और उसे यह विश्वास दिलाया कि भविष्य में एक नयी दुनिया के निर्माण के तत्व मौजूद हो सकते हैं। ........... बिना किसी सहायता के व्यकित स्वयं उत्पीड़न का प्रतिरोध कर सके, ऐसी सामथ्र्य देना, मेरी समझ में महात्मा गांधी के जीवन तथा कृतित्व का सबसे बड़ा गुण है। (माक्र्सवाद, गांधी एण्ड सोशलिज्म) स्माजवाद एक खुला सिद्धान्त है जब कि पंूजीवाद और साम्यवाद दोनों की प्रणालियां बन्द हैं। नयी दुनिया को सारी मानव-जाति के जीवन यापन के अच्छे स्तर के लिए प्रयास करने को तैयार रहना चाहिए। मेरा विश्वास है कि आज की आवश्यकता समृद्धि नहीं, जिन्दगी के अच्छे स्तर की है। (माक्र्सवाद, गांधी एण्ड सोशलिज्म) लोक शकित सत क्रानितयों में एक क्रानित यह भी है कि दुनिया के सभी देशों में, आपस में, पैदावार की सम्भव समता कायम हो जाए। कर्इ एक स्वरूप होते हैं जैसे अन्तर्राष्ट्रीय जमींदार का, अन्तर्राष्ट्रीय पैदावार की साम्राज्यवादी साम्राज्यशाही, अन्तर्राष्ट्रीय हथियारशाही का। इसलिए मेरे दिमाग में यह सम्भावना हो गयी है कि शायद दुनिया में हथियार खत्म होने के साथ-साथ यह जो अभी फर्क चलता है वह भी खत्म हो जायेगा। लोक शकित, मन और दिमाग एक गांधीवाद तो सरकारी गांधीवाद है और एक पुजारी गांधीवाद है और हमारे जैसों का तो कुजात गांधीवाद जो जाति के बाहर निकाल दिया गया हो, ऐसा गांधीवाद। लोकशकित और राज-शकित में विरोध खड़ा कर दिया गया। यह विरोध तर्क से गलत है, बुद्धि से है, गलत दोनों एक ही चीज के अलग-अलग पहलू हैं। शकित प्राप्त करने के लिए केवल यह पुख्य वस्तु मान लोगों का मन और दिमाग और चरित्र बदले बिना कोर्इ बड़ी चीज हो सकती है, तो यह सम्भव नहीं। परिशिष्ट -2 समय-समय पर दिये कार्यक्रम (1) लोहिया की स्वतंत्रतापूर्व विदेश नीति 1. भारत विश्व की समस्याओं में एक स्वतंत्र एवं प्रभुसत्ता सम्पन्न राष्ट्र की हैसियत से भाग लेगा। कांग्रेस का यह विचार किवह पूर्ण आजादी चाहता है, एवं एक संविधान निर्मात्री परिषद द्वारा संविधान बनाना चाहता है, इस बात का धोतक है। 2. जब तक बि्रटिश साम्राज्यवाद भारत में बना रहता है,उसका प्रतिरोध जारी रहेगा एवं राष्ट्रव्यापी सिविल नाफरमानी चलती रहेगी। इसलिए यह समझा जाना चाहिये कि अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में, युद्ध में हम बि्रटिश साम्राज्यवाद के अंग नहीं हैं। 3. भारत लीग आफ नेशन्स को पीपुल्स लीग बनाना चाहता है। 4. भारत अन्तर्राष्ट्रीय संधियों की पवित्रता में विश्वास नहीं रखता, लेकिन आक्रमण को निन्दनीय घोषित किया जाना चाहिए। 5. भारत उन सबाके अपना सर्मथन देगा जो राष्ट्रीय, घरेलू समाजवादी शकितयों के विश्व में विस्तार में अविश्वास रखते हैं, साथ ही आक्रामक के विरूद्ध किसी भी तरह के आर्थिक या अन्तर्राष्ट्रीय विरोध का समर्थन करेगा। 6. भारत अभी भारतीय सेना का अंग मानता है। इसलिए इसके विस्तार या कार्य का समर्थन नहीं किया जा सकेगा। इसलिए जनता को हम सैनिक प्रशिक्षण या अन्य अस्त्र प्रशिक्षण में प्रशिक्षित करना चाहते हैं। (2) विश्व-व्यवस्था 1. एक देश की दूरे देश में पहलेकी लगायी गयी पूंजी लुप्त मानी जानी चाहिए। 2. निर्विघ्न रूप से घूमने व विश्व के किसी भी हिस्से में किसी को भी बसने की सहूलियत। 3. सभी लोगों को राजनीतिक व 'संविधान-सभा निर्माण करने की स्वतंत्रता। 4. किसी तरह की विश्व नागरिकता (3) पांच व्याधियां 1. जाति, धर्म एवं वर्ग के नाम पर निर्मित एवं गठित राजनीति। 2. सरकार का संचालन आतंक एवं विरोधियों की हत्या एवं खूनी प्रतिरोध की भावना पर आधारित। 3. एक नये मध्य वर्ग का निर्माण जो सरकारी कर्मचारी का है। जिनमें वे राजनीतिज्ञ भी शामिल हैं जिन्हें यूरोप की फिलूलखर्ची की आदत है। 4. मुहावरे बनाने वाले एवं अभिनेताओं का विवाद रहित नेतृत्व जिसकी करनी कुछ नहीं के बराबर है। 5. एक सामाजिक दर्शन एवं बहुमुखी नीति एवं कार्यक्रम का अभाव। (4) सप्त क्रानित 1. अन्याय के खिलाफ लड़ार्इ, 2. अन्तर्राष्ट्रीय गैर-बराबरी के विरूद्ध संघर्ष, 3. राष्ट्रीय गैर-बराबरी के विरूद्ध संघर्ष, 4. खर्च पर सीमा, 5. गरीबी के खिलाफ क्रानित, 6. जाति-प्रथा का अन्त विशेष अवसर देकर, और 7. हर सम्भव बराबरी की प्रापित के लिए निरन्तर संघर्षरत रहना। (5) गैरबराबरी के रूप गैर-बराबरी सात प्रकार की विशेष तौर से है : 1. नर-नारी के बीच की गैरबराबरी, 2. गरीबी-अमीरी के बीच की गैरबराबरी, 3. जाति के कारण गैरबराबरी, 4. गोरे-काले की गैरबराबरी, 5. गुलाम देश और शाही देश के बीच की गैरबराबरी, 6. अस्त्रों के कारण गैरबराबरी, यानी अस्त्रों का नाश और, 7. व्यकित और समाज या समूह या राज्य या सरकार के आपस के सम्बन्ध की मर्यादा को तोड़ देने के कारण उत्पन्न गैरबराबरी और अन्याय। (6) स्वाधीनता की रक्षा के लिए 1. विशेष सुविधायें जो जाति, भाषा, धर्म और पद के नाते दी जाती हैं, वह समाप्त हों। 2. न्यायपालिका की शकित अधिक बढ़ार्इ जाय ताकि कार्यपालिका द्वारा किये गये अत्याचारों को रोका जा सके। 3. राजनैतिक और प्रशासनिक संस्थानों का विकेन्द्रीकरण। 4. जन-शकित इतनी प्रबल हो कि अनुचित कानूनों के विरोध की क्षमता पैदा हो। (7) दाम बांधो (ग्रामीण अर्थव्यवस्था) डा. लोहिया का कहना था कि ग्रामीण अर्थ-व्यवस्था में तब तक कोर्इ प्रभावी परिवर्तन नहींहोगा जब तक- 1. ग्रामीण मजदूर को केन्द्र मे रखकर योजना नहीं बनेगी। 2. बंटार्इ खेती के माध्यम से हो रहे शोषण को समाप्त नहीं किया जायेगा। 3. लाभ-हानि खेती पर से कर नहीं हटेगा। दाम बांधो नियम का सिद्धान्त 1. किसी उत्पादित वस्तु का मूल्य लागत मूल्य के डेढ़ गुने से ज्यादा न हो यानी इस डयोढ़े मे लाभांश को रोका जाय। 2. पैदावार के समय वस्तुओं की कीमत में 16: से अधिक उतार-चढ़ाव न हो। 3. कृषि उधोग और मशीनी उधोग में एक तुलनात्मक संतुलन रखा जाय। किसानों को अपनी पैदावार का इतना मूल्य मिलना चाहिए कि उनके व्यवहार में समानता बनी रहे। (8) तीसरी शकित के आधार 1. अफ्रीका और एशिया से औपनिवेशिक शासनों को समाप्त करने के लिए प्रयत्न करना और रूसी एवं एटलांटिक खेमे से उनको बचाना। 2. रूसी संधियों और एटलांटिक सनिधयों के खिलाफ संघर्ष करना क्योंकि ये दोनों खेमे, जो अलग-अलग संधियां कर रहे हैं, वे मूलत: युद्ध के समझौते और युद्ध की तैयारी की संधियां हैं। 3. हथियारों की मदद से उनके क्रय से यह दान शिविर एक युद्ध की तैयारियों में लगे हैं उसे समाप्त करना। 4. राष्ट्र संघ के प्रभाव क्षेत्र को बढ़ाना और उस पर ऐसा प्रभाव डालना ताकि वह विश्व-शानित की स्थापना में रचनात्मक भूमिका निभा सकें। 5. ऐसा माहौल बनाना कि जिससे रूसी खेमे या अमरीकी खेमे से युक्त संयुक्त राष्ट्र संघ का दुरूपयोग अपने झगड़े निपटाने, या अपनी-अपनी अन्तर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए समर्थन जुटाने तथा निहित स्वार्थों की रक्षा केलिए न कर सकें। 6. विश्व के समस्त देशों और राष्ट्रों के जो अलग-अलग गुट बने हैं उनको समाप्त करके ऐसे संगठन के रूप में उन्हें संगठित करना ताकि वह रूसी और एटलांटिक खेमों में शामिल होकर युद्ध की तैयारी में भाग न ले सकें। (9) राष्ट्रीय दृढ़ता के सात सिद्धान्त 1. 15 अगस्त, 1947 को जो देश की सीमा थी, उसको काट-छांट कर कोर्इ समझौता नहीं करना। 2. तिब्बत की सीमा तक अपनी सीमा को पुन: स्थापित करना। 3. तिब्बत की मुकित के बिना शानित नहीं। 4. देश की फौज मे स्वेच्छ से नहीं, कानूनन भरती शुरू करना। 5. रूसी और अमरीकी खेमे के बारी-बारी से पिछलग्गू बनने के बजाये शुद्धरूप में तटस्थता के सिद्धान्त को मानना। 6. हिमालय की रक्षा। 7. जम्बूद्वीप की अवधारणा की स्थापना। 8. देश को निरन्तर गरमाते रहना। (10) व्यकित की समानता के लिए 1. ऐसे धार्मिक अन्ध-विश्वासों से संघर्ष जो व्यकित के व्यकितत्व को अपमानित करते हैं, और इस तरह पूरे राष्ट्र को नीचे ले जाते हैं। 2. सामाजिक स्तर पर सामूहिक भेज को प्रोत्साहित करना तथा अन्तर्जातीय विवाह को समर्थन देना तथा ऐसे सम्प्रदायों , प्रतीकों और प्रदर्शनों का विरोध करना जिससे सामाजिक विषमतायें फैलाती हैं। 3. आर्थिक स्तर पर सम्पतित और आय पर सीमा लगाना और सरकार में किसी प्रकार का वंशानुक्रम या दखल न स्वीकार करना। 4. राजनैतिक स्तर पर विशेष अवसर के सिद्धान्त पर पिछड़ी जातियों को आगे बढ़ाना और ऐसा माहौल बनाना कि व्यापक मत का सही और र्इमानदारी के साथ प्रयोग हो सके। परिशिष्ट- 3 डा. लोहिया का जीवन क्रम 1910 जन्म, 23 मार्च को अकबरपुर, फैजाबाद में। 1916 टंडन पाठशाला, अकबरपुर में प्रवेश। 1918 पिता श्री हीरालाल लोहिया के साथ अहमदाबाद गये, कांग्रेस अधिवेशन के गांधी जी का प्रथम दर्शन किया। 1925 मारवाड़ी विधालय, बम्बर्इ से मैटि्रक परीक्षा प्रथम श्रेणी मे उत्तीर्ण, काशी विश्वविधालय, वाराणसी में इंटरमीडिएट मे प्रवेश। 1927 इण्टरमीडिएट परीक्षा उत्तीर्ण, स्नातक शिक्षा हेतु कलकत्ता गये। 1928 राजनीति मे सकि्रय हुए, साइमन कमीशन का विरोध किया। 1929 विधासागर कालेज से बी.ए. किया, उंची शिक्षा के लिए इंग्लैण्ड गये, छ: माह बाद शोधे लिए जर्मनी गये। 1930 जेनेवा में लीग आफ नेशन्स की सभा में भारतीय प्रतिनिधि का विरोध किया। 1932 हुम्बोल्ड विश्वविधालय, बर्लिन, जर्मनी से डाक्टरेट की उपाधि। 1934 अक्टूबर 21-22 को बम्बर्इ में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के स्थापना सम्मेलन में भाग लिया। 1936 अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के विदेश मंत्री बने। 1938 इलाहाबाद से, गांधी जी के नाम स्वतंत्रता आन्दोलन छेड़ने केलिए पहला पत्र लिखा। 1939 मर्इ 24 को लाहौर में कांग्रेस सोशलिस्ट पाटी्र के अधिवेशन के अवसर पर बन्दी बनाये गये, जून में कलकता जेल से छूटे, अ.भा. कांग्रेस के अधिवेशन में भाग लिया। 1940 मर्इ 11 को सुल्तानपुर उ.प्र. में जिलाराजनीतिक सम्मेलन में अध्यक्षीय भाषण दिया, 18 मर्इ को उ.प्र. कांग्रेस कमेटी में अंग्रेजों के विरूद्ध प्रस्ताव लाये, 7 जून को गिरफतार हुए, 15 जून को 'हरिजन में प्रकाशनार्थ गांधी जी को पहला पत्र लिखा, 1 जुलार्इ को दो वर्ष की सजा सुनार्इ गयी, 12 अगस्त को सुल्तानपुर से बरेली जेल भेजे गये, 15 सितम्बर को गांधी जी के नाम दूसरा पत्र लिखा। 1941 दिसम्बर 4 को बरेली जेल से रिहा हुए। 1942 अप्रैल 23 को सेवाग्राम में गांधी जी से वार्ता की, 8 अगस्त को बम्बर्इ में ''भारत छोड़ो आन्दोलन में शामिल हुए, 9 अगस्त को भूमिगत हुए, भूमिगत रहते हुए अगस्त में ही पहली पुसितका ''जंग जू आगे बढ़ो तथा सितम्बर में दूसरी पुसितका ''मैं आजाद हूं प्रकाशित करार्इ, सितम्बर में ही कांगेस रेडियोे की स्थापना हुर्इ, तीसरी पुसितका''करो या मरो का प्रकाशन, नवम्बर में कांग्रेस रेडियों के भूमिगत कार्यालय पर पुलिस का छापा लेकिन लोहिया कलकता से फरार, दिसम्बर में नेपाल पहुंचे और जे.पी. से मिले। 1943 नेपाल के जंगलों में कांगेस रेडियो की स्थापना को, भूमिगत स्थानों पर पुलिस का छापा, जय प्रकाश नारायण के साथ जेल में बन्दी, आजाद हिन्द के छापामार दस्तों द्वारा जेल तोड़कर जे.पी. के साथ मुक्त कराये गये, नेपाल से कलकता आये। 1944 भूमिगत कार्यकर्ताओं का बम्बर्इ में सम्मेलन हुआ, गिरफतारी के बाद लाहौर जेल में यातनाएं सहीं, लाहौर हार्इकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की। 1945 लाहौर जेल से आगरा जेल लाये गये, कलकता में पिता श्री हीरालाल लोहिया का निधन हो गया। 1946 ''गोवा आन्दोलन आरम्भ किया, सिविल नाफरमानी करते गिरफतार हुए, 21 जून को जेल से रिहा हूए और 29 सितम्बर को पुन: गिरफतार हुए, 8 नवम्बर को रिहा हुए। 1947 नेपाली आन्दोलन में भाग लिया और गिरफतार हुए, प्रदेश में साम्प्रदायिक दंगों पर तीसरा बयान दिया, 15 अगस्त को कलकता में स्वतंत्रता दिवस पर निकले जुलूस का नेतृत्व किया। 1948 जनवरी 29 को गांधी जी से आखिरी भेंट की, नासिक सम्मेलन के फैसले के अनुसार कांग्रेस की सदस्यता छोड़ दी। 1949 नेपाल-कांग्रेस के समर्थन में जुलूस निकालते हुए 25 मर्इ को गिरफतार हुए, रिहा होकर स्टाकहोम गये, रीवां में हुए किसान पंचायत अधिवेशन में भाग लिया। 1950 कोरिया युद्ध के मसले पर अशोक मेहता तथा जे.पी. से मतभेद हुआ, मद्रास सम्मेलन में न जाने का निर्णय किया। 1951 रंगून में समाजवादी सम्मेलन में भाग लिया, किसान आन्दोलन में भाग लेते हुए गिरफतार हुए, रिहा होने के बाद जर्मनी में अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी सम्मेलन में भाग लिया। 1952 अमेरिका, यूगोस्लाविया, जापान, हांगकांग, थार्इलैण्ड, इंडोनेशिया और श्रीलंका की यात्राएं की, पचमढ़ी में हुए समाजवादी पाटी्र के सम्मेलन की अध्यक्षता की, सोशलिस्ट पार्टी तथा किसान मजदूर प्रजा पार्टी में विलय की पहल की। 1953 प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के पांच आधारभूत सिद्धान्तों की घोषणा की, कांग्रेस के साथ साझा मंत्रिमंडल बनाने के प्रस्ताव की निन्दा की। 1954 नहर रेट आन्दोलन चलाया और पन्द्रह सौ कार्यकर्ताओं के साथ जेल गये। निहत्थे मजदूरों पर गोली चलाने वाली केरल की पहली गैरकानूनी सरकार से इस्तीफा मांगा। अन्य नेताओं से मतभेद हुए, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के महामंत्री पद से इस्तीफा दिया। 1956 लखनउ में एक लाख किसानों के जुलूस का नेतृत्व किया, जय प्रकाश नारायण से भेट की, ''मैनकाइण्ड का प्रकाशन शुरू किया, हरिजनों को मंनिदर प्रवेश कराया, गिरफतार हुए। 1957 चकिया-चन्दौली से चुनाव लड़े और हारे, सिविल नाफरमानी करते पांच हजार लोगों के साथ जेल गये, अंग्रेजों की मूर्तियां हटाने का आन्दोलन किया। 1958 द्रमुक नेता रामास्वामी नायकर तथा डा. अम्बेडकर को पत्र लिखे, नायकर से भेंट की, नेफा में गिरफतार हुए। 1959 हिन्दी में बहस करने की सुविधा न मिलने पर सुप्रीम कोर्ट को पत्र लिखा, सुप्रीम कोर्ट ने उसे स्वीकार नहीं किया, सोशलिस्ट पार्टी का पांचवां सम्मेलन। 1960 हरिजनों, गिरिजनों एवं आदिवासियों का छ: माह लम्बा सत्याग्रह चलाया, चित्रकूट में रामायण मेले का आयोजन करने की घोषणा की, 'अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन आयोजित किया। 1961 समाजवादी ताकतों की एकता की अपील की, एथेन्स में आयोजित ''विश्व समाज सम्मेलन में भाग लिया, सप्तक्रांतियों की पुनव्र्याख्या की। 1962 पं. जवाहर लाल नेहरू से फूलपुर संसदीय चुनाव हारे, हैदराबाद में तीसरा ''अंग्रेजी हटाओ सम्मेलन किया, चीनी आक्रमण के परिप्रेक्ष्य में पूरे देश का दौरा किया और सरकार की असफलता पर प्रकाश डाला। 1963 समाजवादी पार्टी तथा प्रजा समाजवादी पार्टी की एकता की पहल की, फरर्ूखाबाद संसदीय क्षेत्र से डेढ़ लाख से अधिक मतों से जीत कर संसद पहुंचे, 23 अगस्त को ''तीन आना बनाम पन्द्रह आना का ऐतिहासिक महत्व का अपना पहला भाषण दिया। 1964 विश्व व्यापी दौरे पर गये, अमेरिका में रंगभेद कानूनो का उल्लंघन करते हुए गिरफतार हुए, लंदन में भारतीय छात्रों को सम्बोधित किया, संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी का गठन कराया। 1965 पटना बंद का आयोजन तथा 25 नवम्बर को संसद घेरने की घोषणा, पटना मे गिरफतारी, उच्चतम न्यायालय में अपने मुकदमे पर स्वयं बहस की। 1966 बस्तर में आदिवासियों पर हुए जुल्म के खिलाफ संसद मे जोशीला भाषण, कलकता में पुलिस हिंसा का विरोध, उ.प्र. बन्द के सिलसिले में गिरफतार। 1967 फरर्ूखाबाद संसदीय क्षेत्र से चुनाव लड़ते हुए 'मुसिलम पर्सनल ला का विरोध, हिन्दी भाषी प्रदेशों में संविद सरकारों का गठन, 12 अगस्त को लोकसभा में अंतिम भाषण, 20 सितम्बर को पौरूष ग्रंथि के आपरेशन हेतु विलिंगटन अस्पताल में भर्ती, 12 अक्टूबर को दिल्ली में देहान्त। 15 फरवरी, 1922 को जन्मे श्री लक्ष्मीकान्त वर्मा ने अपना सार्वजनिक जीवन 1946 में सेवाग्राम (वर्धा) से प्रारम्भ किया। वहां आप 1948 तक अध्यापन कार्य करते रहे और गांधीवादी संस्कारों में रच-बस गये। आगे चलकर आप डा0 लोहिया की विचारधारा से बहुत प्रभावित हुए और समाजवादी आंदोलन के चिंतनशील गवाह बने। विगत 50 वर्षों से आप पत्रकारिता तथा साहित्य-सृजन में लगे हुए हैं। अधोलिखित कृतियां आपके रचनारत जीवन की उल्लेखनीय उपलबिधयां हैं: उपन्यास: खाली कुर्सी की आत्मा, तीसरा प्रसंग, टेराकोटा, एक कटी हुर्इ जिन्दगी। कविता संग्रह: अनुकान्त, धुएं की लकीरें, तीसरा पक्ष, आधुनिक कवि, कंचन मृग, चित्रकूट चरित। नाटक: सीमान्त के बादल, आदमी का जहर, रोशनी एक नदी है, एक ठहरी हुर्इ जिन्दगी, तिन्दुवलम। कहानी संग्रह: नीली झील का सपना, मेरी कहानियां, नीम के फूल। आलोचना: नयी कविता के प्रतिमान, नये प्रतिमान पुराने निकष। अनुवाद: इंग्लैंड का राजनीतिक इतिहास, उदर्ू की कहानियां, साइंस आफ बीइंग-आर्ट आफ लिविंग। अन्य: भारतीय समाजशास्त्र, समाजशास्त्र के सिद्धान्त, प्रतीक पुरूष टंडन जी, राजर्षि टंडन। संपादन: (पुस्तकें) सूर साहित्य संदर्भ, हिन्दी और नागरी लिपी, हिन्दी आन्दोलन, (पत्रिकाएं) जन, नये पत्ते, निकष आदि। डा0 लोहिया महाष्टमी की मध्यरात्रि को छिन्नमस्ता के चरणों मे राममनोहर ने अपने जीवन की बलि दे दी। छिन्नमस्ता, देवी का वह रूप है जिसमे वह स्वयम ही अपना रक्तपान करती है। पिछले कर्इ वर्षों से राममनोहर अक्षरश: अपना रक्तपान कर रहे थे। मानव जाति की इस काल-निशा में चारो तरफ जो भठठी जल रही थी, उसने जीने के रस का स्रोत शुष्क कर दिया था। भारतीय दर्शन के अनुसार कीट-पतंग से लेकर मनुष्य पर्यन्त सभी प्राणियों के जीवन के मूल में ''स्व का रस रहता है। इसी को योग-दर्शन ने ''स्वरसवाही कहा है। अन्य जीवनों की तुलना में, इस रस की सबसे अधिक आवश्यकता राममनोहर के जीवन में थी, इसलिए कि फैजाबाद जिले के अकबरपुर शहर में चार वर्ष के नन्हें शिशु के दिल में जो आग जली थी, वह कभी बुझ नहीं पायी। एक ओर अत्याचार, उत्पीड़न और असमानता के विरूद्ध क्षोभ तथा दूसरी ओर पीडि़तों केलिए करूणा, एक अच्छे व्यकित के अन्तर में सहज ही संभव है। लेकिन राममनोहर के जीवन में, ऐसा लगता था, जैसे अन्याय और पाखंंड के विरूद्ध उनका क्षोभ, केवल उनके अन्तर की भावना न रहकर, उनके रक्त मांस तथा स्वायुतंतुओं को झंकृत कर दिया करता था और यह सिथति उनके जीवन की मूल भावनावृति (पैसन) बन गयी थी। उनकी इस वृतित के उददाम रूप को देखकर मैं कभी-कभी अवाक हो जाता था। अक्सर वह अपनी मित्र-मंडली से घिरा रहा करते थे। एक दिन लखनउ मे आचार्य नरेन्द्रदेव जी के निवास पर हम दोनों एक कमरे में विश्राम कर रहे थे। अकेला पाकर मैंने पूछा-'' राममनोहर, तुम्हारी इस आग का ऐतिहासिक स्रोत कहां है बता सकते हो? मुझे लगता है कि तुम्हारे जीवन की किसी घटना में इसका स्रोत छिपा है। वह उठकर बैठ गये, कहने लगे-'' जब मैं चार वर्ष का बच्चा था उस समय ही, मेरे साथ खेलनेके लिए धनियों के बच्चे आते, परन्तु उनका व्यवहार मेरे अन्तर पर चोट करता था। सात-आठ वर्ष की उम्र में, इसी तरह कलकत्ता के लखपतियों के बच्चों कोकरते देखा। इस व्यवहार से वितृष्णा और विक्षोभ जो जगे वे मेरे अन्तर की अमिट लकीर बन गये। आगे आकर नेताओं के पाखण्ड और अवसरवादिता ने इस अगिन में घी की आहुति दी। इसी भितित पर खड़ी हुर्इ शोषित वर्ग के उपर होनेवाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों के खिलाफ उनके विद्रोह की भावना। यही आग सुदूरअमरीका में नियो जाति के उपर होनेवाले अत्याचार के विरूद्ध उन्हें वहां के जेल में ले गयी। नेपाल की राजाशाही के विरूद्ध सकि्रय विद्रोह का उन्होंने नेतृत्व किया और इसी आग के चलते वे नारी जाति के संरक्षक बन बैठे। देश विदेश की नारियां पीडि़त होकर उन्हें अपनी व्यथाएं कहतीं या लिख भेजतीं। लेकिन केवल आग की लपटें किसी के जीवन का धारण नहीं कर सकती। आग के साथ-साथ रस न रहे तो जीवन इन लपटों में जलकर भस्म हो जाय। इसी कारण वेद की भाषा में कहा गया है कि अगिन और सोम का संयोग ही सृषिट का धारण करता है। एक दिन रेल मे सफर करते हुए मैंने पूछा, ''राममनोहर, तुम्हारे जीवन का दर्शन कया है? उन्होंने अंग्रेजी मे उत्तर दिया-'' ऐवर ग्रीन लाइफ (सदाबहार जीवन-रस)। यह जर्मन भाषा के एक शब्द का, जिसे मैं अब भूल गया हूं, अंग्रेजी अनुवाद था और यही शब्द जर्मन युवक आन्दोलन का प्रधान सांस्कृतिक आधार था। बंगाल के युवक आन्दोलन में सकि्रय भाग लेकर जब वे जर्मनी गये तो वहां जाते ही, जर्मन युवक आन्दोलन मे पिल पड़े। 'म्युनिक, स्ट्रेटगार्ड और बर्लिन के कैफे में जर्मन युवक-युवतियों के साथ गप्पें लड़ाना और पैम्पलेट लिखना, उनका रोजमर्रे का काम बन गया था। इसी समय एक तरफ उन्हें दीखी जर्मन सोशल डेमोक्रेसी की रीढ़ हीनता और दूसरी ओर जर्मन युवक-युवतियों का उददीप्त जीवन प्रवाह। जर्मन युवक आन्दोलन भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम का बहुत बड़ा पोषक था। उनके बीच में भारतीय स्वतन्त्रता-संग्राम के सेनानी गांधीजी की चर्चा अक्सर होती परन्तु गांधीजी की भगवान तथा धर्म की चर्चा वे समझ नहीं पाते और अक्सर कैफे की बहसों में उन्हें चुप हो जाना पड़ता। एक दिन गांधी जी के एक वक्तव्य की कुछ पंकितयां जर्मन पत्रों में प्रकाशित हुर्इ, जिनका भावार्थ था:- ''पंछी भी तभी गाना गाता है ज बवह दाना चुग लेता है। भूखों का भगवान रोटी है। श्राममनोहर एक दिन कहने लगे कि इन वाक्यों को लेकर उस दिन किस तरह वे उछल पड़े थे और कर्इ सप्ताह जर्मन युवक आन्दोलन के केन्द्रों में घूम-घूम क रवह इन वाकयों के आधार पर पर्चे तैयार कर तथा व्याख्यान देकर जर्मन युवक-युवतियों को, भारतीय राष्ट्रीय संग्राम के आधार के संबंध में, गलतफहमियां मिटाने मे समर्थ हुए। गांधी जी के साथ विरोधों की प्रखरता के बीच उनका संबंध आजीवन मधुर बना रहा। एक बातचीत के सिलसिले में गांधीजी ने कहा था '' अनेक लोगों में अनेक गुण हैं परन्तु तुम्हारा शील मुझे बहुत प्रभावित करता है। पिछले दिनों उनके व्यवहार में कठोरता और तिक्तता आ गर्इ थी। उसके भुक्त-भोगी लोग गांधीजी द्वारा ''शील शब्द के व्यवहार से सम्भवत: हंसें। परन्तु मैंने शील की अन्तर्धारा को अनेक कठिन प्रसंगों के बीच उनके जीवन में देखा। कटुता और तिक्तता उनके जीवन के पिछले भाग में प्रबल हो उठी। जब 1955 में, राजस्थान के रेगिस्तान में, उनके उपर अनुशासन की आड़ मे वज्र-प्रहार किया गया, तो वह तिलमिला उठे। उसके बाद धीरे-धीरे उनके जीवन से शील की अभिव्यकित कम होती गर्इ और कटुता बढ़ती गर्इ। इसी प्रसंग में, 8 अगस्त, 1942 की संध्या के समय बिड़ला भवन, बम्बर्इ में गांधीजी के साथ बात-चीत की याद आती है। उस ऐतिहासिक गिरफतारी के पहले गांधीजी ने बातचीत के लिए संध्या 7 बजे का समय दिया था। डां0 लोहिया को अगुआ बनाकर सोशलिस्ट पार्टी का एक छोटा प्रतिनिधि मण्डल गांधीजी से मिलने गया। उस प्रतिनिधि मण्डल में लेखक भी था। हमलोगो के बैठने के साथ ही सरदार बल्लभ भार्इ पटेल आकर बैठ गये। सोशलिस्टों से सरदार का संबंध कर्इ वर्षोंसे तीखा सा था। सम्भवत: इसी कारएण गांधीजी ने सरदार के बैठते ही कहा-''हमारी बातचीत मे सरदार भी रहना चाहते हैं यदि आपलोगों को कोर्इ आपतित न हो। हमलोगों की ओर से डा0 लोहिया ने अत्यन्त नम्रता से उत्तर दिया- '' पिछली बातो ंको याद कर हम इस समहान संग्राम मे प्रवृत्त नहीं हो सकते। आज बल्लभ भार्इ हम सबके प्रिय और सरदार बन गये हैं। मुख्य बातीचीत को प्रारम्भ करते हुए गांधीजी ने कहा ''पिछले कर्इ वर्षों में मेरे वक्तव्यों में विरोध दीख पड़ता है, यदि समय मिला तो इसका स्पष्टीकरण करूंगा, डा0 लोहिया ने तुरत ही उत्तर दिया- ''गांधीजी, इन विरोधाभासों में आज हमारी दिलचस्पी नहीं है। जो आप आज कह रहे हैं वह हमारे अन्तर की आवाज है। हम आज जो आप कहते हैं उसी से संतुष्ट हैं। फिर गांधीजी ने ''करो या मरो की मार्मिक व्याख्या दी और 1942 की क्रानित किस धारा पर चले इसका निर्देश दिया। जीवन का पौधा चिर दिन हरा और उत्फुल्ल बना रहे, यह उनका जीवन दर्शन था। एक लेख में कभी उन्होंने लिखा था-''जीवन के दो प्रधान आकर्षण रहे हैं-भगवान और नारी। फिर उन्होंने कहीं यह भी कहा था: ''मेरा दुर्भग्य है कि भगवान को मैं समझ नहीं पाया और नारी मुझे स्पर्श देकर चली गर्इ। मैंने पिछले एक लेख में लिखा-किसी पद का लोभ और किसी नारी के केशपाश उन्हें बांध नहीं सके। राममनोहर कुंआरा का कुंआरा ही रह गया। चीन, जर्मनी, अमेरिका तथा अन्य देशों के साजवादी आन्दोलन जिन चटटानों पर टकरा कर टूट गये, वे उन्हें भूले नहीं थे। उन्हें यह भी ज्ञात था कि अच्छे कार्यक्रम तान(टोन) तथा मात्रा (ब्हौल्यूम) के अभाव में जनता के दिलों पर अपनी गहरी छाप नहीं बैठा पाते। मेरी और डा0 लोहिया की पहली मुलाकात इलाहाबाद स्टेशन के रेस्तरां में हुर्इ थी। उस समय पूर्णिमा भी उनके साथ थी। उन दिनों जर्मनी से वापस आकर आनन्द भवन में; अखिल भारतीय कांग्रेस कमिटी के विदेश विभाग में वह काम कर रहे थे। उसी पहली बातचीत में ही उन्होंने तान(टोन) और मात्रा (व्हौल्यूम) की चर्चा निकाली थी। आगे चलकर जब 1934 के साथी इधर-उधर बिखर गए तो प्रश्न उठा-''अब क्या? भारतीय समाजवादी आन्दोलन में एक संकट का युग आ गया। 1908 और 1919 मे भारतीय राष्ट्रीयता आन्दोलन मे भी एक एसेा ही समय आया था। उस समय ''फलक (आकाश) उपनाम-धारी स्वर्गीय कवि लालचन्द ने शायरी की थी:- ''सूफी ओ अजीत ने टर्की की राह ली, बंकी था लाजपत वो भी मैंदां से टल गया। सरला और दीनानाथ ने पकड़ी है रविश नर्इ, तू भी बदल फलक कि जमाना बदल गया।। सोशलिस्ट पार्टी के कानपुर-सम्मेलन के बाद धीरे-धीरे कोर्इ इधर गया, कोर्इ उधर गया और 1954 में राममनोहर के जीवन में वैसा ही प्रश्न उठा- ''तू भी बदल फलक कि जमाना बदल गया। पर जमाने को अपने सपनों की अनुरूपता में बदल डालने की दृढ़ता से ओत-प्रोत राममनोहर को बदलता रहने वाला जमाना कैसे बदल देता? जीवन के असीम साहस के साथ उन्होंने समाजवादी आन्दोलन के झण्डे को अकेले उंचा रखने का वृत लिया। तब तक हिन्दुस्तान क समाज की धरती सड़ चुकी थी। चारो तरफ सस्ते भोग की लालसा धू-धू कर जल रही थी। राममनोहर एक तरफ से जो बना आते थे वही दूसरी तरफ से टूट जाता था। उनकी वाणी का तीखापन और भी तीखा ओर कटु होता गया। भद्रता की सीमा उल्लंघन कर छुटने वाले उनकी वाणी के तीखे तीरों की बौछार से भारत के बड़े-बड़े लोग तिलमिला उठे। बहुत से लोगों ने मुझसे आकर पूछा:-'' उनकी वाणी को संयत करने के लिए आप क्यों नहीं कुछ करते? मैं उन्हें स्पष्ट उत्तर देता:- ''यह संभव नहीं। लेनिन के वाणी मे भी ऐसा ही कडुवापन था। लेनिन से यह प्रश्न पूछा गया था। ''आप इस तरह क्यों बोलते हैं? लेनिन ने कहा था:- ''शोषितों की पीड़ा की ज्वाला जिसके अन्तर मे अहरह जलेगी, उसकी वाणी में मिठास नहीं रह सकती। राममनोहर जिस आग में जलते थे, उसकी व्यंजना आसावरी के मीठे स्वर मे संभव नहीं थी। जब पहले पहल पार्लियामेन्ट में चुनकर वे दिलली गये तो स्टेटसमैन के संपादक ने लिखा था- 'ए बुल इन द चार्इना शाप। राममनोहर सच ही एक ठिंगने सांढ की तरह पार्लियामेन्ट में घुसे थे। स्टेटसमैन के सम्पादक ने चेष्टा तो की थी राममनोहर को गाली देने की, लेकिन उसने पार्लियामेन्ट को 'चाइना शाप की उपमा देकर, अनजाने ही, पार्लियामेन्ट की ही छीछालेदर की। पार्लियामेन्ट-भवन को जिन लोगो ने नाजुक चीनी मिटटी के वर्तनों का भण्डार बना दिया, इतिहास उनसे ही इसका उत्तर पूछेगा। ल्ेकिन इस आग की ज्वाला में पड़े रहकर भी मानसिक संतुलन डाक्टर लोहिया रख पाते थे, यह एक महान आश्चर्य है। अन्याय के प्रति क्षोभ और जीवनवृक्ष को अनवरत हरियाली के रस सदाबहार बनाये रखने की अलमस्त चाह-डाक्टर लोहिया के जीवन की इन दो धाराओं-पर पहले प्रकाश डाल चुका हूं। लेकिन गंगा और यमुना के साथ-साथ सरस्वती की अन्त: सलिला तसरी धारा भी थी, जिसे उन्होंने बराबर गुप्त ही रक्खा। लेकिन अब उसपर प्रकाश डालने मे कोर्इ हर्ज नहीं हैं। अपने जीवन की शायद ही कोर्इ बात वे मुझसे गुप्त रखते थे। हैदराबाद मे श्री बदरी विशाल पित्ती के घर पर हम दोनों एक बार ठहरे थे। एक संध्या को बदरी विशाल मुझे राममनोहर के कमरे में ले गये। देखा राममनोहर चित्त पड़े हैं और उनके मुंह से अद्र्ध चेतनावस्था में, किसी वक्तव्य के कुद वाक्य अदर्धस्फुट निकल रहे हैं। मैं कमरे से बाहर आ गया। मैं जानता था कि उनके जीवन की तीसरी धारा जो अन्त: सलिला है, उसकी ही इस तरह कभी-कभी अभिव्यंजना हो जाती थी। वे अक्सर कहा करते- ''क्या सारा योग-दर्शन-योगशिचत-वृतितनिरोध में नहीं समा जाता? जर्मनी जाने से पहले ही उन्होंने योग दर्शन का अध्ययन कर लिया था और अपनी पद्धति से वह चित्त वृतितनिरोध की चेष्टा आजीवन करते रहे। यही था वह आधार जहां से उनके जीवन की अदभुत मौलिकता उदभूत होती थी। यह निशिचत रूप से कह सकता हूं कि भारत के राजनीतिक आकाश में मौलिक विचारों का एक चमकता हुआ सितारा राममनोहर के साथ ही टूट गया सृजनात्मक विचार या मौलिक विकार निरूद्ध वृतितयों के परे के क्षेत्र स्पर्श से ही निकालते हैं। विश्व-राष्ट्र, तीसरा कैम्प, भूमि सेना, राज्य और सरकार का भेद, चौखम्भा राज्य आदि उनके वाक्य आज भारतीय रानीति के प्रचलित बिन्दु बन गये हैं, पर मूलत: वे लोहिया के हि मौलिक चिन्तन की उपज थे। चित्तवृतितनिरोध की साधना उन्होंने कैसे और कब पायी यह कहना आज संभव नहीं। हो सकता है इसका बीज उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता श्री हीरालाल लोहिया से पाया हो। आदरणीय श्री हीरालाल जी से मेरा परिचय हजारीबाग जेल में हुआ था और उनके वात्सल्य प्रेम को हम सब ने निकट से देखा। हीरालालजी राममनोहर लोहिया के नाते, अपने को सोशलिस्ट पार्टी का बाप कहते और अपने वात्सल्य प्रेम का प्रकाश देते हम सबको सप्ताह मे दो बार मिठार्इ खिलाकर ! कितने श्रम से सारा दिन लगाकर अपने हाथों से वह मिठार्इ तैयार करते और हमें जबतक भरमेट खिला नहीं देते उन्हें संतोष नहीं होता! राममनोहर के प्रेम सम्बन्धों की चर्चा, उनके बचपन की कथाएं बड़े रस के साथ वह मुझे सुनाते। एक लेख में राममनोहर ने एक बार लिखा था, '' लगता है मानव विचार धारा नये विचार अन्तरीपों की खोज की प्रेरणा ही जैसे खो चुकी है। विज्ञान के गगन चुम्बी चमत्कार से जैसे एक तरफ विचारकों के अन्तर्विचार नेत्र अभिभूत से हो गये हैं वैसे ही दूसरी ओर मानव जाति ने धर्म और सम्प्रदाय का अन्तर खो दिया है। जैसे राज्य के स्थायी ध्वज-स्तम्भ के आस-पास सरकारें उठती और गिरती हैं, वैसे ही धर्म के ज्योतिस्तम्भ के नीचे सम्प्रदाय बनते और बिगड़ते हैं। धर्म न हिन्दू होता है और न मुसलमान होता है, न र्इसार्इ और न बौद्ध धर्म वह चिर सत्य हैं, वह सनाातन ध्वजस्तम्भ है, जो भौतिक और आध्यातिमक तत्वों का मूल आधार है। उसे आनने, छूने, अनुभव करने की चेष्टा अनन्त काल से वैज्ञानिक अनुसंधान केन्द्रों में मठों, मनिदरों, मसिजदों, गिरजाघरों, आश्रमों में होती रही है और अनन्त काल तक होती रहेगी। उसी के स्पर्श से वैज्ञानिक अनुसंधान-केन्द्रों, मनिदरों, मसिजदों, गिरजाघरों के छोटे-छोटे दीप जलते हैं। लेकिन अभागी मानवजाति आज इन्हीं छोटी-छोटी वैज्ञानिक और साम्प्रदायिक दीपशिखाओं को धर्म का ध्वजस्तम्भ मान बैठी है। इसी के परिणाम स्वरूप आज मानवजाति चरित्रहीन और उन्मत्त हो उठी है। 1962 के चुनाव में पिटकर जब राममनोहर काशी की गंगा में मेरे साथ एक नौका पर बैठे विचार मंथन कर रहे थे, वे मुझसे पूछते रहे-''रामनन्दन, इस तरह क्यों हो रहा है? मैं उनसे कहता-'' राममनोहर चरित्रहीनता और उन्मत्ता के ताण्डवनृत्य के बीच तुम सृजन की कि्रया नहींकर सकते। इस सड़ी हुर्इ समाज की धरती में सर्वोदय, समाजवाद जिसका भी पौधा डालोगे, वह सड़ेगा ही। 1967 के चुनाव में वे कांग्रेस को राजसत्ता के एकाधिकार से गिराने में तो सफल हो गये, लेकिन सृजन के काम में सफल नहीं हुए। अतृप्त भोगों की वासना और अवसरवादिता उनकी अपनी जमात में भी जलती ही रही। 4 सितम्बर 67 को जब वे दुमका में मिलने आये तो मैेंने देखा, जीने का रस वे खो चुके हैं। अगिन थी, पर सोम-रस नहीं था। इतना शीध्र चले जो जायेंगे, वह तो उस समय कल्पना नहीं हुर्इ, लेकिन अपनी ही आग में वे जल रहे हैं, ऐसा स्पष्ट दीखता था। ठीक ऐसी ही आग बलिदान के कुछ सप्ताह पहले, गांधीजी में भी मैंने देखी थी। गांधीजी ने तीव्रवेदना से कहा था:-''रामनन्दन, जो लोग मेरी ओर देखते थे आज मुझे पिछड़ी संख्या (बैक नम्बर) मानते हैं। शतरंज के बादशाह या फर्जी की जगह मैं एक छोटा प्यादा बन गया हूं। जिन्हें मैंने अपने हाथों देश के राजसिंहासन पर बैठाया, उन्हें उन्हीं हाथों से गिराने की अभिरूचि नहीं होती। तुम इसे मेरा मोह कह सकते हो। आज अक्षरश: एक भटठी में मैं जल रहा हूं। करीब-करीब ऐसे ही वाक्य राममनोहर ने भी दुमका में कहे थे। हमलोगों ने यह निश्चय किया था कि कुछ दिनों बाद दिल्ली मे मिलेंगे और नये सिरे से इन प्रश्नों पर विचार करेंगे। मैंने राममनोहर से कहा था- ''देश इसे याद रक्खेगा कि विश्वराज्य का नारा तुमने ही पहले पहल भारतवर्ष में दिया। अब मेरी प्रार्थना है, उसके साथ विश्वधर्म का नारा भी तुम दो। विश्वसंस्कृति के आधार पर ही विश्वराज्य का महल बन सकता है, साथ-साथ तुम इसका भी स्पष्टीकरण कर दो कि धर्म और सम्प्रदाय का अन्तर क्या है। सम्प्रदाय निरपेक्षता की बात मैं समझ सकता हूं, परन्तु धर्मनिरपेक्षता तो पशुता है। दूसरी बात मैंने कही थी-''राममनोहर, कार्यक्रम और कार्यकर्ता अथवा पथ और पथिक का एक गहरा सम्बन्ध है। कार्यक्रम और कार्यकर्ता इन दोनों में किसका ज्यादा महत्व है, यह कहना कठिन है, लेकिन आज की हालत में, मेरी दृषिट में, कार्यक्रम से ज्यादा महत्व व्यकितयोें का हो गया है। विश्वराज्य और विश्वधर्म की स्थापना के लिए उन्मुख इतिहास की धारा महान तपसिवयों की खोज रही है। यह काम, जिस तरह के लोग सार्वजनिक जमातों में लगे हुए हैं, उनसे सम्भव नहीं होगा। इसी चटटान पर टकरा कर आनेवाले वर्षों में सर्वोदय संघ, संसोपा, कांग्रेस, कम्ययुनिस्ट पार्टी, सभी संस्थायें टूटेंगी। फिर नये सिरे से अच्छे लोगों को इकटठा करने की चेष्टा करो। राममनोहर ने अपनी जेब से छोटा-सा नोटबुक निकालकर उसके किसी पृष्ठ पर लिखा ''कार्यक्रम और व्यकित, और मुझे कहा 'दिल्ली पहुंच कर मैं इस विषय पर लेख लिखूंगा। उस समय कौन जानता थ कि दिल्ली पहुंचकर वे अपने जीवन का अंतिम अध्याय ही लिखने जा रहे हैं। बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा है-यह कैसा विधि का विधान कि मौत आतताइयों को लम्बी आयु देती है और डा0 लोहिया जैसे लोगों को अल्पायु मे ही ले जाती है? वे शायद नहीं जानते कि मुगल साम्राज्य के पतन के पीछे सिक्ख गुरूओं के बलिदान का कितना बड़ा हाथ था। युग परिवर्तन की कामना से उन्मुख इतिहास की देवी को राममनोहर के बलिदान की जरूरत थी, जैसे भवभूति ने रामचन्द्र के मुख् से कहलाया है- ''स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जानकीमपि। आराधनाय लोकस्य मुन्चतो नासित मे व्यथा। राममनोहर शोषित मानवता के चरणों पर अपनी बलि देकर चले गये। युग परिवर्तन केलिए उन्मुख छिन्नमस्ता समाज की (राजनीतिक, साम्प्रदायिक, औधोगिक आदि) उंची कुर्सियों पर बैठे गलित कुष्ठों की बलि लेकर क्या करेगी? उसे तो सानेगुरूजी गांधी, राममनोहर, किंगलूथर जैसे पवित्र रक्तों की बलि चाहिए। ''आगे क्या? इसका उत्तर इतिहास के गर्भ में छिपा है। मैं भवभूति के शब्दों में यही कह सकता हूं- 'उत्पत्स्यतेअसित मम कोअपि समानधर्मा। कालोहयं निरवधिर्बिपुला च पृथ्वी।।