डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
हिन्दू-मुसलमान और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के सवाल पर कुछ
मेरी तबियत है कि आज मैं आपसे हिन्दू-मुसलमान और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के सवाल पर कुछ बोलूं, क्योंकि हैदराबाद उन दो शहरों में एक है जहां के लोग अगर चाहें तो हिन्दू-मुसलमान सवाल को हल करने की बड़ी पहल कर सकते हैं। दूसरा शहर आप जानते ही हो, लखनउ है। हैदराबाद में वैसे तो हिन्दुस्तान के हर एक शहर में, जितनी जान होनी चाहिए उतनी नहीं है, यहां और भी है। उसके क्या सबब हैं लम्बे-चौड़े सब मुझे यहां बताने नहीं हैं, आप सब जानते हो।
हिन्दू और मुसलमान इस शहर में करीब-करीब बराबर हैं। हिन्दू-मुसलमान और हिन्दुस्तान-पाकिस्तान इन दो सवालों को ले कर कहीं उनके दिमाग सुधर पाये तो गजब हो सकता है। दिमाग सुधारने के लिए मेरी राय में सबसे जो बड़ी चीज है, वह है नजर, जिससे इतिहास की तरफ देखा जाता है। वैसे तो हिन्दू-मुसलमान में फर्क धर्म का है, लेकिन उस पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। हिन्दू चाहे जितना उदार हो जाए फिर भी अपने राम और कृष्ण को मोहम्मद से कुछ थोड़ा अच्छा समझेगा ही, और मुसलमान चाहे जितना उदार हो जाए अपने मोहम्मद को राम और कृष्ण से कुछ थोड़ा अच्छा समझेगा ही। लेकिन इतना ज्यादा नहीं होना चाहिए। उन्नीस-बीस से ज्यादा का फर्क न रहे तो दोनों का मन ठीक हो सकता है। इतना तो मुझे धर्म के बारे में कहना है, इससे ज्यादा नहीं।
असल चीज है, इतिहास पर कौन सी नजर रखें क्योंकि आखिर जब हम हिन्दू और मुसलमान की बात करते हैं तो हवा मेंं नहीं, अरब के मुसलमान की नहीं, हिन्दुस्तान के मुसलमान की, और हिन्दुस्तान का मुसलमान तो आखिरकार हिन्दू का भार्इ है, अरब के मुसलमान का तो है नहीं। जब रिश्ता नहीं, तो समझ ही नहीं पाएंगे। दो दिन रह जाएं कुढ़ने लग जाएंगे, एक दूसरे को गाली नहीं दे पाएंगे। आम तौर से जो भ्रम हिन्दू और मुसलमान, दोनों के मन में है, वह यह कि हिन्दू सोचता है पिछले 700-800 बरस तो मुसलमानों का राज रहा, मुसलमानों ने जुल्म किया और अत्याचार किया, और मुसलमान सोचता है, चाहे वह गरीब से गरीब क्यों न हो, कि 700-800 बरस तक हमारा राज था, अब हमको बुरे दिन देखने पड़ रहे हैं।
हिन्दू और मुसलमान दोनों के मन में यह गलतफहमी धंसी हुर्इ है। यह सच्ची नहीं है। अगर सच्ची होती तो इस पर मैं कुछ नहीं कहता। असलियत यह है कि पिछले 700-800 बरस में मुसलमान ने मुसलमान को मारा है। मारा है, कोर्इ रूहानी अर्थ में नहीं, जिस्मानी अर्थ में मारा है। तैमूरलंग आता जब 4-5 लाख आदमियों का कतल करता है, तो उसमें से 3 लाख तो मुसलमान थे, पठान मुसलमान थे जिनका कतल किया। कतल करने वाला मुगल मुसलमान था। यह चीज अगर मुसलमानों के घर-घर में पहुंच जाए कि कभी तो मुगल मुसलमान ने पठान मुसलमान का कतल किया और कभी अफ्रीकी मुसलमान ने मुगल मुसलमान का, तो पिछले 700 बरस का वाकया लोगों के सामने अच्छी तरह से आने लग जाएगा कि यह हिन्दू-मुसलमान का मामला नहीं है, यह तो देशी-परदेशी का है। सबसे पहले अरब के या और कहीं के मुसलमान आये। वे परदेशी थे। उन्होंने यहां के राज को खतम किया। फिर वे घीरे-धीरे सौ-पचास बरस में देशी बने लेकिन जब वे देशी बन गये तो फिर एक दूसरी लहर परदेशियों की आयी, जिसने इन देशी मुसलमानों को उसी तरह से कतल किया जिस तरह से हिन्दुओं को । फिर वे परदेशी भी सौ-पचास बरस से देशी बन गये, और फिर दूसरी लहर आयी। हमारे मुल्क की तकदीर इतनी खराब रही है, पिछले 700-800 बरस में, कि देशी तो रहा है नपुंसक ओर परदेशी रहा है लुटेरा, या समझो जंगली और देशी रहा है नपुंसक। यह है हमारे 700 बरस के इतिहास का नतीजा।
इस बात को हिन्दू और मुसलमान दोनों समझ जाते हैं तो फिर नतीजा निकलता है कि हर एक बच्चे को सिखाया जाए हर एक स्कूल में, घर-घर में, क्या हिन्दू क्या मुसलमान बच्ची-बच्चे को कि रजिया, शेरशाह, जायसी वगैरह हम सबकेे पुरखे हैं, हिन्दू और मुसलमान दोनों के। मैं यह कहना चाहता हूं कि रजिया, शेरशाह, जायसी को मैं अपने मां-बाप में गिनता हूं। यह कोर्इ मामूली बात इस वक्त मैंने नहीं कही है। लेकिन, उसके साथ-साथ मैं चाहता हूं कि हममें से हर एक आदमी, क्या हिन्दू, क्या मुसलमान, यह कहना सीख जाए कि गजनी, गोरी और बाबर लुटेरे थे और हमलावर थे। यह दोनों जुमले साथ-साथ हों, हिन्दू और मुसलमान दोनों के लिए कि गजनी, गोरी और बाबर हमलावर और लुटेरे थे, सारे देश के लिए परदेशी होते हुए देशी लोगों की स्वाधीनता को खतम करने वाले लोग थे और रजिया, शेरशाह ओर जायसी वगैरह हमारे सबके पुरखे थे। अगर 700 बरस को देखने की यह नजर बन जाए तो फिर हिन्दू और मुसलमान दोनों पिछले 700 बरस को अलग-अलग निगाह से नहीं देखेंगे, लड़ार्इ करने वाली निगाह से नहीं देखेंगे, फिर वे देखने लग जाएंगे, जोड़ने वाली निगाह से कि हमारे इतिहास में यह तो मामला था देशी का, यह था परदेशी का, यह अपने, यह थे पराये और दोनों का नजरिया एक हो जाएगा।
जब हम इतनी दूर पहूंच जाते हैं तो फिर मैं उससे आज के लिए कुछ नतीजा निकालना चाहता हूं। आज हिन्दू और मुसलमान दोनों को बदलना पडे़गा। दोनों के मन बिगड़े हुए हैं। सबसे पहले तो जो बात मैंने आपके सामने रखी, उसी मामले में। कितने हिन्दू हैं जो कहेंगे कि शेरशाह उनके बाप-दादों में हैं, और कितने मुसलमान है जो कहेंगे कि गजनी, गोरी लुटेरे थे? मैं बोल रहा हूं इसलिए वह बात अच्छी लग रही है, लेकिन अभी जब आप घर लौटोगे, तो कोर्इ न कोर्इ शैतान आपको सुना देगा, देखा, कैसी वाहियात बातें सुन कर आये हो, अगर गजनी-गोरी न आये होते, तो मुसलमान होते ही कहां से? देखा, शैतान किस बोली से बोलता हैं तो, इसका मतलब इसलाम या मोहम्मद, नहीं वह तो गजनी-गोरी से है। जरा इसके नतीजे सोच लेना कि क्या होते हैं। और, उसी तरह से, शैतान की बोली होगी, देखा, कैसा वह बोलने वाला था, वह तुम हिन्दुओं के बाप-दादे शेरशाह को बना गया। अच्छी तरह से सोच-विचार करके, अपने मन को, खोपड़ी को एक तरह से तराश करके, उलट करके जो कुछ भी गंदगी उसमें पिछले 700-800 बरस की भरी हुर्इ है, उसको साफ करके फिर उस जुमले पर आना और फिर सोचना कि हिन्दू और मुसलमान दोनों का मन बदलना बहुत जरूरी हो गया है।
मन इस वक्त बहुत बिगड़ा हुआ है। मैं दो मिसाल दे कर बताता हूं। ऊपर से तो सब मामला ठीक है, ज्यादातर ठीक है। दंगे कहां होते हैं। कभी-कभी जरूर हो जाते हैं, पर ऊपर से मामला ठीक है। लेकिन अन्दर क्या है यह सब को मालूम है। जो र्इमानदार आदमी है, वह छिपा नहीं सकता इस बात को कि अन्दर दोनों का मन एक-दूसरे से फटा हुआ है। मुझे इस बात पर सबसे ज्यादा दु:ख इसलिए होता है कि इससे हमारा देश बिगड़ता है। कोर्इ भी देश तब तक सुखी नहीं हो सकता, जब तक उसके सभी अल्पसंख्यक सुखी नहीं हो जाते। मेरा मतलब सिर्फ मुसलमानों से नहीं। वैसे तो सच पूछो तो मैं मुसलमानों को अलग से अहमियत नहीं देता। मुसलमानों के अन्दर ज्यादातर पिछड़े लोग हैं जैसे जुलाहे, धुनिये। 5 करोड़ में ये चार, साढे़ चार करोड़ पिछडे़ मुसलमान लोग हैं। मैं उनको अहमियत देता हूं, पढ़ार्इ-लिखार्इ में, गरीबी में, हर मामले में। उसी तरह से और लोग भी हैं, हरिजन, आदिवासी वगैरह। जब तक ये सुखी नहीं होते, तब तक हिन्दुस्तान सुखी नहीं हो सकता। यह पहला उसूल है। इसमें भी मन ठीक करना।
एक और बड़ी बात है और यह कि अगर हम किसी तरह से हिन्दू-मुसलमान के मन को जोड़ पाये तो शायद हम हिन्दुस्तान-पाकिस्तान को जोड़ने का सिलसिला भी शुरू कर देंगे। मैं यह मान कर नहीं चलता कि जब हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा एक बार हो चुका है, यह हमेशा के लिए हुआ है। किसी भी भले आदमी को यह बात माननी नहीं चाहिए। मन को जोड़ने का क्या तरीका है? एक तरफ हिन्दुओं के मन में मुसलमानों के लिए बहुत सन्देह है, शक है और इसबात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ बरसों में पलटन में, और महकमें छोड़ भी दो, और इसी ढंग के जो दिल्ली के मकहमें हैं उनमें बड़ी नौकरियों में मसलमानों को जितना हिस्सा देना चाहिए, उतना नहीं दिया गया है। इसे बहुत कम आदमी कहते हैं, क्योंकि सच बोलने से आदमी जरा झिझका करते हैं, लेकिन यह बात सच है। नेहरू जी कभी-कभी इस बात को जरा कहते हैं, लेकिन उनकी बात को पकड़ लेना। महकमा उनका, सरकार उनकी, दिल्ली सरकार के वे खुद मालिक हैं, लगातार पौने पांच बरस तक वे मुसलमानों को सेना और दूसरी बड़ी जगहों से दूर रखते हैं और फिर जब मुसलमान भड़कने लगते हैं तो तीन महीने के लिए अपना सुर बदल देते हैं। कभी कोर्इ जमीअत का सम्मेलन बुलवा देते हैं, कहीं और मुसलमानों को और कहना शुरू करते हैं कि अब मैं यह और बरदाश्त नहीं कर सकूंगा, मेरे मुल्क के बाशिन्दों को बराबरी का दर्जा मिलना चाहिए। तरह-तरह से बातें करके वे मुसलमानों का दिल खुश कर लेते हैं। नेहरू कैंची या कांग्रेस कैंची क्या है, आप समझ लेना। यह कांग्रेस कैंची किस तरह चला करती है? इसके दो फल हैं। चार बरस नौ महीने तो एक फल चलता है कि मुसलमानों को नौकरी दो मत और तीन महीने के लिए दूसरा फल चलता है कि मुसलमानों की जगह-जगह सभाएं करो, सम्मेलन करो, उनसे कहो कि नेहरू महाराज तो सब कुछ करना चाहते हैं, जांच बैठा दी अभी, कमीशन बैठी है, उसकी जांच निकलने वाली है, और फिर जब मुसलमानों का मन जरा तसल्ली पा जाए तो उसके बाद बात भुला दी; कैंची का दूसरा फल चलने लग जाए।
हिन्दू-मुसलमान दोनों को इस बात को अच्छी तरह समझ लेना चाहिए। मुसलमानों के अन्दर यह गलतफहमी फैली हुर्इ है की नेहरू साहब उनके हाफिज हैं। वे कैसे हाफिज हैं इस बात को समझ लेना चाहिए। हिन्दुओं के लिए भी जरूरी है कि नेहरू साहब जो भी करें, कांग्रस जो भी करे, उसे समझ लें, क्योंकि कांग्रेस में तो, मालूम होता है, एक पटटा लिखा रखा है किसी तरह हुकूमत चलाते रहो, चाहे देश का सत्यानाश हो जाए। इसलिए हिंदुओं को अपना मन अब साफ कर लेना चाहिए कि आखिर इस मुल्क के हम सब नागरिक हैं। अगर मान लो कि थोड़ा-बहुत मामला शक का है और कभी किसी टूट के मौके पर कुछ मुसलमानों का भरोसा नहीं किया जा सकता कि टूट के मौके पर वे यह या वह रूख अखितयार करेंगे, मुसलमान उतना ही ज्यादा खतरनाक बनेगा और हिंदू मुसलमानों के लिए शक करेंगे, मुसलमान उतना ही ज्यादा खतरनाक बनेगा और हिंदू जितनी ज्यादा सदभावना या प्रेम के साथ मुसलमान के साथ बर्ताव करेंगे, उतना कम खतरनाक मुसलमान बनेगा, हिंदू लोग अगर इस सि(ांत को समझ जाएँ तो मामला कुछ अच्छा हो।
यह चीज भी याद रखना कि जासूस साधारण नहीं हुआ करते। जासूस तो बड़े मजे के लोग होते हैं। उनके पीछे बड़ी ताकत रहती है। वे इधर-उधर थोड़े ही भटकते रहते हैं। मैं इस संबंध में आपको एक बात बता दूँ कि दोनों सरकारें निकम्मी हैं, हिंदुस्तान-पाकिस्तान की। लोगों का आना-जाना तो बहुत रहता ही है। मैं समझता हूँ 200-300 या 400 आदमी इधर और उधर आते-जाते रहेंगे। उनमें ज्यादातर बेपढ़े होंगे। अगर पढ़े-लिखे होंगे तो वे तो जानते हैं कि कितने दिन का 'वीसा मिला है, वह कब खतम होने वाला है, उसके पहले ही वापस चले जाओ । और, याद रखना कि खाली एक ही बंगाल में नहीं, अभी भी पाकिस्तान में 1 करोड़ या 90 लाख के आसपास हिंदू हैं पाकिस्तान के हिंदू जब यहां आते हैं हिन्दुस्तान में या हिन्दुस्तान के मुसलमान जब पाकिस्तान में जाते हैं उनमें ज्यादातर बेपढ़े हैं। वे 'वीसा वगैरह के मामले में जानते नहीं और अगर 400 रोज जाते हों तो, 40-50 आदमी या 20 आदमी या 10 आदमी ऐसे जरूर हैं जो अपने 'वीसा के खतम हो जाने के बाद भी ठहर जाते हैं। दोनों तरफ की सरकारें इतनी गंदी है कि हर एक को समझ लेती है कि वह तो जासूस है और किले में ले जा करके उसको ंतंग करती हैं। जासूस क्या 'वीसा की तारीखों को तोड़ करके रह जाएँगे? वह तो अपना 'वीसा अलग से बनवा लेगा, अपना 'पासपोर्ट अलग से बनवा लेगा। उसके पास तो बहुत-सी-करामातें होती हैं, बहूत-से साधन होते हैं। इसके बारे में हिंदुस्तान और पाकिस्तान दोनों की सरकारों का कुछ थोड़ा इन बेपढ़े मामूली इनसानों पर रहम खानी चाहिए और इनको जासूस बना कर नाहक तंग नहीं करना चाहिए। जासूस तो कोर्इ दूसरे ढ़ंग के होते हैं।
जिस तरह मैंने हिंदू मन के बदलाव की बात कही, उसी तरह मुसलमान मन के बदलाव की बात कहता हूँ। जहां कहीं मैंने अंग्रेजी हटाने की बात कही, जो मुसलमान बहुत दिनों मेरे साथ रहे हैं वे तो समझ लेते हैं, वरना दूसरों का माथा उसी दम ठनक जाता है कि यह क्या कर रहा है, यह तो हिंदी लादना चाहता है। कितना शक है मुसलमान के दिमाग में। मैं तो कह रहा हूं अंग्रेजी खतम करो। मैं कहां कह रहा हूं कि हिंदी लादो। मैं तो अंग्रेजी खतम करने की बात कह रहा हूं ताकि यह जबान जो 50 लाख बड़े लोगों की है, हमारे ऊपर लदी न रहे, हम करोड़ो लोगों को रहत मिले, हम अपनी सरकार का कामकाज अपनी भाषा में चला सकें। जिस भाषा को मैं लाना चाहता हूँ वह तो मातृभाषा है। हिंदी से उसका ताल्लुक है ही नहीं। तमिलनाडु में अपनी तमिल लाओ बंगाल में बंगला। सच पूछो तो इस वक्त मेरे बारे में बहुत जोरों से, गलत ढ़ंग से भी अखबारों ने गंदा प्रचार किया है कि जैसे मैं हिंदी लादना चाहता हूं। यह बिल्कुल झूठी बात है। सब भाषाओं के प्रान्त बने, इसके लिए लोगों ने बड़ा हल्ला मचाया, मराठों ने मराठी के लिए हजारों की तायदाद में अपनी जान दी लेकिन जब महाराष्ट्र बन गया तब मराठी बिचारी अलग रह गयी। मुझे तो सदमा इस बात का है। वहां अभी भी अंग्रेजी रानी राज कर रही है। तमिलनाडु में भी यही अंग्रेजी रानी राज कर रही है। आंध्र-प्रदेश में भी अंग्रेजी रानी राज कर रही है। मैंने तो उसी संबंध में कहा कि इस अंग्रेजी रानी को हटाओ, अपनी-अपनी भाषाओं को लाओ। लेकिन लोगों को डर लगता है कि जब अपनी-अपनी मातृभाषा आएगी तो दिल्ली में हिंदुस्तानी आ जाएगी। इसका मेरे पास क्या इलाज है? आप चाहो तो मैं इसके लिए तैयार हूं हिंदी रानी न आए। अगर मान लो गैर-हिंदी इलाके के लोग किसी एक भाषा पर राजी हो जाते हैं, तमिल या बंगला पर, तो मैं इस बात का ठेका लेता हूँ कि हिंदी इलाके के 20-22 करोड़ आदमियों को राजी कर लूंगा कि दिल्ली कि भाषा तमिल बने या बंगाली बने।
खैर, इस बात को अभी आप छोड़ो। मुसलमानों वाली बात लो कि हिंदुस्तानी और हिंदी की बात होती है तो झट से उनके मन में शक हो जाता है। मुसलमान को समझना चाहिए कौन आदमी है लेकिन फिर भी शक हो जाता है कि यह तो हिंदी लादना चाहता है। जो जबान मैं बोल रहा हूं वह आखिर क्या है? मेरा तो ऐसा खयाल है कि अगर फिर से यह देश एक हुआ तो उसकी भाषा यही होगी जो मैं इस वक्त बोल रहा हूं, जो चालू भाषा है अपभ्रंश से निकली है। वैसे, वह लम्बा-चौड़ा किस्सा है। इतना ही मैं आपको बता दूं कि यह सही है कि वह पाली और संस्कृत की औलाद है लेकिन वह अपभ्रंश वाली,जो जनता में टूट-टाट गयी। अपभ्रंश में तो फारसी के भी शब्द आ जाते हैं, अरबी के भी आ जाते हैंं। मिला-जुला कर कोर्इ चीज बनी है, लेकिन खाली इसलिए नहीं कि मुझको फारसी या अरबी का इस्तेमाल करना है। दिखाना नहीं चाहूंगा, मुसलमान को खुश करने के लिए अपनी बात नहीं बदलूंगा । जो चालू भाषा है ताकतवर भाषा है, उसमें लोग अपने र्इमान अैर जान का एक ठोस भाषा में इस्तेमाल करते हैं। उसी से देश को बनाना है। और इसी पर मुसलमान शक करता है तो मैं कहता हूं कि उसके दिमाग में कितना कूड़ा भर दिया गया है यह क्या सोचना है।
फिर बात उठ जाती है कि किस लिपि में, लिखावट में, यह भाषा लिखी जाए मुझे आज इस सवाल से मतलब नहींं। लेकिन अगर मान लो कोर्इ आदमी यह प्रस्ताव रखता है कि हिंदुस्तान की जितनी भाषाएं हैं सब नागरी में लिखी जाएं तो पहली बात तो यह कि नागरी के मानी हिंदी नहीं होते। यह गलती कभी मत कर बैठना। नागरी तो एक लिखावट है जो हिंदुस्तान में सभी भाषाओं के लिए चला करती थी, किसी न किसी रूपमें ब्राह्राणी ।
अब भी जितनी भी लिखावटें हैं, तेलुगु, तमिल इत्यादि ये सब एक ही चीज के रूप हैं। अगर कोर्इ ऐसी बात कहता है तो फिर उसके बड़े èयान से और प्रेम से सुनना चाहिए। उससे घबराना नहीं चाहिए।
असल में, आज हिंदू और मुसलमान दोनों का मन वोट के राज ने बिगाड़ दिया है। चुनाव के मौके पर जाते हैं, और मौकों पर जाते नहीं। सभाएँ भी नहीं करते और वोट माँगते हैं। वोट माँगने वाले लोग हमेशा इस बात का ख्याल रखते हैं कि कोर्इ चीज न कह दें कि सुनने वाला नाराज हो जाए। नतीजा होता है कि हिंदुस्तान में जितनी भी पार्टियाँ हैं, वे हिंदू-मुसलमान को बदलने की बात बिल्कुल नहीं कहती। मन में जो पुराना कूड़ा पड़ा हुआ है, जो गलतफहमी है, जो भ्रम है, उन्हीं को तसल्ली दे -दिला कर वोट ले लेना चाहते हैं। यह है आज हमारे राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी खराबी कि हम लोग वोट के राज में, नेता लोग खास तौर से, सच्ची बात कहने से घबरा जाते हैं। इसका नतीजा है कि हिंदू और मुसलमान दोनों का मन खराब रह जाता है, बदल नहीं पाता।
इसमें तो सुधार होना चाहिए। साफ-सी बात है कि मुसलमान जैसी चीज नहीं रहनी चाहिए राजनीति में। टूट जाना चाहिए। जैसे हिंदू टूटते हैं अलग-अलग पार्टियों में, वैसे मुसलमानों को भी टूटना चाहिए। लेकिन यह बात कुछ मानी हुर्इ-सी है कि मुसलमान जाएगा तो एक साथ जाएगा। हमेशा वह कोर्इ न कोर्इ इत्तेहाद बनाएगा। पहले कोर्इ रहा है वह इत्तेहादुल मुसलमीन था, रजाकार, फिर अभी भी इत्तेहाद । हमेशा एक टुकड़ी बन कर, सबके सब मुसलमान, जहां तक बन सके एक टुकड़ी में चले हैं। यह बात तो ठीक नहीं। इसका नतीजा तो यह भी हो सकता है कि हिंदू लोग सबके सब एक टुकड़ी में चलने लगें। अपने र्इमान से जो सही सियासत हो उसको पकड़ कर चलो। अगर आज हैदराबाद में हिंदू और मुसलमान हजारों की बलिक अगर लाखों की कहूं तो ज्यादा न होगा, तायदाद में मिल कर इस चीज के लिए आगे बढ़ते हैं और शहर में दो-चार मील लंबे जुलूस निकालते हैं तो न सिर्फ आंèा्र-प्रदेश में बलिक सारे हिंदुस्तान में बिजली दौड़ जाएगी कि यह क्या चीज हो रही है कि हिंदू-मुसलमान दोनों मिल करके किसी चीज को ले रहे हैं । वह मेल तब हो सकता है जब लोग हिंदू और मुसलमान की हैसियत से इकटठा नहीं होंगे बलिक अपनी नजर से कि हमको कौन-सी राजनीति करनी है, उसको ले कर इकटठा हों।
इससे थोड़ी-सी दिक्कत यह हो जाती है कि 90 सैकड़ा काम तो अपना सबका एक होता है? जैसे चीनी का दाम कितना है? यह तो एक ऐसा सवाल है जिससे न हिंदू का मतलब, न मुसलमान का मतलब। मोटे कपड़े का दाम कितना है, किरोसीन तेल का दाम कितना, मजदूरी कितनी मिल रही है, हिंदुस्तान में जो खेती- कारखाने की पैदावार में बढ़ती होती है वह किसके यहां जाती है? ये सब सवाल तो हिंदू-मुसलमान दोनों के एक से हैं। जैसे मैंने यह सवाल उठया कि हिंदुस्तान में एक तो बढ़ती हो ही नहीं रही है, दो बरस से बिल्कुल बंद है। दो बरस पहले होती थी तो दो नया पैसा हर आदमी रोज के हिसाब से होती थी, औसत। और वह दो नया पैसा भी 44 करोड़ को नहीं मिलता था, वह ज्यादातर मिल जाता था 50 लाख बड़े लोगों को और चौथार्इ या आध पैसा बचता था वह मिल जाता था, 5-10 करोड़ बीच के लोगों को। 27 करोड़ को तो कुछ मिलता ही नहीं था जो तीन आने रोज पर जिंदगी चलाते हैं। यह बात हिंदू- मुसलमान दोनों के लिए लागू है। और हरिजन और दूसरे अल्प-संख्यक देखें तो उसके लिए और ज्यादा लागू है। यहां तो कोर्इ फर्क नहीं पड़ता । चीजों के दाम, सरकारी नौकर कितनी तायदाद में हैं, टैक्स कैसे लगता है, पुलिस का महकमा किस ढ़ंग से चलता है, पुलिस का और जनता का आपस में व्यवहार कैसा है ये जिंदगी के 90 सैकड़ा मामले हैं ऐसे हैं कि मतलब नहीं कि कौन हिंदू है कौन मुसलमान। लेकिन 10 सैकड़ा मामले हैं जो गड़बड़ कर दिया करते हैं। पहले भी इन्हीं ने गड़बड़ किया और अब भी वे ही गड़बड़ करते हैं कि किसको नौकरी मिलती है; बड़ी नौकरी, छोटी नौकरी नहीं, हाजरी नौकरी किसको मिलती है, और मèयम वर्ग के पढ़े-लिखे लोगों का सवाल आ जाता है। इसी तरह से कुछ और हैं कि किसके सबब से मन खटटे हो जाते हैं। इसलिए मैं यही कहना चाहूंगा कि 90 सैकड़ा मामलों को ठीक कर लो तो सब ठीक हो जाएगा। इन 10 सैकड़ा मामलों को नजर-अन्दाज कर देने से रगड़ चलती रह जाएगी, इसलिए इन मामलों को भी ठीक करना जरूरी है। लेकिन इनके लिए सोच-समझ करके कौन- सी सियासत ठीक है, उसको पकड़ना चाहिए।
इसी संबंèा में मैं हिंदुस्तान-पाकिस्तान कीबात भी कह दूं। मुझे इस बात का बड़ा आफसोस है कि जब इस देश का बंटवारा हुआ तब मुझ जैसे लोगों ने इसके खिलाफ कोर्इ काम नहीें किया। हम शायद इसको रोक नहीं सकते थे। कुछ भी करते लेकिन कम से कम उस वक्त जेल में बैठे होते तो मन में एक तसल्ली होती कि हमने इसका कोर्इ मुकाबला तो किया। उस वक्त हम चूक गये। कर्इ कारण थे। एक कारण महात्मा गांधी भी थे। इस बात को अब छोड़ दीजिए। अब सवाल उठता है कि इस देश का जो बँटवारा हो चुका है, क्या उसकी स्थायी, मुकमिमल मान कर चलें या कोर्इ रास्ता निकल सकता है जिसके फिर जोड़ शुरू हो। जिन लोगों ने सोचा था कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान बँटवारे के बाद आपस में प्रेम रहेगा, शांति रहेगी, हिंसा नहीं होगी, वह तो हो नहीं पाया। प्रेम तो हुआ नहीं, बलिक द्वेष बढ़ गया। खाली फर्क इतना है कि जो द्वेष या मनमुटाव अंदर रहता था, वहां अब दो देशों के रूप में आ गया और हिन्दुस्तान और पाकिस्तान की दोनों सरकारों की ताकत का बहुत बड़ा हिस्सा यानी पैसा, प्रचार, विदेश नीति का बहुत बड़ा हिस्सा आज एक दूसरे को बदनाम करने में खर्च हो रहा है। हिंदुस्तान केविदेश मकहमे की चाल यह रहती है कि दुनिया भर में प्रचार करो कि पाकिस्तान खराब अैर पाकिस्तान के विदेश मंत्रालय की चाल हमेशा रहती है कि प्रचार करो कि हिन्दुस्तान खराब। दोनों का यह धंधा हो गया है। यह कोर्इ मामला हल हुआ?
अखबारों को बहुत सूझ-बूझसे हमें पढ़ना सीखना चाहिए। ये दोनों सरकारें जब कभी चाहती हैं तो लोगों का मन गरमा देती है, फुला देती हैं, उसमें वैर ला देती हैं, चाहे तो कुछ नहीं, लेकिन सरहद की छुटपुट खबरें हिंदुस्तान-पाकिस्तान दोनों की छाप देने से पाकिस्तान के अखबार में हिंदुस्तान के अखबार में, लोगों का मन बिगड़ जाता है। ये खबर सरकारी महकमों से मिलती हैं। अच्छी तरह से अखबार पढ़ना चाहिए । हो सकता है कि हिंदुस्तानकी सरकार कर्इ बार 44 करोड़ लोगों का मन चीन से हटा कर पाकिस्तान की तरफ मोड़ना चाहे।यह चाल हो सकती है। चीन तो बड़ा शत्रु है। लोग, अगर मान लो गरमा रहे हैं चीन के खिलाफ,सरकार को डर लग रहा है तो सरकार की तबियत हो जाती है कि चीन से जरा मन हटा दो और एक छोटे दुश्मन की तरफ मन मोड़ो। इसलिए उस तरह की खबरें दे देती है और हम लोग भी बेबकूफ बन जाते हैं। हम लोग चीन की तरफ से मन हटा कर पाकिस्तान की तरफ ले जाते हैं।
उसी तरह से पाकिस्तान की सरकार; जब कभी मुसीबत में पड़ती है, अपने देश के किसी मसले को हल नहीं कर पाती है, तो हमेशा हिंदुस्तान को बदनाम करके कि हिंदुस्तान ने हमें तबाह कर रखा है, हिंदुस्तान की सरकार हमले की तैयारी कर रही है और चेत जाओ, हमारा मुल्क खतरे में पड़ा हुआ है इससे पाकिस्तानियों का मन वह किसी तरह से गरमा देती है।
इन दोनों सरकारों के हाथ में इस वक्त बहुत खतरनाक हथियार हैं, लेकिन जनता अगर चाहे तो मामला बदल सकता है। इसीलिए मैंने लोकसभा में विदेश नीति की बहस में एक ही जुमला कहा था। उस पर कांग्रेसी बड़े तिलमिला उठे। मैंने कहा था पाकिस्तान की सरकार उतनी ही गंदी है जितनी कि हिंदुस्तान की सरकार। कितना सीधा, सही सच्चा जुमला है। इसमें कोर्इ बात गलत नहीं थी लेकिन चारों तरफ से लोग तिलमिला उठे। किसी ने कहा यह क्या आप कह रहे हैं और चिल्ल-पों शुरू हो गयी । एक आदमी ने चिल्ला कर कहा, यह है आपका स्वाभिमान! मैंने कहा, स्वाभिमान की बातें करते हो? 20 हजार वर्ग मील जमीन को दे कर अब स्वाभिमान की बात करते हो? देश के दो टुकड़े करके और कभी जोड़ने की बात नहीं की, अब आप स्वाभिमान की बातें करते हो? जब हमने यह दो स्वाभिमान की बातें कहीं तब जा कर ठंडे पडे़।
हिंदुस्तान-पाकिस्तान का मामला, अगर सरकारों की तरफ देखो, तो सचमुच बहुत बिगड़ा हुआ है। इसमें शक नहीें है। और इसलिए अब जो बात मैं कहने जा रहा हूँ, वह बड़ी अटपटी लगती है कि जरा-जरा-सी बातों को तो बढ़ा दिया है, लड़ रहे हैं, अखबारों में दिन-रात एक दूसरे को गरमा रहे हैं और चमड़ी या शरीर फुला रहे हैं, ऐसी सूरत में मैं आपसे पाकिस्तान-हिन्दुस्तान के महासंघ की बात करना चाहता हूँ। एक देश तो नहीं, एक राज नहीं, लेकिन दोनों कम से कम कुछ मामलोें में शुरूआत करें एक की। वह निभ जाए तो अच्छा और नहीं निभे तो और कोर्इ रास्ता देखा जाएगा। बस और बातों में न सही लेकिन नागरिकता के मामले में और अगर हो सके तो थोड़ा-बहुत विदेश नीति के मामले में, थोड़ा-बहुत पलटन के मामले में एक महासंघ की बातचीत शुरू हो। मैं साफ कह देना चाहता हूँ, जो विचार मैं आपके सामने रख रहा हूं वहीं मैंने लोकसभा में भी रखा था यह कहते हुए कि यह विचार सरकार के पैमाने पर आज शायद अहमियत नहीं रखता मतलब हिंदुस्तान की सरकार और पाकिस्तान की सरकार से इससे कोर्इ मतलब नहीं क्योंकि वे सरकारें तो गंदी हैं। इसलिए हिंदुस्तान की और पाकिस्तान की जनता को चाहिए अब इस ढ़ंग से वह सोचना शुरू करे। नयी तरह की चीजें सोचना भी जरूरी होता है। मैं तो कम से कम इस बात के लिए तैयार हूँ। मैं नहीे कहता कि हर एक आदमी इस चीज को मान ले। सोचे इस बात पर, दूसरे तरीके निकल सकते हैं।
अगर हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है तो जब तक मुसलमानों को या पाकिस्तानियों को तसल्ली नहीं हो जाती, तब तक के लिए संविधान में कलम रख दी जाए कि इस महासंघ का राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री, दो में से एक पाकिस्तानी रहेगा। इस पर से लोग कह सकते हैं कि तुम अंदर-अंदर रगड़ क्यों पैदा करना चाहते हो? जिस चीज को पुराने जमाने में कांग्रेस और मुसलिम लीग वाले नहीं कर पाये, कभी-कभी कोशिश करते थे, रगड़ पैदा होती थी। अब तुम फिर से रगड़ पैदा करना चाहते हो? इसका और कोर्इ अगर जवाब नहीं तो मैं एक सीधा-सा जवाब दूंगा कि 1 बरस हमने यह बाहर वाली रगड़ करके देख लिया, अब फिर अंदर की रगड़ कैसी भी हो, इनसे तो कम से कम ज्यादा अच्छी ही होगी। यह बाहर वाली पाकिस्तान- हिन्दुस्तान की रगड़ है, उसको हम निभा नहीं सकते। इसके चलते तो हम दुनिया में हमेशा मोहताज रहेंगे। हमेशा किसी न किसी के मोहताज या शिकार बनते रह जाएँगे। इसी तरह से और भी नये ढं़ग की बातें सोच सकते हो।
हो सकता है कि लोग काश्मीर वाला सवाल उठाएँ कि अब तक तो तुमने आसान-आसान बातें कर लीं, लेकिन जो मामला झगड़े का है, उस पर तो कुछ कहो। तो, काश्मीर का सवाल अलग से हल करने की जब बात चलती है, तो मैं कुछ भी लेने देने को तैयार नहीं हूँ। मेरा बस चले तो मैं काश्मीर का मामला बिना इस महासंघ के हल नहीं करूँगा। आजकल जो बातें चलती हैं उनमें सिलसिला नहीं है। प्रधानमंत्री साहब तो बड़े मजे के आदमी हैं। सुबह कुछ बोलते हैं, शाम को कुछ । लोग सुन कर खुश हो जाते हैं। पर मेरा तो वह तरीका है नहीं, मैं उसे अखितयार करने लग जाऊँ तो हिंदुस्तान की जनता दूसरे ही दिन कहने लगेगी कि यह तो पागल आदमी है
। लेकिन प्रधानमंत्री के लिए तो यह आसान बात है कि सुबह वे कह देते हैं कि हम तो काश्मीर के बारे में कोर्इ बात करेंगे ही नहीें पाकिस्तान से और शाम में कह देते हैं कि बातें होती हैं तो सभी चीजों पर होती है। देने को तैयार रहते हैं, लेने को तैयार रहते हैं। कभी कहते हैं कि जो मामला इस वक्त तक का है, उसमें कुछ थोड़ा-बहुत हेर-फेर करके सुलह हो ही सकती है। उसकी दो क्या, कितनी जीभें हैं। उनकी बात छोड़ ही दो। लेकिन मैं इतना कहना चाहूँगा कि अगर कोर्इ एक मामला अलग से करने जाएँगे तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान का मामला खड़ा हो जाएगा। मान लो काश्मीर का किसी तरह से हल कर लो, फिर तीसरा कोर्इ सवाल खड़ा हो जाएगा, पूर्वीपाकिस्तान के हिंदुओं का, यह पशिचमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान आने-जाने के रास्ते का। इसलिए मैं साफ बोलना चाहता हूँ कि अगर हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ बनता है, तब मैं काश्मीर के बारे में कोर्इ भी बात सोचने को तैयार हो जाता हूँ, चाहे काश्मीर हिंदुस्तान के साथ रहे, चाहे काश्मीर पाकिस्तान के साथ रहे, चाहे काश्मीर एक अलग इकार्इ बन कर इस हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ में आए, पर महासंघ बने कि जिससे हम सब लोग फिर से एक ही खानदान के अंदर बने रहें। इस महासंघ के तरीके पर बुनियादी तौर पर हिंदुस्तान-पाकिस्तान की जनता सोचना शुरू करे।
फिर से मैं कहे देता हूँ कि यह सब सोचना बेमतलब होगा, जब तक कि किसी इलाके के हिंदू और मुसलमान जानदार बन कर एक नयी पलटन नहीं तैयार करते इसीलिए मैंने हैदराबाद और लखनऊ की बात कही। हैदराबाद और लखनऊ में हिंदू और मुसलमान जानदार बन कर एक ताकत बनें और अपनी सभाओं से? अपने प्रचार से, अपने प्रदर्शन से दिखाएं कि एक नयी लहर अब इस देश में उठी है तब अलबत्ता इन चीजों में कोर्इ ताकत आए।
इसी सिलसिले में एक सवाल थोड़ा-सा उठा है शेख अब्दुला का। आज से नहीं कर्इ बरस से मैंने कहा है कि शेख अब्दुल्ला को जेल में नहीं रखना चाहिए, लेकिन आजकल जब मैं कोर्इ बात कर देता हूं तो यह जरा ज्यादा फैल जाती है। अखबार वालों की थोड़ी-बहुत मेहरबानी है। पूरी तो नहीं फैलती। पूरी बात देने लगें तब तो मजा आ ही जाए। खैर, यह बात फैली तो कुछ लोगों को अच्छा लगा और कुछ लोगों को बुरा लगा। मुझसे एकाध जगह लोगों ने कहा, तुम इस देशद्रोही की रिहार्इ की बात करते हो? देशद्रोही! इस बात को पूरी तरह समझ लेना चाहिए कि आखिर यह बात है क्या। मैंने क्यों रिहार्इ की बात की है। उसका सबसे बड़ा सबब है कि मैं चाहता हूं कि हिंदुस्तान में कायदे-कानून की सरकार चले, मनमानी सरकार न चले। थोड़ी देर के लिए आप शेख अब्दुल्ला को भूल जाओ। मान लो हम लोगों के बीच कोर्इ चोर है, मैं चोर हूँ या आप चोर हैंं। आप गिरफ्तार होते हैं। चोरों के साथ कैसा बरताव होना चाहिए इसके कुछ कायदे-कानून हैं। आप क्या चाहेंगे कि कायदे-कानून का बरताव हो या चोर को बस मारना-पीटना शुरू कर दिया जाए और अगर कोर्इ गहरी चोरी हुर्इ तो इतना मारा जाए कि नौबत ही न आए मुकदमे की। वह फिर मनमानी सरकार हो जाएगी। एक होती है कायदे-कानून की सरकार, एक होती मनमानी सरकार। मुझे इस बात का जबरदस्त खतरा दिखार्इ दिया कि हिंदुस्तान में, और पाकिस्तान में तो खैर साफ ही सी बात है कि 10-15 बरस में मनमानी सरकार चली है, कायदे-कानून की सरकार नहीं।
कदम-कदम पर आप देख सकते हो। मैं खुद अपना एक किस्सा बताता हूँ। मेरा एक मुकदमा मामूली नहीं था। उसमें इलाहाबाद वाले उच्च न्यायालय में हम जीते थे। तीन हजार आदमी जेल से एक साथ छूटे थे। वह दुनिया में एक अजीब घटना हुर्इ थी। आज से 7-8 बरस पहले की बात है। हम लोग मुकदमा जीते, कानून टूट गया और कानून टूटते ही एक दिन में एक साथ हजार आदमी जेल से छूटे थे। फिर उत्तर-प्रदेश की सरकार ने उसकी अपील की। अपील की चिटठी मेरे पास आयी। एक बार आयी तब मैं दिल्ली की सबसे बड़ी अदालत में गया। वहां पता लगा कि अभी तो वह मुकदमा नहीं आएगा। सोचा, कोर्इ बात नहीं हिंदुस्तानी आलसी भी होता है, मैं भी आखिर हिंदुस्तानी हूं, सह लेता हूं नही ंतो मुझे गुस्सा आ जाना चाहिए था कि तुमने चिटठी भेजी, बुलाया, अब कहते हो मुकदमा नहीं करेंगे। फिर दुबारा चिटठी आयी, दुबारा भी चले गये। तब भी हमने सह लिया । ऐसा मत समझना कि बड़ा आदमी हूं। मैं बड़ा नरम और ठंडा और कुछ-मानी में दब्बू आदमी हूं। दो बार सह लिया फिर तिबारा चिटठी आयी कि एकदम बुलाया है, अदालत में गया, फिर सुनता हूं कि मुकदमा नहीं है। तब थोड़ा- सा हमको भी लगा कि यह क्या मामला है। जज क्या समझते हैं कि हम नागरिक हिंदुस्तान के शहरी हमारी कोर्इ इज्जत तो होनी चाहिए। अगर जज को काम है, तो शहरी को भी तो काम है। जज ही खाली अपने दिमाग में सोचे बैठा रहता है कि हमको ही काम और जब चाहे पेशी करे, जब चाहे मूल्तवी करें आज हिंदुस्तान में करोड़ों रूपया बरबाद हो रहा है,क्योंकि मजिस्टर और जज लोगोें को गुमान हो गया है कि जब चाहे पेशी कर सकते हैं और जब चाहे मुल्तवी कर सकते हैं। तो खैर, फिर मैं गया अदालत मेंं फिर सवाल उठ गया था अंग्रेजी वाला। कुछ वकीलों से पूछा। हमने कहा, हम तो अंग्रेजी बोलने वाला वकील नहीं रखेंगे तो सब घबरा गये। हमने सुना था कि कुछ ऐसा वक्त आता है कि खुद खड़े हो कर बोल सकते हो। तब हमने कहा, जज साहब, यह हमारा मामला है, दो बार हम बुलाये गये, तीसरी बार भी बुलाये गये अब भी मुकदमा नहीं ले रहे हैं आप। तो पहले तो उसने शराफत से बातचीत की। बड़ा जज था। अच्छी तरह से बात की, जी हां आपका मुकदमा वक्त पर आएगा। फिर मैंने कहा, जज साहब, इस पर भी आप गौर करें कि दो बार मैं पहले आ चुका हूं, यह तीसरी बार है, अब बार-बार मुझे आप बुलाते हैं। तो न जाने क्यों उन्हें गुस्सा आ गया, और वे बोल पड़े कि आपको बीस बार आना पडे़गा। हमारे मन में जो बात आयी थी उसे, अच्छा हुआ, हमने कही नहीं। लेकिन हमने कहा, जज साहब आपको एक-तरफा फैसला करना पड़ेगा और हम चले आये। आखिर जज में और शहरी में ऐ रिश्ता होना चाहिए कि जज को शहरी की इज्जत करनी चाहिए तभी तो शहरी जज की जज्जत करेगा। ऐसा तो नहीं कि जब चाहे बुलाओ।
वैसे, आजकल प्रताप सिंह कैरों साहब पंजाब वाले हैं। खाली वही नहीें हैं, ऐसा मत समझना, वह प्रताप सिंह कैरों साहब और यहां संजीव रेडडी साहब, ये जितने साहब हैं, एक ही थैली के चटटे-बटटे हैंं। किसी की पोल खुल जाती है, किसी की रह जाती है। उनका मामला मैं इसलिए बता रहा हूं कि जो मैं अभी बात कर रहा था कि कायदे-कानून की सरकार और मनमानी सरकार दोनों में फर्क होना चाहिए। वहां कोर्इ सिविल सर्जन साहब थे। उनका तबादला करने के लिए पंजाब के मुख्य मंत्री ने कुछ हुकुम निकाले, क्योंकि सिविल सर्जन साहब, उनके लिए उनकी बीबी के लिए और उनके बच्चों के लिए कुछ कर-करा दिया करते थे। कभी तो सिलार्इ वाली मश्ीन देते थे, कभी दवाइयाँ पहुंचा देते थे, कभी किसी मरीज को बिना फीस के देखभाल किया करते थे, कभी उनके आदमी को अपने मकान में रख लिया करते थे, खिला देते थे लगातार तीन-तीन, चार-चार महीने। फिर इसमें उन्होंने जरा आना-कानी की, तो मुख्य मंत्री साहब नाराज हो गये और उनके खिलाफ कार्यवाही कर डाली। अब यह सोचने की बात है कि क्या कोर्इ मंत्री, मंत्री के नाते इतनी ताकत पा जाता है कि वह अपने कागज पर हुकुम निकाले, इस नीयत से नहीं कि सूबे का सरकारी इन्तजाम अच्छा होता या बुरा होता है, बलिक इस नीयत से कि मेरी बीबी को या मेरे बच्चों को ठीक-ठीक दवा नहीं दिया, तो वह मनमानी हुकूमत हो जाया करती है। हुकूम, फैसले कायदे के मुताबिक होने चाहिए। और जहां मनमानी चलेगी वहां तो व्यापार और गíी में ऐसा संबंध हो जाएगा कि गíी पर बैठा हुआ हमेशा मदद करता रहेगा व्यापार वाले को और दोनों एक-दूसरे की मदद से खूब लूटते रहेंगे। दोनों का रिश्ता खूब बढि़या चलता रहेगा। यह तो यहां भी चलता होगा। मुझे बताने की कोर्इ जरूरत नहीं।
अब यह देखना कि शेख अब्दुल्ला के साथ कायदा-कानून बरता गया है या मनमानी चली। मुझे इसमें कोर्इ शक नहीं है कि उनके साथ मनमानी हुर्इ। मुझे इस बात का जिक्रकरने की कोर्इ जरूरत नहीं कि वे आदमी अच्छे हैं या बुरे, देशभक्त हैं या देशद्रोही हैं। अभी मैं खाली इस बात को छेड़ता हूं कि हिंदुस्तान में चोर को भी, डाकू को भी, देशद्रोही को भी कायदा-कानून मिलना चाहिए। उसके साथ मनमानी नहीं करनी चाहिए। मैं आपको भी आगाह कर देना चाहता हूं कि अगर आप किसी पुलिस को किसी चोर के साथ गैरकानूनी बरताव करते देखो, दखल देना, डरना नहीं वरना पुलिस की आदत पड़ जाती है। आज चोर के साथ जैसा बरताव करती है, कल वैसा ही साहूकार के साथ शुरू कर देती है, इसलिए कायदे-कानून की सरकार चलानी है। जब मैं देखता हूं कि हिंदुस्तान में हथकडि़यां पहना कर कैदियों को ले जाते हैं तो बहुत बुरा लगता है। भले लोग तो हथकड़ी छुपा कर रखते हैं। हथकड़ी पहनाना जरूरी ही है तो छुपा कर ले जाओ। हथकड़ी ही नहीं पहनाते हैं, कमर में रस्सी बांधते हैं और फिर सड़क पर मारपीट भी करते हैं। पहले तो मैं दखल दिया करता था। अब कहां-कहां दखल देने जाऊँ हर चीज में दखल देता हूं तो फिर लोग कहने लगते हैं, देखो यह तो सबसे लड़ना शुरू कर देते हैं। लेकिन आप लोग, जो नौजवान लोग हो, उनसे मैं कहना चाहता हूं कि जब मैं आपकी उमर का था, तब सड़क पर थप्पड़ लगते हुए देख कर मुझे बुरा लगता था और जो थप्पड़ मारता था, उसमें दखल देना मेरा अपना कर्तव्य समझता था। एक दफा अगर हमारे सड़क के और शहर के बरताव बिगड़ जाते हैं तो फिर वह बिगड़ाव बहुत दूर तक चला जाता है।
खैर। मैं चाहता हूं कि मुझे खान अब्दुल गफफार खां की रिहार्इ मांगने का हक रहे। वे पाकिस्तान की जेल में हैंं । मुझे वह हक तभी मिलता है जब हिंदुस्तान की जेलों में बंद शेख अब्दुल्ला की रिहार्इ की भी मांग करूं। ऐसा नहीं हो सकता कि यहां तो चुप रह जाओ और वहां खाली मांग करो। मैं नहीं जानता कि मेरी आवाज पाकिस्तान में पहुंचती है या नहीं पहुुंचती है, लेकिन कभी न कभी तो पहुंचेगी। कब तक लोग दबा कर रखेंगे। तब लोग सोचेंगे कि यह आदमी है, यह कुछ सच्चा आदमी लगता है, यह तो इन्साफ पसंद करता है। इन्साफ के लिए आदमी को खड़ा होना चाहिए, जहां भी हो।
खान अब्दुल गफफार खां को और शेख अब्दुल्ला को मैं एक सतह पर नहीं रखता हूं। कहीं लोग गलत न समझ बैठें । खान तो बहुत बड़ा आदमी है। उनका क्या मुकाबला है शेख के साथ। यहां कोर्इ बड़े और छोटे का सवाल नहीं। यहां सिर्फ अमन और कायदे-कानून का सवाल है कि आदमी जो भी हो,छोटा हो, बड़ा हो, उसके साथ कायदे-कानून का सुलूक होना चाहिए। शेख अब्दुल्ला ने कभी भी काश्मीर को पाकिस्तान में मिलाने की बात नहीं की, जहां तक मुझे मालूम है। उन्होंने जो कभी मांग की थी और मैं समझता हूं कि जिस ढ़ंग से उन्होंने की वह गलत मांग थी, वह यह कि काश्मीर को अलग कर दिया जाए। उसे हिन्दुस्तान-पाकिस्तान से अलग, स्ववंत्र देश बना दिया जाए। ऐसी मांग उन्होंने की थी लेकिन मैं आपको एक इत्तला देना चाहता हूं। सुबूत तो शायद इसके रह भी नहीं गये होंगे, लेकिन यह बात है बिल्कुल सही। कर्इ आदमियों से मैंने सुनी है। हो सकता है कि शेख अब्दुल्ला खुद इसको कहते हुए डरें, लेकिन मुझे काहे का डर है। जब शेख अब्दुल्ला ने स्वाधीन काश्मीर की बात की थी काश्मीर में तब थोड़ा-बहुत उकसावा उनको हिंदुस्तान के प्रधान मंत्राी से मिला था। यह आदमी बड़ा कातिल आदमी है। दूसरों को फंसा कर अलग खड़ा हो जाता है। खैर। अब शेख जैसे आदमी कहते हैं, तो सजा भुगतते हैं। हमारे जैसे आदमी ऐसी बेवकूफी नहीं भी करते हैं तब भी भुगतनी पड़ती है क्योकि कायदा बिगड़ चुका है।
मैं आपको एक बात बता देता हूंं। मुंह छिपाने की चीज तो है ही वह। एक आदमी आया था अभी। वह कौन था, इसको छोड़ो। उसने शेख के बारे में मुझसे कुछ बात कीं समझाना चाहा तो मैंने उसे साफ-साफ कह दिया। एक चीज अलबत्ता कुछ अच्छी लगेगी मुझे उसमें कि शेख ने किसी आदमी को अपनी मौजूदा राय बतायी। वह बहुत अच्छी तो नहीं थी, बुरी भी नहीं थी, लेकिन उसमें कुछ शब्द ऐसे थे जिन्हें मैं दुहरा देना चाहता हूंं। उन्होंने कहा, अलबत्ता मैं ऐसा कोर्इ काम नहीं करूंगा कि जिससे हिन्दुस्तान के लोगों को, जिसमें काश्मीर के लोग शामिल हैं, नुकसान हो। यह छोटी-सी बात है लेकिन एक मानी में बहुत बड़ी बात है। ये शेख के शब्द थे ऐसा मुझे बताया गया। यह भी मैं आपसे कह दूं कि जब लोग हस्ताक्षर कराने आये शेख अब्दुला की रिहार्इ के लिए तो मैंने हंसते हुए कहा कि क्या प्रधान मंत्री ने अब रिहार्इ के लिए भी आंदोलन शुरू कर दिया है? मैं भी जानता हूं, कहां कैसे मामले चलते रहते हैं। जो हो, मैंने कहा, मैं तो सही चीज पर दस्तखत करूंगा। यह मैं जानता था कि यह सही चीज है, अच्छी चीज है, दस्तखत करना है, चाहे उसके लिए कहीं से भी इशारा आया हो, लेकिन फिर मैंने कहा कि शेख से जा कर कह देना कि पहचान तो हमारी बहुत पुरानी है, चली आ रही है, एक-दूसरे को थोड़ा जानते हैं, कर्इ ढंग से जाना है, अच्छे ढंग से जाना है, बुरे ढंग से जाना है,
क्योंकि कुछ चीजें हुर्इ थीं। सन 46-47 में शेख को, जब उन्होंने तीन-पांच की, तो मैंने भी कहा होगा कि असली हैसियत देख कर बातचीत करो। मैंने शेख से कहला भेजा है कि शेख, बड़ा वक्त बीत गया, तुम्हारा भी वक्त बीता है और हमारा भी वक्त बीता है, तुमने बहुत कोशिश की कि अपने दोस्त के भक्त बन करके, सरकार के ओहदों पर रह करके जनता का भला करो, उसका मजा तो तुमने चख लिया, अब आगे से तुम यह संकल्प करो कि अगर रिहार्इ हो गयी तो हम हिंदुस्तान के हिंदू-मुसलमानों का मन जोड़ने के लिए गíी से दूर रह कर पूरा काम करेंगे और उसके जरिये से अगर हो सका तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ को बनाने की भी कोशिश करेंगे। पता नहीं यह बात वहां तक पहुंच पायी या नहीं।
हां, यह जो सारा वाकया है, उससे एक बात मैं बता दूं कि जब मैंने लोकसभा में कहा कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ की बात सोचनी चाहिए तब कुछ लोगों ने बड़बड़ाना शुरू किया। एकाध ने बीच में टोका-टाकी की और एक आदमी तो ढृढ़ता के साथ खड़ा हो गया और बोला, अब मैं आगे नहीं बोलने दूंगा और फिर कहा, ये बड़े लीडर हैं, मामूली आदमी नहीं हैं, जब अपने मुंह से बात निकालते हैं तो हमारा हक हो जाता है पूछने का कि वे बताएं कि किस ढंग से हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के एके को यह करेंगे? यह सवाल पूछा था उसने लोकसभा में। हम तो जवाब देना चाहते थे लेकिन अध्यक्ष बीच में बोले कि वह बहुत देर बोल चुके हैं और अगर मैंने यह भी मौका दिया तो लंबी तकरीर हो जाएंगी इसीलिए मैं यह मौका देने का नहीं, तब हमने सोचा कि तफसील से तो कुछ कह नहीं सकते, तो हमने कहा कि और बातें चाहे समझ में न आएं लेकिन एक बात समझ लेना सपना देखों, हिंदुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ का सपना देखो।
सपना, सपना, या सपना देखें वगैरह-वगैरह हल्ला मचाने लग गये। हमने कहा, हां काँग्रेस वाले अब सपना देखना भूल गये। पहले देखा करते थे। अब तो गíी पर बैठे-बैठे दिन की चीजें इतनी बेखबर बना देती हंै कि सपना बिचारे कहां से देख पाएंगे। जब सपना देखा था, तभी अंग्रेजी राज खत्म हुआ और किसी ने बुरा सपना देखा था, तभी तो मुल्क का बंटवारा हुआ। अगर अच्छा सपना देखो तो शायद जोड़ की बात शुरू हो और सपने देखने का मतलब यह नहीं कि आदमी को नींंद आ जाती है तभी सपना देखता है। बैठे-बैठे भी तो सपना देखता है और नौजवान लोग तो बहुत सपना देखा करते हैं। जहां और सब सपने देखते हो, वहां हिंदुस्तान-पाकिस्तान का महासंघ का सपना भी देखो। अब हजरत प्रधानमंत्री ने जवाब देते वक्त, जवाब तो खैर किसी बात का नहीं दिया, क्योंकि मैंने अपने भाषण में कहा था कि हिंदुस्तान की विदेश नीति में सोच नहीं है, सिद्धांत नहीं है, सपना नहीं है और तीनों की अलग-अलग मिसाल दी थी। सपना नहीं है, उसकी मिसाल तो इतनी ही है कि हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ का सपना भी देखा नहीं। सोच नहीं है, क्योंकि इसने कभी भी खुदमुख्तार बन कर, खुद सोच करके कोर्इ रास्ता नहीं दिया दुनिया में । मिसाल के लिए एक रास्ता बताया, रूस और अमरीका के क्रुश्चेव और कैनेडी साहब बैठें, शिखर सम्मेलन करें । इसलिए कि यह जो बम है इसको खत्म किया जाए। तनाव कम करने के लिए, अणुबम खतम करने के लिए कैनेडी और क्रुश्चेव साहब की बैठक हो। मैंने कहा, क्यों नहीं कैनेडी-क्रुश्चेव साहब जो दोनों अमीर मुल्कों के नुमाइन्दे हैं उनकी बैठक कराते दुनिया की गरीबी पर बहस करने के लिए। अगर सोच होता हिंदुस्तान की विदेश नीति में तो इन दोनों आदमियों की बैठक कराते दुनिया की गरीबी पर बहस करने के लिए। सिद्धांत नहीं की मैंने मिसाल दी कि इसने कभी भी किसी मसले पर बिना रोक-थाम के नहीं सोचा। हमेशा इसके दिमाग में एक बात रही कि कहीं कोर्इ नाखुश तो न हो जाए-कोर्इ बड़ा, छोटे की तो परवाह की नहीं हिंदुस्तान की सरकार ने। और आज सब मुसीबत झेलनी पड़ रही है। छोटे की परवाह नहीं की। बर्मा क्या सोचता है, नेपाल क्या सोचता है, पाकिस्तान क्या सोचता है, इसकी कोर्इ परवाह नहीं ।
बाद में प्रधानमंत्री साहब ने जवाब दिया, मैं डरता नहीं हूं। जैसे कोर्इ बच्चा हो, जो डरता हो और कहता है, वाह मैं नहीं डरता, मैं कभी नहीं डरा। हमारे मन में आया, टोकें । फिर चुप रह गये कि क्यों बुडढे को टोकते हो। उनका खाली एक ही जवाब था, हम डरते नहींं छोटों से नहीं डरते हो, यह बात सही है। अपने ही घर की विद्रोही संतान पर, भारत माता के नागा लोगों पर हवार्इ जहाज से बमगोला बरसाते हो, गोवा के छोटे-मोटे पुर्तगाल पर बमगोला बरसाते हो, लेकिन जो बड़ा है, ताकतवर है जिसकी सेना इस मुल्क के अंदर घुस रही है, उसके ऊपर हवार्इ जहाज से बमगोला नहीं बरसाते हो यह तो नेहरू साहब की हमेशा से फितरत रही है कि अपने से कमजोर से वे नहीं डरते, अपने से मजबूत से वे डरा करते हैं। और ऐसा आदमी अच्छा नहीं होता यह याद रखना । अपने से मजबूत से बात नहीं, भलमनसाहत का बरताव करे वह आदमी अच्छा होता है।
खैर, इनको डर लगता है कि वह नाखुश नहीं हो जाए। अल्जीरिया की सरकार बनी तो उनको चीन ने पाकिस्तान ने सब ने मान लिया और हिंदुस्तान ने नहीं माना इस डर से कि कहीं फ्रांस नाखुश न हो जाए। कांगो में मुल्क का जब बंटवारा हुआ, लुमुंम्बा का कतल हुआ, उस वक्त हिंदुस्तान का नुमाइन्दा वहां पर था। हिंदुस्तान की सरकार ने कोर्इ कड़ा कदम नहीं लिया, इस डर से कि कहीं बेलजियम और अमरीका नाखुश न हो जाएं। तिब्बत के मामले में, हंगरी के मामले में हिंदुस्तान की सरकार ने कभी कोर्इ कड़ा कदम नहीं उठाया, इस डर से कि कहीं रूस नाखुश न हो जाए। और रूस नाखुश हो जाएगा तो काश्मीर के मामले को रोकवोट लगा करके जो ठीक-ठीक किया रहता है वह बिगड़ जाएगा। हमेशा इस सरकार को डर रहता है। तो सिद्धांत नहीं, सपना नहीं।
तीनों के बारे में प्रधान-मंत्री साहब ने दबी आवाज में कहा, मैं डरता-वरता नहीं हूं और सपने की बात यहां कही गयी तो थोड़ा-बहुत सपना जरूर देखना चाहिए। बहुत धीमे से बोले, खाली सपना देखना ही चाहते हो तो सपना हिंदुस्तान-पाकिस्तान का ही क्यों देखना चाहते हो, दुनिया का क्यों नहीं देखते हो। सारी दुनिया का महासंघ बनाओ-यह लोकसभा में जवाब मिलता है। ढपोरशंख का किस्सा जानते हो न? एक ढपोरशंख था। उससे मांगों एक लाख तो कहता है, एक लाख क्या दो लाख ले लो। तब उसको बोलो, दो लाख दे दो, तो कहा, भार्इ, क्या दो लाख लेओगे 4 लाख ले लो। वह हमेशा दूना देता था पर जितना मांगते उतना नहीं देता था। उसी तरह से हिंदुस्तान का विदेशमंत्री, जब मैं उससे हिंदुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ की बात करता हूं तो कहता है, क्या हिंदुस्तान-पाकिस्तान के महासंघ की बात करते हो, दुनिया के महासंघ को लो। इस तरह सोच नहीं चलता।
दुनिया का महासंघ भी कभी न कभी तो बनेगा। मैं चाहता हूं बने। प्रधानमंत्री साहब उसके लायक नहीं हैं, क्योंकि उन्हें गíी का इतना मोह है कि वे ऐसे सपने देख नहीं सकते। बनेगा, लेकिन पता नहीं अभी उसको कितने बरस, पचास बरस लगें सौ बरस लगें, पता नहीं और ज्यादा बरस लग जाएं। वैेसे तो हिंदुस्तान-चीन के भी महासंघ का सपना देखता हूं। देखना चाहिए, क्योंकि चीन की मौजूदा राक्षसी सरकार हमेशा चीन पर राज करेगी ऐसी बात तो नहीं। कभी न कभी तो राक्षसी सरकार खतम होगी। और हिन्दुस्तान की जो गंदी सरकार है वह भी खतम हो करके कोर्इ अच्छी सरकार बनेगी। जरूर कोर्इ न कोर्इ दूसरे रास्ते निकलेंगे। लेकिन जो आदमी चीन को और पाकिस्तान को एक सतह पर रखता है, हिंदुस्तानी हो कर के उसको कोर्इ भी जरा भी इल्म नहीं है, उसको बुद्धि नहीं, विधा नहीं है। कभी हिंदुस्तान-चीन एक राज्य रहे हैं? हिंदुस्तान-पाकिस्तान तो एक ही धरती के अभी-अभी दो टुकड़े हुए हैं। अगर दोनों देशों के लोग थोड़ी भी विधा, बुद्धि से काम करते चले गये तो 10-5 बरस में फिर से एक हो करके रहेंगे। इसलिए इनको और चीन को एक सतह पर रखना बहुत जबरदस्त नादानी है। मैं इस सपने को देखता हूं कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान फिर से किसी न किसी एक इकार्इ में बंधे यह काम अगले 5-10 बरस में हो सकता है। चीन के साथ यह काम नहीं हो सकता। अगले 20 बरस में नहीं हो सकता, 30 बरस में नहीं। 50 तक तो मैं नहीं जाता क्योंकि एक नयी शकल दुनिया के सामने आ जाती है। इसलिए जो कोर्इ आदमी दोनों को एक सतह पर रखे, चीन को और पाकिस्तान को, उससे आप बहस करना कि देखो आप गलती कर जाते हो।
पाकिस्तान के बंगाल में कौन लोग हैं? उनकी कौन-सी जबान है? मुसलमान समझते होंगे कि यह लिखावट, उदर्ू वाली लिखावट, दायें से बायें चलने वाली, मुसलमानों की खास लिखावट है, और दूसरी बात यह कि इस कौम की खास लिखावट है। दोनों बातें बिल्कुल गलत हैं। पाकिस्तान के जो भी 8 करोड़ या 9 करोड़ मुसलमान हैं उनमें से आधे से ज्यादा बंगाल में हैं। उनकी लिखावट यही नागरी वाली लिखावट है क, ख, ग, वाली। उनकी भाषा बंगला है और लिखावट नागरी। उसी तरह, बहुत-से र्इसार्इ समझते हैं कि उनकी लिखावट रोमन है और अंग्रेजी उनकी भाषा। और यह जो रेडियो चलता है हिंदुस्तान का उसमें सबेरे के वक्त वन्दना सुनते हैं। कभी गीता से कुछ सुना देते हैं, कुछ रामायण से कुछ कानून से और एकाध र्इसाइयों की कविता या गाना सुनाते हैं। इसी वक्त तबीयत होती है कि रेडियो को तोड़ दिया जाए, क्योंकि हमेशा वह गाना मैंने अंग्रेजी में सुना जैसे र्इसू मसीह साहब अंग्रेजी जबान बोलते थे कोर्इ आल इंडिया रेडियो को बताना जा करके कि र्इसू मसीह साहब की जबान अरमैक जबान थी, जो शायद अपनी हिंदुस्तानी के ज्यादा नजदीक है बनिस्बत अंग्रेजी के लेकिन न जाने क्यों बेवकूफ लोग यही सोचते हैं कि र्इसू मसीह साहब की जबान अंग्रेजी थी। तबीयत तो कर्इ दफा होती है कि स्कूल खोला जाए जिसमें दुनिया के बारे में लोग जान जाएं। खैर। यह मैंने पूर्व पाकिस्तान या बंगाल की लिखावट के बारे में, भाषा के बारे में आपसे कहा कि वह कितनी मिली-जुली है।
उसी तरह, पाकिस्तान के इधर वाले लाहौर, कराची वाले हिस्से को देखो। अभी भी जब लोग मिल जाया करते हैं-कम मिलते हैं लेकिन जब मिलते हैं, दीवार तो जरूर आ गयी है बीच में लेकिन कभी-कभी जब वह दीवार टूटती है- तो मजा आता है। अभी कुछ दिनों पहले एक आदमी आया था। वह पाकिस्तान की सरकार का अफसर था। मैंने उससे एक बात कही, जो बिल्कुल सही बात है, कि हिंदुस्तान-पाकिस्तान में जैसे और दो मुल्कों में दोस्ती होती है वैसी तो दोस्ती हो नहीं सकती, क्योंकि जहां हमारी दोस्ती शुरू होगी, वह रूक नहीं सकती, दोस्ती बढ़ती ही चली जाएगी और बढ़ती चली जाएगी। कहीं न कहीं वह महासंघ या एके पर रूकेगी। उसके पहले नहीं। और अगर वह दोस्ती नहीं होती तो दुश्मनी, युद्ध की जैसी सिथति बनेगी, चाहे युद्ध हो न हो लेकिन युद्ध जैसी सिथति रहेगी। हम दोनों एक ही जिस्म के दो टुकड़े हैं, इसलिए हमारे बीच में मामूली दोस्ती के सवाल को मत उठाना। तब वह हंसा, कहने लगा, हां वह बात तो आपकी मैं जानता हूं लेकिन इस वक्त आप मुझसे न करें तो अच्छा है। आप दूसरी बातें करें। मैंने कहा, कभी न कभी तो तुमको इस बात का सामना करना पड़ेगा कि दोस्ती होगी तो खुल कर होगी नहीं तो फिर मामला रूक-रूका जाएगा।
मैं आपसे यह बात क्यों कह रहा हूं। कर्इ दफा चीन वाले घमंड के साथ कहा करते हैं, हम 60 करोड़ हैं। 60 करोड़ का, 65 करोड़ का उनको घमंड है। हम भी थोड़ी अक्ल से काम लें उदारता से, दयानतदारी से, तो क्या जाने हमारी भी तकदीर खुल जाए तब हम भी घमंड से नहीं लेकिन ताकत से कह सकेंगे कि हम भी 60 करोड़ हैं। दोनों एक हैं, हिंदुस्तान-पाकिस्तान अलग-अलग नहीं, हम दोनों 60 करोड़ हैं। इतनी ताकत हम हासिल करें उसके लिए कुछ अकल की जरूरत होती है।
मैंने शुरू से आखिर तक जो आपको बताया, हिंदू-मुसलमान वाली, हिंदुस्तान-पाकिस्तान वाली बात, उस पर आप लोग छोटी-छोटी टोलियां बना कर सोच-विचार करना। अगर इसमें से आपने कुछ नतीजा निकाला, जगह-जगह अपने मोहल्लों में टोलियां बनायीं, कहीं कोर्इ सियासत खड़ी की, मिली-जुली सियासत, जिसमें हिंदू और मुसलमान दोनों मिल कर आगे चलें, चाहे वह अंग्रेजी जबान को मिटाने के लिए, चाहे महंगी को खतम करने के लिए तो अच्छा होगा। कितनी चीजें महंगी हो गयी हैं। जैसे शक्कर है। मैंने आज ज्यादा उस पर जिक्र नहीं किया लेकिन आप जानते हो, शक्कर का दाम सवा रूपय, डेढ़ रूप्या है लेकिन हमारा जो उसूल है, उसके मुताबिक शक्कर का दाम साढ़े तेरह आने- चौदह आने सेर होना चाहिए। हालांकि नौ आने सेर में शक्कर बनती है और उसे सरकारी टैक्स, नफावगैरह लगा कर डेढ़ गुना तक साढ़े तेरह आने सेर में बेचो। उसके लिए कुछ आंदोलन करो। आप अपनी पार्टी को चुनो। पार्टी नही ंतो किसी एक मोर्चे में आओ। कहीं कोर्इ हैदराबाद शहर में नयी जान पैदा करो कि जिसमें यह मालूम हो कि अब सब लोग आ गये।
मैंने आज खास तौर से हिंदू-मुसलमान की बात कही लेकिन आप याद रखना, यह बात इसी तरह से हरिजन, आदिवासी और पिछड़ी जाति वालों, औरतों के लिए भी समझ लेना, क्योंकि औरत तो जो कोर्इ भी है, चाहे उंची जाति की, चाहे नीची जाति की, सबको मैं पिछड़ी समझता हूं और मैं क्या समझता हूं, आप जानते हो, औरत को हिंदुस्तान में, दुनिया में दबा करके रखा गया है। उसे यहां बहुत ज्यादा दबा कर रखा गया है। मर्द ही मर्द सुन रहे हैं मेरी बात को। औरतें कितनी सुनने आयी हैं? तो ये जितने पिछड़े हैं, इनको विशेष अवसर देना होगा, ज्यादा मौका देना होगा, तब ये ऊँचा उठेंगे। जब मैंने तीन आने वालों की बात कही, यह जब मैं इन पिछड़ों की बात कहता हूं तो मेरा मकसद खाली एक होता है कि जो सबसे नीचे हैं उसके ऊपर अपनी आंखें रखोगे और उसको उठाओगे तो जो उसके ऊपर हैं वह तो खुद-ब-खुद ऊँचा उठेगा। सबसे नीचे है उस पर अपनी आंख रखो। मैं आपसे आखिर में यही प्रार्थना करता हूं कि इन सब चीजों पर खूब गंभीरता से सोच-विचार करना और बन पड़े तो हैदराबाद में एक नयी जान पैदा करने की कोशिश करना।
-1963, अक्तूबर 3; हैदराबाद; भाषण(1)