डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
डा. राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में 'खर्च पर सीमा का क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा और उस पर बहस हुर्इ
निवेदन डा. राममनोहर लोहिया ने लोकसभा में 'खर्च पर सीमा का क्रांतिकारी प्रस्ताव रखा और उस पर बहस हुर्इ थी। डा0 साहब से मैंने उक्त बहस को छापने की अनुमति मांगी और अनुमति के साथ ही भूमिका भेजने का भी वादा मिला, पर दो दिन बाद ही उनके अस्वस्थ होने का यामाचार और कुछ दिनों की आशा-निराशा के पश्चात उनका निधन। इस अनभ्र बज्रपात के कारण इसके प्रकाशन में देर हुर्इ । डा0 साहब के न रहने पर किसी दूसरे से भूमिका लिखाने का मेरा मन नहीं हुआ। लोहिया के प्रखर विचार और लोकसभा में उठायी बहसों ने देश के जन मानस को हिलाया है। इसी बहस में एक ओर लोहिया की प्रतिभा का प्रखर अंश है दूसरी ओर सोमानी का हास्यास्पद लचर भाषण। मैं आशा करता हूँ, इस तरह की बहा जगह जगह चलेगी, खास तौर पर छोटे व्यापारियों, सरकारी नौकरों और बुद्धिजीवियों में हर जगह सेमिनार आयोति हों। जिससे जनसाधारण की कर्म-सामथ्र्य जागं मंत्रियों, बड़े व्यापारियों और बड़े अफसरशाहों का त्रिगुट, जिसके गठबंधन से देश चौपट हो रहा है, बचाया जा सके और देश की पुरर्रचना हो सके। मैं इस प्रकाशन में अनंत झुनझुनवाला, प्रसन्न पोíार के सहयोग के लिए तथा परमानंद पोíार एवं मातादीन ढं़ढ़ारिया, जिनके कारण शीघ्र छपार्इ की व्यवस्था हो सकी, इन सबका आभार मानता हूं। इस पुस्तक की बिक्री का पैसा 'लोहिया स्मारक कोष में जायेगा। मैं आशा करता हूं मेरे सभी समाजवादी सााियों का सहयोग इसकी बिक्री और प्रचार में प्राप्त होगा 21, कलाकर स्ट्रीट, विजय ढांढनिया कलकत्ता- 7 राममनोहर लोहिया: 7 जून 1967, मैं समझता हूं कि भातर का बजट बहुत अच्छा साधनों के हिसाब से और आज की गिरावट की हालत में बनाया जा सकता है, बशर्ते कि खाली आय व्यय के हिसाब से न देखा जाय। साधन श्रम है, साधन खर्चे में कमी हैक्। मैंने अभी खर्चे की कमी की बात कही। स्त्रोत के ऊपर, उसके अलावा और तरीकों से। मुझे उससे मतलब नहीं, किन चीजों का राष्ट्रीयकरण करते हो, जरूरत पड़े सब चीजों का राष्ट्रीयकरण करो। मुझे इससे मतलब नहीं कि खर्चे के ऊपर केवल सीमा कानून से लगाते हो या आयकर से लगाते हो या किस तरह से लगाते हो, लेकिन सीमा बाँधो खर्चा करने के लिए चाहे जैसे भी हो। आज के हिंदुस्ताने में मैं 1500 रू. से ज्यादा किसी को नहीं खर्च करने देना चाहता हूं। जिसमेें वित्तमंत्री का तो पंद्रह सौ भी नहीं पड़ेगा,बारह तेरह सौ शायद पड़ जाय तो पड़ जाय और उसमें सुविधाएं वगैरह शामिल हों। तो खर्चे की सीमा अगर बांध दी जाय तो मेरे हिसाब से करीब हजार से पंद्रह सौ करोड़ यानी 15 अरब रूपया साल बच सकता है। लोग इस हिसाब को सुनकर दंग रह जाते हैें लेकिन वास्तविक सिथति यही है। यह बात सही है जो हनुमन्तैया साहब ने कहा कि जब इस तरह का खर्चा कम करोगे तो जो आजकल सरकारी नौकरी नौकरों की तादाद बढ़कर सवा करोड़, डेढ़ करोड़ हो गर्इ है जिसमें से कि एक लाख सरकारी नौकर तो आप जैसे बड़े लोगों की शान शौकत, ठाट-बाट के लिए हैं, सलामी देने के लिए हैं और कुछ लंगूर लोग जाकर के सलामी ले भी लिया करते हैं। यह एक लाख आदमी जो हैं इनके ऊपर खर्च कम करना है तो मैं यह नहीं कहता कि इनको काम से बाहर निकाल दो। लेकिन यह सही है कि आपकी सरकार में दम नहीं है, शायद हमारी सरकार में भी दम नहीं है, लेकिन वह सरकार जो दम रीखेगी इन लोगों से खेती कारखाने में काम कराने का या उनको बरखास्त करने का, वही हिंदुस्तान के मसले को हल कर सकेंगी और कोर्इ सरकार याह ंके मसले को हल नहीं कर सकेगी। हजार से पंद्रह सौ करो। बोनस वगैरह के मामले में भी कह देना चाहता हूं। मुझे यह अच्छा नहीं लगता है। साफ बात है- एक तरह का चक्कर चलता है, लेकिन चक्कर चलाता कौन है, कंद्रीय नौकरों का बोनस बढ़ाते हो अपनी गíी को बरकरार रखने के लिए, तो प्रांत के नौकर अपना बोनस क्यों नहीं बढ़वाना चाहेंगे। आपका जितना काम होता है गíी पर बैठे रहने के लिए होता है, तो मेरे जैसा आदमी इस बात को जरूर कहना चाहताहै कि आप ऐसा हिंदुस्तान होना चाहिए जिसमें जितनी चिंता नीचे के नौकरों का बोनस बढ़ाने की होनी चाहिए, उससे ज्यादा चिंता ऊपर वालों के खर्चे और सुविधायें घटाने की होनी चाहिए। जब बड़े मंत्रियों के घरों में नमक, दाल, हल्दी के दामों की फिक्र होने लग जायगी, तब जाकर चीजों के दाम गिरेंगे, उससे पहले गिरने वाले नहीं है। तो पहले बड़े लोगों के खर्चे गिराओ। यह श्रमका संकट है। चरित्र का संकट है-- लोग ऐसा बोलते हैं क्यों? क्योंकि जो बड़े लोग हैं, वे बड़े लोग र्इमानदार नहीं रह गये हैं। क्योंकि पिछले 20 वर्षों से लूट-खसोट मची हुर्इ है, जो पाया उड़ाया । यहां की अर्थ-व्यवस्था विकासोन्मुख नहीं है, फैलाव इसमें नहीं रह गया है। विश्वास खत्म हो गया है, आज भारत की जनता को विश्वास नहीं रह गया है कि हमारी खेती ओर कारखाने में तरक्की हो सकती है यहां फैलाव हो सकता है और जब यह विश्वास खत्म हो जात है तो हर समूह अपने टुकड़े को बढ़ाना चाहता है। हर व्यकित अपने हिस्से को बढ़ाना चाहता है- चाहे भाषा के नाम पर, चाहे प्रदेश के नाम पर, चाहे जाति के नाम पर, हर तरफ लूट मची हुर्इ है, कि अपना हिस्सा बढ़ाओ क्यांकि कुल हिस्सा बढ़ाया नहीं जा सकता। यह श्रमका संकट बड़ा जबरदस्त है। मैं एक चीज कह दूं। जो कुछ आँकड़े मैंने बताये हैं, उसके लिए मुझे बहुत ज्यादा मदद मिली है एक नौजवान अध्यापक से-- काशी विधापीठ के श्री कृष्णनाथ शर्मा से। दूसरे नौजवान लोग भी जरा स्वतंत्र चिंतन इस ढंग से किया करें तो ज्यादा अच्छा है। अशोक मेहता: लोकसभा 12 जून 7967, यदि हमलोग डा0 लोहिया के सुझाव को स्वीकार कर लें, तो हम लोग प्रत्यक्ष कर से सभी चीजों की पूर्ति नहीं कर सकते। मेरे मित्र डा0 लोहिया ने कहा कि यदि उन्हें अवसर मिले तो वे खर्च की सीमा को 1500 रू महीना में बाँध देंगे यानी 18000 रू0 साल। जिसका मतलब हुआ कि 40 हजार या इससे ऊपर की आमदनी पर 100 फीसदी कर होगा । मैं इसे स्वीकार करने के लिये तैयार हूं लेकिन जब आप ऐसा करेंगे तब भी 25 करोड़ रूप्या ही अतिरिक्त प्राप्त होगा। जिसकी आमदनी चालीस हजार रूपये से ज्यादा है यदि उससे 100 फीसदी कर ले लिया जाय ता उसके पस कोर्इ आमदनी नहीं रह जायगी तब भी वित्तमंत्री को 25 करोड़ रूप्या ही मिलेगा। बनारस स्कूल का उनका कोर्इ नैजवान अर्थशास्त्री दोस्त उनसे कहा है कि खर्चे की सीरमा बांध देने से 1000 करोड़ रूपया मिलेगा। उन्हें वित्तमंत्री के पस जाना चाहिए था और इसके लिए सरकार का पूरा महकमा उनकी मदद करता। डा0 लोहिया को देश के लिए नीति निर्धारित करने वक्त किसी मेधावी नौजवान के ऊपर ही नहीं करना चाहिए। लोकसभा 14 जून 1967 मोरारजी देसार्इ: डा0 लोहिया ने हि कि यदि 1500 रू0 मासिक से ऊपर के वेतन और खर्चों में कटौती कर दें तो 1000 करोड़ रूपये की बचत होगी। मुझे नहीं मालूम कि ये आंकड़े उन्हें कहां से मिले। यदि आप ऐसा करें तो भी 25 करोड़ रूप्ये से ज्यादा नहीं बचा पायेंगे। राममनोहर लोहिया: यह एक बिल्कुल गलत बात है, मोरारजी भार्इ! इसके ऊपर बहस कर लो। मोरारजी देसार्इ: जब भी वे चाहें उनके साथ बैठने के लए तैयार हूं। मैं उनसे सीखने के लिए तैयार हूं। जहां कहीं वे मेरी गलती बताएंगें, उनसे मैं वास्तव में लाभानिवत होऊँगा। राममनोहर लोहिया: कभी कहीं पर बहस कर लो। मोरारजी देसार्इ: जब भी मेरे दोस्त खाली हों। मैं यही कह सकता हूं। राममनोहर लोहिया: ऐसे नहीं, खाली आपसे बहस करने से क्या फायदा है, यहां पर बहस कर लो। मोरारजी देसार्इ: वो हमेशा किसी चीज को सार्वजनिक बनाने में विश्वास रखते हैं न कि लाभप्रद विचार विनियम में। मैं इस तरह की चीजों में दिलचस्पी नहीं रखता। मैं उनसे सीखने में दिलचस्पी रखता हूं। लेकिन इस तरह के विवाद से मैं नहीं सीखना चाहता । वे अपने तरीके से मुझे सिखाने को तैयार हैं, लेकिन मैं उनसे अपने तरीके से सीखना चाहता हूं, उस तरीके से नहीं जैसा वे चाहते हैं। रामसेवक यादव: पाठ जो पढ़ाना चाहेंगे, वही तो पढ़ायेंगे। राममनोहर लोहिया: इनको परदे की आड़ में पढ़ाना होगा? खर्च पर सीमा: प्रस्ताव और बहस श्राममनोहर लोहिया ( संतोपा): लोकसभा 4 अगस्त 1967, यह सभा कंकल्प करती है कि सरकार को व्यकितगत मासिक व्यय 1500 रू0 तक सीमित करने के हेतु प्रस्ताव तैयार करने के लिए एक समिति नियुक्त करनी चाहिए ताकि विकास कार्य में लगाने के लिए प्रति वर्ष एक हजार करोड़ रूपया उपलब्ध किया जा सके। लेबो प्रभु: (स्व0 पा0) एक महत्वपूर्ण व्यवस्था का प्रश्न है। यह प्रस्ताव संविधान की उस व्यवस्था के खिलाफ है जिसमें निजी संपित्त और आय की व्यवस्था है। इस सदन को इस तरह के प्रस्ताव पर बहस नहीं करनी चाहिए। जब तक कि संविधान में यह व्यवस्था है। इसलिए मेरा व्यवस्था का सवाल है कि इस प्रस्ताव पर विचार करने से पूर्व इस संवैधानिक सिथति को ध्यान में रखा जाय। मधु लिमये: संपत्ति को कोर्इ सवाल नहीं है, खर्चे का सवाल है। स0 मो0 बनर्जी: यह सामाजिक और संविधान के हिसाब से उचित है। उपाध्यक्ष: क्या इस सदन को अर्थनीति पर विचार करने का अधिकरा नहीं है? जैसा भी प्रस्ताव हो, वह देश की अर्थनीति से संबंध रखता है। मैं व्यकितगत रूप से इस पर विचार कर चुका हूं, और माननीय प्रस्तावक अपने अधिकार क्षेत्र में है। संविधान की कोर्इ भी धारा इस पर रोक नहीं लगाती। यह प्रस्ताव अर्थनीति से संबंधित है। इस प्रस्ताव में जो आँकड़ा दिया गया है उससे हम लोगों का कोर्इ संबंध नहीं है। लोकसभा 4-8-67 राममनोहर लोहिया: अध्यक्ष महोदय, तीन आना बनाम पंद्रह आना वाली बहस पूर्वार्ध थी, पहले की बहस थी, आज की बहस 1500 रू0 महीने की सीमा लगाने वाली उत्तरार्ध की बहस है, रोग का निदान है। यह कहते वक्त एक बात मैं साफ कर दूं- रूपये का मूल्य बदलता रहता है। अगर मुझे 6 महीपे पहले बोलना होता या साल भर पहले मैं एक हजार रूप्या कहता और मैं दावा करता हूं कि मेरा सुझाव यदि लागू कर दिया जाय तो यही 1500 रू0 एक महीने के अंदर यानी सुझाव लागू होने के एक महीने के अंदर अंदर दो हजार रूप्या कम से कम हो जायेगा, यानी जो 100 रू0 है वह 125 हो जायगा। क्योंकि रूप्ये का मूल्य बदलता रहता है। सबसे पहले मैं एक प्रश्न उठाना चाहता हूं। मानीय सदस्य कर्इ बार पूछ बैठते हैं- यह हो कैसे? बात तो बड़ी अच्छी है, तो मैं जड़ में जाना चाहता हूं। केसे यह हो? हम बहुत तरह के टैक्स लगाते हैं, एक लाख रूप्ये में से 62 हजार रूपया आयकर ले लेते हैं, फिर भी नहीं हो पाया, दौलत के ऊपर टैक्स लगा दिया, फिर भी नहीं हो पाया, यहां तक कि खर्चे पर भी टैक्स लगाया, फिर भी नहींं हो पाया, मैं उदाहरण के लिए, केवल उदाहरण के लिए एक बात कहना चाहता हूं- स्त्रोत पर जाओ, स्त्रोत कहां-- जहां पर लोग खर्चा कर रहे हों, ऐसी तरकीवें निकालो कि उन विलासी खर्चों को रोक दिया जाय, जैसे कि मोटर वाली बात को लेता हूं। इस समय चार लाख निजी मोटरों का इस्तेमाल अपने देश में हो रहा है, अगर मान लो कि एक मोटर पर औसतन 500 रू0 महीने का खर्च रखा जाय, कुछ 200-300 वाली हैं, कुछ हजार-दो हजार वाजी हैं, अगर सब को लेकर औसतन 500 रू रखा जाय तो करीब 200 करोड़ रूप्ये की बचत हो जाती है। थोड़ी देर के लिये मान लें कि आखिर चलना-फिरना तो होगा ही बसों से या टैकिसयों से, या मान लीजिये किसी संस्था या सरकारी गाडि़यों में, तो भी 200 करोड़ रूप्ये की बचत इन निजी मोटरों के बंद कर देने से हो जायगी, स्त्रोत के ऊपर इस तरह से पहुंचा जा सकता है। असल में मैंने यह प्रश्न खाली इसलिए नहीं उठाया है कि हम को समाज के अंदर कोर्इ न्याया कायम करना है। सबसे बड़ी बात यह है कि जब हम अभाव की, कमी को, जब तक हम अपने यहां जो अभाव है, तंगी है, सभी चीजों को चाहे वह अकाल के रूप् में या चाहे मुफलिसी के कारण है, पब तक अभाव की साझेदारी तंगी और कमी से अपने देश में कायम नहीं कर देंगे तब तक हम किस मुंह से जनता को कहंगे कि तुम तकलीफ उठा कर इस देश को बनाआ। जो लोग इस देश का निर्माण करने वाले हैं, कानून बनाने वाले हैं, सरकार को चलाने वाल लोग ैं, यदि वे विलासिता में रहते हैं, ठाठ-बाट में रहते हैं, उनके मुंह में यह शकित नहीं है किवह जनता को कह सकं कि तुम मन लगाकर और पेट काट करके देश का निर्माण करो और इस संबंध में............... आचार्य कृपलानी: कहते ही हैं। राममनोहर लोहिया: क्योंकि हमारा देश 'समाज सरकार अभिमुख है और सरकार अफसर अभिमुख है, यानी जनता सरकार की नौकर है और सरकार अफसरों की नौकर है। किसी हद तक मैं सही बात कह रहा हूं। अगर दादा आग नहीं टोकेंगे तो बात पूरी कर सकूंगा, नही ंतो इन्ही मसलों में रह जाऊँगा। एक करोड़ के करीब सरकारी नौकर हैं, उनमें से बहुत से ऐसे हैं जो कोर्इ भी पैदावार बढ़ाने का काम नहीे करते, कलमघिसू लोग हैं, उपजाऊ लोग नहीं है ओर यह बिल्कुल निशिचत बात है कि जैसे और देशों में पार्किन्सन नाम का नियम लागू है-- हमारे देश में कुटुंब के कारणवश, जाति के कारणवश, प्रदेश और भाषा के कारणवश लोग खाली जगहें समाज में और सरकार में बानाया करते हैं, इस लिये नहीं कि कोर्इ जरूरत है, बलिक खाली जगहों का निर्माण करो, जिसमें अपने कुटुमिबयों, जातिवालों, भाषावालों को भर सको। मेरा अनुमान है कि 30-40 लाख आदमी ऐसे हैं, जिनकी कोइ जरूरत नहीं है, लेकिन फिर भी वह सरकारी काम काज में लगे हुए हैं, इससे कतनी फिजूलखर्ची होती है, इसका अंदाजा लगाना मुशिकल है। 30-40 लाख न सही, यदि हम 20 लाख को ही मान लें, तो इनसे 300 करोड़ रूपये की बचत हो जाती है.........। एक माननीय सदस्य: आपका सुझाव है कि इनको निकाल दिया जाय। राममनोहर लोहिया: जो आज भारत की जनता की छाती पर बैठे हुए मूंग दल रहे हैं-- यह 300 करोड़ रूपया बच सकता हैं लेकिन यह सरकार कुछ नहीं कर सकती, जकब तक किवे खुद अभाव और तंगी को सहने के लिए तैयार नहीं हैं और दुनिया को दिखा नहीं देते हैं कि हम भी तुम्हारी तरह से तकलीफ उठा रहे हैं। मैं इनको बरखास्त करने की बात नही कर रहा हूं- मैं यह कर रहा हूं कि इन सरकारी नौकरों को कलम-घिसाऊ कामों से हटाकर उपजाऊ कामों में लगा दीजिये, जिसमें कि वे देश की दौलत को बढ़ावा देने के काम में लग सकें। यह काम सरकार कर सकती है, जिसके लिये कि मैंने यह बह यहां पर उठार्इ है। आज क्या हो रहा है? एक तरह से यह सरकार चलती रह गर्इ तो हमारा देश यादवस्थली बन जायगा। आज हर एक वर्ग मँहगार्इ भत्ता माँग रहा है। बनर्जी साहब मँहगार्इ भत्ते की माँग को बढ़ावा दे रहे हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूँ कि वह सही कदम क्यों नहीं उठाते, ऊपर के लोग विलासिता में क्यों रहते हैं? मैं अगर मजदूर नेता होता, तो मैं मँहगार्इ भत्ते की मांग नहीं करता, मैं यह मांग करता कि बड़े लोगों के खर्चे घटाये जायें, ताकि चीजों के दाम घट सकें और हमारा समाज अच्छी तरह से चल सके............. स0 मो0 बनर्जी: इंदिराजी स हम ने यही तो कह है। राममनोहर लोहिया: बिड़ला, सरकारी नौकर, जितने ये बड़े लोग हैं, इन सब के खर्चे घटाये जायें, तभी जाकर हम अपने समाज को बना सकेंगे। आपको मैंने रकमें बतार्इ हैं, रकमों पर ज्यादा जोर मत देना, मैं तो बहुत डर डर कर हजार करोड़ कह रहा हूं, लेकिन मेरा अंदाज 1500 करोड़ रूप्ये का है। दो मंत्रियों ने यहां पर 25 करोड़ कहा है-- एक तो श्री अशेक मेहता ने और दूसरेू श्री मोरारजी देसार्इ नें श्री अशोक मेहता के कभी ताजगी के दिन थे, पुष्प प्रफुलिलत हुआ था। मैं नहीं जानता श्री देसार्इ का फल कब खिला था या नहीं खिला था, उन्होंने कोर्इ निशानी नहीं छोड़ी, लेकिन श्री मेहता ने निशानियाँ छोड़ी हैं और मैं एक निशानी पढ़ कर सुनाता हूं-- वह यह है कि-- '' भारत में 0.4 प्रतिशत लोग राष्ट्रीय आमदनी का 5 प्रतिशत लेते हैं। थ्जसका मतलब हो जाता है- सात लाख, यानी डेढ़ लाख परिवार कमाने वाले, 10 अरब रूप्या जा जाते हैं, आज की राष्ट्रीय आमदनी के हिसाब से। मैं यह मानता हूं कि उन्होंने जब यह किताब लिखी थी। 1653 में, तब से समानता और ज्यादा घटी है, असमानता बढ़ी है, 10 बीब रूप्ये से ज्यादा हो जायगी, लेकिन यदि 10 अरब ही मान लिया जाय और मेरा 1500 रू0 वाला निपयम लागू कर दिया जाय, इन डेढ़ लात्रा कुटुम्बों पर, तो ढ़ार्इ अरब रूपया खर्च होगा और 750 करोड़ रूप्ये की बचत हो जायगी। यह है श्री अशोक मेहता की ताजगी के जमाने की, जब उनकी कली खिली थी, उस जमाने की बात। अब यह पच्चीस करोड़ पर आ गये है। श्री मोरारजी देसार्इ की मुझे पता नहीं है कि कली खिली थी। जरूर खिली होगी। लेकिन नमूना मेरे पास नहीं है, इसलिए मैं नहीें कह सकता हूं। टगर कुछ लोग समझें कि मैं यह ऐसे जमाने की बात कर रहा हूं कि जब अशोक मेहता साहब किसी तरह से लिख गये तो मैं जो व्यापारी लोग हैं जैसे यहां पर कुछ महानुभाव बैठे हुए हैं, कुछ लोग इनमें से मेरे दोस्त हैं, युवा जन हैं और स्वतंत्र पार्टी में होते हुए भी एक आध को मैं जानता हूं, उनसे बात करने में मजा आता है। जवान लोग है। लोवो प्रभु जैसे नहीं जिनको संविधान की याद आ जाय करती है। पीलु मोदीजी भी हैं, मनु जी हैं, जो मजे के आदमी है। हमारी उनसे कोर्इ लड़ार्इ नहीं होने वाली है, अभी कम से कम । मैं कुल राष्ट्रीय आमदनी के विवरण मं नहीं जाऊँगा क्योंकि किस्सा लंबा हो जायगा। खाली इतना समझिए कि अगर मेरा नियम लागू कर दिया जाए तो इन व्यापारियों के चंबर की किताब के अनुसार भी 57 करोड़ बचता है। मैं खाली कहे देता हूं कि कितने लोग हैं, इसके बारे में आप आयकर के जो कमिश्नर हैं उनकी किताब के आँकड़े से मेरा जवाब देंगे तो वह बिल्कुल गैर जरूरी, बेमतलब, असंगत जवाब होगा। उसका कुछ भी मतलब नहीं हो पाता। इसलिए कि सब लोग आयकर दीेते नहीं है। कम देते हैं। 57 करोड़ का तीन गुना कम से कम करना चाहिए। लेकिन अगर दो गुना भी आप करो तो 114 करोड़ रूप्या तो ऐसा है जो उधारेगी रकम है, आमदनी उसमें से बच जाएगी। खेी वगैरह की भी उतना शामिल कर लो तो तीन सौ करोड़ इन लोगोें के हिसाब से बचता ळें एक एक जगह से अगर मैं हिसाब लगा कर बताऊँ तो यह साबित कर सकता हूं कि कितना ज्यादा रूपया बचता है। एक बार बहस हुर्इ थी। नंदा ज्ी बैठे हुए हैं। इन्होने एक बात को माना था। इनके उ वक्त के मुखिया के बारे में मैं कुछ नहीं कहूँगा। इन्होंने साढ़े सात आने माना था। मोटे तौर पर आठ आना सही। मैंने तीन आना कहा था। मैं अब चार आना बढ़ाये देता हूं। अगर उस तरह से देखा जाय तो औसत आमदनी जितनी है और जो साठ सैकड़ा जनता को कम मिलता है श्री नंदा के 'जब वह मंत्री थे कहने के अनुसार- अब पता नहीं कौन योजना मंत्री हैं, लेकिन ये गृह मंत्री भी रह चुके हैं- तो 6000 करोड़ रूपया बच जाता है। और मेरे हिसाब से नौ हजार करोड़ रूपया...........। उपाध्यक्ष महोदय: जिस तरह आप आय का हिसाब रख रहे हैं मुझे भी समय का हिसाब रखना चाहिए। दो घंटा इसके लिए निर्धारित है। यदि सदन और समय बढ़ाना चाहता है तो दूसरी बात है। मेरा सुझाव है कि आप को 20 मिनट दिया जाएं एक बजे तक आप इसे खत्म कर दें। मधुलिमये: आप खाने की छुटटी रखिये। राममनोहर लोहिया: अभी तो मैं आधा भाषण भी नहीं कर पाया हूं। दस बारह मिनट अगर आप और दे ंतो खत्म कर दूंगा। कमल नयन बजाज: दो घन्टे की डिबेट है और बीस मिनट माननीय सदस्य बोल चुके हैं। दस-बारह मिनट और लेंगे तो दूसरे क्या बोलेंगे...........। उपाध्यक्ष महोदय: मैंने समय की गिनती करली है। यदि आप दूसरी तरफ से उत्तर नहीं चाहते हैं तो मैं मंत्री महोदय से निवेदन करूँगा कि वे कुछ न कहें। फिर भी चर्चा का कुछ उपयोगी नतीजा निकलना ही चाहिए। मंत्रीजी के लिए कुछ समय निकालना ही पड़ेगा। आप दोपहर के भोजन के समय तक अपनी बात खत्म कर दें। राममनोहर लोहिया: दो घंटे के बजाय चार घंटे कर देंं लोगों को बहुत अधिक चुभ रहा है। शिव नारायण: आप इनको दस-बार मिनट दे दें, इसमें क्या एतराज की बात है। आज ना-आफिशियल बिजनेस है, उसमें से दे दें। राममनोहर लोहिया: कितना वक्त मेरा ऐसे बरबाद हो जाता है। व्यवस्था के प्रश्नों आदि में चला जाता हैं मेहरबानी करके मुझे जरा बोलने दीजिये। यह हो सकता है कि जो मैंने छ: हजार करोड़ रूपये की बचत बतार्इ है कि वह सब की सब बड़े लोगों को न मिलती हो, कुछ मध्यम लोगों को मिल जाती हो। लेकिन उस हिसाब से हजार करोडत्र रूप्ये का जो मैंने हिसाब रखा है वह गलत नहीं होता है। एक बार यहां पर नोबल पुरस्कार विजेता श्री पाउलिंग आए थे। उन्होंनें कहा था कि हिंदुस्तान में हालत गिर रही है। उस पर बहुत ज्यादा हल्ला मचा थां सवाल जवाब हुए थे। जवाब ठीक तरह से लोग नहीं दे पाए थे। अगर सरकार के अपने (नेशनल कंजम्पशन सर्वे) राष्ट्रीय खपत सर्वे को देखा जाए तो उसके अनुसार जो नीचे के बीस सैकड़ा लोग हैं, आबादी है उसके तरल पदार्थ यानी तेलों में और मीठी चीजों में कमी हुर्इ है। यह सरकार ने खुद माना है। हो सकता है कि मेरी बात पर कुछ लोग कहं कि तुम काम देश में कम करवा दोगे क्योंकि काम के अनुसार मजदूरी या मुनाफा मिलना चाहिय। इसमें किसी को प्रेरणा नहीं रहेगी। यदि प्रेरणा नहीं रहेगी तो कैसे काम चलेगा। ऐसे लोगों को मैें कहूंगा कि जब राजा जी बारह सौ एकड़ के मकान में रहते थे तब जितना वह काम करते थे मेरा अनुमान है कि उम्र बढ़ जाने पर भी अब एक चौथार्इ एकड़ के मकान में रहते हुए उससे भी ज्यादा काम वह करते हैं। मैं चाहता हूं कि वह सौ बरस काम करते चले जायें। इस तरह से काम का मजदूरी और धन से ताल्लुक नहीं रहता है। नोकरशाह और जगर सेठ के संबंध को आप जरूर जान लो। नौकर शाह अपने देश में ज्यादा हैं, नगर सेठ कम हैं। तीस लाख मान लो नौकरशाह, बीस लाख मान लो नगर सेठ, बीस लाख दोनों मा लो तो बारह लाख नौकरशाह और आठ लाख नगर सेठ। ये जितने लोग हैं इन सब के बारे में कराची प्रस्ताव में जो गलती की गर्इ है वह गलती अब हमलोगों को दोहरानी नहीं चाहिए। वह गलतीयह है कि सरकारी नौकरों और मंत्रियों की तनख्वाह को तो बांध देना, कम कर देना, आदर्शमय बना देना और चारों तरफ उनके लालच का समुद्र बहा देना, सरकारी नौकरों और मंत्रियों को आदश्र के द्वीप में बैठा देना और नगर सेठों को लालच के समुद्र में बहते रहने देना। यह चीज असंभव है। लालच के समुद्र में और सब जगह जब लगाम लगाओगे तभी जाकर सरकारी नौकर और मंत्री लोग अपने काम में र्इमानदार और आदर्शवादी बनेंगे। अब एक सवाल उठता है। कर्इ लोग कहते हैं कि तुम खपत और खर्च के ऊपर क्यों जोर देते हो। राष्ट्रीयकरण की बात क्यों नहीं करते हो। ऐसे लोागों से मैं खाली इतना कहूंगा कि मेरा प्रस्ताव बहुत आगे जाता है। यह क्या चुटकुले लगाते हो कि बैंकों का राष्ट्रीयकरण करो। इस प्रस्ताव के पस होने के बाद जो लोग समझते हैं कि उनको काम करने की प्रेरणा नहीं है उन सब का राष्ट्रीयकरण हो जाता है। अगर प्रेरणा लोग समझते हें तो हम ऐसी बात भी सोच सकते हैंं मैंने सुना है कि संतान वगैरह के मामले में आदमी जरा बहुत ज्यादा आतुर रहता है और उसकी भावनाएं रहती हैं। कुछ रूप्या बीस बरस तक हम उनके नाम में जमा करते रह सकते हैं। इसका कराण यह है कि मैं जो कुछ कह रहा हूं वह केवल बीस बरस के लिए कह रहा हूं। अपना देश जब भरपूर हो जाय उसके बाद जो आप को करना हो कर लो। ये पैसे आप चाहो तो उनको दे दो, उनकी संतानों को दे दो। लेकिन बीस बरस तक इस तरह से जैसा मैंने बताया है काम चलाओ। कर्इ बात लोग कहते हैं कि तुम्हारी अपनी क्या हालत है। मैं पहले से बता देता हूं कि यह विशेषाधिकार का समाज हैं। मेरी तनख्वाह पाँच सौ रूप्ये मासिक है लेकिन सुविधाओं के हिसाब से देखा जाय तो जिस ढंग का मुझे मकान मिला हुआ है ओर जो सुभते हैं उन सब को जोड़ा जाय तो अढ़ार्इ हजार रूपया माहवार तनख्वाह बैठती हैं जहां मैंने अपनी बात की वहां मैं मंत्रियों की भी कह देना चाहता हूं। उनको कीब साठ हजार महीना पड़ता है और व साल में जाकर आठ लाख के करीब पड़ता होगा। और ठाठ-बाट के क्या कहने हैंं मैंने राष्ट्रपति भवन के बारे में एक बार कहा था कि खाली लिफ्ट बदलने के लिए चालीस लाख रूप्या खर्च करने की योजना बनी थी, जिसमें से पाँच छ: लाख रूपया खर्च भी हो गया। कहने के लिए तो राष्ट्रपति और प्रधान मंत्री मेंसे प्रत्येक पर दस, बीस, तीस लाख रूपया खर्च होता है, लेकिन मैंने साबित कर दिया है कि उनमें से प्रत्येक पर कम से कम एक करोड़ रूपया साल का निजी खर्च होता होगां इतने ठाठ-बाट, इतनी शानो-शौकत, इतना ऐश्वर्य, इतनी शौकीनी। क्या हम लोग यूरोप और अमरीका की नक करके अपने देश में पैदावार बढ़ाना चाहते हैं? अगर पहले हीम बीस वर्ष वत पैदावार बढ़ा लें और उसके बाद उस ऐश्वर्य की नकल करें, तो मुझे कोर्इ एतराज नहीं होगा। मैं खुद चाहता हूं कि मैं आराम से रहूं। एक रूसी से मेरी दोस्ती हो गर्इ थी। शायद वह रूसी भी सी0 आर्इ0 ए0 वाला रहा हो। वह दिन में दो बार मेरे पास आने लग गया। यह ताशकंद से पहले की बात हैं अब तो उसकी शक्ल दिखार्इ नहीं पड़ती है। उसने मुझे कहा कि तुम अपने घर में वातानुकूलित करने वाली, ठंडा करने वाली, मशीन क्यों नहीं लगा लेते, तुम इस तरह काम कैसे कर सकते हो; मजदूरों का भला कैसे करोगे मैंने कहा कि पहले मुझे अपने देश को तुम्हारे रूस जैसा एक आधुनिक पैदावार वाला देश बनाने दो, फिर वातानुकूलित करने वाली मशीन की बात करना। में यह भी कह देना चाहता हूं कि मेंने अपने प्रस्ताव में यह नहीं कहा है कि लोग अपनी चीजों को छोड़ दें। वह तो धर्म के लाग करते है। धर्म के लोग एक तो प्ररणा पर काम करते हैं और दूसर, सन्तर्इ पर काम करते हैं। राजनीति के लागों का काम प्ररणा पर चलता है और दूसरे, बिधि और कानून पर चलता हैं, ताकि करोड़ों के लिए कोर्इ काम किया जा सके, न कि सिर्फ एक, दो, चार आदमी संत बनकर उदाहरण रख दें और लोग कहें कि कितने अच्छे और बढि़या आदमी हैं। इसलिए मैं आप को एक बड़ा भंडार बताना चाहता हूं और वह है सिंचार्इ वाला भंडार। मैंने एक मोटा सा हिसाब लगाया है कि पूरी खेती के लिए सिंचार्इ की व्यवस्था करने के लिए 40 अरब से एक खरब रूप्ये तक की जरूरत पड़ेगी-- एक खरब रूपये, यानी दस हजार करोड़ रूपये। मैं समझता हूं कि इतना ज्यादा सिंचार्इ का काम करना असंभव है, जब तक हम सारी जनता के सामने यह आदर्श न रख दें कि हमने इस देश में अभाव की सांझेदारी करनी शुरू कर दी है। कुछ लोग यह सवाल उठायेंगे कि क्या मैं निजी धंधे और सार्वजनिक धंधे जैसे विषय के बारे में कुछ नहीं करूंगा। मैंने तो बुनियादी बात कह दी है मैं आप से बड़ी गंभीरता के साथ कहना चाहता हूं किअगर इस देश को चलाने वाले लोग, चाहे वे निजी धंधे वले हों और चाहे सार्वजनिक धंधे वाले, इतने नादान हों कि कहें कि चलो कोर्इ बात नहीं है, हम अपने कारखानों का माल हिन्देशिया भेजेंगे, बर्मा भेजेंगे या और कहीं भेजेंगे और उनसे गेहूं मंगायेंगे- यह बात केवल सार्वजनिक धंधे वाले ही नहीं कह सकते हैं, निजी धंधे वाले भी कह सकते हैं तो यह वही गलती होगी, जो कि इस देश में पिछले बीस बरस से हो रही है, यानी नार्इलोन, येन, टेरीलीन वगैरह के न जाने कितने वाहियात किस्म के कारखाने तो बन गए और सिंचार्इ का काम नहीं हो पाया। जो लोग कहते हैं कि उपभोक्ता पर छोड़ दो, खुला धंध छोड़ दो, मैं उन्हें कहूंगा कि ऐसा करने का नतीजा आज हम देख ही रहे हैं। और जो लोग कहते हैं कि सार्वजनिक धंधे बनाये जायें, मैं उन्हें कहूंगा कि रादरकेला और जमशेदपुर में आज कोर्इ फक्र नहीं है।। जिस तरह से लूट जमशेदपुर में है, उसी तरह लूट राउरकेला में भी है, क्योंकि वहां पर उसी तरह की अफसरशाही, नौकरशाही और मजदूरों का शोषण है-- और मैं तो यहां तक कहूंगा कि शायद कुछ ज्यादा है, क्योंकि वहां पर अपवनी जाति आर अपने कुटुम्ब के लोगों को भरे का काम चलता आ रहा है। असल में यह मामला संपत्ति का है। संपत्ति का मोह और संपत्ति की संस्था, मैं समझता हूं कि संसार मेंं अभी तक किसी व्यकित ने, किसी समाज, किसी देश ने एक-साथ इन दोनों का हल नहीं निकाला है। माक्र्स साहब ने संपत्ति की संस्था का हल निकाला था। हमारे उपनिषदों ने संपत्ति के मोह का हल निकाला था। किसी तरह से हम कोर्इ ऐसा रास्ता निकालें कि संपत्ति के मोह और संपत्ति की संस्था, इन दोनांं का हल निकाल सकें, भोग की इच्छा और भोग की व्यवस्था, दोनों का हल निकाल सकें मैंने यही बात यहां पर रखी है कि किसी तरह से भोग की व्यवस्था पर रूकावट लगार्इ जाये, भोग की इच्छा पर रूकावट लगार्इ जाये। मैंने अभी मोटर का उदाहरण दिया है। मैं अब स्कूल का उदाहरण देता हूं। हमारे देश में पांच दस लाख बच्चे ऐसे हैं, जो बढि़या स्कूलों में जाते हैं, जो बीस, तीस, पचास, अस्सी, सौ रूप्ये महीना फीस देते हैं- खाली फीस, बस वाली फीस, स्कूल वाली फीस, कपड़े और खाना नहीं। अगर उस खर्च को रोक दिया जाये और ऐसे स्कूल हो जायें, जिनमें राष्ट्रपति का बच्चा और भंगी का बच्चा दोनों एक-साथ पढ़ने जायें, तो इससे भी कम से कम साठ करोड़ रूप्ये से एक अरब रूप्ये की बचत हो जायेगी। अंत में मैं यही निवेदन करूँगा कि जो बातें मैंने कह हैं, सभी माननीय सदस्य इस विषय पर बोलते हुए उन पर ध्यान देंं मैं संपत्ति के मोह, भोग की इच्छा, संपत्ति की संस्था और भोग की व्यवस्था, दोनों के बारे में कह रहा हूं। मैं अपने देश के लिए एक ऐसा रास्ता निकाल रहा हूं, जिस पर अभी तक लोगों ने नहीं सोचा है। माननीय सदस्य उस पर गंभीरता से सोचें और देश का निर्माण करें। सुशीला नायर (कांग्रस): उपाध्यक्ष माहेदय, माननीय डा0 लोहिया ने जो यह प्रश्न रखा है कि खर्चे पर अमुक बंधन लगाया जाय और अमुक हद से ज्यादा लोग खर्चा न करें यह प्रस्ताव तो अच्छा प्रस्ताव है, इनमें कोर्इ दो राय नहीं हो सकती। आज जब इतनी मुसीबत में से, आर्थिक संकट में से देश गुजर रहा है, हम अपनी जरूरियात पर कम खर्च करके देश के नवनिर्माण के लिए लगाएं, इसमें कोर्इ दो राय नहीं हो सकती, यह अच्छी बात है। श्री लोबो प्रभु ने कहा कि इसके उपर संवैधानिक रूकावट आयेगी तो अगर इन्होंने आमदनी के ऊपर रोक लगाने को कहा होता तब तो संवैधानिक कुछ बात आ सकती थी मौलिक अधिकार की, लेकिन अपना पैसा आप खर्च न करें अपने ऊपर और देश के लिए रखें, इसमें कोर्इ आपत्ति नहीं होनी चाहिए, ऐसा मुझे लगता है। मगर, उन्होंने जो कुछ तरीके बताये हैं, उससे मुझे शक है किवे तरीके कारगर हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि मोटर किसी के पास निजी न रहे। चार लाख मोटरगाडि़यां हटा दें और पांच सौ रूप्ये का जो एक एक गाड़ी के पीछे खर्चा होता है वह बच जाएगा। अब या तो देश में मोटरगाडि़यां रहें नही, हम बैलगाडि़यों में चलें यह चाहते हों तब तो कुछ बात हो सकती है लेकिन अगर मोटरगाडि़या। चलनी है और मै ंसमझती हूं कि डाद्ध लोहिया भी बैलगाड़ी में नहीं चलेंगे, मोटरगाडि़ों पर ही चलेंगे तो मै यह कहना चाहती हूं कि संस्था की ओर से चलें या व्यकित की ओर से चलें, खर्चा तो उनके ऊपर होगा ही। खर्चे की बचत नहीं होगी।..... मोटरगाडि़यां अगर बननी बंद हो जायेगी तो इतने लाख लोग जो उसमें काम करने वाले हैं वह भी बेकार हो जायेंगे, यह भी सोचने की बात है। विभूति मिश्र: खेती पर सब लोग जाकर काम करें। सुशीला नायर: हम जानते हैं कि इस देश में खेती पर काम करने वाल जितने ज्यादा लोग हैं उनके लिये प्र्याप्त काम नहींं है। आज तो यह कहा जा रहा है सबकी तरफ से और लोहिया जी की तरफ से भी कि जमीन पर से कुछ लोगों को हटा लें ताकि वह ज्यादा उत्पादन कर सकें। जमीन के अलावा दूसरी जगह दूसरे साधनों से। राममनोहर लोहिया: ट्रैक्टर और पमिपंग सैट वगैरह बस। सुशील नायर: पमिपंग सेअ वगैरह यह जो कह रहे हैं वह भी बनें। आपने कहा कि एक करोड़ इस समय सरकारी नोकर हैं, इनमें से 20 लाख को कम से कम निकाल दिया जाए। इनको लिकाल किर कहां फेंका जायगा, यह कोर्इ मजाक तो नहीं है। जहां कहीं जरा भी छंअनी होती है, हल्ला मच जाता हैं हमारे भार्इ बोलते हैं, सभी बोलते हैं कि आखिर वे लोग कहां जाएं, कैसे रोटी खाएं। यह सही है कि भविष्य में सरकारी नौकरों की भर्ती कम की जाय, नये विस्तार में उनको लगाया जाय- यह चीज मानने की हैंं लेकिन बीस लाख लौकरों को निकालना वह नहीं हो सकता। आपने स्कूलों की बातें कही हैं। मैं चाहती हूं कि सब स्कूल अच्छे हों। लेकि यदि कोर्इ मां- बाप अपना पेट काअ करके अपने बच्चों को अच्छी तालीम देने के लिए मिलकर कोर्इ सामूहिक साधन कर लेते हैं तो इसमें कोर्इ आपत्ति नहीं होनी चाहिए। यह ठीक है कि हमारे स्कूल अच्छे बनें, लेकिन जब तक यह नहीं होता है, तब तक इसमें कोर्इ आपत्ति नहीं होनी चाहिए कि जो मां-बाप अपने बच्चे को अच्छी तालीम दे सकते हैं, वे दें। मुझे इतना ही कहना है कि संपत्ति का मोह न हो, संस्थाओं की तरफ तवज्जह दी जायं जब डा0 लोहिया बापू के पास सेवाग्राम में बैठते थे, उनकी तरफ तवज्जह देंं जो रास्ता उन्होंनें बताया था उसको अपनाये हमें अपने विचारों में परिवर्तन करना होगा। खाली कानून बनाकर, लोगों पर पाबंदी लगा कर, यह व्यवस्था सफल साबित नहीं हो सकेगी। कानून की मदद लें, लेकिन ज्यादा तालीम की तरफ ध्यान दें। अब मैं शराबबंदी की बात कहती हूं। आप उसका विरोध करते हैं। 1200 करोड़ रूप्या हर साल चुंगी से इस देश में आता है। 100 करोड़ के पीछे 4 रू0 प्रति व्यकित खर्च करते हैं। अगर लोहिया जी हमारे साथ पूरा सहयोग देकर शराबबंदी को सफल बनाये ंतो इस तरह से 50 करोडऋ बच सकता है। राममनोहर लोहिया: मैं शराब पीने को कभी नहीं कहा। एन0 के0 सोमानी ( स्व0 पार्टी): डा0 लोहिया ने आप इस सदन के सामने जैसा बे बुनियाद निराधार निरर्थ क और मानव स्वभाव के सर्वथा प्रतिकूल प्रस्ताव पेश किया है, उस पर किसी भी प्रकार विवके पूण्र विचार करना मेरे लिए अत्यन्त कठिन है। मुझे शक है कि डा0 लोहिया कुछ-कुछ आत्म पीड़न की आदत के शिकार होते जा रहे हैंं कितने दु:ख की बात है कि भ्रम जाल में उलझे हुए डा0 लोहिया ऐसे बेसिर-पैर के प्रस्ताव पेश कर देते हैं कभी तो उनकी उन्माद पूर्ण बातें भव्य टौर आकर्षक भी नजर आती हैं, लेकिन मैं नहीं जानता कि ऐसे व्यकित के साथ कैसे कोर्इ गंभीर विवाद किया जा सकता है, जो काल्पनिक मिंक कोट और हीरे के हार का सपना देखता रहता है। उन्होनें सिद्धांत पेश किये हैं, जिनसे विभिन्न और सर्वथा प्रतिकूल निष्कर्ष निकलते हैं। उनका कहना है कि व्यकितगत खर्चो में यदि कमी की जा सके तो इस देश में प्रतिवर्ष एक हजार करोड़ रूप्ये बच जायेंगे जो उत्पादन के कामों में लगाये जा सकते हैं। मैं समझता हूं कि ये विचारधारा गलत और बेबुनियाद हैं क्योंकि यह मानव प्रकृति के सर्वथा प्रतिकूल है और अगर हम इस पर अमल करना शुरू कर दे ंतो यह प्रवृति बचत और पैदावर के उस ढाँचे की ही नींव उखाड़ डालेगी जिसके निर्माण करने की डा0 लोहिया दुहार्इ देते हैंं बचत निर्माण और धन वृद्धि के स्त्रोत सूख जायेंगे और जो थोड़ा सा धन आज इस देश में बचा है वो भी गायब हो जायेगा। जब वे राजाजी की या अपने जैसे एक तपस्वी की कही हुर्इ बातें दुहराते हैं तब उनके भिन्न-भिन्न अर्थ निकाले जा सकते हैं क्योंकि उनके दृषिटकोण भिन्न-भिन्न हैं । जब वे मनुष्य प्रकृति की बात करते हैं तब मैं उनका ध्यान गीता के दूसरे अध्याय में अजर्ुन और कृष्ण की वार्ता की तरफ दिलाना चाहूंगा। जब वे सिथतप्रज्ञ की बात करते हैं तब उनका इशारा उन लोगों की तरफ है, जिनको धन की कोर्इ वांच्छना नहीं है या सन्यासी है। पर ये बातें हिंदुस्तान की आम जनता पर तो किसी तरह लागू नहीं होती। अजर्ुन ने कृष्ण से पूछा- सिथतप्रशस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव। सिथतधी: कि प्रभाषेत कि भासीत ब्रजेत किम।। और कृष्ण ने उत्तर दिया- ध्यायतो विषयान्पुंस संगस्तेषुपजायते। राममनोहर लोहिया: इसके आगे भी जोड़ो-कर्माड़गजीव सर्वश-- एन0 के0 सोमानी: डा0 राममनोहर लोहिया का विश्वास है किइस देश में और देश के बाहर भी हर मनुष्य सिथतप्रज्ञ होता है और उन्हीं भावनाओं से प्ररित होता है जो राजाजी को और स्वंय उन्हें प्रेरित करती रहती है। अब हम जरा देश में उत्पन्न सिथतियों पर नजर डालें। मेरा विश्वास है हमारी राष्ट्रीय अर्थ व्यवस्था के उíेश्य कुछ इस प्रकार हो सकते हैं। इस बात का जिक्र मैं इसलिये कर रहा हूं कि डा0 लोहिया ने बड़े पैमाने पर और एक सुढृढ़ पूंजी निर्माण की आवश्कता पर जोर दि है। हो सकता है वे इस पूंजी का उपभोग सिंचार्इ और कृषि के लिये करना चाहेंं इस पर हमारा विरोध नहीं है, पर सवाल है कि पूंजी निर्माण हो कैसे? बेबुनियादी बातें करने से और गलत सिद्धांत प्रतिपादित करने से तो पूंजी बन नहीं सकती। पूंजी या तो करों द्वारा आ सकती है और इस मामले में सरकार की कृपा से, करों की दर आसमान तक पहुंच गर्इ है और 82.2: से 89: तक की है। या पंूजी आ सकती है जनता से ऋण लेकर वह भी ऊँची सीमा तक पहुंची हुर्इ है या घाटे के बजट से, जिससे सौभाग्यवश इस समय, हम बचाना चाहते हैं, या फिर विदेशी सहायता से, मेरा कहना है कि पूंजी निर्माण के ये चारों ही तरीके इतने अधिक उपयोग में लाये जा चुके हैं कि अब उनमें गंजाइश नहीं है। तब फिर व्यकितगत बचत और व्यकितगत पूंजी का गला घोंटने से क्या लाभ? एक जुआरी भी अनुभव से शिक्षा ग्रहण करता है पर बीस बरस तक इस देश से जो प्रयोग किये गये उससे डा0 लोहिया कुछ भी सीखना नहीं चाहते। वे न तो कार्यकुशलता और अध्यावसाय में विश्वास करते हैं, न व्यकित के काय्र कौशल में भारतीय व्यकित के खिलाफ और जो कुछ अब तक इस देश में किया गया है उससे एक कदम और आगे जाकर व्यकितगत प्रयत्नों का तो वे गला ही घोंटना चाहते हैं। अगर वे अपना उपार्जित धन खच्र करने का अधिकार व्यकित को नहीें देना चाहते हैं। अगर वे अपना उपार्जित धन खर्च करने का अधिकार व्यकित को नहीे देना चाहते तब फिर अधिकर काम करने और अधिक पैदा करने का आकर्षण (इच्छा) ही कहां रहेगा। डा0 महालनोविस के द्वारा फरवरी 1964 में पस्तुत की हुर्इ रिर्पोट से भी वे मनमाने निष्कर्ष निकालना चाहते हैं ंनिश्चय ही वे मति भंग के शिकार हो गये हैंं आय विरण के संबंध में डा0 महालनोबिस ने कहा था भारतवर्ष में आय की असमानता दूसरे उन्नत और पिछड़े देशों से अधिक है, सोवियत रूस को देखते हुए भी। मुझे मालूम नहीं कि गीता उन्हें कहां तक प्रभावित करती है पर सन 1931-32 में कही हुर्इ स्टालिन की वो बात उन्हें याद दिलाना चाहूंगा जिसमें उसने कहा था कि समानता का सिद्धान्त एक असभ्य और अउन्नत समाज का धोतक है, ओर समाजवाद से इसका कोइ्र वास्ता नहीं। उनसे ये भी कहा- ये तो एक बुजर्ुवा, भ्रम है। मैं नहीं समझता कि डा0 साहब भारतवर्ष में इसी प्रकार के समाज की स्थापना करना चाहते हैं? फिर एक क्षण के लिए सोचिये, कि भगवान बचाये, अगर यह प्रस्ताव पारित हो जाये, कुछ आयकर के अधिकारियों के हाथों में मनचाही व्याख्या और घुसखोरी की सत्ता आ जायेगी। आयकर अधिकारी का पूर्ण अधिकार होगा कि वे घर पर आ सकें और आपसे पूछें कि दूध कहां से प्या, आप के बच्चों को शिक्षा के लिए कितना शुल्क दिया, आपने अपनी यात्रा, आमोद-प्रमोद, सिनेमा, शिक्षा और अनाज वगैरह पर कितना व्य किया। मैं मान लूं कि डा0 लोहिया ये सब अधिकार आयकर अधिकारियों को देना चाहेंगे। लेकिन मेरा तर्क है इससे हमारे देश में भ्रष्टाचार बढ़ेगा और कालाधन में भी कमी के बजाय वृद्धि होगी। मगर डा. लोहिया अपव्यय और अनुत्पादक खर्चों में कमी करने का साहस करते हैं तो मेरा दल और मैं उनके साथ हैं। मैं उनसे मेरे बड़े भार्इ के नाते यह जानना चाहूंगा कि उन्होंने और उनके दल ने जो इस वक्त इस देश में कर्इ स्थानों पर प्रांतीय सरकारों में शामिल हैं खर्चों में कटौती की है? जहां सरकारों में उनके कथन की मान्यता है उन्होंने उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने के तरीकों के लिये कुछ किया है क्या? क्या हमें वे बतायेंगे उन प्रांतो में जहां केी सरकार में उनके कथन की मान्यता है, उन्होंने सरकार और व्यापारियों के बीच पारस्परिक अविश्वास को समाप्त करने का स्वस्थ वातावरण बनाया है क्या? हमस ब उनके साथ है अगर उन्होंने ऐसा कोर्इ भी कार्य किया तो। नाथ पार्इ: क्या उनके कथन की मान्यता वहां है? सोमानी: हमस ब उनके साथ हैं, अगर वे बढ़ती कीमतों को जो कि पिछले 10 वर्षों में करीब 80 : बढ़ गर्इ है, रोकने के लिए कुछ करें। लेकिन जहां तक इस मूर्खतापूर्ण, अव्यवहारिक प्रस्ताव का संबंध है, यह प्रोत्साहन और साहस को ही समाप्त कर देगा हमलोग निश्चय ही इसके साथ नहीं है। अमृतलाल नाहटा (कांग्रेस): जहां तक इन उíेश्यों का संबंध है और उसके पीछे जो भावना है उसका मैं आदर करता हूं और समर्थन करता हूं। लेकिन मैं यह माने को तैयार नहीं हूं कि जो सुझाव इन्होंने दिये हैं वह कोर्इ रामबाण औषधि है, या अमोघ अस्त्र है जिन से कि देश की सारी समस्याएं हल हो जाएंगी। मैं चाहूंगा कि डा0 साहब इन समस्या की ओर जरा एक व्यावहारिक और वैज्ञानिक दृषिटकोण से देखें। मैं उनका एक विराधाभास आपके सामने रखना चाहता हूं । खचर्ै पर आप एक सीमा बांध देंगे। वह कहते हैं कि उससे पैसा बच जायेगा लेकिन पैसा बचने से ही वह देश कें निर्माण में लग जायगा उसका क्या आश्वासन हमें है?.......... श्री सोमानी के प्रश्न पर मुझे गोर्की का एक लेख याद आता हैं वह एक धन्नासेठ से मिलने गये। उससे गोर्की ने पूछा कि क्या तुम दस कोट पहनते हो तो उसने जवाब दिया कि नहीं एक ही कोट पहनता हूं। उससे पूछा कि क्या तुम 100 बार खाते हो तो उसने जवाब दिया कि नहीं एक बार खाता हूं। उससे पूछा कि क्या वह 50 विस्तर पर सोता है तो जवाब मिला कि नहीं भार्इ एक ही बिस्तर पर सोता हूं। करते क्या हो? धन्नासेठ ने जवाब दिया कि पैसा बनात हूं। इस पर गोर्की ने पूछा कि क्या टकसाल चलाते हो? उसने जवाब दिया कि मैं टकसाल नहीं, कारखानें व मिलें चलाता हूं। गोर्की ने पूछा कितना पैसा बनाते हो तो उसने कहा कि लाख रूपया। उसका क्या करते हो? और पैसा बनाता हूं। उसका क्या करते हो? और अधिक पैसा बनाता हूं। गोर्की ने जब फिर उससे सवाल किया कि उसका क्या करते हो त उस धन्ना सेठ ने कहा कि तुम पागल तो नहीं हो? इस गोर्की ने उस धन्नासेठ से कहा मुझे तो आप पागल नजर आते हैं। इसलिए यह कोर्इ खर्चा करने के लिए ही पैसा कमाते हों ऐसी बात नहीं है। यह एक विशष प्रकार के प्रणी हैं जो उस एक चक्र में फंसे हुए हैं और कुछ वह कर नहीं सकते। वह खर्चे के लिए ही पैसा कमाते हों, ऐसी बात मैं सिद्धांत रूप् से स्वीकार करने को तैयार नहीं हू। इसलिए केवल खर्चे पर सीमा बांध देने से समस्या हल नहीे होती। ................ अटल बिहारी बाजपेयी (जनसंघ): प्रस्ताव कितनी मात्रा में व्यावहारिक है, क्या कनून से यह संभव है या नहीं, कौन सी कठिनाइयां पेदा हेंगी, क्या उनका निराकरण किया जा सकता है? या नहीं किया जा सकता? यह सारी बातें समिति को सौंपी जा सकती है। प्रश्न यह है कि यह सदन इ बात को चाहता है या नहीं चाहता है कि हमारे देश में वेभव का, ऐश्वर्य का, अनाप-शनाप खर्चे का ठाठ-बाट का जो एक तरीका चल पड़ा है वह बंद होना चाहिये, गरीबी-अमीरी में बड़ी खार्इ है और वह खार्इ रोज बढ़ती जा रही है। भारत में आम आदमी अब अधिक प्रतीाा करने के लिए तैयार नहीं है। हमारे सामने आकांक्षाओं और अपेक्षाओं का बड़ा आलोड़न हो रहा है। गरीबी अमीरी का अंतर है वह खराब है वह कम होना चाहिये। अभी सोमानी जी गीता की बात कर रहे थे। महाभारत में कुंती ने कहा कि मेरे दिन निर्घनता में बीत रहे हैं यह मुझे इतना नहीं खलता जितना कि कौरवों के समृद्धि में दिन बीत रहे हैं। जब कुंती जैसी महिला के âदय में विषमता कसक सकती है तो भारत के आम आदमी पर वैभव के प्रदर्शन का क्या असर होता होगा यह हम सभी स्वीकार करेंगे, हमारे देश में वैभव का बड़े भौंड़े ढंग से प्रदर्शन होता है। उपभोग में संयम का जो हमारा आदर्श है उे राज्य कानून के जरिये किस प्रकार चरितार्थ करे इस पर विचार होना चाहिए। इस समय जो अर्थ संकट है उसमें यह करना ही पड़गा। उत्पादन में वृद्धि उपभोग में संयम, वितरण में औचित्य। कहा जाता है उपभोग में संयम तो उन्सेनिटव नहीं मिलेगा। हो सकता है कुछ लोग मुनाफे के लिए काम करें पर इससे बड़ी प्रेरणा क्या हो सकती है इस देश मेंं फैले अज्ञान, अभाव और बीमारी को दूर करने के लिये काम करें। जिन्हें यह प्रेरणा प्रेरित नहीं करती उनके लिये कानून का विचार करना होगा। इस देश के सेठ-पुजीपति अगर कौटी पर खरे नहीं उतरेंगे तो म्ैं चेतावनी देता हूं उनको देश का मानस जिस गति से बदल रहा है देखना चाहिये। अगर वह खुद अनुशासन संयम से नहीं रह सकते तो राज्य को कानून बना कर रखना होगा। प्रस्ताव में नियंत्रण पुरूषार्थ पर नहीं, आमदनी पर नहीं, फिजुल खर्ची पर है, नियंत्रण सस्ते ढ़ंग की शानशौकत पर है इस पर रोक लगाने का समय आ गया है। कमल नयन बजाज (कांग्रेस): यदि मुझे उधोगों को बढ़ाना है या इसकी जिम्मेदारी लेकर देश के निर्माण के काम के लिए आगे बढ़ाना है और बंबर्इ में रहना है तो वहां तीन कमरों के फ्ैट का किराया भी आज एक या दो हजार रूप्या महीना हो जाएगा। जब तक आप इस देश में ऐसी आर्थिक व्यवस्था नहीं कर देंगे कि जिनको तीन बेड रूम की जगह मिलनी चाहिय या जितनी भी जगह आप मुनासिब समझते हैं, मिलनी जरूरी है, उतनी मिल जाय और जिसकी कीमत आज पचास हजार रूप्या है वह दो हजार रू0 में मिलना चाहिए तब तक यह प्रस्ताव कार्यानिवत नहीं किया जा सकता। इस तरह की आर्थिक व्यवस्था हम को बनानी पड़ेगी जिसमें वैभव का प्रदर्शन करने वाला आदमी प्रतिष्ठा न पा सके। ऐसा वातावरण हमको समाज में पैदा करना होगा। आज लोग वैभव का प्रदर्शन क्यों करते हैं? इसलिए करते हैं कि उससे प्रतिष्ठा मिलती है। उसकी हम लोग तारीफ करते हैं, इसलिये वह खच्र करता है, नही ंतो वह कभी खच्र न करे। मोटरगाड़ी बंद कर देने से हमारी कुशलता कम होगी।........... एस0 कडडप्पन: जब डा0 लोहिया अपने प्रस्ताव के समर्थन में बोल रहे थे,मैं निशिचत तौर पर कह सकता हूं कि कुछ माननीय सदस्य सोच रहे होंगे कि वे सपनावादी हैं। मैं डा0 लोहिया के प्रस्ताव तथा उनके द्वारा व्यक्त विचारों का पूर्ण समर्थन करता हूं। अभी हमारे एक माननीय सदस्य ने कहा कि यदि एक डाक्टर के पस मोटर नहीं होगी तो वह धर्मसंकट में पड़ जाएगा और डा0 लोहिया कहते है। कि उनके पास निजी कार नहीं होना चाहिए। मुझे पूरा विश्वास है कि डा0 लोहिया के दिमाग में ऐसी बात नहीं होगी। एक क्षण के लिए मान भी लें कि यही मंशा होगी और हम अमेरिकी गेहूं से मुकित पा सकें तो देश खुशहाल होगा और विदेशों में प्रतिष्ठा बढ़ेगी।.......... इस सरकार को अपने को गांधी का अनुयायी कहते लज्जा आनी चाहिए। यह दु:ख की बात है कि जो गांधीजी का चेला बनने का दावा करते हैं वहींं सबसे ज्यादा ठाट-बाट से रहते हैं। ........... पिछली लोकसभा में जब डा0 लोहिया यह तथ्य दे रहे थे कि जो निचले तबके के लाग हैं उनकी आमदनी तीन आना रोज है तो तत्कालीन गृहमंत्री श्री नंदा ने इस पर सख्त एतराज किया ओर दूसरे दिन लोकसभा में उन्होंने बयान दि कि तीन आना गलत है बलिक निचले तबके के लोगों की आमदनी साढ़े सात आना रोज है। चाहे वह आमदनी साढ़े सात आने हो या एक रूप्या ही क्यों न हो, क्या आज की महंगार्इ में वह पर्याप्त है? इसलिए खर्चे पर सीमा बांधना आवश्यक है। हमारे देश में न्यूनतम और अधिकतम आमदनी में कोर्इ अनुपात नहीं है। अगर देखा जाय तो इस देश में अनुपा तें 100 से 1000 तक का अंतर है । न्यूनतम और अधिकतम आमदनी में अनुपात होना ही चाहिए, चाहे 1:10 का हो या 1:20 का या 1:30 इसमें मुझे कोर्इ एतराज नहीं है। जनता की भावना को सरकार समझे। मैं डा0 लोहिया के प्रस्ताव से पूर्णतया सहमत हूं। आंकड़ों में फरक पड़ सकता है। यदि आप चाहें तो अपने ही लोागों की कमेटी बन लें जो इस पर पूरी तरह से छानबीन करे।.......... पी0 राममूर्ति (सम्यवादी): हम लोग हर काम के लिए विशेषज्ञ बुलाते हैं यहां तक कि होटल उधोग के लिए भी। लेकिन हिंदुस्तान विदेशों को एक प्रकार का विशषज्ञ, चाहे जितनी संख्या में हों, विदेशों में उसका निर्यात कर सकता है। और वे हैं- टैस्क-चोर। टैक्स की चोरी करने में यहां का एक वर्ग विशेष दुनिया में अद्वितीय है। कांग्रेस पार्टी को डा0 लोहिया का प्रस्ताव बेहिचक मंजूर कर लेना चाहिए। क्योंकि अखिल भारतीय कांग्रेस कार्यकारिणी ने आय पर सीमा लगाने के लिए प्रस्ताव पास कर दिया है। जब आय पर सीमा बांधी जा सकती है तो खर्चे पर क्यों नहीं। डा0 लोहिया ने जो 1500 रू0 महीना सीमा बांधने केे लिए सुझाव रखा है वह बहुत ही उदार है। प्रस्ताव को स्वीकार किया जाना चाहिए।.... दिनकर देसार्इ: मैं डा0 लोहिया के प्रस्ताव का समर्थन करता हूं। कैमिब्रज यूनिवर्सिटी के प्रो0 कालदार ने भारत सरकार को टैक्स प्रणाली पर सुझाव देते हुए एक रिपोर्ट दी है। उसमें एक अध्याय खर्चे की सीमा पर भी है। प्रो. कालदार का कहना है कि भारत जैसे देश के लिए आवश्यक है कि वह खर्चे पर सीमा बांधे। साधारण जनता के पास इतना पेसा नहीं रहता कि वह संचय कर सके इसलिए अमीरों के खर्चे पर रोक लगानी चाहिए।......... इस देश की समस्या गरीबी नहीं है; हम लोगों ने गरीबी को वरण कर लिया है। यहां की मुख्य समस्या भुखमरी है। यहां की जनता भूख से व्याकुल है। एक तरफ भुखमरी है और दूरसी तरफ शान शौकत। जब तक यह सिथति बंद नहीं होगा हम लोग उन्नति नहीं कर सकते। केवल आर्थिक दृषिटकोण से ही नहीं बलिक सामाजिक दृषिटकोण से भी इस पर विचार होना चाहिए। अंत में मैं माननीय सदन को चेतावनी दे देना चाहता हूं। यदि वर्तमान सिथति बनी रहती है, एक ओर भुखमरी और दूसरी ओर शान शौकत, तो इस देश में खूनी क्रांति होगी। सदन को इसे नहीं भूलना चाहिए। यह इतिहास का एक क्रम है। जो चीन में हुआ यहां भी हो सकता है। मैं उपप्रधान मंत्रीजी से निवेदन करता हूं कि वे इस प्रस्ताव को स्वीकार कर लें। प्रस्ताव में दिये गये आंकड़ों से मतभेद हो सकता है, लेकिन कमेटी तो बननी ही चाएि। यह एक ऐसा मौलिक प्रश्न है जिसका संबंध देश की आर्थिक व्यवस्था ही नहीं बलिक सामाजिक व्यवस्था से भी है। रणधीर सिंह (कांग्रेस): मैं एक नया मेंबर हूं और जब से आया हूं कभी मैंने डा0 साहब को तेजा से उलझते देखा, कभी वह स्वेतलाना के लिय उलझते हैं, कभी ऐसी बात कह देते हैं जो उनके मेयार से कम होती है। मैं डा0 लोहिया की इस देश के बड़े-बड़े कांग्रेसी नेताओं जैसी इज्जत करता हूं, उतनी ही इज्जतर करता हूं बड़े दिमागदार आदमी है। पहली बार उनकी तरफ से नौइयत की बात आयी है जो देश में इनक्लाब का असर रखती है, जो देश में एक सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक न्याय की शक्ल लेकर रूनुमा होती है। मैं उनसे कहना चाहता हूं कि यह बात कहकर उन्होंनें न सिर्फ हमें बेदार किया है, बलिक मुल्क की सेवा की है और वह यह कि असल मुíा यह कि हर घर में चिराग जले, हर पेट में रोटी जाय, हर जिस्म पर कपड़ा हो, कोर्इ अनपढ़ न हो, कोर्इ बीमार न हो, हर गांव में सड़क जाय, हर गांव में बिजली हो, हर किसान के खेत में बिजली पहुंचे और हमारा देश एक आला मैयार जिंदगी हासिल कर सके। यह सामाजिक परिवर्तन की बात है और मैं कांगे्रस सोशलिस्ट होने के नाते, इसका स्वागत करता हूं। लेकिन एक बात मैं खास तोर पर कहना चाहूंगा कि इन्होंने जितनी बातें कहीं हैं उनमें बहुत सी अव्यवहारिक बातें कहीं गयी हैं। जैसे इन्होंनें कह दिया कि 30-40 लाख सरकारी नौकर फालतू हैं, आप तो दो दो आदमियों के पीछे लाठी लिये फिरते हैं, अगर 30-40 लाख को घर भेज दिया तो डा0 लोहिया क्या करेंगे।...... तेनेती विश्वनाथन: स्वतंत्र पार्टी के एक नौजवान सदस्य की जब मैं बात सुन रहा था तो लगा कि वह कुछ सही बात कहंगे लेकिन उनकी बातों से इसकी जानकारी मिली कि किस तरह से संपत्ति का एकत्रीकरण देश में हो रहा है। डा0 लोहिया ने खर्चे पर सीमा बांधने की बात कही है। यदि हमें तत्काल नहीं कर सकते तो इसके लिए एक कमेटी बैठा सकते हैं। संसद में सर्व सम्मति से व्यय कर का कानून पास हो चुका है क्या उस समय इसे व्यावहारिक समझा गया था? 1500 रू0 के ऊपर के खर्च पर शत प्रतिशत टैक्स लगा देना मुशिकल काम नहीं है। यदि मुझे और डा0 लोहिया को दो दिन का मौका दिया जाय तो हम लोग इस काम को कर देंगे। मैं समझता था कि वे 1500 रू0 की सीमा नहीं बांधेंगे बलिक कम कहेंगे, आज देश की क्या परिसिथति है? किवल कुछ लाख लोग ही 1500 रू0 महीना से ऊपर खर्च करते हैं। इसलिये इस प्रस्ताव के विपक्ष में जितनी भी दलीलें दी गयीं केवल कुछ लाख लोगों के लिए न कि करोड़ों शोषित और पीडिऋत के लिए। विदेशी शासन तो चले गये और उनका स्थान देशी शोषकों ने ले लिया सामाजिक क्रांति की जो एक धारा देश में बह रही है उसमें यह सहायक होगा और जो तरक्की पसंद ताकतें हैं उन्हें इससे बल मिलेगा। 1500 रू0 की सीमा बहुत ज्यादा है। आचार्य कृपलानी (स्वतंत्र): मैं बहुधा डा0 लोहिया से सहमत नहीं रहा हूं और उनके इस प्रस्ताव से भी सहमत नहीं हूं। यह एक बहुत ही खतरनाक प्रस्ताव है और यह अधार्मिक भी है। यदि अमीर लोग र्इमानारी से धंधा करें और कालाबाजारी न करें तो उनके पास पैसा बचेगा ही नहीं, जैसा कि पिलू मोदीने कहा कि इन्हें 130 प्रतिशत टैक्स देना पड़ता है। ये लोग इस तरह से पैसा कमायेंगे तो मेरा निशिचत मत है कि ये सभी नरककुण्ड में जाएंगे। क्राइस्ट ने सही कहा था कि अमीर के लिए स्वर्ग में जाना कठिन है। जबकि एक ऊँट सूर्इ की नोक में से गुजार सकता हैं उन्हें आप अपने ही जूष में पिसने क्यों नहीं देते और उन्हें बुरी तरह हमेशा नरक की आग में क्यों नहीं जलने देते? क्राइस्अ ने यह भी कहा कि स्वर्ग की बादशाहत गरीबों के लिए है, अमीरों के लिए नहीं ंमेरी समझ में नहीं आ रहा है कि डा0 लोहिया अमीरों को और अमीर ताि गरीबोें को और गरीब होने देने से क्यों रोक रहें हैं, जैसा कि इस सरकार के जरिये होता चला आ रहा है। मैं सरकार को बधार्इ देता हूं क्येंकि जब कभी मैं कठिनार्इ में फंसता हूं तो भगवान की प्रार्थना करने लगता हूं। जब जनता भूखों मर रही है, वे भगवान की प्रार्थना करेंगे। अमीर कभी भी भगवान की प्रार्थना नहीं करते यहां तक कि वे शैतान की भी नहीं पूजा करते। उन्हें न तो भगवान से मतलब है न शैतान स। गरीब आदमी हमेशा र्इश्वर को याद करेगा क्योंकि यह धार्मिक देश है धर्म को रखने के लिये मेरी समझ में गरीबी ही इस देश का सबसे बड़ा इलाज है।................ ........... इस देश में कोर्इ क्रांति नहीं हो रही है इससे मुझे कोर्इ आश्चर्य नहीं है। कलकत्ता शहर में ती लाख लोग बिना खाये मर गये, कुछ ही महीनों में, जबकि शहर में अन्न के गोदाम भरे पड़े थे। उन्होंने मरना पसंद किया? हाथ भी नहीं उठाया, हिंसा भी नहीं की। ऐसी यहां की जनता है। हम लोगों ने उन्हें इतना कुचल दिया है कि कभी भी ये क्रांति की बात सोच ही नहीं सकते। उनके मन में नफरत पैदा नहीं होती। मैं किसी प्रकार की भी समिति बनाने के विरोध में हूं।........... उप-प्रधान मंत्री तथा वित्त मंत्री: मोरारजी देसार्इ: उपाध्यक्ष महोदय, जो प्रस्ताव डा0 राममनोहर लोहिया ने रखा है वह तो उन्होंने जनरल बजट की सामान्य चर्चा के दौरान फरमाया था और आज फिर उसी को अपने इस प्रस्ताव में फरमाया है। तभी मैंने कहा था कि उनकी वह बात ठीक नहीं है। '' डा0 लोहिया का कहना है, यदि मासि 1500 रू0 से ऊपर की तनखाहों और खर्चों में कटौती की जाए तो एक हजार करोड़ बचाया जा सकता है। मुझे नहीं मालूम कि ये आंकड़े उन्हें कहां से मिले हैं। यदि ऐसा किया भी जाए तो मात्र 25 करोड़ रूप्या बचाया जा सकता है। डसी समय डा0 राममनोहर लोहिया ने मुझे टोक कर बीच में सवाल पूछा और उन्होंनें कहा कि यह बिल्कुल गलत बात है। तब मैंने कहा था कि अगर डा0 साहब की इच्छा हो तो मैं उनके साथ इस पर चर्चा करने के लिए राजी हूं। अगर मेरी बात गलत हो तो मैं समझने के लिए भी राजी हूं। इसी हिसाब से यह प्रस्ताव आज ले आये हैं। मैं तो आशा करता था कि वह मेरे साथ चर्चा करेंगे और मुझे कुछ सिखायेंगे। मगर ऐसी चर्चा का उनको ज्यादा शौक है:........ मननीय सदस्य: क्योंकि जनतंत्र है। मेरारजी देसार्इ: आज यहां आये। जनतंत्र है मैंने मान लिया मैंन कोर्इ नहीं कहा। जनतंत्र को जितना मैं मानता हूं उतना डा0 साहब नहीं मानते हैं क्योंकि उतना वह मानते तो कभी, जितनी दखल वह याहं करते हैं उतनी दखल करते नहीं। रविराय: दखल देना भी प्रजातंत्र है मेरारजी देसार्इ: ठीक है वह भी उस तरीके से करना चाहिए अपने तरीके से नहींं । उसका भी विधान है। राममनोहर लोहिया: अब सोमवार को आप से तरीका सीखने के लिये आयेंगे। मेरारजी देसार्इ: मैं कोर्इ तरीका सिखा नहीं सकता। मैं कभी आपको सिखा नहीं सकता। इतनी जुर्रत मेरे पास है नहीं और मूर्खता भी नहीं है। अब डाक्टर साहब की जो भावना है, जो आदर्श है, उनके साथ मैं बिल्क्ुल सहमत हूं। इस देश में फिजूल खर्ची न हो, इस देश में हर एक को पूरा पूरा खाना मिले, कपड़ा मिले, घर रहने को मिले, शिक्षा मिले ताकि हर एक बादमी अच्छी जिंदगी बसर कर सके। मैं भी यह चाहता हूं कि जितनी जल्दी हो सके व्यवहार के लिहाज से जितनी जल्दी संीाव हो, इस देश मं किसी के पास भी बड़ी पूंजी न रहे ओर हर एक को कम से कम अच्छी रिहाइस के लिए जितने साधन मिलने चाहिए काम करने के साथ उतने उनको मिलने चाहिए। ऐसी हालत मैं देखना चाहता हूं। अगर उसका तरीका डा. साहब को लगता है कि होता है। मुझे लगता है कि नहीं होता है।हो सकता है कि मेरी समझ बहुत कच्ची हो और मैं बहुत दूर तक न देख सकता हूं जितनी दूर कि वह देख सकते हों। परंतु आखिर तो मुझे जो सूझता है मैं वही तो कर सकता हूं, यहां बैठ करके। उसने ज्यादा तो मैं नहीे कर सकता। मैं उनके दिमाग से काम चलाऊँ तो मेरे जैसा बेवकूफ कौन बनेगा? अगर मेरे हिसाब से वह चलेंगे तो वह भी बेवकूफ बनेंगे। इसलिए हर एक को दूसरे की अक्ल का फायदा उठाना चाहिए मगर उस अक्ल को लेकर तो नहीं चलना चाहिए व तो एपनी अक्ल से ही चलना चाहिए। इसलिए मैं कहता हूं, बड़े अदब के साथ कहता हूं, मैं कोर्इ मजाक नहीं करता क्योंकि मजाक करने का सवाल नहीं है। जिस भावना और जिस आदर्श को लेकर वह प्रस्ताव लाये हैं मैं उसका कभी मजाक नहीं कर सकता क्योंकि वह भावना बहुत ऊँची है और मैं उसे मानता भी हूं मगर मैं सिर्फ ख्याली दुनिया में नहीे जाता। ख्याली दुनिया, ख्याली पुलाव भी खिलाने की बात मैं नहीं मानता। ख्याली पुलाव पकाने के लिए मुझे कोर्इ कहे कि किसी के सुपुर्द करूं तो मैं कैसे कर सकता हूं? ऐसे ही एक कमेटी बनाने का काम है। इसलिए मैं उसे कैसे कबूल करूँ? उसमें कुछ अच्छा निकल सकता है ऐसा लग तो मैं जरूर करूँ? हां हमारे बुहुर्ग कृपलानी जी ने अपनी अनोखी शैली में जो कहना था वह कहा, जितनी गालियां देनी थीं राज्य को, वह दीं, क्योंकि वह चाहते थे। उससे मुझे कोर्इ नाराजगी नहीं है, क्योंकि यह तो हर रोज सुनने में आती है। और अगर इससे मैं उनको खुश कर सकता हूं कि उनकी बात मान लूं, तो क्यों न करूँ? उन्होंने कहा कि कमेटी नहीं बनानी चाहिए। इससे वह खुश होंगे इसलिये मैं स्वीकार कर लेता हूं। फिर उनका इरादा कोर्इ भी क्यों न हो। उनका इरादा मुझे कहीं भेजने का हो, दोजख में भीेजने का हो जहन्नुम में भेजने का हो, जहां भी भेजना हो, लेकिन अगर इससे उनकी खुशी होती हो तो मैं खुशी से चला जाऊँगा। इसमें मुझे कोर्इ नाराजगी नहीं। आचार्य कृपलानी: आप तो साहूकार नहीं है। मोरारजी देसार्इ: राज्य नहीं करन चाहता है। साहूकार का सवाल नहीं है। राज्य एसी हालत में नहीं रखना चाहता है। राममनोहर लोहिया: कहने पर क्यों जाओ, अच्छा है वैसे ही जाओ। मोरारजी देसार्इ: वैसे जहां जाना है वहां जाउंगा। आपकी मर्जी क्यों ढूंढूंगा? आप की सरदारी जिन्होनें मानी है वह जायेंगे जहां जाना होगा, मैं क्यों जाऊँ आपके कहने से?...... मैं तो चाहता हूं कि सब स्वर्ग जायें। मैं नहीं चाहता कोर्इ नर्क में जाये। मैं क्यों चाहूंगा? आचार्य कृपलानी: मैंने कभी नहीं कहा कि वित्तमंत्री जहन्नुम में जाएं। मैं नहीं सोचता कि वे अमीर व्यकित हैं। मैं केवल अमीरों और पूंजीपतियों के बारे में कह रहा था जो गैरकानूनी ढंग से पैसा इकटठा करते हैं। मोरारजी देसाइ: हो सकता है कि मैं न समझा होऊँ। मैं कबूल करता हूं, मैं उनकी बात मान लेता हूं कि उनका इरादा नहीं था। उन्होने मेरे लिए नहीं कहा था, कांग्रेस के लिये कहा, राज्य के लिए कहा, जो राज्य चलाते हैं उनके लिये कहा। मैं भी तो उसका हिस्सा हूं। में उसमें आ जाता हूं। मैं इससे कैसे इंकार करूँ? आचार्य कृपलानी: कांग्रस को भी मैं नहीं कहा। मैंने पूंजीपतियों को कहा। मैं तो सोमानी और मोदी को कह रहा था। मोरारजी देसार्इ: इसमें कोर्इ शक नहीं है कि अगर दोनों में कोर्इ पसंद करना हो, स्वर्ग में गरीबी मिलती हो और दोजख में पैसा मिलता हो, तो यह सब भार्इ दोजख पसंद करेंगे। यह कभी स्वर्ग पसंद नहीं करेंगे। इसको मैं जानता हूं, मैं इससे इंकार नहीं कर सकता। मगर मुझे कबूल है कि आखिर उन्हें जो पसंद करना हो वह कर लें। इससे मैं क्यों झगड़ा करूं? हमें कराना है हमें यह देखना चाहिए। हम चाहते हैं किइस देश में हमारा समाज ऐसा बने जिसमें ऐसी हालत न हो, फिजूलखर्ची न हो, वैभव का प्रदर्शन न हो। यह मैं जरूर चाहता हूं। मगर जिस तरीके से कहा गया उस तरीके से कैसे होगा? यह मेरी समझ में नहीं आता। इसलिए मैं कुछ बातें रखना चाहता हूं कि मैं क्यों ऐसा मानता हूं। पहले तो प्रस्ताव में कहा गया, जिसके लिए श्री राममूर्ति ने कहा था कि यह व्यकितगत मासिक आय है जो कि 1500 रू0 होनी चाहिये या कि एक कुटुम्ब की। अगर व्यकितगत आय है तब तो कुटुम्ब की आय बहुत ज्यादा हो जाती है। मैं मानता हूं कि कुटुंब के लिए कहा गया है। एक व्यकित के लिए नहीं कहा गया। प्रति कुटुंब 18 हजार रू0 सलाना होना चाहिए, ऐसा डा0 लोहिया का मन्तव्य है। रवि राय: यह तो आप मान लीजिये। मोरारजी देसार्इ: वह मैं क्यों मानूंगा। यह तो कभी भी नहीं करना चाहिए अगर आप मान सकते हैं, आपकी अक्ल वहां जाये तो मैं क्या करूंगा? मैं आपकी अक्ल दुरूस्त नहीं करना चाहता। रखिये जो आप के पास पड़ी है। रवि राय: आप भी थोड़ी सी ले लीजिये। मोरारजी देसार्इ: मैं ले लूंगा तो फिर आप के पास कुछ नहीं रह जायेगा। रवि राय: हम देते रहेंगे। एक माननीय सदस्य: आप विषय पर बोलिये। मोरारजी देसार्इ: विषय पर ही बोल रहा हूं। जो वह कह रहे हैं उसका जवाब दे रहा हूं, नही ंतो न बोलें। जो बोलेगा पवाब मिलेगा। अब सवाल यह है कि कितने लोग हैं जिनसे एक हजार करोड़ रूपया मिल सकेगा, जैसे कि डा0 लोहिया ने कहा? हमारे यहां 26 लाख लोग आय कर देते हैं ओर उनमें से 25 लाख लोगों की आमदनी 40 हजार से नीचे है। जिसकी 40 हजार की आमदनी है उसके पास 18,000 रू0 खर्च के लिए रह जाता है। इतना उसके पस रहता है इसलिे 40,000 कहता हूं। जो बाकी रह जाते हैं उनमें 30,000 कंपनियां हैं और 23 हजार फर्म हैं। बाकी 22,700 लोग रह जाते हैं। उनमें से करीब 20,000 लोग ऐसे हैं जिनकी आमदनी 40,000 और 1 लाख के बीच में है। 1 लाख की आमदनी के ऊपर के लोग 2700 है। इतने लोग है जिनके पास 8,000 रू0 छोड़ कर बाकी पैसा ले लिया जाये तो 1,000 करोड़ कहां से मिलेगा यह मेरी समझ में नहीं आता। आज हम 1 लख से ऊपर की आमदनी वालों के पास सिर्फ 8,000 रू0 ही तो रखते हैं, बाकी सारा ले लेते हैं। इसलिये जो मिलेगा वह 8,000 ही तो मिलेगा। इससे ज्यादा लेने से ज्यादा तो मिल नहीं सकता। यह सारा हिसाब निकालने के बाद अगर गणित शास्त्र के हिसाब से मिलाया जाये तो 40,000 और 1 लाख की आमदनी के बीच के जो लोग हैं उनके पास 18,000 छोड़ कर बाकी सारा ले लिया जाये तो जो लेते हैं उससे जयादा से ज्यादा 34 करोड़ रूप्या और मिलेगा बाकी जो 2700 लोग रहे उनसे 15 करोड़ से ज्यादा नहीं मिलता। इस तरह से कुल मिलाकर 50 करोड़ भी पूरा नहीं मिलता। डा0 लोहिया ने 1,000 करोड़ कहा। इतना ही नहीं कहा, यह भी कहा कि शायद यह कम बतला रहा हूं हो सकता है 1500 करोड़ मिल जाये। मगर यह तो सिर्फ जो लोग आय कर देते हैं उनका हिसाब हुआ। कुछ काश्तकार भी ऐसे होंगे जिनकी आमदनी इतनी हो, हालांकि ऐसे बहुत लोग नहीं हैं काश्तकारों में जिनकी आमदनी 40,000 से ज्यादा हो। बहुत थोडे़ होंगे। मैं नहीं जानता कि उनसे 2 या 4 करोड़ रू0 से ज्यादा मिल सकता है, अगर मिले भी तो। मगर कहां 1,000 करोड़ और कहां यह राशि। ऐसा समढे कि यदि मिल जायेगा तब भी इतना ही होता है। अगर ज्यादा हो सकता है तो हम जरूर लेंगे। फिर 26 हजार रू0 के खर्च के ऊपर यहां एक एक्सपेनिडचर टैक्स भी लगाया गया है। पहले लगाया गया, फिर निकाला गया, फिर लगाया गया, फिर निकाला गया। क्यों निकाला? इसलिये कि इसमें और भी ज्यादा चोरी बढ़ती गर्इ। किसी का फायदा हुआ नहीं। जिस समाज में हम रहते हैं, उसमें ही हमं रहना है। उसको हम एकदम से फरिश्ता नहीं बना सकते। उसको और भी खराब करना राज्य या समाज का काम नहीं है। इसलिये इसके दूसरे रास्ते ढूंढने चाहिये, और दूसरे रास्ते भी हैं। नहीं हैं, ऐसा मैं नहीं मानता हूंं। लेकिन एकदम से वह रास्ता लाने से काम नहीं चलता। उससे ऊपर भी हमें देखना होगा। नहीं देखना होगा, ऐसा मैं नहीं मानता। मग इस तरीके सेक यह काम करने से काम होगा नहीं। बाकी बात रही इन्सेनिटव की । हमारे जवान संसद सदस्य श्री सोमानी ने जो कहा उसको मैं पसंद जरूर नहीं करता। जिस भाषा में उन्होने कहा वह अच्छा नहीं था क्योंकि इस तरीके से कहने से कोर्इ फायदा नहीं होता। मगर वह इसलिये कहते हैं मानो उनको अपना ही बचाव करना है। इसमें से उनको लगा कि कहीं अगर ऐसा हो गया तो क्या होगा। एक दिन तो होना ही है। यानी इस तरह की आमदनी और इस तरह की पूंजी रहेगी नहीं, ऐसा मैं मानता हूं। एक माननीय सदस्य: आप सबकी आमदनी बढ़ाने की चेष्टा करें। मोरारजी देसार्इ: आमदनी बढ़ानी है, लेकिन जो भूखे मरते हैं उनकी आमदनी पहले बढ़ानी होगी। आज जो इन्सेनिटव देना है वह इसीलिये देना है, क्यांकि बराबरी नहीं है। आखिर कुछ पैसा उनके पास भी रहना चाहिये। उन्हें भी कमाना है और हमें उनसे टैक्स लेना है। अगर 100 फीसदी उनसे हम टैक्स ले लेंगे तो कोर्इ कमायेगा क्या? कोर्इ सन्यासी नहीं है। सन्यासी किसी को हम बना भी नहीं सकते। यहां डा0 लोहि भी संन्यासी नहीं बने हुए हैं। वह कहते हैं कि हमारे उपनिषदकारों ने, ऋषियों और मुनियों ने हमें भोग का संयम सिखया। माक्र्स ने भी संपत्ति का संयम सिखाया। कितने लोग सीखे यह मैं पूछना चाहता हूं। राममनोहर लोहिया: दोनों मिलाओ तब काम चलेगा। मोरारजी देसार्इ: एक से नहीं सीखा है तो दोनों से कहां सीखेंगे। डाक्टर साहब बड़े महत्वाकांक्षी हो सकते हैं, वह बहुत ऊँचा उठने की लालसा रख सकते हैं, वह इतने बड़े होना चाह सकते हैं कि पैगंबर बन जाएं। वह बड़े बनें, मैं बहुत राजी होऊँगा।........ राममनोहर लोहिया: मैं ना-चीज हूं, रास्ता सिर्फ दिखा रहा हूं.........मोरारजी देसार्इ: बड़े लोग जो होते हैं वे अपने आप को नाचीज ही मानते हैं। यह उनकी नम्रता है। राममनोहर लोहिया: क्या हमेशा पैगंबर बनने की बात कहा करते हो? मोरारजी देसार्इ: पैगंबर बनेंगे तो मैं आपकी पूजा करूंगा। लेकिन आज आप नहीं हैं। मधु लिमये: आप बनें। मोरारजी देसार्इ: मैंने कभी नहीे सोचा कि मैं पैगंबर हूं। डा0 साहब क्रांतिकारी बनना चाहते हैं, यह मैं समझ लेता हूं, यह मैं कह देता हूं। नया कायदा लाना चाहते हैं, नइ्र चीज लाना चाहते हैं, यही मैं मान लेता हूं। शब्दों के साथ क्यों झगड़ा करते हैं । मैंने कोर्इ अपमान करने की नियत से नहीं कहा था। मैं कहता हूं किवह महत्वाकां़क्षी हैं और जरूर हैंें। नर्इ दुनिया बनाना चाहते हैं और ऐसी नर्इ दुनिया जिसके बारे में कोर्इ और नहीं सोचता है। जरूर नर्इ दुनिया वह बनयें। मैं न नहीं करता हूं। लेकिन इस तरीके से वह कभी नहीं बनेगी। इसलिए मैं कह रहा हूं कि जो शकित उनमें हैं उसको वह एसे कामों में लगायें जो व्यावहारिक काम हैं। ख्वाबोें की दुनिरया में वह न रहें। व्यावहारिक वह बनें तो जयादा फायदा होगा और उनकी शकित का सदुपयोग भी होगा। यही मेरा कहना है, इससे ज्यादा कुछ नहीं कहना है। प्रेरणा की बात भी यहां कही गर्इ है। हम चाहते हैं कि हम फिजूलखर्ची को कम कर सकें और भोग पर संयम लगे। लेकिन मैं पूछता हूं कि कौन भोग से बचा है, डाक्टर साहब बचे हैं या मैं बचा हूं, कौन बचा है। हमस ब पर चह चीज लागू होती है। लेकिन सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली वाली बात नहीं होनी चाहिए। ऐसी बातें करने से काम नहीं होता है। जब हमारी यह आस्था है तो हम दूसरों के पास जाकर उनसे संयम नहीं करवा सकते हैं। भोग पर संयम लगवाना चाहते हैं, जरूर लगवायें। महात्मा गांधी ने भी कर्इ लोगों से करवाना चाहा था। लेकिन बहुत कम लोगों ने किया था। यही दुनिया की तारीख हें संयम करेंगे तो लोग अपने आप करेंगे। जबर्दस्ती आप नहीं करवा सकते हैं। समाज में यह ठीक है कि कानून की भी जरूरत होती है। कानून से कुछ भी हो सकता है। लेकिन जितना वह समझते हैं कि कानून की सहायत से हो सकता है उतना नहीं हो सकता है। आखिर आदमी पैसा कमाता है तो खच्र करना भी चाहेगा। खर्च करना नहीं चारहेगा ऐसी बात नहीं है। पैसा वह अपने परिवार के लिए रखना भी चाहेगा, दरेने के लिए भी पैसा कमाना चाहेगा। खैरात देने के लिए भी वह पैसा चाहता है जिससे उसका बड़प्पन जाहिर हो, उसका नाम हो। सारा अपने उप नही खर्च करना वह चाहेगा, यह भी हो सकता है। पैसा वह कमाये उसको वह खर्च करना चाहिये अपने पर और अपने बच्चों पर और उसको आप रोकना चाहें तो रोक सकते हैं लेकिन इस तरह से न रोंकें कि वह काम करना भी बंद कर दे, काम भी रूक जाए और संपत्ति पैदा ही न हो। जब संपत्ति पैदा ही नहीं होगी तो क्या बाटेंगे, उसको भी तो सोचना चाहिये। डाक्टर साहब ने कहा कि एक करोड़ सरकारी नौकर हैं, जरूर हैं। लेकिन एक करोड़ में से अठारह हजार के ऊपर आमदनी वाले कितने लोग हैं? मैं मानता हूं कि दस हजार नहीं तो बारह हजार होंगे। इससे अधिक नहीं है।................ एन. अमरेस: आपका कानून ऐसा कहता है। मोरारजी देसार्इ: कानून तो है लेकिन कानून करेक्ट नहीं करता है। जो कानून तोड़ने वाले हैं वे ही ऐसा कहते हैं। जो लोग लोकशाही को मानते हैं उनका फर्ज है किवे कानून को कैसा भी वह हो, मानें और उसको तोड़ना हो तो खुले तोर से तोड़ें और सजा को सहन करेंं चोरी से काम अगर होता है, चोरी से अगर पैसा पैदा किया जाता है तो उसको कोर्इ बरदास्त नहीं करेगा। यह कहा जाता है कि चोर नहीें पकड़े जाते हैं। पकड़े गए तो चोर नहीं पकड़े गए तो सहूकार। लेकिन एक न एक दिन तो पकड़े ही जाते हैं । नहीं पकड़े जाते हैं ऐसी बात नहीें है समाज और राज्य का काम है कि वह इनको ठीक करें। ठीक करने के लिए हमें ठीक तरीके से इंतजाम करना पड़ेगा । कमेटी बना देने से काम नहीं चलेगा। उसमें से कुछ नहीं निकलेगा। एक मोनोपोली कमीशन बना था। पांच साल हो गए है, अभी भी उसकी रिपोर्ट नहीं आर्इ है। पीलु मोदी: तनख्वाह खाते हैं। मोरारजी देसार्इ: तनख्वाह खाने की बात नहीं है। तनख्वाह आप पाते हैं, वे नहीं। तनख्वाह का काम आपके सुपुर्द कर दिया गया है। इसीलिए आप करम करते हैं वे नहीं। यही सवाल है कि बोल सकते हैं लेकिन समझ नहीं सकते हैंं वही डाक्टर लोहिया कहते हैंं दुरूस्त करना चाहते हैं लेकिन वे दुरूस्त नहीं होते हैं। पास बैठकर वह भी देखते हैं फिर भी मुझे कहते हैं कि कमेटी मान लो। कैसे मान लूं? इसीलिए कमेटी की बात नहीं मान सकता हूं। मैंने पहलीे कहा है कि ख्वाबी पुलाव पकाने के लिए मैं किसी को भी नहीं कहूंगा। राममनोहर लोहिया: मुझे खुशी है कि तीन हप्ते में वित्त मंत्री जी पचीस करोड़ से पचास करोड़ तक पहुंचे। जब पहले बोले थे तब कहा गया था कि सिर्फ पचीस करोड़ आज बोले तो कहते हैं कि पचास से साठ करोड़ बचेंगे। इस रफ्तार से कहते रहे तो छ: महीनें में मेरी जगह पर पहुंच जायेंगे। मोरारजी देसार्इ: मैंने कहा है कि ज्यादा से ज्यादा ज्यादा करोड़ । लेकिन आप उसको पकड़ न लें। यह सब कुछ किया जाए तो शायद हो सकता है। राममनोहर लोहिया: जब कभी गर्दन आपकी पकड़ में आ जाए तो चिल्लाया कम करो। गर्दन पकड़ी गर्इ है इस वक्त थोड़ी सी आपकी। इसलिए मैं बता रहा हूं कि पचास करोड़ पर आज आप पहुंचे हैं और सोमवार को जब आपकी और हमारी बात होगी तो शायद तीन सौ करोड़, तक पहुंच जाओगे। मैं हजार डेढ़ हजार करोड़ कहना चाहता हूं। मैं सब आंकड़े दे चुका हूं। अब मैं ज्यादा वक्त खराब करना नहीं चाहता हूंं मैं खाली एक बात कहना चाहता हूं। यह बात मैं राममूर्ति जी को और शर्मा जी को कहना चाहता हूं। मैं ने जानबूझ कर खर्चा कम करने को कहा हैं इसलिए कहा है कि बहुत से नोकर शाह और मंत्री लोग तनख्वाह पाते हैं तीन हजार चार हजार रूप्या महीने की लेकिन सुविधायें उनकी होती हैं, दस हजार, पचास हजार, अस्सी हजार और एक लाख रूप्ये की। आप अच्छी तरह से समझ लो कि जब मैं खर्चा कहता हूं तू तो मेरा मतलब तनख्वाह ओर सुविधाओं दोनों से है। हमारा भारत सुविधाओं का देश है। संसार में सर्वश्रेष्ठ सुविधाओं का देश है। मैंने अपनी सुविधायें खुद गिनार्इ है। मैं जानता हूं कि सुविधाये ंआसानी से नहीं छोड़ी जा सकती है। विधि और कानून पस हो जाएगा तो ये सुविधायें हम सब को छोड़नी पड़ेगी। इसलिए खर्चे के मामले मे बात साफ हो जानी चाहिये। मेरा मतलब सुविधाओं से है तनख्वाह से है। और जन लोगों ने यहां पर कहा है कि आमदनी के ऊपर अंकुश, तो बिल्कुल साफ बात है कि जो पंद्रह सौ रूप्ये मिलन है वह कुटुंब पीछे मिलेगा, व्यकित के पीछे नहीं। यह राशि कुटुंब के पीछे खर्च करने को मिलेगी। इससे कोर्इ तिजोरियां नहीं भरती जायेंगी। मैंने पहले ही भाषण में कह दिया था कि ज्यादा से ज्यादा संतान व्रैरह की प्ररणा के लिए एक आदमी को पांच सौ रूप्या या हजार रूप्या महीना दे दिया करो तो अलग बात है। इसका साफ मतलब होता है कि आमदनी करके अप्रत्यक्ष रूप से अपने पास रखन की इस प्रस्ताव में कोर्इ गुंजाइश नहीं है। हमारे कम्युनिस्ट भार्इ समझने में गलती न करें। मैं एक बात साफ कह देना चाहता हूं कि मैं उन राष्ट्रयकरण को नहीं चाहता हूं जिसके अंदर अफसर लोग तीन हजार दो हजार या एक हजार तनख्वाह लें लेकिन पचास हजार की सुविधाएं हैं। अब राष्ट्रीयकरण जिन कारखानों का हो गया है वे निजी कारखानों की तरह से ही चलते हैं। इसलिए मैंने यहां पर खर्च शब्द का प्रयोग किया है। सोमानी जी ने अपने विचार यहां पर आज रखे हैं । अप जातने हैं कि मै बहुत अपने उपर संयम करता हूं। मिंक कोट और हीरों वगैरह की चर्चा हुर्इ है। मैं बिल्कुल साफ बात आपके सामने रखना चाहता हूं। नौकरशाहों में और नगरसेठों में तो सदा सर्वदा का, सदियों का शताबिदयों का संबंध चलता आया ळै। इसलिए उनको यह बात क्यां नहीं अखरेगी। बड़ी अखरेगी। मैं प्रेरणा की बात भी सुनी है। मुझको गुस्सा साधारण तौर पर नहीं आता है। लेकिन मैं इसका उत्तर देना चाहता हूंंं। मोरारजी भार्इ ने अभी बताया है कि एक लाख आदमी। मान लो बीस लाख आदमी हैं, मेरे पंद्रह सौ के हिसाब से। मैं आज बहुत ही डंडे दिल से कहना चाहता हूं कि अगर ये बीस लाख आदमी बिल्कुल खत्म हो जाएं, संसार में न रहें, उनकी प्ररणा से भारत को कोर्इ लाभ न मिले तो भारत कहीं ज्यादा अच्छा हो जाएगा। इन आदमियों की कोर्इ जरूरत नहीं है। ये प्रेरणा की जो बात करते हैं, उनकी जरूरत नहीं है। बीस लाख बादमी अगर खाली पैसा खाकर और खर्च करके ही प्रेरणा पाते हैं तो जितनी जल्दी दुनिया से इनका नामोनिशान मिटे अच्छा है। आखिर हैं तो बीस लाख ही। इसे ज्यादा नहीं है और इसलिए मैं चाहता हूं कि कभी सोचें जो 50 करोड़ में से बाकी 20 लाख घटाने से बचते हैं 49 करोड़ 80 लाख, उनकी प्रेरणा की बात भी तो सोचें। 50 करोड़ की या 49 करोड़ 50 लाख की प्रेरणाओं की बात नहीं सोचने। जो पंद्रह सौ या चार सौ या दो सौ या आठ आने या चार आने या दो आने वाले हैं उनकी प्रेरणाओं की बात भी तो सोचनी चाहिए। ओर इसीलिए जब हीरों की चर्चा करते हैं, मैं नाम नहीं लूंगा, मेरे घर स्वतंत्र वाले भी आये हैं और उन्होंने बताया है, बहुत बढि़या बात बतार्इ है कि अपने देश में 6 हजार करोड़ रूप्ये की तो चाँदी जमा है और 4 हजार करोड़ रूप्ये का सोना जमा है और हीरा कितने का है............ व्यवधान मैं बताता हूं कि हीरे के साथ जो चीजें हैं वह मिला करके 15 हजार करोड़ रूपये का माल जमा है। जरा सोचें उसकी तरफ। बेमतलब माल जमा हुआ पड़ा है। मैं चाहता हूं कि भारत में विधि और कानून के जरिये ऐसी व्यवस्था और ऐसी संस्था कायम कर दें कि इस पंद्रह हजार करोड़ रूपये की चांदी के रूप में सोने के रूप में या हीरे के रूप् में.......व्यवधान अब सोमानी जी अलबत्ता उस हीरे का दूसरा उनयोग करना चाहेंगे, उनके और लोग भी दूसरा उपयोग कर रहे हैं। सुना है 60 हजार डालर यानी चार-पांच लाख रूपये खर्च करके न्यूयार्क टाइम्स का स्पेशल सप्लीमेंट निकलवाने में भी उसका उपयोग करते रहते हैं। मुझे बहुत ज्यादा चिढ़ाया मत करो। नगर सेठों और नौकरशाहों का यह जमाना अब खत्म हो गया है। व्यवधान अब देखिए अध्यक्ष महोदय, अब जरा बातें कुछ मजे की आ रही हैं। मैं जल्दी कर रहा हूं। अब इसलिए क्योंकि कुछ बातें गलतफहमी पैदा कर सकती हैं, डाक्टर सुशीला नायर वाली बात खास तौर से और औरों ने भी उसको यहां दोहराया है, जैसे कि मैं कोर्इ लोगों को बरखास्त करना चाहता हूं, 20 लाख सरकारी नौकरों को बरखास्त करा देना चाहता हूं। यह बात मैंने नहीं कही थी। मैंने कहा था कि इनको कलम घिस्सू कामों से हटा करके उपजाऊ कामों में जगाओ चाहे वह खेती के हों, सिंचार्इ के हों, कारखाने के हों, कलम घिस्सू कामेां से हटाओ तो मेहरबानी करके........... सुशील नायर: लोहिया साह तनख्वाह कैसे बचेगी? आपने कहा कि सवा सौ के हिसाब से इतने करोड़ बच जायेंग वह कैसे बचेंगे? राममनोहर लोहिया: अ बतनख्वाह तो बच ही गर्इ। मुशिकल यह है सुशीला जी कि उतना आप को समझने में बहुत ज्यादा वक्त लग जायगा। वह तो बच ही गर्इ । जो गर-जरूरी फिजूल कलम घिस्सू काम करते रहेंगे तो वह रूपया तो बरबाद जा रहा है और वह उपजाऊ काम में लग जायेंगे तो ज्यादा पैदावार होगी। सुशीला जी आप विजय लक्ष्मी जी के साथ बैठी हुर्इ हैं, उनसे बात कर लीजिए। विजय लक्ष्मी जी, आप उनको समझा दें।... व्यवधान समझा दिया न? क्योंकि यह बहुत बड़ी गलतफहमी हो जाती है और मेरा नुकसान वैसे भी देश में बहुत होता है। और इसलिए वह जो 3 हजार औरतें निकाली गर्इ हैं मुझे इस बात का बड़ा अफसोस है और खास तौर से अुसोस इस बात का है कि सबसे पहले चक्र औरतों पर चला न कि मर्दोुं पर। सुशीला नायर: सिखाइए उनको जरा। राममनोहर लोहिया: लोगों ने कहा कि कुछ अपनी सरकारों में कुछ करके दिखाओ। पहली बात तो यह है कि मेरी सरकार है नहीं । मेरी सरकार तो जब या तो श्री मोराजी मेरे शिष्य बनें तब होगी और या यह लोग वहां पहुंचे। इसके अलावा तो मेरी सरकार होन वाली नहीं है। और क्या तरीका कोर्इ तीसरा बता रहे हो मोरारजी भार्इ? नहीं न? तो सरकार तो मेरी है नहीं। लेकिन फिर भी मैं आप को बताऊँ कि मेरे जितने भी मंत्री है जिनपर मेर थोड़ा भी असर चलता है मैं उनसे कहा करता हूं कि पुलिस वाले तुम्हारे साथ चलते हैं, पहरा देते हैं किसी दूसरी जगह जब तुम जाते हो तो वह तुमको सलामी देते हैं, क्या तुम लंगूर बनना चाहते हो? यह मैंने कर्इ दफा भाषणों में कहा है और मुझे यह कहते हुए खुशी है कि हमारे यहां के कर्इ मंत्रियों ने पुलिस का संपर्क छोड़ दिया है। मैं कइयों को मोटरों के संपर्क से भी थोड़ा बहुत अलग करवा प्या हूं और उसके साथ साथ कुछ ऐसी चीजें भी करवार्इ हैं............ सुशील नायर: थोड़ा औरतों को बचाइए....... व्यवधान। राममनोहर लोहिया: अब आप कह ंतो औरत बन जाऊँ और क्या करूँ? एक गलती बड़ी भारी यह हो जाती है कि दो तरह के हिसाब ऐ साथ चलते रहते हैं। मोरारजी भार्इ समझते हैं कि एक लाख में से सिर्फ 8 हजार रूपया बचता है एक लाख के बाद वाली सीढ़ी पर जब आमदनी कर लगता है लेकिन इधर दूसरी तरफ से, मैं यहां वालों में से किसी का नम नहीं लूंगा, यह लोग मुझको बताते हैं कि कागज के ऊपर तो 8 हजार बचता है लेकिन असलियत में 50 हजार बचता है। आज यहां जितनी गलती हो रही है हिसाब लगाने में उसका कारण यह है कि कभी तो वह 8 हजार वाला हिसाब लेते हैं वित्त मंत्री महोदय, जो कागज के ऊपर है और कीाी वह 50 हजार रूपये वाला हिसाब दूसरे लोग से लेते हैं जो कि असलियत में है। तो दोनां वस्तुओं में संबंध रखते हो। कागज वाले हिसाब को बिल्कुल खत्म कर दो। इसके अलावा मुझे आप से यह कहना है कि कर्इ दफा मुझे ताना मारते हैं स्वतंत्र वाले भी और कम्युनिस्ट वाले भी कि तुम्हारे विचार तो यह हैं लेकिन तुम स्वतंत्र से लेकर कम्युनिस्ट तक को केैसे इकटठा कर रहे हो? क्यों नहीं इकटठा करूं? और जब कांग्रेस भी हमारे जितनी छोटी रह जायगी तो कांग्रेस को भी उसके साथ ले लेंगे। मैं नहीे चाहत कि यह विराट विशाल राक्ष अपने साथ जायेंगी तो कांग्रेस से भी मुझको कोर्इ जाती दुश्मनी नहीं है और यह यह याद रखना मुझको गुस्सा भी आता है तो खाली एक दिन दो दिन के लिए आता है। उससे ज्यादा नहीं आया करता । तो यह जो सबको इकटठा करने वाली बात है आप अच्छी तरह से अध्य़क्ष महोदय, यमझ चुके हें कि अगर कोर्इ ऐसी चीज है कि जिसमें किसी का साथ मिल सकता है जैसे नौकरशाहों की फिजूलखर्ची में स्वतंत्र का साथ मिल सकता है और जहां बड़े पैसे वाले पंूजीपतियों के संचय में और खर्चे में कम्युनिस्टों का साथ मिल सकता है तो मैं कोशिश क्यों न करूं कि उन दोनों का साथ जब ताक हो सके चले। फिर आखिर को तो कहीं न कहीं फैसला हो ही जायेगा। मैदान में चलते चलते पल्टन में कहीं न कहीं लोग छूट जाएंगे, कोर्इ परवाह नहींं लेकिन अगर पल्टन चलती रही तो आखिर को अपनी मंजिल पर पहुँच करके नया हिंदुस्तान बनाएगी। 