डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
कृष्ण की सभी चीजें दो हैं। दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ!
कृष्ण की सभी चीजें दो हैं। दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ, या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृति या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गयी है। यों कृष्ण देवकीनंदन भी हैं, लेकिन यशोदानंदन अधिक । ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ, पेट-माँ का नाम न जाते हों, लेकिन बाद वाली, दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोर्इ निराला ही होगा। उसी तरह, बसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नंद को असली बाप से कुछ बढ़ कर ही रूतबा मिल गया है। द्वारिका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है किंतु यदि कृष्ण की चले, तो द्वारिका और द्वारिकाधीश मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहें। मथुरा तो बाल-लीला, और यौवन-क्रीड़ा की दृषिट से, वृंदावन और बरसाना वगैरह अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रूकिमणी और सत्यभामा की, राधा और रूकिमणी की, या राधा और द्रौपदी की । प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा, सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राध ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुँचाए, लेकिन इतना संभव नहीं लगता। हर हालत में, रूकिमणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी। मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख है। यह शारीरिक सीमा, उसे अपना एक दोस्त, एक माँ, एक बाप, एक दर्शन वगैरह देती रहती है। किंतु मनुष्य हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है, मन हीे के द्वारा उछल सकता है। कृष्ण उसी तत्त्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलाँघता-उलाँघता सब में मिला देता है, किसी से भी अलग नहीं रखता क्योंकि कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्यलीला है, केवल सिद्धांतों और तत्त्वों का विवेचन नहीं, इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रह कर दो और निरापनी हो गयी है। यों दोनों में ही कृष्ण का तो निरापना है, किंतु लीला के तौर पर अपनी माँ, बीबी और नगरी से परायी बढ़ गयी है। परायी को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्म करना है। मथुरा का एकाधिपत्य खत्म करती है द्वारिका, लेकिन इस क्रम में द्वारिका अपना श्रेष्ठत्व जैसा कायम कर लेती है। भारतीय साहित्य में मां है यशोदा और लला है कृष्ण। मां-लाल का इनसे बढ़ कर मुझे तो कोर्इ संबंध मालूम नहीं, किंतु श्रेष्ठत्व भर ही तो कायम होता हैं मथुरा हटती नहीं और न रूकिमणी, जो मगध के जरासंध से लेकर शिशुपाल होती हुर्इ हसितनापुर के द्रौपदी और पाँच पाण्डवों तक एकरूपता बनाये रखती है। परकीया-स्वकीया से बढ़ कर उसे खत्म तो करता नहीं, केवल अपने और पराये की दीवारो को ढहा देता है। लोभ, मोह, र्इष्र्या, भय इत्यादि की चहारदीवारी से अपना या स्वकीय छुटकारा पा जाता है। सब अपना और, अपना सब हो जाता है। बड़ी रसीली लीला है कृष्ण की, इस राधकृष्ण या द्रौपदी-सखा और रूकिमणी-रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर में, पे्रमानंद और खून की गर्मी और तेजी में कमी नहीं। लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना। कृष्ण है कौन? गिरधारी, गिरिधर गोपाल! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी है, लेकिन कृष्ण का गुáतम रूप तो गिरिधर गोपाल में निखरता है। कान्हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उँगली पर क्यों उठाना पड़ा था? इसलिए न कि उसने इन्द्र की पूजा बंद करवा दी और इन्द्र का भोग खुद खा गया, और खाता रहा । इन्द्र ने नाराज हो कर पानी खोला, पत्थर बरसाना शुरू किया। तभी तो कृष्ण को गोबर्धन उठा कर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्ण ने इन्द्र का भोग खुद क्यों खाना चाहा? यशोदा और कृष्ण का इस संबंध में गुá विवाद है। मां, इन्द्र को भोग लगाना चाहती है, क्योंकि वह बड़ा देवता है, सिर्फ वास से ही तृप्त हो जाता है, और उसकी बड़ी शकित है, प्रसन्न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ। बेटा कहता है कि वह इन्द्र से भी बड़ा देवता है, क्योंकि वह तो वास से तृप्त नहींं होता और बहुत खा सकता है और उसके खाने की कोर्इ सीमा नहीं। यही है कृष्ण-लीला का गुá-रहस्य। वास लेने वाले देवताओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्ण-लीला है। कृष्ण के पहले भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। नि:संदेह अवतार कृष्ण के पहले से शुरू हो गये। किंतु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है, जो निरंतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली। कृष्ण संपूर्ण और अबाध मनुष्य है, खूब प्यार किया, खूब खाया-खिलाया और प्यार सिखाया, जन गण की रक्षा की और उसका रास्ता बताया, निर्लिप्त भोग का महान त्यागी और योगी बना। इस प्रसंग में यह प्रश्न बेमतलब है कि मनुष्य के लिए, विशेष कर राजकीय मनुष्य के लिए, राम का रास्ता सुकर और उचित है या कृष्ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्य बनता रहा। देव और निस्व और असीमित होने के नाते कृष्ण में जो असंभव मनुष्यताएँ हैं, जैसे झूठ-धोखा और हत्या, उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं, उसमें कृष्ण का क्या दोष ? कृष्ण की संभव और पूर्ण मनुष्यताओं पर ध्यान देना ही उचित है, और एकाग्र ध्यान। कृष्ण ने इन्द्र को हराया, वास लेने वाले देवों को भगाया, खाने वाले देवों को प्रतिषिठत किया, हाड़, खून, मांस वाले मनुष्य को देव बनाया, जन गण में भावना जागृत की कि देव को आसमान में मत खोजो, यहीं अपने बीच पृथ्वी पर खोजो। पृथ्वी वाला देव खाता है, प्यार करता है, मिल कर रक्षा करता है। कृष्ण जो कुछ करता था, जम कर करता था, खाता था जम कर, प्यार करता था जम कर, रक्षा भी जम कर करता था। पूर्ण भोग, पूर्ण प्यार, पूर्ण रक्षा। कृष्ण की सभी क्रियाएँ उसकी शकित के पूरे इस्तेमाल से ओत-प्रोत रहती थीं, शकित का कोर्इ अंश बचा कर नहीं रखता था, कंजूस बिल्कुल नहीं था, ऐसा दिलफेंक, ऐसा शरीरफेंक, चाहे मनुष्यों में संभव न हो, लेकिन मनुष्य ही हो सकता है। मनुष्य का आदर्श चाहे जिसके पहुँचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रूक जाना पड़ता हो। कृष्ण ने खुद गीत गाया है सिथतप्रज्ञ का, ऐसे मनुष्य का जो अपनी शकित का पूरा और जम कर इस्तेमाल करता हो। 'कूर्मोगानीव ने बताया ऐसे मनुष्य को। कछुए की तरह यह मनुष्य अपने अंगों को बटोरता है, अपनी इनिद्रयों पर इतना संपूर्ण प्रभुत्व है इसको कि इनिद्रयार्थों से उन्हें पूरी तरह हटा लेता है। कुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उल्टा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करना, जम कर, भोग भी, त्याग भी। जमा हुआ भोगी कुष्ण, जमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोनों में विशेष अंतर नहीं। फिर भी, कृष्ण ने एकांगी परिभाषा दी, अचल सिथतप्रज्ञ की, चल सिथतप्रज्ञ की नहीं। उसने परिभाषा दी जो इनिद्रयार्थों से इनिद्रयों को हटा कर पूर्ण प्रभुता निखारता हो, उसकी नहीं, जो इनिद्रयों को इनिछ्रयार्थों में लपेट कर, घोल कर। कृष्ण खुद तो दोनों था, परिभाषा में एकांगी रह गया। जो काम जिस समय कृष्ण करता था, उसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोेग करता था, अपने लिए कुछ भी नहीं बचता था, अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। 'कूर्मोगानीव के साथ-साथ 'समग्र-अंग-एकाग्री भी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था। जो काम करो जम कर करो, अपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंक कर। देवता बनने की कोशिश में मनुष्य कुछ कृपण हो गया है, पूर्ण। आत्मसमर्पण वह कुछ भूल सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने आप को किसी दूसरे के समर्पण करे। अपने ही कामों में पूरा आत्मसमर्पण करे। झाड़ू लगाये तो जम कर या अपनी इनिद्रयों का पूरा प्रयोग कर, युद्ध में रथ चलाये तो जम कर, श्यामा मालिन बन कर राधा को फूल बेचने जाए तो जम कर, जीवन का दर्शन ढूंढे और गाये तो जम कर। कृष्ण ललकारता है मनुष्य को, अकृपण बनने के लिए, अपनी शकित को पूरी तरह और एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्य करता कुछ है, ध्यान कुछ दसूरी तरफ करता है। झाड़ू देता है, फिर भी कूड़ा कोनो में पड़ा रहता है। एकाग्र ध्यान न हो तो एब इनिद्रयों का अकृपण प्रयोग कैसे हो। 'कूर्मोगानीव और 'समग्र-अंग-एकाग्री मनुष्य को बनाना है। यही तो देवता की मनुष्य बनने की कोशिश है। देखो, हाँ इन्द्र खाली वास लेता है, मैं तो खाता हूं। आसमान के देवताओं को जो भगाए उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ के लिए तैयार रहना चाहिए, तभी कृष्ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उंगली पर उठाना पड़ा। इंद्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता, तो ऐसा कृष्ण किस काम का? फिर कृष्ण के रक्षा-युग का प्रारंभ होने वाला था। एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर-लीला है। कालिया-दहन और कंसवध उसके आसपास के हैं। गोवर्धन उठाने में कृष्ण की उंगली दुखी होगी अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुँझला कर सहारा देने को कहा होगा। माँ को कुछ इतराकर उंगली दुखने की शिकायत की होगी। गोपियों से आंख लड़ाते हूए अपनी मुसकान द्वारा कहा होगा। उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्ण की तो आपस में गंभीर और प्रफुलिलत मुद्रा रही होगी। कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्ण ने अधिक निहारा होगा, मां की ओर इतरा कर, या राधा की ओर प्रफुल्ल होकर। उंगली बेचारे की दुख रही थी। अब तक दुख रही है, गोवर्धन में तो यही लगता है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्ण ने गऊ वंश रूप दानव को मारा था, राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्थल पर कृष्ण से गंगा मांगी। बेचारे कृष्ण को कौन-कौन से असंभव काम करने पड़े हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है, दूसरों को सुखी बनाने के लिए। उसकी उंगली दुख रही है। चलो, उसको सहारा दें। गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने जिनमें पंडे होते ही हैं, प्रश्न किया कि मैं कहां का हूं? मैंने छेड़ते हुए उत्तर दिया, राम की अयोध्या का। पंडों ने जवाब दिया, सब माया एक है। जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्तू वाले राम से गोवर्धन वासियों नेह कैसे चल सकता है। उनका दिल तो माखन मिसरी वाले कृ्रष्ण से लगा है। माखन मिसरी वाला कृष्ण, सत्तू वाला राम कुछ सही है, पर उसकी अपनी उंगली अब तक दुख रही है। एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुर्इ । पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोर्इ नतीजा न निकला, न निकलने वाला। लेकिन क्या मीठी मुस्कान से उस पंडे ने कहा कि जीवन में दो मीठी बात ही तो सब कुछ है। कृष्ण मीठी बात करना सीखा गया है, आसमान वाले देवताओं को भगा गया है, माखन मिसरी वाले देवों की प्रतिष्ठा कर गया है। लेकिन, उसका अपना कौन-कौन सा अंग अब तक दुख रहा है? कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया है, जिसने मनुष्य बनने की कोशिश की। उसका राज्य संसार में अधिक फैला । शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़र्इ का बेटा था और उसकी अपनी जिंदगी में वैभव और ऐश न था, शायद इसलिए कि जन-रक्षा का उसका अंतिम काम ऐसा था कि उसकी उंगली सिर्फ न दुखी, उसके शरीर का रोम-रोम सिहरा और अंग-अंग टूट कर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्यान करके अपने सीमा बांधने वाले चमडे़ को बाहर उछालते हैं। हो सकता है कि र्इसुमसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज के मालिक सभ्यता के पुरखे हैं। र्इसू रोमियों पर चढ़ा। रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्णलीला का मजा ब्रज और भारत भूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्ण और क्रिस्टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया। दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं-कहीं सादृश्य है। कभी दो महाजनों की तुलना नहीें करनी चाहिए। दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं। फिर भी, क्रिस्टोस प्रेम के आत्मोत्सर्गी अंग के लिए बेजोड़ और कृष्ण संपूर्ण मनुष्य लीला के लिए। कभी कृष्ण के वंशज भारतीय शकितशाली बनेंगे, तो संभव है उसकी लीला दुनिया भर में रस फैलाए। कृष्ण बहुत अधिक हिंदुस्तान के साथ जुड़ा है। हिंदुस्तान के ज्यादातर देव ओर अवतार अपनी मिटटी के साथ सने हुए हैं। मिटटी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्प्राण हो जाते हैं। त्रेता का राम हिंदुस्तान की उत्तर-द़िक्षण और कृष्ण पूर्व-पशिचम धुरी पर घूमे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि देश को उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पशिचम एक करना ही राम और कृष्ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्पति राजनीति से है, बिखरे हुए स्वजनों को इकटठा करना, कलह मिटाना, सुलह कराना और हो सके तो अपने और सब की सीमा को ढहाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊँचा उठाना, सदाचार की दृषिट से और आत्म-चिन्तन की भी। देश की एकता और समाज के शुद्धि संबंधी कारणों और आवश्यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्पति हुर्इ है। अलबत्ता धर्म इन आवश्यकताओं से ऊपर उठ कर, मनुष्य को पूर्णकरने की भी चेष्टा करता है। किंतु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है, उतना और कोर्इ धर्म नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्ण के किस्से तो मनगढ़न्त गाथाएँ हैं, जिनसे एक अद्वितीय उधेश्य हासिल करना था। इतने बड़े देश के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पशिचम को एक रूप में बाँधना था। इस विलक्षण उधेश्य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्से बने। मेरा मतलब यह नहीं कि सबके सब किस्से झूठे हैं। गोबर्धन पर्वत का किस्सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है ही, साथ-साथ न जाने कितने और किस्से, जो कितने और आदमियों के रहे हों, एक कृष्ण अथवा राम के साथ जुड़ गये हैं। जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ। यह भी हो सकता है कि कोर्इ न कोर्इ चमत्कारिक पुरूष राम और कृष्ण के नाम के हुए हों। चमत्कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो। लेकिन उन गाथाकारों का यह काम अनहोना नहीं है, जिन्होंने राम और कृष्ण के जीवन की घटनाओं को इस सिलसिले और तफसील में बांधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है। आज के हिंदुस्तानी, राम और कृष्ण की गाथाओं की एक-एक तफसील को चाव से और सप्रमाण जानते हैं, जब कि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुंधली स्मृति मात्र रह गये हैं। महाभारत हिंदुस्तान की पूर्व-पशिचम यात्रा है, जिस तरह रामायण उत्तर-दक्षिण यात्रा है। पूर्व-पशिचम यात्रा का नायक कृष्ण है, जिस तरह उत्तर-दक्षिण का नायक राम है। मणिपुर से द्वारिका तक कृष्ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ है, जैसे जनकपुर से श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का। राम का काम अपेक्षाकृत सहज था। कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी। राम का मुकाबला या दोस्ती हुर्इ भील, किरात, किन्नर, राक्षस इत्यादि से, जो उसकी अपनी सभ्यता से अलग थे। राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्यता में ढाल देना, चाहे हराये बिना या हराने के बाद। कृष्ण को वास्ता पड़ा अपने ही लोगों से। एक ही सभ्यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व-पशिचम एकता कृष्ण को स्थापित करनी पड़ी। इस काम में पेंच ज्यादा थे। तरह-तरह की संधि और विग्रह का क्रम चला। न जाने कितनी चालाकियाँ और धूर्तताएँ भी छुर्इ गयीं। दिलचस्प किस्से भी खूब हुए। जैसी पूर्व-पशिचम राजनीति जटिल थी, वैसी ही मनुष्यों के आपसी संबंधी भी, खास कर मर्द-औरत के। अर्जुन की मणिपुर वाली चित्रांगदा, भीम की हिडम्बा और पांचाली का तो कहना ही क्या। कृष्ण की बुआ कुन्ती का बेटा अजर्ुन, दूसरा कर्ण दोनों अलग-अलग बापों से, और कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया। फिर भी, क्यों जीवन का निचोड़ छन कर आया? क्योंकि कृष्ण जैसा निस्व मनुष्य न कभी हुआ और उससे बढ़ कर तो कभी होना ही असंभव है। राम उत्तर-दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बना, राजा भी हुआ। कृष्ण तो अपनी मुरली बजाता रहा। महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्ण ने कुछ लिया नहीं, दिया ही। पूर्व-पशिचम एकता की दो धुरियां स्पष्ट ही कृष्ण-काल में थीं। एक पटना-गया और मगध-धुरी और दूसरी हसितनापुर-इन्द्रप्रस्थ की कुरूधुरी। मगध-धुरी का भी फैलाव स्वयं कृष्ण की मथुरा तक था, जहां मगध-नरेश जरासंध का दामाद कंस राज्य करता था। बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित-मित्र थे। मगध-धुरी के खिलाफ कुरू-धुरी का सशक्त निर्माता कृष्ण था। कितना बड़ा फैलाव किया कृष्ण ने इस धुरी का! पूर्व में मनीपुर से लेकर पशिचम में द्वारका तक का इस कुरू-धुरी में समावेश किया। देश की दोनों सीमाओं, पूर्व की पहाड़ी सीमा और पशिचम की समुद्री सीमा को फाँसा और बाँधा, इस धुरी को कायम और शकितशाली करने के लिए कृष्ण को कितनी मेहनत और कितने पराक्रम करने पड़े और कितनी लंबी सूझ सोचनी पड़ी। उसने पहला वार अपने ही घर मथुरा में मगध राज्य के दामाद पर किया। उस समय सारे हिंदुस्तान में यह वार गूंजा होगा। कृष्ण की यह पहली ललकार थी, वाणी द्वारा नहींं। उसने कर्म द्वारा रण-भेरी बजायी। कौन अनसुनी कर सकता था? सब को निमंत्रण हो गया, यह सोचने के लिए कि मगध राजा को अथवा जिसे कृष्ण कहे उसे सम्राट के रूप में चुनो। अंतिम चुनाव भी कृष्ण ने बड़े छली रूप में रखा। कुरूवंश में ही न्याय-अन्याय के आधार पर दो टुकड़े हुए और उनमें अन्यायी टुकड़ी के साथ मगध-धुरी को जुड़वा दिया। संसार ने सोचा होगा कि वह तो कुरूवंश का अन्दरूनी और आपसी झगड़ा है। कृष्ण जानता था कि वह तो इन्द्रप्रस्थ-हसितनापुर की कुरू-धुरी और राजगिरि की मगध-धुरी का झगड़ा है। राजगिरि का राज्य कंस-वध पर तिलमिला उठा होगा। कृष्ण ने पहले ही वार में मगध की पशिचमी ताकत को खत्म कर दिया लेकिन अभी तो ताकत बहुत ज्यादा बटोरनी थी और बढ़ानी थी। यह तो सिर्फ आरंभ था । आरंभ अच्छा हुआ। सारे संसार को मालूम हो गया। लेकिन कृष्ण कोर्इ बुद्धू थोड़े ही था, जो आरंंभ की लड़ार्इ को अंत की बना देता। उसके पास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कंस के ससुर और उसकी पूरे हिंदुस्तान की शकित से जूझ बैठता। वार करके, संसार को डंका सुना के कृष्ण भाग गया। भागा भी बड़ी दूर, द्वारिका में। तभी से उसका नाम रणछोड़ दास पड़ा। गुजरात आज भी हजारों लोग शायद एक लाख से अधिक लोग होंगे, जिनका नाम रणछोड़ दास है। पहले मैं इस नाम पर हँसा करता था, मुस्काना तो कभी न छोडूंगा। यों, हिंदुस्तान में और भी देवता हैं जिन्होंने अपना पराक्रम भाग कर दिखाया जैसे ज्ञानवापी के शिव ने। यह पुराना देश है। लड़ते-लड़ते थकी हडिडयों को भागने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन कृष्ण थकी पिणिडयों के कारण नहीं भागा, वह भागा, जवानी की बढ़ती हडिडयों को बढ़ने और फैलने का मौका चाहिए था। कृष्ण की पहली लड़ार्इ तो आजकल की छापामार लड़ार्इ की तरह थी, वार करो और भागो। अफसोस यही है कि कुछ भक्त लोग भागने ही में मजा लेते हैंं। द्वारिका मथुरा से सीधे फासले पर करीब 700 मील है। वर्तमान सड़कों की यदि दूरी नापी जाए तो करीब 1050 मील होती है। बिचली दूरी इस तरह करीब 850 मील होती है। कृष्ण अपने शत्रु से बड़ी दूर तो निकल ही गया, साथ ही साथ देश की पूर्व-पशिचम एकता हासिल करने के लिए उसने पशिचम के आखिरी नाके को बांध लिया। बाद में पांचों पाण्डवों के वनवास-युग में अजर्ुन की चित्रांगदा और भीम की हिडम्बा के जरिये उसने पूर्व के आखिरी नाके को बांधा। इन फासलों को नापने के लिए मथुरा के महान राजमार्ग। मथुरा से अयोध्या की बिचली दूरी करीब 300 मील है। अयोध्या से राजमहल करीब 470 मील है। राजमहल से इम्फाल की बिचली दूरी करीब सवा पांच सौ मील है, यों वर्तमान सड़कों से फासला करीब 850 मील और सीधा फासला करीब 380 मील है। इस तरह मथुरा से इम्फाल का फासला उस समय के राजमार्ग द्वारा करीब 1600 मील रहा होगा। कुरू-धुरी के केंद्र पर कब्जा करने और उसे सशक्त बनाने के पहले कृष्ण केंद्र से 800 मील दूर भागा। और अपने सहचरों और चलों को उसने 1600 मील दूर तक घुमाया। पूर्व-पशिचम की पूरी भारत यात्रा हो गयी । उस समय की भारतीय राजनीति को समझने के लिए कुछ दूरियां और जानना जरूरी है। मथुरा से बनारस का फासला करीब 370 मील, मथुरा से पटना करीब 500 मील है। दिल्ली से, जो तब इन्द्रप्रस्थ थी मथुरा का फासला कीब 90 मील है। पटने से कलकत्ते का फासला करीब सवा तीन सौ मील है। कलकत्ता के फासले का कोर्इ विशेष तात्पर्य नहीं, सिर्फ इतना ही कि कलकत्ता भी कुछ समय तक हिंदुस्तान की राजधानी रही है, चाहे गुलाम हिंदुस्तान की। मगध-धुरी का पुनर्जन्म एक अर्थ में कलकत्ते में हुआ। जिस तरह कृष्णकालीन मगध-धुरी के लिए राजगिर केंद्र है, उसी तरह ऐतिहासिक मगध-धुरी के लिए पटना या पाटलिपुत्र केंद्र है, और दोनों का फासला करीब 40 मील है। पटना-राजगिरि केंद्र का पुनर्जन्म कलकत्ते में होता है, इसका इतिहास के विधार्थी अध्ययन करें, चाहें अध्ययन करते समय सन्तापपूर्ण विवेचन करें कि यह काम विदेशी तत्वावधान में क्यों हुआ? कृष्ण ने मगध धुरी का नाश करके कुरू-धुरी की क्यों प्रतिष्ठा करनी चाही? इसका एक उत्तर तो साफ है। भारतीय जनगण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पशिचम में था जो राजगिरी और पटना से बहुत दूर पड़ जाता था। उसके अलावा मगध-धुरी कुछ पुरानी बन चुकी थी। शकितशाली थी, किंतु उसका फैलाव संकुचित था। कुरू-धुरी नयी थी और कृष्ण इसकी शकित और इसके फैलाव दोनों का ही सर्वशकितसंपन्न निर्माता था। मगध-धुरी को जिस तरह चाहता शायद न मोड़ सकता, कुरू-धुरी को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ और फैला सकता था। सारे देश को बाँधना जो था उसे। कृष्ण त्रिकालदर्शी था। उसने देख लिया होगा कि उत्तर-पशिचम में आगे चल कर यूनानियों,हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे, इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केंद्र कहीं वहीं रखना चाहिए, जो इन आक्रमणों के पहले ही देशी मगध-धुरी बदला चुकाएगी, और सैकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक, कृष्ण की भूमि के नजदीक यानि कन्नौज और उज्जैन तक खिसक चुकी होगी, किंतु अशक्त अवस्था में। त्रिकालदर्शी ने देखा शायद सब कुछ हो, लेकिन कुछ कर न सका हो। वह हमेशा के लिए अपने देशवासियों को कैसे ज्ञानी और साधु दोनों बनाता। वह तो केवल रास्ता दिखा सकता था। रास्ते में भी शायद त्रुटि थी। त्रिकालदर्शी को यह भी देखना चाहिए था कि उसके रास्ते पर ज्ञानी ही नहीं, अनाड़ी भी चलेंगे और वे कितना भारी नुकसान उठाएँगे। राम के रास्ते चल कर अनाड़ी का भी अधिक नहीं-बिगड़ता, चाहे बनना भी कम होता हो। अनाड़ी ने कुरू-पांचाल संधि का क्या किया? कुरू-धुरी की आधार-शिला थी कुरू-पांचाल संधि। आसपास के इन दोनों इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था जो कृष्ण ने उन लीलाओं के द्वारा किया, जिनसे पांचाली का विवाह पाँचों पाण्डवों से हो गया। यह पांचाली भी अदभुत नारी थी। द्रौपदी से बढ़ कर, भारत की कोर्इ प्रखरमुखी और ज्ञानी नारी नहीं । कैसे कुरू- सभा को उत्तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्या दूसरे को दाँव पर रखने की उसमें स्वतंत्र सत्ता है? पाँचों पाण्डव और अजर्ुन भी उसके सामने फीके थे यह कृष्णा तो कृष्ण के ही लायक थी। महाभारत का नायक कृष्ण, नायिका कृष्णा। कृष्णा का संबंध भी विश्व साहित्य में बेमिसाल है। दोनों सखा-सखी ही क्यों रहे? कभी कुछ और दोनों में से किसी ने होना चाहा? क्या सखा-सखी का संबंध पूर्ण रूप से मन की देन थी या उसमें कुरू-धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था? जो हो, कृष्ण और कृष्णा का यह संबंध राधा और कृष्ण के संबंध से कम नहीं, लेकिन साहित्यकारों और भक्तों की नजर इस ओर नहीं पड़ी है। हो सकता है कि भारत की पूर्व-पशिचम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म, न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा, शायद इसलिए कि यदि वह स्वयं कर्मफल हेतु बन जाता, तो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था। उसने की भी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी-केंद्र बनाये। उसके लिए दूसरों का इन्द्रप्रस्थ और हसितनापुर ही अच्छा रहा। उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप में रखा, जिसे संसार अपनी कहता है, वैसी न बनाया। कौन जाने कृष्ण के लिए यह सहज था उसमें भी उसका दिल दुखा था। कृष्णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थी, महान सुंदरी रही होगी। उसकी बुद्धि का तेज, उसकी चकित हरिणी सी आँखों में चमकता रहा होगा। गोरी की अपेक्षा सुंदर, सांवली, नखशिख, और अंग में अधिक सुडौल होती है। राधा गोरी रही होगी। बालक और युवक कृष्ण राधा में एकरस रहा। प्रौढ़ कृष्ण के मन पर कृष्णा छायी रही होगी राधा और कृष्ण तो एक थे ही। कृष्ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी? बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्था में श्याम को निहारा। कृष्णा-कृष्ण संबंध में और कुछ हो न हो, भारतीय मर्दों को श्यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर मनन करना चाहिए। रामायण की नायिका गोरी है। महाभारत की नायिका कृष्णा है। गोरी की अपेक्षा साँवली अधिक सजीव है। जो भी हो, इसी कृष्ण-कृष्णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्म हुआ। न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्याग। कृष्णा पांचाल यानी कन्नौज के इलाके की थी, संयुक्ता भी। धुरी-केंद्र इंद्रप्रस्थ का अनाड़ी राजा पृथ्वीराज अपने पुरखे कृष्ण के रास्ते न चल सका। जिस पांचाली द्रौपदी के जरिये कुरू-धुरी की आधार-शिला रखी गयी, उसी पांचाली संयुक्ता के जरिये दिल्ली कन्नौज की होड़ हुर्इ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बनी। कभी-कभी लगता है कि व्यकित का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्म होता है, कभी फीका, कभी रंगीला। कहां द्रौपदी और कहां संयुक्ता, कहाँ कृष्ण और कहाँ पृथ्वीराज। यह सही है। फीका और मारात्मक पुनर्जन्म, लेकिन पुनर्जन्म तो है ही। कृष्ण की कुरू-धुरी के और भी रहस्य रहे होंगे। साफ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्व का निर्माता और प्रतीक था। उसी तरह जरासंध भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं । यह सही जँचता है, किंतु है अधूरा विवेचन। जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का। कृष्ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्व का निर्माता था। जहां तक मुझे मालूम है, अभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी बहुरूप एकत्व के आधार पर भारत का निर्माण होगा। अभी तक तो कृष्ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल जीवन है जो औरों में नहीं। कृष्ण यादव-शिरोमणि था, केवल क्षत्रिय राजा ही नहीं, शायद क्षत्रिय उतना नहीं था, जितना अहीर। तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है,क्षत्राणी उसे हटा न पायी। विराट विश्व और त्रिकाल के उपयुक्त कृष्ण बहुरूप था। राम और जरासंध एकरूप थे, चाहे आदर्शवादी एकरूपता में केंद्रीकरण और क्रूरता कम हो, लेकिन कुछ न कुछ केंद्रीकरण था, शायद क्रूरता भी। बेचारे कृष्ण ने इतनी नि:स्वार्थ मेहनत की, लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा। सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे 'बोल हरि, हरि बोल के उच्चारण से अपनी आखिरी यात्रा पर निकाले जाते हैं, नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़कर सारे भारत में हिंदू मुर्दे-'राम नाम सत्य है के ही साथ ले जाये जाते हैं। बंगाल के इतना तो नहीं फिर भी उड़ीसा और असम में कृष्ण का स्थान अच्छा है। कहना मुशिकल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस, कौन बीस है। सबसे आश्चर्य की बात है कि स्वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहाँ एक दूसरे को' जै रामजी नमस्ते करते हैं। सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह 'जै रामजी बड़ा मीठा लगता है, शायद एक कारण यह भी हो। राम त्रेता के मीठे, शांत और सुसंस्कृत युग का देव है। कृष्ण पके, जटिल, तीखे और प्रखर बुद्धि का देव है। राम गम्य है। कृष्ण अगम्य है। कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं, यदि बनाते भी हैं, तो उसके मित्रभेद और कूटनीति की नकल करते हैं, उसका निस्व उनके लिए असाघ्य रहता है। इसलिए कृष्ण हिंदुस्तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किए हैं। कितने संधि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी संबंधों के धागे उसे पलटने पड़ते थे । यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी संबंधों में कृष्ण नीति अब भी चलायी जाए। कृष्ण जो पूर्व-पशिचम को एकता दे गया, उसी के साथ-साथ उसी नीति का औचित्य भी खतम हो गया। बच गया कृष्ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिंदुस्तानी इन दोनों का समन्वय नहीं कर पाये है। करें, तो राम के कर्म में भी परिर्वतन आये। राम रोऊ है। इतना कि मर्यादा भंग होती है। कृष्ण कभी रोता नहीं। आँखें जरूर डबडबाती हैं उसकी कुछ मौकों पर, जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं। कैसे मन और वाणी थे कृष्ण के। अब भी, तब की गोपियां और जो चाहें, हम मुरली की तान सुन कर रस विभोर हो सकते हैंं और अपने चमड़े बाहर उछाल सकते हैं। साथ ही कर्म संग के त्याग, सुख-दुख, शीत-उष्ण, यज, अजय के सतम्व के योग और सब भूतों में एक अव्यय भाव का सुरीला दर्शन, उसी वाणी से सुन सकते हैं। संसार में एक कृष्ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया। वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्ण का संबंध कैसा था? क्या सखा-सखी का संबंध स्वयं एक अंतिम सीढ़ी और असीम मैदान है, जिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं? कृष्ण छलिया जरूर था लेकिन कृष्णा से उसने कभी छल न किया। शायद वचन-बद्ध था, इसलिए। जब कभी कृष्णा ने उसे याद किया, वह आया। स्त्री-पुरूष की किसलय-मित्रता को, आजकल के वैज्ञानिक अवरूद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं। यह अवरोध सामाजिक या मन के आंतरिक कारणों से हो सकता है। पांचों पाण्डव कृष्ण के भार्इ थे और द्रौपदी कुरू-पांचाल संधि की आधर-शिला थी। अवरोध के सभी कारण मौजूद थे फिर भी, हो सकता है कि कृ्रष्ण को अपनी चित्तवृत्तियों का कभी निरोध न करना पड़ा हो। यह उसके लिए सहज और अंतिम संबंध था, ठीक उतना ही सहज और अंतिम और रसमय जैसा राधा से प्रेम का संबंध था। अगर यह सही है, तो कृष्ण-कृष्णा के सखा-सखी संबंध का व्योरा दुनिया में विख्यात होना चाहिए, और तफसील से, जिससे पुरूष-स्त्री संबंध का एक नया कमरा खुल सके। अगर राधा की छटा कृष्ण पर हमेशा छायी रहती है तो कृष्ण की छटा भी उस पर छायी रहती है। अगर राधा की छटा निराली है, तो कृष्णा की घटा भीं छटा में तुषिटप्रधान रस है, घटा में उत्कंठा-पधान कर्तव्य । राधा-रस तो निराला है ही। राधा-कृष्ण एक हैं, राधा-कृष्ण का, स्त्री का जिक्र बहुत पुराना नहीं हैं, क्योंकि सबसे पहली बार पुराण में आता है ' अनुराधा के नाम से। नाम ही बताता है प्रेम और भकित का वह स्वरूप, जो आत्मविभोर है, जिसमें सीमा बाँधने वाली चमड़ी रह नहीं जाती। आधुनिक समय में मीरा ने भी उस आत्मविभोरता को पाने की कोशिश की। बहुत दूर तक गयी मीरा, शायद उतनी दूर गयी जितना किसी सजीव देह को किसी याद के लिए जाना संभव हो। फिर भी मीरा की आत्मविभोरता मेें कुछ गर्मी थी। कृष्ण को तो कौन जला सकता है, झुलसा भी नहीं सकता, लकिन गरमी तो लगे। राधा न गरम है, न ठंडी है, राधा पूर्ण है। मीरा की कहानी एक और अर्थ में बेजोड़ है। पदमिनी मीरा की पुरखिन थी, दोनों चित्तौड़ की नायिकाएं हैं। करीब ढार्इ सौ वर्ष का अंतर है। कौन बड़ी है, वह पदमिनी जो जौहर करती है या वह मीरा जिसे कृष्ण के लिए नाचने से कोर्इ मना न कर सका। पुराने देश की यही प्रतिभा है। बड़ा जमाना देखा है इस हिंदुस्तान ने। क्या पदमिनी थकती-थकती सैकड़ों बरस में मीरा बन जाती है? या मीरा ही पदमिनी का श्रेष्ठ स्वरूप है? अथवा जब प्रताप जाता है, तब मीरा फिर पदमिनी बनती है। हे त्रिकालदर्शी कृष्ण! क्या तुम एक ही में मीरा और पदमिनी नहीं बना सकते? राधा-रस का पूरा मजा तो ब्रज-रज में मिलता है। सरयू और अयोध्या का बेटा हूं। ब्रजरज में शायद कभी न लौट सकूंगा। लेकिन मन से तो लौट चुका हूं। श्रीराधा की नगरी बरसाने के पास एक रात रह कर मैंने राधारानी के गीत सुने हैं। कृष्ण बड़ा छलिया था। कभी श्यामा मालिन बन कर राधा को फूल बेचने आता था। कभी वैध बन कर आता था, प्रमाण देने के लिए। राधा अभी ससुराल जाने लायक नहीं है। कभी राधा प्यारी को गोदाने का न्योता देने के लिए गोदनहारिन बन कर आता था। कभी वृन्दा की साड़ी पहन कर आता था, और जब राधा उससे एक बार चिपट कर अलग होती थी, शायद झुंझला कर, शायद इतरा कर, तब श्रीकृष्ण मुरारी को ही छटठी का दूध याद आता था, बैठ कर समझाओ राधा-रानी को कि वृंदा से आँखें नहीं लड़ायी। मैं समझता हूं कि नारी अगर कहीं नर के बराबर हुर्इ है, तो सिर्फ ब्रज में और कान्हा के पास। शायद इसीलिए आज भी हिंदुस्तान की औरतें वृंदावन में जमुना किनारे एक पेड़ में रूमाल जितनी चुनरी बांधने का अभिनय करती है। कौन औरत नहीं चाहेगी कन्हैया से अपनी चुनरी हरवाना, क्योंकि कौन औरत नहीं जानती कि दुष्ट जनों के द्वार चीर हरण के समय कृष्ण ही उनकी चुनरी अनन्त करेगा। शायद जो औरतें पेड़ में चीर बाँधती हैं, उन्हें यह सब बताने पर वे लजाएंगी, लेकिन उनके पुत्र-पुण्य आदि की कामना के पीछे भी कौन-सी सुषुप्त याद है? ब्रज की मुरली लोगों के इतना विàल कैसे बना देती है कि वे कुरूक्षेत्र के कृष्ण को भूल जाएँ, और फिर मुझे तो लगता है कि अयोध्या का राम मणिपुर से द्वारिका के कृष्ण को कभी भुलाने न देगा। जहाँ मैंने चीर बाँधने का अभिनय देखा, उसी के नीचे वृन्दावन के गंदे पानी का नाला बहते देखा, जो जमुना से मिलता है और राधारानी के बरसाने की रंगीली गली में पैर बचा-बचा कर रखना पड़ता है कि कहीं किसी गंदगी में न सन जाए। यह वह रंगीली गली है, जहां बरसाने की औरतें हर होली पर लाठी ले कर निकलती हैं और जिसके नुक्कड़ पर नंद गाँव के मर्द मोटे साफे बाँध और बड़ी ढालों से अपनी ऱक्षा करते हैं। राधारानी अगर कहीं आ जाए, तो वह इन नालों और गंदगियों को तो खत्म करे ही, बरसाने के औरतों के हाथ में इत्र, गुलाला और हल्के, भीनी महक वाले, रंग की पिचकारी थमाये और नंद गाँव के मर्दों को होली खेलने के लिए न्योता दे। ब्रज में महक नहीं है, कुंज नहीं है, केवल करील रह गये हैं। शीतलता खत्म है। बरसाने में मैंने राधारानी की अहीरिनों को बहुत ढ़ूंढ़ा। पांच-दस घर होंगे। वहां बनियाइनों और ब्राह्राणियों का जमाव हो गया हैं जब किसी जाति में कोर्इ बड़ा आदमी या कड़ी औरत हुर्इ तीर्थ-स्थान बना और मंदिर और दुकानें देखते-देखते आयीं। तब इन द्विज नारियों के चेहरे भी म्लान थे, गरीब, कृश और रोगी। कुछ लोग मुझे मूर्खतावश द्विज-शत्रु समझने लगे हैं। मैं तो द्विज-मित्र हूं, इसलिए देख रहा हूं कि राधारानी की गोपियों, मल्लाहिनों और चमाइनों को हटा कर द्विज नारियों ने भी अपनी कांति खो दी है। मिलाओ ब्रज की रज में पुष्पों की महक, दो हिंदुस्तान को कृष्ण की बहुरूपी एकता, हटाओ राम का एकरूपी द्विज-शूद्र धर्म, लेकिन चलो राम के मर्यादा वाले रास्ते पर, सच और नियम पालन कर। सरयू और गंगा कर्तव्य की नदियाँ हैंं। कर्तव्य कभी-कभी कठोर होकर अन्यायी हो जाता है, और नुकसान कर बैठता है। जमुना और चम्बल, केन तथा दूसरी जमुनामुखी नदियां रस की नदियां हैं। रस में मिलन है, कलह मिटाता है। लेकिन लास्य भी है, जो गिरावट में मनुष्य को निकम्मा बना देता है। इसी रसभरी इतराती जमुना के किनारे कृष्ण ने अपनी लीला की, लेकिन कुरू-धुरी का केंद्र उसने गंगा के किनारे ही बरसाया। बाद में हिंदुस्तान के कुछ राज्य जमुना के किनारे बने और एक अब भी चल रहा है। जमुना क्या तुम कभी बदलोगी, आखिर गंगा में ही तो गिरती हो। क्या की भी इस भूमि पर रसमय कर्तव्य का उदय होगा? कृष्ण! कौन जाने तुम थे या नहीं? कौन तुमने राधालीला को कुरू-लीला से निभाया। लोग कहते हैं कि युवा कृष्ण का प्रौढ़ कृष्ण से कोर्इ संबंध नहीं। बताते हैं कि महाभारत में राधा का नाम तक नहींं बात इतनी सच नहीं, क्योंकि शिशुपाल ने क्रोध में कृष्ण की पुरानी बातें साधारण तौर पर बिना नामकरण के बतायी हैं। सभ्य लोग ऐसे जिक्र असमय नहीं किया करते, जो समझते हैं वे, और जो नहीं समझते हैं, वे भी। महाभारत में राधा का जिक्र हो सकता है। राधा का वर्णन तो वहीं होगा जहां तीन लोक का स्वामी उसका दास है। रास का कृष्ण और गीता का कृष्ण एक है। न जाने हजारों वर्ष से अभी तक पलड़ा इधर या उधर क्यों भारी हो जात है? बताओ कृष्ण! कृष्ण -डा0 राममनोहर लोहिया कृष्ण की सभी चीजें दो हैं। दो माँ, दो बाप, दो नगर, दो प्रेमिकाएँ, या यों कहिए अनेक। जो चीज संसारी अर्थ में बाद की या स्वीकृति या सामाजिक है, वह असली से भी श्रेष्ठ और अधिक प्रिय हो गयी है। यों कृष्ण देवकीनंदन भी हैं, लेकिन यशोदानंदन अधिक । ऐसे लोग मिल सकते हैं जो कृष्ण की असली माँ, पेट-माँ का नाम न जाते हों, लेकिन बाद वाली, दूध वाली, यशोदा का नाम न जानने वाला कोर्इ निराला ही होगा। उसी तरह, बसुदेव कुछ हारे हुए से हैं, और नंद को असली बाप से कुछ बढ़ कर ही रूतबा मिल गया है। द्वारिका और मथुरा की होड़ करना कुछ ठीक नहीं, क्योंकि भूगोल और इतिहास ने मथुरा का साथ दिया है किंतु यदि कृष्ण की चले, तो द्वारिका और द्वारिकाधीश मथुरा और मथुरापति से अधिक प्रिय रहें। मथुरा तो बाल-लीला, और यौवन-क्रीड़ा की दृषिट से, वृंदावन और बरसाना वगैरह अधिक महत्त्वपूर्ण हैं। प्रेमिकाओं का प्रश्न जरा उलझा हुआ है। किसकी तुलना की जाए, रूकिमणी और सत्यभामा की, राधा और रूकिमणी की, या राधा और द्रौपदी की । प्रेमिका शब्द का अर्थ संकुचित न कर सखा, सखी भाव को ले के चलना होगा। अब तो मीरा ने भी होड़ लगानी शुरू की है। जो हो, अभी तो राध ही बड़भागिनी है कि तीन लोक का स्वामी उसके चरणों का दास है। समय का फेर और महाकाल शायद द्रौपदी या मीरा को राधा की जगह तक पहुँचाए, लेकिन इतना संभव नहीं लगता। हर हालत में, रूकिमणी राधा से टक्कर कभी नहीं ले सकेगी। मनुष्य की शारीरिक सीमा उसका चमड़ा और नख है। यह शारीरिक सीमा, उसे अपना एक दोस्त, एक माँ, एक बाप, एक दर्शन वगैरह देती रहती है। किंतु मनुष्य हमेशा इस सीमा से बाहर उछलने की कोशिश करता रहता है, मन हीे के द्वारा उछल सकता है। कृष्ण उसी तत्त्व और महान प्रेम का नाम है जो मन को प्रदत्त सीमाओं से उलाँघता-उलाँघता सब में मिला देता है, किसी से भी अलग नहीं रखता क्योंकि कृष्ण तो घटनाक्रमों वाली मनुष्यलीला है, केवल सिद्धांतों और तत्त्वों का विवेचन नहीं, इसलिए उसकी सभी चीजें अपनी और एक की सीमा में न रह कर दो और निरापनी हो गयी है। यों दोनों में ही कृष्ण का तो निरापना है, किंतु लीला के तौर पर अपनी माँ, बीबी और नगरी से परायी बढ़ गयी है। परायी को अपनी से बढ़ने देना भी तो एक मानी में अपनेपन को खत्म करना है। मथुरा का एकाधिपत्य खत्म करती है द्वारिका, लेकिन इस क्रम में द्वारिका अपना श्रेष्ठत्व जैसा कायम कर लेती है। भारतीय साहित्य में मां है यशोदा और लला है कृष्ण। मां-लाल का इनसे बढ़ कर मुझे तो कोर्इ संबंध मालूम नहीं, किंतु श्रेष्ठत्व भर ही तो कायम होता हैं मथुरा हटती नहीं और न रूकिमणी, जो मगध के जरासंध से लेकर शिशुपाल होती हुर्इ हसितनापुर के द्रौपदी और पाँच पाण्डवों तक एकरूपता बनाये रखती है। परकीया-स्वकीया से बढ़ कर उसे खत्म तो करता नहीं, केवल अपने और पराये की दीवारो को ढहा देता है। लोभ, मोह, र्इष्र्या, भय इत्यादि की चहारदीवारी से अपना या स्वकीय छुटकारा पा जाता है। सब अपना और, अपना सब हो जाता है। बड़ी रसीली लीला है कृष्ण की, इस राधकृष्ण या द्रौपदी-सखा और रूकिमणी-रमण की कहीं चर्म सीमित शरीर में, पे्रमानंद और खून की गर्मी और तेजी में कमी नहीं। लेकिन यह सब रहते हुए भी कैसा निरापना। कृष्ण है कौन? गिरधारी, गिरिधर गोपाल! वैसे तो मुरलीधर और चक्रधर भी है, लेकिन कृष्ण का गुáतम रूप तो गिरिधर गोपाल में निखरता है। कान्हा को गोवर्धन पर्वत अपनी कानी उँगली पर क्यों उठाना पड़ा था? इसलिए न कि उसने इन्द्र की पूजा बंद करवा दी और इन्द्र का भोग खुद खा गया, और खाता रहा । इन्द्र ने नाराज हो कर पानी खोला, पत्थर बरसाना शुरू किया। तभी तो कृष्ण को गोबर्धन उठा कर अपने गो और गोपालों की रक्षा करनी पड़ी। कृष्ण ने इन्द्र का भोग खुद क्यों खाना चाहा? यशोदा और कृष्ण का इस संबंध में गुá विवाद है। मां, इन्द्र को भोग लगाना चाहती है, क्योंकि वह बड़ा देवता है, सिर्फ वास से ही तृप्त हो जाता है, और उसकी बड़ी शकित है, प्रसन्न होने पर बहुत वर देता है और नाराज होने पर तकलीफ। बेटा कहता है कि वह इन्द्र से भी बड़ा देवता है, क्योंकि वह तो वास से तृप्त नहींं होता और बहुत खा सकता है और उसके खाने की कोर्इ सीमा नहीं। यही है कृष्ण-लीला का गुá-रहस्य। वास लेने वाले देवताओं से खाने वाले देवताओं तक की भारत-यात्रा ही कृष्ण-लीला है। कृष्ण के पहले भारतीय देव, आसमान के देवता हैं। नि:संदेह अवतार कृष्ण के पहले से शुरू हो गये। किंतु त्रेता का राम ऐसा मनुष्य है जो निरंतर देव बनने की कोशिश करता रहा। इसलिए उसमें आसमान के देवता का अंश कुछ अधिक है। द्वापर का कृष्ण ऐसा देव है, जो निरंतर मनुष्य बनने की कोशिश करता रहा। उसमें उसे संपूर्ण सफलता मिली। कृष्ण संपूर्ण और अबाध मनुष्य है, खूब प्यार किया, खूब खाया-खिलाया और प्यार सिखाया, जन गण की रक्षा की और उसका रास्ता बताया, निर्लिप्त भोग का महान त्यागी और योगी बना। इस प्रसंग में यह प्रश्न बेमतलब है कि मनुष्य के लिए, विशेष कर राजकीय मनुष्य के लिए, राम का रास्ता सुकर और उचित है या कृष्ण का। मतलब की बात तो यह है कि कृष्ण देव होता हुआ निरंतर मनुष्य बनता रहा। देव और निस्व और असीमित होने के नाते कृष्ण में जो असंभव मनुष्यताएँ हैं, जैसे झूठ-धोखा और हत्या, उनकी नकल करने वाले लोग मूर्ख हैं, उसमें कृष्ण का क्या दोष ? कृष्ण की संभव और पूर्ण मनुष्यताओं पर ध्यान देना ही उचित है, और एकाग्र ध्यान। कृष्ण ने इन्द्र को हराया, वास लेने वाले देवों को भगाया, खाने वाले देवों को प्रतिषिठत किया, हाड़, खून, मांस वाले मनुष्य को देव बनाया, जन गण में भावना जागृत की कि देव को आसमान में मत खोजो, यहीं अपने बीच पृथ्वी पर खोजो। पृथ्वी वाला देव खाता है, प्यार करता है, मिल कर रक्षा करता है। कृष्ण जो कुछ करता था, जम कर करता था, खाता था जम कर, प्यार करता था जम कर, रक्षा भी जम कर करता था। पूर्ण भोग, पूर्ण प्यार, पूर्ण रक्षा। कृष्ण की सभी क्रियाएँ उसकी शकित के पूरे इस्तेमाल से ओत-प्रोत रहती थीं, शकित का कोर्इ अंश बचा कर नहीं रखता था, कंजूस बिल्कुल नहीं था, ऐसा दिलफेंक, ऐसा शरीरफेंक, चाहे मनुष्यों में संभव न हो, लेकिन मनुष्य ही हो सकता है। मनुष्य का आदर्श चाहे जिसके पहुँचने तक हमेशा एक सीढ़ी पहले रूक जाना पड़ता हो। कृष्ण ने खुद गीत गाया है सिथतप्रज्ञ का, ऐसे मनुष्य का जो अपनी शकित का पूरा और जम कर इस्तेमाल करता हो। 'कूर्मोगानीव ने बताया ऐसे मनुष्य को। कछुए की तरह यह मनुष्य अपने अंगों को बटोरता है, अपनी इनिद्रयों पर इतना संपूर्ण प्रभुत्व है इसको कि इनिद्रयार्थों से उन्हें पूरी तरह हटा लेता है। कुछ लोग कहेंगे कि यह तो भोग का उल्टा हुआ। ऐसी बात नहीं। जो करना, जम कर, भोग भी, त्याग भी। जमा हुआ भोगी कुष्ण, जमा हुआ योगी तो था ही। शायद दोनों में विशेष अंतर नहीं। फिर भी, कृष्ण ने एकांगी परिभाषा दी, अचल सिथतप्रज्ञ की, चल सिथतप्रज्ञ की नहीं। उसने परिभाषा दी जो इनिद्रयार्थों से इनिद्रयों को हटा कर पूर्ण प्रभुता निखारता हो, उसकी नहीं, जो इनिद्रयों को इनिछ्रयार्थों में लपेट कर, घोल कर। कृष्ण खुद तो दोनों था, परिभाषा में एकांगी रह गया। जो काम जिस समय कृष्ण करता था, उसमें अपने समग्र अंगों का एकाग्र प्रयोेग करता था, अपने लिए कुछ भी नहीं बचता था, अपना तो था ही नहीं कुछ उसमें। 'कूर्मोगानीव के साथ-साथ 'समग्र-अंग-एकाग्री भी परिभाषा में शामिल होना चाहिए था। जो काम करो जम कर करो, अपना पूरा मन और शरीर उसमें फेंक कर। देवता बनने की कोशिश में मनुष्य कुछ कृपण हो गया है, पूर्ण। आत्मसमर्पण वह कुछ भूल सा गया है। जरूरी नहीं है कि वह अपने आप को किसी दूसरे के समर्पण करे। अपने ही कामों में पूरा आत्मसमर्पण करे। झाड़ू लगाये तो जम कर या अपनी इनिद्रयों का पूरा प्रयोग कर, युद्ध में रथ चलाये तो जम कर, श्यामा मालिन बन कर राधा को फूल बेचने जाए तो जम कर, जीवन का दर्शन ढूंढे और गाये तो जम कर। कृष्ण ललकारता है मनुष्य को, अकृपण बनने के लिए, अपनी शकित को पूरी तरह और एकाग्र उछालने के लिए। मनुष्य करता कुछ है, ध्यान कुछ दसूरी तरफ करता है। झाड़ू देता है, फिर भी कूड़ा कोनो में पड़ा रहता है। एकाग्र ध्यान न हो तो एब इनिद्रयों का अकृपण प्रयोग कैसे हो। 'कूर्मोगानीव और 'समग्र-अंग-एकाग्री मनुष्य को बनाना है। यही तो देवता की मनुष्य बनने की कोशिश है। देखो, हाँ इन्द्र खाली वास लेता है, मैं तो खाता हूं। आसमान के देवताओं को जो भगाए उसे बड़े पराक्रम और तकलीफ के लिए तैयार रहना चाहिए, तभी कृष्ण को पूरा गोवर्धन पर्वत अपनी छोटी उंगली पर उठाना पड़ा। इंद्र को वह नाराज कर देता और अपनी गउओं की रक्षा न करता, तो ऐसा कृष्ण किस काम का? फिर कृष्ण के रक्षा-युग का प्रारंभ होने वाला था। एक तरह से बाल और युवा-लीला का शेष ही गिरिधर-लीला है। कालिया-दहन और कंसवध उसके आसपास के हैं। गोवर्धन उठाने में कृष्ण की उंगली दुखी होगी अपने गोपों और सखाओं को कुछ झुँझला कर सहारा देने को कहा होगा। माँ को कुछ इतराकर उंगली दुखने की शिकायत की होगी। गोपियों से आंख लड़ाते हूए अपनी मुसकान द्वारा कहा होगा। उसके पराक्रम पर अचरज करने के लिए राधा और कृष्ण की तो आपस में गंभीर और प्रफुलिलत मुद्रा रही होगी। कहना कठिन है कि किसकी ओर कृष्ण ने अधिक निहारा होगा, मां की ओर इतरा कर, या राधा की ओर प्रफुल्ल होकर। उंगली बेचारे की दुख रही थी। अब तक दुख रही है, गोवर्धन में तो यही लगता है। वहीं पर मानस गंगा है। जब कृष्ण ने गऊ वंश रूप दानव को मारा था, राधा बिगड़ पड़ी और इस पाप से बचने के लिए उसने उसी स्थल पर कृष्ण से गंगा मांगी। बेचारे कृष्ण को कौन-कौन से असंभव काम करने पड़े हैं। हर समय वह कुछ न कुछ करता रहा है, दूसरों को सुखी बनाने के लिए। उसकी उंगली दुख रही है। चलो, उसको सहारा दें। गोवर्धन में सड़क चलते कुछ लोगों ने जिनमें पंडे होते ही हैं, प्रश्न किया कि मैं कहां का हूं? मैंने छेड़ते हुए उत्तर दिया, राम की अयोध्या का। पंडों ने जवाब दिया, सब माया एक है। जब मेरी छेड़ चलती रही तो एक ने कहा कि आखिर सत्तू वाले राम से गोवर्धन वासियों नेह कैसे चल सकता है। उनका दिल तो माखन मिसरी वाले कृ्रष्ण से लगा है। माखन मिसरी वाला कृष्ण, सत्तू वाला राम कुछ सही है, पर उसकी अपनी उंगली अब तक दुख रही है। एक बार मथुरा में सड़क चलते एक पंडे से मेरी बातचीत हुर्इ । पंडों की साधारण कसौटी से उस बातचीत का कोर्इ नतीजा न निकला, न निकलने वाला। लेकिन क्या मीठी मुस्कान से उस पंडे ने कहा कि जीवन में दो मीठी बात ही तो सब कुछ है। कृष्ण मीठी बात करना सीखा गया है, आसमान वाले देवताओं को भगा गया है, माखन मिसरी वाले देवों की प्रतिष्ठा कर गया है। लेकिन, उसका अपना कौन-कौन सा अंग अब तक दुख रहा है? कृष्ण की तरह एक और देवता हो गया है, जिसने मनुष्य बनने की कोशिश की। उसका राज्य संसार में अधिक फैला । शायद इसलिए कि वह गरीब बढ़र्इ का बेटा था और उसकी अपनी जिंदगी में वैभव और ऐश न था, शायद इसलिए कि जन-रक्षा का उसका अंतिम काम ऐसा था कि उसकी उंगली सिर्फ न दुखी, उसके शरीर का रोम-रोम सिहरा और अंग-अंग टूट कर वह मरा। अब तक लोग उसका ध्यान करके अपने सीमा बांधने वाले चमडे़ को बाहर उछालते हैं। हो सकता है कि र्इसुमसीह दुनिया में केवल इसलिए फैल गया कि उसका विरोध उन रोमियों से था जो आज के मालिक सभ्यता के पुरखे हैं। र्इसू रोमियों पर चढ़ा। रोमी आज के यूरोपियों पर चढ़े। शायद एक कारण यह भी हो कि कृष्णलीला का मजा ब्रज और भारत भूमि के कण-कण से इतना लिपटा है कि कृष्ण और क्रिस्टोस दोनों ने आसमान के देवताओं को भगाया। दोनों के नाम और कहानी में भी कहीं-कहीं सादृश्य है। कभी दो महाजनों की तुलना नहीें करनी चाहिए। दोनों अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ हैं। फिर भी, क्रिस्टोस प्रेम के आत्मोत्सर्गी अंग के लिए बेजोड़ और कृष्ण संपूर्ण मनुष्य लीला के लिए। कभी कृष्ण के वंशज भारतीय शकितशाली बनेंगे, तो संभव है उसकी लीला दुनिया भर में रस फैलाए। कृष्ण बहुत अधिक हिंदुस्तान के साथ जुड़ा है। हिंदुस्तान के ज्यादातर देव ओर अवतार अपनी मिटटी के साथ सने हुए हैं। मिटटी से अलग करने पर वे बहुत कुछ निष्प्राण हो जाते हैं। त्रेता का राम हिंदुस्तान की उत्तर-द़िक्षण और कृष्ण पूर्व-पशिचम धुरी पर घूमे। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि देश को उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पशिचम एक करना ही राम और कृष्ण का धर्म था। यों सभी धर्मों की उत्पति राजनीति से है, बिखरे हुए स्वजनों को इकटठा करना, कलह मिटाना, सुलह कराना और हो सके तो अपने और सब की सीमा को ढहाना। साथ-साथ जीवन को कुछ ऊँचा उठाना, सदाचार की दृषिट से और आत्म-चिन्तन की भी। देश की एकता और समाज के शुद्धि संबंधी कारणों और आवश्यकताओं से संसार के सभी महान धर्मों की उत्पति हुर्इ है। अलबत्ता धर्म इन आवश्यकताओं से ऊपर उठ कर, मनुष्य को पूर्णकरने की भी चेष्टा करता है। किंतु भारतीय धर्म इन आवश्यकताओं से जितना ओत-प्रोत है, उतना और कोर्इ धर्म नहीं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि राम और कृष्ण के किस्से तो मनगढ़न्त गाथाएँ हैं, जिनसे एक अद्वितीय उधेश्य हासिल करना था। इतने बड़े देश के उत्तर-दक्षिण और पूर्व-पशिचम को एक रूप में बाँधना था। इस विलक्षण उधेश्य के अनुरूप ही ये विलक्षण किस्से बने। मेरा मतलब यह नहीं कि सबके सब किस्से झूठे हैं। गोबर्धन पर्वत का किस्सा जिस रूप में प्रचलित है उस रूप में झूठा तो है ही, साथ-साथ न जाने कितने और किस्से, जो कितने और आदमियों के रहे हों, एक कृष्ण अथवा राम के साथ जुड़ गये हैं। जोड़ने वालों को कमाल हासिल हुआ। यह भी हो सकता है कि कोर्इ न कोर्इ चमत्कारिक पुरूष राम और कृष्ण के नाम के हुए हों। चमत्कार भी उनका संसार के इतिहास में अनहोना रहा हो। लेकिन उन गाथाकारों का यह काम अनहोना नहीं है, जिन्होंने राम और कृष्ण के जीवन की घटनाओं को इस सिलसिले और तफसील में बांधा है कि इतिहास भी उसके सामने लजा गया है। आज के हिंदुस्तानी, राम और कृष्ण की गाथाओं की एक-एक तफसील को चाव से और सप्रमाण जानते हैं, जब कि ऐतिहासिक बुद्ध और अशोक उनके लिए धुंधली स्मृति मात्र रह गये हैं। महाभारत हिंदुस्तान की पूर्व-पशिचम यात्रा है, जिस तरह रामायण उत्तर-दक्षिण यात्रा है। पूर्व-पशिचम यात्रा का नायक कृष्ण है, जिस तरह उत्तर-दक्षिण का नायक राम है। मणिपुर से द्वारिका तक कृष्ण या उसके सहचरों का पराक्रम हुआ है, जैसे जनकपुर से श्रीलंका तक राम या उसके सहचरों का। राम का काम अपेक्षाकृत सहज था। कम से कम उस काम में एकरसता अधिक थी। राम का मुकाबला या दोस्ती हुर्इ भील, किरात, किन्नर, राक्षस इत्यादि से, जो उसकी अपनी सभ्यता से अलग थे। राम का काम था इनको अपने में शामिल करना और उनको अपनी सभ्यता में ढाल देना, चाहे हराये बिना या हराने के बाद। कृष्ण को वास्ता पड़ा अपने ही लोगों से। एक ही सभ्यता के दो अंगों में से एक को लेकर भारत की पूर्व-पशिचम एकता कृष्ण को स्थापित करनी पड़ी। इस काम में पेंच ज्यादा थे। तरह-तरह की संधि और विग्रह का क्रम चला। न जाने कितनी चालाकियाँ और धूर्तताएँ भी छुर्इ गयीं। दिलचस्प किस्से भी खूब हुए। जैसी पूर्व-पशिचम राजनीति जटिल थी, वैसी ही मनुष्यों के आपसी संबंधी भी, खास कर मर्द-औरत के। अर्जुन की मणिपुर वाली चित्रांगदा, भीम की हिडम्बा और पांचाली का तो कहना ही क्या। कृष्ण की बुआ कुन्ती का बेटा अजर्ुन, दूसरा कर्ण दोनों अलग-अलग बापों से, और कृष्ण ने अर्जुन को कर्ण का छल-वध करने के लिए उकसाया। फिर भी, क्यों जीवन का निचोड़ छन कर आया? क्योंकि कृष्ण जैसा निस्व मनुष्य न कभी हुआ और उससे बढ़ कर तो कभी होना ही असंभव है। राम उत्तर-दक्षिण एकता का न सिर्फ नायक बना, राजा भी हुआ। कृष्ण तो अपनी मुरली बजाता रहा। महाभारत की नायिका द्रौपदी से महाभारत के नायक कृष्ण ने कुछ लिया नहीं, दिया ही। पूर्व-पशिचम एकता की दो धुरियां स्पष्ट ही कृष्ण-काल में थीं। एक पटना-गया और मगध-धुरी और दूसरी हसितनापुर-इन्द्रप्रस्थ की कुरूधुरी। मगध-धुरी का भी फैलाव स्वयं कृष्ण की मथुरा तक था, जहां मगध-नरेश जरासंध का दामाद कंस राज्य करता था। बीच में शिशुपाल आदि मगध के आश्रित-मित्र थे। मगध-धुरी के खिलाफ कुरू-धुरी का सशक्त निर्माता कृष्ण था। कितना बड़ा फैलाव किया कृष्ण ने इस धुरी का! पूर्व में मनीपुर से लेकर पशिचम में द्वारका तक का इस कुरू-धुरी में समावेश किया। देश की दोनों सीमाओं, पूर्व की पहाड़ी सीमा और पशिचम की समुद्री सीमा को फाँसा और बाँधा, इस धुरी को कायम और शकितशाली करने के लिए कृष्ण को कितनी मेहनत और कितने पराक्रम करने पड़े और कितनी लंबी सूझ सोचनी पड़ी। उसने पहला वार अपने ही घर मथुरा में मगध राज्य के दामाद पर किया। उस समय सारे हिंदुस्तान में यह वार गूंजा होगा। कृष्ण की यह पहली ललकार थी, वाणी द्वारा नहींं। उसने कर्म द्वारा रण-भेरी बजायी। कौन अनसुनी कर सकता था? सब को निमंत्रण हो गया, यह सोचने के लिए कि मगध राजा को अथवा जिसे कृष्ण कहे उसे सम्राट के रूप में चुनो। अंतिम चुनाव भी कृष्ण ने बड़े छली रूप में रखा। कुरूवंश में ही न्याय-अन्याय के आधार पर दो टुकड़े हुए और उनमें अन्यायी टुकड़ी के साथ मगध-धुरी को जुड़वा दिया। संसार ने सोचा होगा कि वह तो कुरूवंश का अन्दरूनी और आपसी झगड़ा है। कृष्ण जानता था कि वह तो इन्द्रप्रस्थ-हसितनापुर की कुरू-धुरी और राजगिरि की मगध-धुरी का झगड़ा है। राजगिरि का राज्य कंस-वध पर तिलमिला उठा होगा। कृष्ण ने पहले ही वार में मगध की पशिचमी ताकत को खत्म कर दिया लेकिन अभी तो ताकत बहुत ज्यादा बटोरनी थी और बढ़ानी थी। यह तो सिर्फ आरंभ था । आरंभ अच्छा हुआ। सारे संसार को मालूम हो गया। लेकिन कृष्ण कोर्इ बुद्धू थोड़े ही था, जो आरंंभ की लड़ार्इ को अंत की बना देता। उसके पास अभी इतनी ताकत तो थी नहीं जो कंस के ससुर और उसकी पूरे हिंदुस्तान की शकित से जूझ बैठता। वार करके, संसार को डंका सुना के कृष्ण भाग गया। भागा भी बड़ी दूर, द्वारिका में। तभी से उसका नाम रणछोड़ दास पड़ा। गुजरात आज भी हजारों लोग शायद एक लाख से अधिक लोग होंगे, जिनका नाम रणछोड़ दास है। पहले मैं इस नाम पर हँसा करता था, मुस्काना तो कभी न छोडूंगा। यों, हिंदुस्तान में और भी देवता हैं जिन्होंने अपना पराक्रम भाग कर दिखाया जैसे ज्ञानवापी के शिव ने। यह पुराना देश है। लड़ते-लड़ते थकी हडिडयों को भागने का अवसर मिलना चाहिए। लेकिन कृष्ण थकी पिणिडयों के कारण नहीं भागा, वह भागा, जवानी की बढ़ती हडिडयों को बढ़ने और फैलने का मौका चाहिए था। कृष्ण की पहली लड़ार्इ तो आजकल की छापामार लड़ार्इ की तरह थी, वार करो और भागो। अफसोस यही है कि कुछ भक्त लोग भागने ही में मजा लेते हैंं। द्वारिका मथुरा से सीधे फासले पर करीब 700 मील है। वर्तमान सड़कों की यदि दूरी नापी जाए तो करीब 1050 मील होती है। बिचली दूरी इस तरह करीब 850 मील होती है। कृष्ण अपने शत्रु से बड़ी दूर तो निकल ही गया, साथ ही साथ देश की पूर्व-पशिचम एकता हासिल करने के लिए उसने पशिचम के आखिरी नाके को बांध लिया। बाद में पांचों पाण्डवों के वनवास-युग में अजर्ुन की चित्रांगदा और भीम की हिडम्बा के जरिये उसने पूर्व के आखिरी नाके को बांधा। इन फासलों को नापने के लिए मथुरा के महान राजमार्ग। मथुरा से अयोध्या की बिचली दूरी करीब 300 मील है। अयोध्या से राजमहल करीब 470 मील है। राजमहल से इम्फाल की बिचली दूरी करीब सवा पांच सौ मील है, यों वर्तमान सड़कों से फासला करीब 850 मील और सीधा फासला करीब 380 मील है। इस तरह मथुरा से इम्फाल का फासला उस समय के राजमार्ग द्वारा करीब 1600 मील रहा होगा। कुरू-धुरी के केंद्र पर कब्जा करने और उसे सशक्त बनाने के पहले कृष्ण केंद्र से 800 मील दूर भागा। और अपने सहचरों और चलों को उसने 1600 मील दूर तक घुमाया। पूर्व-पशिचम की पूरी भारत यात्रा हो गयी । उस समय की भारतीय राजनीति को समझने के लिए कुछ दूरियां और जानना जरूरी है। मथुरा से बनारस का फासला करीब 370 मील, मथुरा से पटना करीब 500 मील है। दिल्ली से, जो तब इन्द्रप्रस्थ थी मथुरा का फासला कीब 90 मील है। पटने से कलकत्ते का फासला करीब सवा तीन सौ मील है। कलकत्ता के फासले का कोर्इ विशेष तात्पर्य नहीं, सिर्फ इतना ही कि कलकत्ता भी कुछ समय तक हिंदुस्तान की राजधानी रही है, चाहे गुलाम हिंदुस्तान की। मगध-धुरी का पुनर्जन्म एक अर्थ में कलकत्ते में हुआ। जिस तरह कृष्णकालीन मगध-धुरी के लिए राजगिर केंद्र है, उसी तरह ऐतिहासिक मगध-धुरी के लिए पटना या पाटलिपुत्र केंद्र है, और दोनों का फासला करीब 40 मील है। पटना-राजगिरि केंद्र का पुनर्जन्म कलकत्ते में होता है, इसका इतिहास के विधार्थी अध्ययन करें, चाहें अध्ययन करते समय सन्तापपूर्ण विवेचन करें कि यह काम विदेशी तत्वावधान में क्यों हुआ? कृष्ण ने मगध धुरी का नाश करके कुरू-धुरी की क्यों प्रतिष्ठा करनी चाही? इसका एक उत्तर तो साफ है। भारतीय जनगण का बाहुल्य उस समय उत्तर और पशिचम में था जो राजगिरी और पटना से बहुत दूर पड़ जाता था। उसके अलावा मगध-धुरी कुछ पुरानी बन चुकी थी। शकितशाली थी, किंतु उसका फैलाव संकुचित था। कुरू-धुरी नयी थी और कृष्ण इसकी शकित और इसके फैलाव दोनों का ही सर्वशकितसंपन्न निर्माता था। मगध-धुरी को जिस तरह चाहता शायद न मोड़ सकता, कुरू-धुरी को अपनी इच्छा के अनुसार मोड़ और फैला सकता था। सारे देश को बाँधना जो था उसे। कृष्ण त्रिकालदर्शी था। उसने देख लिया होगा कि उत्तर-पशिचम में आगे चल कर यूनानियों,हूणों, पठानों, मुगलों आदि के आक्रमण होंगे, इसलिए भारतीय एकता की धुरी का केंद्र कहीं वहीं रखना चाहिए, जो इन आक्रमणों के पहले ही देशी मगध-धुरी बदला चुकाएगी, और सैकड़ों वर्ष तक भारत पर अपना प्रभुत्व कायम करेगी और आक्रमण के समय तक, कृष्ण की भूमि के नजदीक यानि कन्नौज और उज्जैन तक खिसक चुकी होगी, किंतु अशक्त अवस्था में। त्रिकालदर्शी ने देखा शायद सब कुछ हो, लेकिन कुछ कर न सका हो। वह हमेशा के लिए अपने देशवासियों को कैसे ज्ञानी और साधु दोनों बनाता। वह तो केवल रास्ता दिखा सकता था। रास्ते में भी शायद त्रुटि थी। त्रिकालदर्शी को यह भी देखना चाहिए था कि उसके रास्ते पर ज्ञानी ही नहीं, अनाड़ी भी चलेंगे और वे कितना भारी नुकसान उठाएँगे। राम के रास्ते चल कर अनाड़ी का भी अधिक नहीं-बिगड़ता, चाहे बनना भी कम होता हो। अनाड़ी ने कुरू-पांचाल संधि का क्या किया? कुरू-धुरी की आधार-शिला थी कुरू-पांचाल संधि। आसपास के इन दोनों इलाकों का वज्र समान एका कायम करना था जो कृष्ण ने उन लीलाओं के द्वारा किया, जिनसे पांचाली का विवाह पाँचों पाण्डवों से हो गया। यह पांचाली भी अदभुत नारी थी। द्रौपदी से बढ़ कर, भारत की कोर्इ प्रखरमुखी और ज्ञानी नारी नहीं । कैसे कुरू- सभा को उत्तर देने के लिए ललकारती है कि जो आदमी अपने को हार चुका है क्या दूसरे को दाँव पर रखने की उसमें स्वतंत्र सत्ता है? पाँचों पाण्डव और अजर्ुन भी उसके सामने फीके थे यह कृष्णा तो कृष्ण के ही लायक थी। महाभारत का नायक कृष्ण, नायिका कृष्णा। कृष्णा का संबंध भी विश्व साहित्य में बेमिसाल है। दोनों सखा-सखी ही क्यों रहे? कभी कुछ और दोनों में से किसी ने होना चाहा? क्या सखा-सखी का संबंध पूर्ण रूप से मन की देन थी या उसमें कुरू-धुरी के निर्माण और फैलाव का अंश था? जो हो, कृष्ण और कृष्णा का यह संबंध राधा और कृष्ण के संबंध से कम नहीं, लेकिन साहित्यकारों और भक्तों की नजर इस ओर नहीं पड़ी है। हो सकता है कि भारत की पूर्व-पशिचम एकता के इस निर्माता को अपनी ही सीख के अनुसार केवल कर्म, न कि कर्मफल का अधिकारी होना पड़ा, शायद इसलिए कि यदि वह स्वयं कर्मफल हेतु बन जाता, तो इतना अनहोना निर्माता हो ही नहीं सकता था। उसने की भी लालच न की कि अपनी मथुरा को ही धुरी-केंद्र बनाये। उसके लिए दूसरों का इन्द्रप्रस्थ और हसितनापुर ही अच्छा रहा। उसी तरह कृष्णा को भी सखी रूप में रखा, जिसे संसार अपनी कहता है, वैसी न बनाया। कौन जाने कृष्ण के लिए यह सहज था उसमें भी उसका दिल दुखा था। कृष्णा अपने नाम के अनुरूप सांवली थी, महान सुंदरी रही होगी। उसकी बुद्धि का तेज, उसकी चकित हरिणी सी आँखों में चमकता रहा होगा। गोरी की अपेक्षा सुंदर, सांवली, नखशिख, और अंग में अधिक सुडौल होती है। राधा गोरी रही होगी। बालक और युवक कृष्ण राधा में एकरस रहा। प्रौढ़ कृष्ण के मन पर कृष्णा छायी रही होगी राधा और कृष्ण तो एक थे ही। कृष्ण की संतानें कब तक उसकी भूल दोहराती रहेंगी? बेखबर जवानी में गोरी से उलझना और अधेड़ अवस्था में श्याम को निहारा। कृष्णा-कृष्ण संबंध में और कुछ हो न हो, भारतीय मर्दों को श्यामा की तुलना में गोरी के प्रति अपने पक्षपात पर मनन करना चाहिए। रामायण की नायिका गोरी है। महाभारत की नायिका कृष्णा है। गोरी की अपेक्षा साँवली अधिक सजीव है। जो भी हो, इसी कृष्ण-कृष्णा संबंध का अनाड़ी हाथों फिर पुनर्जन्म हुआ। न रहा उसमें कर्मफल और कर्मफल हेतु त्याग। कृष्णा पांचाल यानी कन्नौज के इलाके की थी, संयुक्ता भी। धुरी-केंद्र इंद्रप्रस्थ का अनाड़ी राजा पृथ्वीराज अपने पुरखे कृष्ण के रास्ते न चल सका। जिस पांचाली द्रौपदी के जरिये कुरू-धुरी की आधार-शिला रखी गयी, उसी पांचाली संयुक्ता के जरिये दिल्ली कन्नौज की होड़ हुर्इ जो विदेशियों के सफल आक्रमणों का कारण बनी। कभी-कभी लगता है कि व्यकित का तो नहीं लेकिन इतिहास का पुनर्जन्म होता है, कभी फीका, कभी रंगीला। कहां द्रौपदी और कहां संयुक्ता, कहाँ कृष्ण और कहाँ पृथ्वीराज। यह सही है। फीका और मारात्मक पुनर्जन्म, लेकिन पुनर्जन्म तो है ही। कृष्ण की कुरू-धुरी के और भी रहस्य रहे होंगे। साफ है कि राम आदर्शवादी एकरूप एकत्व का निर्माता और प्रतीक था। उसी तरह जरासंध भौतिकवाद का युद्ध मानने लगे हैं । यह सही जँचता है, किंतु है अधूरा विवेचन। जरासंध भौतिकवादी एकरूप एकत्व का प्रादुर्भाव हुआ और उसी के अनुरूप बौद्ध धर्म का। कृष्ण आदर्शवादी बहुरूप एकत्व का निर्माता था। जहां तक मुझे मालूम है, अभी तक भारत का निर्माण भौतिकवादी बहुरूप एकत्व के आधार पर भारत का निर्माण होगा। अभी तक तो कृष्ण की बहुरूपता में वह त्रिकाल जीवन है जो औरों में नहीं। कृष्ण यादव-शिरोमणि था, केवल क्षत्रिय राजा ही नहीं, शायद क्षत्रिय उतना नहीं था, जितना अहीर। तभी तो अहीरिन राधा की जगह अडिग है,क्षत्राणी उसे हटा न पायी। विराट विश्व और त्रिकाल के उपयुक्त कृष्ण बहुरूप था। राम और जरासंध एकरूप थे, चाहे आदर्शवादी एकरूपता में केंद्रीकरण और क्रूरता कम हो, लेकिन कुछ न कुछ केंद्रीकरण था, शायद क्रूरता भी। बेचारे कृष्ण ने इतनी नि:स्वार्थ मेहनत की, लेकिन जन-मन में राम ही आगे रहा। सिर्फ बंगाल में ही मुर्दे 'बोल हरि, हरि बोल के उच्चारण से अपनी आखिरी यात्रा पर निकाले जाते हैं, नहीं तो कुछ दक्षिण को छोड़कर सारे भारत में हिंदू मुर्दे-'राम नाम सत्य है के ही साथ ले जाये जाते हैं। बंगाल के इतना तो नहीं फिर भी उड़ीसा और असम में कृष्ण का स्थान अच्छा है। कहना मुशिकल है कि राम और कृष्ण में कौन उन्नीस, कौन बीस है। सबसे आश्चर्य की बात है कि स्वयं ब्रज के चारों ओर की भूमि के लोग भी वहाँ एक दूसरे को' जै रामजी नमस्ते करते हैं। सड़क चलते अनजान लोगों को भी यह 'जै रामजी बड़ा मीठा लगता है, शायद एक कारण यह भी हो। राम त्रेता के मीठे, शांत और सुसंस्कृत युग का देव है। कृष्ण पके, जटिल, तीखे और प्रखर बुद्धि का देव है। राम गम्य है। कृष्ण अगम्य है। कृष्ण ने इतनी अधिक मेहनत की कि उसके वंशज उसे अपना अंतिम आदर्श बनाने से घबड़ाते हैं, यदि बनाते भी हैं, तो उसके मित्रभेद और कूटनीति की नकल करते हैं, उसका निस्व उनके लिए असाघ्य रहता है। इसलिए कृष्ण हिंदुस्तान में कर्म का देव न बन सका। कृष्ण ने कर्म राम से ज्यादा किए हैं। कितने संधि और विग्रह और प्रदेशों के आपसी संबंधों के धागे उसे पलटने पड़ते थे । यह बड़ी मेहनत और बड़ा पराक्रम था। इसके यह मतलब नहीं कि प्रदेशों के आपसी संबंधों में कृष्ण नीति अब भी चलायी जाए। कृष्ण जो पूर्व-पशिचम को एकता दे गया, उसी के साथ-साथ उसी नीति का औचित्य भी खतम हो गया। बच गया कृष्ण का मन और उसकी वाणी। और बच गया राम का कर्म। अभी तक हिंदुस्तानी इन दोनों का समन्वय नहीं कर पाये है। करें, तो राम के कर्म में भी परिर्वतन आये। राम रोऊ है। इतना कि मर्यादा भंग होती है। कृष्ण कभी रोता नहीं। आँखें जरूर डबडबाती हैं उसकी कुछ मौकों पर, जैसे जब किसी सखी या नारी को दुष्ट लोग नंगा करने की कोशिश करते हैं। कैसे मन और वाणी थे कृष्ण के। अब भी, तब की गोपियां और जो चाहें, हम मुरली की तान सुन कर रस विभोर हो सकते हैंं और अपने चमड़े बाहर उछाल सकते हैं। साथ ही कर्म संग के त्याग, सुख-दुख, शीत-उष्ण, यज, अजय के सतम्व के योग और सब भूतों में एक अव्यय भाव का सुरीला दर्शन, उसी वाणी से सुन सकते हैं। संसार में एक कृष्ण ही हुआ जिसने दर्शन को गीत बनाया। वाणी की देवी द्रौपदी से कृष्ण का संबंध कैसा था? क्या सखा-सखी का संबंध स्वयं एक अंतिम सीढ़ी और असीम मैदान है, जिसके बाद और किसी सीढ़ी और मैदान की जरूरत नहीं? कृष्ण छलिया जरूर था लेकिन कृष्णा से उसने कभी छल न किया। शायद वचन-बद्ध था, इसलिए। जब कभी कृष्णा ने उसे याद किया, वह आया। स्त्री-पुरूष की किसलय-मित्रता को, आजकल के वैज्ञानिक अवरूद्ध रसिकता के नाम से पुकारते हैं। यह अवरोध सामाजिक या मन के आंतरिक कारणों से हो सकता है। पांचों पाण्डव कृष्ण के भार्इ थे और द्रौपदी कुरू-पांचाल संधि की आधर-शिला थी। अवरोध के सभी कारण मौजूद थे फिर भी, हो सकता है कि कृ्रष्ण को अपनी चित्तवृत्तियों का कभी निरोध न करना पड़ा हो। यह उसके लिए सहज और अंतिम संबंध था, ठीक उतना ही सहज और अंतिम और रसमय जैसा राधा से प्रेम का संबंध था। अगर यह सही है, तो कृष्ण-कृष्णा के सखा-सखी संबंध का व्योरा दुनिया में विख्यात होना चाहिए, और तफसील से, जिससे पुरूष-स्त्री संबंध का एक नया कमरा खुल सके। अगर राधा की छटा कृष्ण पर हमेशा छायी रहती है तो कृष्ण की छटा भी उस पर छायी रहती है। अगर राधा की छटा निराली है, तो कृष्णा की घटा भीं छटा में तुषिटप्रधान रस है, घटा में उत्कंठा-पधान कर्तव्य । राधा-रस तो निराला है ही। राधा-कृष्ण एक हैं, राधा-कृष्ण का, स्त्री का जिक्र बहुत पुराना नहीं हैं, क्योंकि सबसे पहली बार पुराण में आता है ' अनुराधा के नाम से। नाम ही बताता है प्रेम और भकित का वह स्वरूप, जो आत्मविभोर है, जिसमें सीमा बाँधने वाली चमड़ी रह नहीं जाती। आधुनिक समय में मीरा ने भी उस आत्मविभोरता को पाने की कोशिश की। बहुत दूर तक गयी मीरा, शायद उतनी दूर गयी जितना किसी सजीव देह को किसी याद के लिए जाना संभव हो। फिर भी मीरा की आत्मविभोरता मेें कुछ गर्मी थी। कृष्ण को तो कौन जला सकता है, झुलसा भी नहीं सकता, लकिन गरमी तो लगे। राधा न गरम है, न ठंडी है, राधा पूर्ण है। मीरा की कहानी एक और अर्थ में बेजोड़ है। पदमिनी मीरा की पुरखिन थी, दोनों चित्तौड़ की नायिकाएं हैं। करीब ढार्इ सौ वर्ष का अंतर है। कौन बड़ी है, वह पदमिनी जो जौहर करती है या वह मीरा जिसे कृष्ण के लिए नाचने से कोर्इ मना न कर सका। पुराने देश की यही प्रतिभा है। बड़ा जमाना देखा है इस हिंदुस्तान ने। क्या पदमिनी थकती-थकती सैकड़ों बरस में मीरा बन जाती है? या मीरा ही पदमिनी का श्रेष्ठ स्वरूप है? अथवा जब प्रताप जाता है, तब मीरा फिर पदमिनी बनती है। हे त्रिकालदर्शी कृष्ण! क्या तुम एक ही में मीरा और पदमिनी नहीं बना सकते? राधा-रस का पूरा मजा तो ब्रज-रज में मिलता है। सरयू और अयोध्या का बेटा हूं। ब्रजरज में शायद कभी न लौट सकूंगा। लेकिन मन से तो लौट चुका हूं। श्रीराधा की नगरी बरसाने के पास एक रात रह कर मैंने राधारानी के गीत सुने हैं। कृष्ण बड़ा छलिया था। कभी श्यामा मालिन बन कर राधा को फूल बेचने आता था। कभी वैध बन कर आता था, प्रमाण देने के लिए। राधा अभी ससुराल जाने लायक नहीं है। कभी राधा प्यारी को गोदाने का न्योता देने के लिए गोदनहारिन बन कर आता था। कभी वृन्दा की साड़ी पहन कर आता था, और जब राधा उससे एक बार चिपट कर अलग होती थी, शायद झुंझला कर, शायद इतरा कर, तब श्रीकृष्ण मुरारी को ही छटठी का दूध याद आता था, बैठ कर समझाओ राधा-रानी को कि वृंदा से आँखें नहीं लड़ायी। मैं समझता हूं कि नारी अगर कहीं नर के बराबर हुर्इ है, तो सिर्फ ब्रज में और कान्हा के पास। शायद इसीलिए आज भी हिंदुस्तान की औरतें वृंदावन में जमुना किनारे एक पेड़ में रूमाल जितनी चुनरी बांधने का अभिनय करती है। कौन औरत नहीं चाहेगी कन्हैया से अपनी चुनरी हरवाना, क्योंकि कौन औरत नहीं जानती कि दुष्ट जनों के द्वार चीर हरण के समय कृष्ण ही उनकी चुनरी अनन्त करेगा। शायद जो औरतें पेड़ में चीर बाँधती हैं, उन्हें यह सब बताने पर वे लजाएंगी, लेकिन उनके पुत्र-पुण्य आदि की कामना के पीछे भी कौन-सी सुषुप्त याद है? ब्रज की मुरली लोगों के इतना विàल कैसे बना देती है कि वे कुरूक्षेत्र के कृष्ण को भूल जाएँ, और फिर मुझे तो लगता है कि अयोध्या का राम मणिपुर से द्वारिका के कृष्ण को कभी भुलाने न देगा। जहाँ मैंने चीर बाँधने का अभिनय देखा, उसी के नीचे वृन्दावन के गंदे पानी का नाला बहते देखा, जो जमुना से मिलता है और राधारानी के बरसाने की रंगीली गली में पैर बचा-बचा कर रखना पड़ता है कि कहीं किसी गंदगी में न सन जाए। यह वह रंगीली गली है, जहां बरसाने की औरतें हर होली पर लाठी ले कर निकलती हैं और जिसके नुक्कड़ पर नंद गाँव के मर्द मोटे साफे बाँध और बड़ी ढालों से अपनी ऱक्षा करते हैं। राधारानी अगर कहीं आ जाए, तो वह इन नालों और गंदगियों को तो खत्म करे ही, बरसाने के औरतों के हाथ में इत्र, गुलाला और हल्के, भीनी महक वाले, रंग की पिचकारी थमाये और नंद गाँव के मर्दों को होली खेलने के लिए न्योता दे। ब्रज में महक नहीं है, कुंज नहीं है, केवल करील रह गये हैं। शीतलता खत्म है। बरसाने में मैंने राधारानी की अहीरिनों को बहुत ढ़ूंढ़ा। पांच-दस घर होंगे। वहां बनियाइनों और ब्राह्राणियों का जमाव हो गया हैं जब किसी जाति में कोर्इ बड़ा आदमी या कड़ी औरत हुर्इ तीर्थ-स्थान बना और मंदिर और दुकानें देखते-देखते आयीं। तब इन द्विज नारियों के चेहरे भी म्लान थे, गरीब, कृश और रोगी। कुछ लोग मुझे मूर्खतावश द्विज-शत्रु समझने लगे हैं। मैं तो द्विज-मित्र हूं, इसलिए देख रहा हूं कि राधारानी की गोपियों, मल्लाहिनों और चमाइनों को हटा कर द्विज नारियों ने भी अपनी कांति खो दी है। मिलाओ ब्रज की रज में पुष्पों की महक, दो हिंदुस्तान को कृष्ण की बहुरूपी एकता, हटाओ राम का एकरूपी द्विज-शूद्र धर्म, लेकिन चलो राम के मर्यादा वाले रास्ते पर, सच और नियम पालन कर। सरयू और गंगा कर्तव्य की नदियाँ हैंं। कर्तव्य कभी-कभी कठोर होकर अन्यायी हो जाता है, और नुकसान कर बैठता है। जमुना और चम्बल, केन तथा दूसरी जमुनामुखी नदियां रस की नदियां हैं। रस में मिलन है, कलह मिटाता है। लेकिन लास्य भी है, जो गिरावट में मनुष्य को निकम्मा बना देता है। इसी रसभरी इतराती जमुना के किनारे कृष्ण ने अपनी लीला की, लेकिन कुरू-धुरी का केंद्र उसने गंगा के किनारे ही बरसाया। बाद में हिंदुस्तान के कुछ राज्य जमुना के किनारे बने और एक अब भी चल रहा है। जमुना क्या तुम कभी बदलोगी, आखिर गंगा में ही तो गिरती हो। क्या की भी इस भूमि पर रसमय कर्तव्य का उदय होगा? कृष्ण! कौन जाने तुम थे या नहीं? कौन तुमने राधालीला को कुरू-लीला से निभाया। लोग कहते हैं कि युवा कृष्ण का प्रौढ़ कृष्ण से कोर्इ संबंध नहीं। बताते हैं कि महाभारत में राधा का नाम तक नहींं बात इतनी सच नहीं, क्योंकि शिशुपाल ने क्रोध में कृष्ण की पुरानी बातें साधारण तौर पर बिना नामकरण के बतायी हैं। सभ्य लोग ऐसे जिक्र असमय नहीं किया करते, जो समझते हैं वे, और जो नहीं समझते हैं, वे भी। महाभारत में राधा का जिक्र हो सकता है। राधा का वर्णन तो वहीं होगा जहां तीन लोक का स्वामी उसका दास है। रास का कृष्ण और गीता का कृष्ण एक है। न जाने हजारों वर्ष से अभी तक पलड़ा इधर या उधर क्यों भारी हो जात है? बताओ कृष्ण!