डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
महाष्टमी की मध्यरात्रि को छिन्नमस्ता के चरणों में राममनोहर ने अपने जीवन की बलि दे दी
महाष्टमी की मध्यरात्रि को छिन्नमस्ता के चरणों में राममनोहर ने अपने जीवन की बलि दे दी। छिन्नमस्ता, देवी का वह रूप है जिसमें वह स्वयं ही अपना रक्त पान करती है। पिछले कर्इ वर्षों से राममनोहर अक्षरश: अपना ही रक्तपान कर रहे थे मानवजाति की इस काल-निशा में चारों तरफ जो भटठी जल रही थी, उसने जीने के रस का स्रोत शुष्क कर दिया था। भारतीय दर्शन के अनुसार कीट पतंग से लेकर मनुष्य पर्यन्त सभी प्राणियों के जीवन के मूल में ''स्व का रस रहता है। इसी को योगदर्शन ने ''स्वरसवाही कहा था। अन्य जीवनों की तुलना में इस रस की सबसे अधिक आवश्यकता राममनोहर के जीवन में थी, इसलिए कि फैजाबाद जिले के अकबरपुर शहर में चार वर्ष के नन्हेंं शिशु के दिल में जो आग जली थी, वह कभी बुझ नहीं पायी।
एक ओर अत्याचार, उत्पीड़न और असमानता के विरूद्ध क्षोभ तथा दूसरी ओर पीडि़तों के लिए करूणा, एक अच्छे व्यकित के अंतर में सहिज ही संभव है। लेकिन राममनोहर के जीवन में, ऐसा लगता था, जैसे अन्याय और पाखंड के विरूद्ध उनका क्षोभ, केवल उनके अंतर की भावना न रहकर, उनके रक्त-मांस तथा स्नायुतंतुओं को झंकृत कर दिया करते थे और यह सिथति उनके जीवन की मूल भावनावृति (पैसन) बन गयी थी। उनकी इस वृत्ति के उíाम रूप को देखकर मैं कभी-कभी अवाक हो जाता था।
अक्सर वह अपनी मित्र मंडली से घिरा रहा करते थे। एक दिन लखनऊ में आचार्य नरेन्द्रदेव जी के निवास पर हम दोनों एक कमरे में विश्राम कर रहे थे। अकेला पाकर मैंने पूछा- ''राममनोहर, तुम्हारी इस आग का ऐतिहासिक स्रोत कहां है, बता सकते हो? मुझे लगता है तुम्हारे जीवन की किसी घटना में इसका स्रोत छिपा है। वह उठकर बैठ गये, कहने लगे- ''जब मैं चार वर्ष का बच्चा था उस समय ही, मेरे साथ खेलने के लिए धनियों के बच्चे आते, परंतु उनका व्यवहार मेरे अंतर पर चोट करता था। सात-आठ वर्ष की उम्र में, इसी तरह कलकत्ता के लखपतियों के बच्चों को करते देखा। इस व्यवहार से वितृष्णा और विक्षोभ जो जगे वे मेरे अंतर की अमिट लकीर बन गये। आगे आकर नेताओं के पाखण्ड और अवसरवादिता ने इस अगिन में घी की आहुुति दी। इसी भित्ति पर खड़ी हुर्इ शोषित-वर्ग के ऊपर होनेवाले सामाजिक और आर्थिक अत्याचारों के खिलाफ उनके विद्रोह की भावना!- यही आग सुदूर अमरीका में निग्रो जाति के ऊपर होनवाले अत्याचार के विरूद्ध उन्हें वहां के जेल में ले गयी। नेपाल की राणाशाही के विरूद्ध सक्रिय विद्रोह का उन्होंने नेतृत्व किया और इसी आग के चलते वे नारी-जाति के संरक्षक बन बैठे। देश-विदेश की नारियाँ पीडि़त होकर उन्हें अपनी व्यथाएँ कहती या लिख भेजतीं। लेकिन केवल आग की लपटें किसी के जीवन का धारण नहीं कर सकती। लेकिन आग के साथ-साथ रस न रहे तो जीवन इन लपटों में जलकर भस्म हो जाय। इसी कारण वेद की भाषा में कहा गया है कि अगिन और सोम का संयोग ही सृषिट का धारण करता है।
एक दिन रेल में सफर करते हुए मैंने पूछा,'' राममनोहर, तुम्हारे जीवन का दर्शन क्या है? उन्होंने अंग्रेजी में उत्तर दिया-''एवर ग्रीन लाइफ (सदाबहार जीवन-रस)। यह जर्मन भाषा के एक शब्द का, जिसे मैं अब भूल गया हूं, अँग्रेजी अनुवाद था और यही शब्द जर्मन युवक आंदोलन का प्रधान सांस्कृतिक आधार था। बंगाल के युवक-आंदोलन में सक्रिय भाग लेकर जब वे जर्मनी गये तो वहां जाते ही, जर्मन युवक- आंदोलन में पिल पड़े। 'म्युनिक, स्ट्रेटगार्ड और बर्लिन के कैफे में जर्मन युवक-युवतियों के साथ गप्पे लड़ाना और पैम्पलेट लिखना, उनका रोजमर्रे का काम बन गया था। इसी समय एक तरफ उन्हें दीखी जर्मन सोशल डेमोक्रेसी की रीढ़हीनता और दूसरी ओर जर्मन युवक-युवतियों का उíीप्त जीवन-प्रवाह।
जर्मन युवक-आंदोलन भारतीय स्वतंत्रता-संग्राम का बहुत बड़ा पोषक थां उनके बीच में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी गाँधीजी की चर्चा अक्सर होती परंतु गाँधी जी की भगवान तथा धर्म की चर्चा वे समझ नही पाते और अवसर कैफे की बहसों में उन्हें चुप हो जाना पड़ता।
एक दिन गांधी जी के एक वक्तव्य की कुछ पंकितयाँ जर्मन पत्रों में प्रकाशित हुर्इ जिनका भावार्थ था-
''पंछी भी तभी गाना गाता है ज बवह दाना चुग लेता है। भूखों का भगवान रोटी है।
राममनोहर एक दिन कहने लगे कि इन वाक्यों को लेकर उस दिन किस तरह वे उछल पड़े थे और कर्इ सप्ताह जर्मन युवक-आंदोलन के केंद्रों में घूम-घूम कर वह इन वाक्यों के आधार पर पर्चे तैयार कर तथा व्याख्यान देकर जर्मन युवक-युवतियों की, भारतीय राष्ट्रीय संग्राम के आधार के संबंध में, गलतफहमियाँ मिटाने में समर्थ हुए।
गंधीजी के साथ विरोधी की प्रखरता के बीच उनका संबंध आजीवन मधुर बना रहा। एक बातचीत के सिलसिले में गांधीजी ने कहा था'' अनेक लोगों में अनेक गुण हैं परंतु तुम्हारा शील मुझे बहुत प्रभावित करता है। पिछले दिनों उनके व्यवहार में कठोरता और तिäता आ गर्इ। उसके भुक्त-भोगी लोग गांधी जी द्वारा 'शील शब्द के व्यवहार से संभवत: हँसें। परंतु मैंने शील की अन्तर्धारा को अनेक कठिन प्रसंगों के बीच उनके जीवन में देखा।
कटुता और तिäता उनके जीवन के पिछले भाग में प्रबल हो उठी। जब 1955 में, राजस्थान के रेगिस्तान में, उनके ऊपर अनुशासन की आड़ में बज्र-प्रहार किया गया, तो वह तिलमिला उठे। उसके बाद धीरे-धीरे उनके जीवन से शील की अभिव्यकित कम होती गर्इ और कटुता बढ़ती गर्इ।
इसी प्रसंग में, 8 अगस्त 1942 की संध्या के समय बिड़ला भवन, बंबर्इ में गांधीजी के साथ बात-चीत की याद आती हैं उस ऐतिहासिक गिरफ्तारी के पहले गांधीजी ने बातचीत के लिए संध्या 7 बजे का समय दिया था। डा0 लोहिया को अगुआ बनाकर सोशलिस्ट पार्टी का एक छोटा प्रतिनिधि-मंडल गांधीजी से मिलने गया। उस प्रतिनिधि मंडल में लेखक भी था। हमलोगों के बैठने के साथ ही सरदार वल्लभ भार्इ पटेल आकर बैठ गये। सोशलिस्टों से सरदार का संबंध कर्इ वर्षों से तीखा-सा था। संभवत: इसी कारण गांधीजी ने सरदार के बैठते ही कहा-'' हमारी बातचीत में सरदार भी रहना चाहते हैं, यदि आपलोग को कोर्इ आपत्ति न हो ।
हमलोग की ओर से डा0 लोहिया ने अत्यन्त नम्रता से उत्तर दिया-
''पिछली बातों को याद कर हम इस महान संग्राम में प्रवृत नहीं हो सकते। आज वल्लभ भार्इ हम सब के प्रिय और सरदार बन गये हैं।
मुख्य बातचीत को प्रारंभ करते हुए गांधीजी ने कहा-'' पिछले कर्इ वर्षों में मेरे वक्तव्यों में विरोध दीख पड़ता है, यदि समय मिला तो इसका स्पष्टीकरण करूँगा। डा0 लोहिया ने तुरंत ही उत्तर दिया- '' गांधीजी, इन विरोधाभासों में आज हमारी दिलचस्पी नहीं है। जो आप आज कह रहे हैं वह हमारे अंदर की आवाज है। हम आज जो आप कहते हैं उसी से संतुष्ट हैं। फिर गाँधीजी ने '' करो या मरो की मार्मिक व्याख्या दी और 1942 की क्रांति किस धारा पर चले इसका निर्देश दिया।
जीवन का पौधा चिर दिन हरा और उत्फुल्ल बना रहे, यह उनका जीवन दर्शन था। एक लेख में कभी उन्होंने लिखा था- '' जीवन के दो प्रधान आकर्षण रहे हैं- भगवान और नारी। फिर उन्होंने कहीं यह भी कहा था- '' मेरा दुर्भाग्य है कि भगवान को मैं समझ नहीं पाया और नारी मुझे स्पर्श देकर चली गयी।
मैंने पिछले एक लेख में लिखा- किसी पद का लोभ और किसी नारी के केशपास उन्हें बांध नहीं सके। राममनोहर कुंआरा ही रह गया। चीन, जर्मनी, अमरीका तथा अन्य देशों के समाजवादी आंदोलन जिन चटटानों पर टकरा कर टूट गये, वे उन्हें भूले नहीं थे। उन्हें यह भी ज्ञात था कि अच्छे से अच्छे कार्यक्रम तान तथा मात्रा के अभाव में जनता के दिलों पर अपनी गहरी छाप नहीं बैठा पाते।
मेरी और डाक्टर लोहिया की पहली मुलाकात इलाहाबाद स्टेशन के रेस्तराँ में हुर्इ थी। उस समय पूर्णिमा भी उनके साथ थी। उन दिनों जर्मनी से वापस आकर, आनंद भवन में, अखिल भारतीय काँग्रेस कमिटी के विदेश विभाग में वह काम कर रहे थे। उस पहली बातचीत में ही उन्होंने तान और मात्रा की चर्चा निकाली थी।
आगे चलकर जब 1934 के साथी इधर-उधर बिखर गए तो प्रश्न उठा- '' अब क्या? भारतीय समाजवादी आंदोलन में एक संकट का युग आ गया। 1908 और 1910 में भारतीय राष्ट्रीयता आंदोलन में भी एक ऐसा ही समय आया था। उस समय 'फलक (आकाश) उपनाम-धारी स्वर्गीय कवि लालचंद ने शायरी की थी-
''सूफी औ अजीत ने टर्की की राह ली,
बाकी था लाजपत वो भी मैदाँ से टल गया।
सरला और दीनानाथ ने पकड़ी है रविश नर्इ,
तू भी बदल फलक कि जमाना बदल गया।।
सोशलिस्ट पार्टी के कानपुर-सम्मेलन के बाद धीरे-धीरे कोर्इ इधर गया, कोइ्र उधर गया और 1954 में राममनोहर के जीवन में वैसा ही प्रश्न उठा-
तू भी बदल फलक कि जमाना बदल गया ।
पर जमाने को अपने सपनों की अनुरूपता में बदल डालने की ढृढ़ता से ओत-प्रोत राममनोहर को बदलता रहने वाला जमाना कैसे बदल देता? जीवन के असीम साहस के साथ उन्होंने समाजवादी आंदोलन के झण्डे को अकेले ऊँचा रखने का व्रत लिया।
तब तक हिंदुस्तान के समाज की धरती सड़ चुकी थी। चारों तरफ सस्ते भोग की लालसा धू-धू कर जल रही थी। राममनोहर एक तरफ से जो बना आते थे, वही दूसरी तरफ से टूट जाता था। उनकी वाणी का तीखापन और भी तीखा और कटु होता गया। भद्रता की सीमा का उल्लंघन कर छूटने वाले उनकी वाणी के तीखे तीरों की बौछार से भारत के बडे़-बड़े लोग तिलमिला उठे। बहुत से लोगों ने मुझसे आकर पूछा- '' उनकी वाणी को संयत करने के लिए आप क्यों नहीं कुछ करते? मैं उन्हें स्पष्ट उत्तर दे देता- '' यह संभव नहीं । लेनिन ने कहा था- '' शोषितों की पीड़ा की ज्वाला जिसके अंतर में अरहर जलेगी, उसकी वाणी में मिठास नहीं रह सकती। राममनोहर जिस आग में जलते थे, उसकी व्यंजना आसावरी के मीठे स्वर में संभव नहीं थी।
जब पहले-पहल पार्लियामेंट में चुनकर वे दिल्ली गये तो स्टेटमैन के संपादक ने लिखा था- '' ए बुल इन द चाइना शाप। राममनोहर सच ही एक ठिगने साँढ़ की तरह पार्लियामेंट में घुसे थे। स्टैटसमैन के संपादक ने चेष्टा तो की थी राममनोहर को गाली देने की, लेकिन उसने पार्लियामेंट को 'चाइना शाप की उपमा देकर अनजाने ही, पार्लियामेंट की ही छीछालेदर की। पार्लियामेंट-भवन को जिन लागों ने नाजुक चीनी मिटटी के बत्र्तनों का भंडार बना दिया, इतिहास उनसे ही इसका उत्तर पूछेगा।
लेकिन इस आग की ज्वाला में पड़े रहकर भी मानसिक संतुलन डाक्टर लोहिया रख पाते थे, यह एक महान आश्चर्य है। अन्याय के प्रति क्षोभ और जीवनवृक्ष को अनवरत हरियाली के रस से सदाबहार बनाये रखने की अलमस्त चाह- डाक्टर लोहिया के जीवन की इन दो धाराओं- पर पहले प्रकाश डाल चुका हूं। लेकिन गंगा और यमुना के साथ-साथ सरस्वती की अन्त: सलिला तीसरी धारा भी थी, जिसे उन्होंने बराबर गुप्त ही रक्खा। लेकिन अब उसपर प्रकाश डालने में कोर्इ हर्ज नहीं है। अपने जीवन की शायद ही कोर्इ बात वे मुझसे गुप्त रखते थे।
हैदराबाद में श्री बदरी विशाल पित्ती के घर पर हम दोनों एक बार ठहरे थे । एक संध्या को बदरी विशाल मुझे राममनोहर के कमरे में ले गये। देखा राममनोहर चित्त पड़े हैं और उनके मुँह से अद्र्धचेतनावस्था में किसी वक्तव्य के कुछ वाक्य अदर्धस्फुट निकल रहे हैंं मैं कमरे से बाहर आ गया। मैं जानता था कि उनके जीवन की तीसरी धारा, जो अन्त: सलिला है, उसकी ही इस तरह कभी-कभी अभिव्यंजना हो जाती थी।
वे अक्सर कहा करते- '' क्या सारा योग-दर्शन योगशिचत्त- वृत्तिनिरोध: में नहीं समा जाता? जर्मनी जाने से पहले ही उन्होंने योगदर्शन का अध्ययन कर लिया था और अपनी पद्धति से वह चित्त वृत्तिनिरोध की चेष्टा आजीवन करते रहे। यही था वह आधार जहां से उनके जीवन की अदभुत मौलिकता उदभूत होती थी। यह निशिचतरूप से कह सकता हूं कि भारत के राजनीतिक आकाश में मौलिक विचारों का एक चमकता हुआ सितारा राममनोहर के साथ ही टूट गया। सृजनात्मक विचार या मौलिक विचार निरूद्ध वृत्तियों के परे के क्षेत्र-स्पर्श से ही निकलते हैं। विश्व-राष्ट्र, तीसरा कैम्प, भूमि-सेना, राज्य और सरकार का भेद, चौखम्भा राज्य आदि उनके वाक्य आज भारतीय राजनीति के प्रचलित बिंदु बन गये हैं पर मूलत: वे लोहिया के ही मौलिक चिंतन की उपज थे। चित्तवृत्तिनिरोध की साधना उन्होंने कैसे और कब पायी यह कहना आज संभव नहीं है। हो सकता है इसका बीज उन्होंने अपने स्वर्गीय पिता श्री हीरालाल लोहिया से पाया हो। आदरणीय श्री हीरालाल जी से मेरा परिचय हजारीबाग जेल में हुआ और उनके वात्सल्य प्रेम को हम-सब ने निकट से देखा। हीरालाल जी राममनोहर लोहिया के नाते, अपने को सोशलिस्ट पार्टी का बाप कहते और अपने वात्सल्य-प्रेम का प्रकाश देते हम सबको सप्ताह में दो बार मिठार्इ खिलाकर! कितने श्रम से सारा दिन लगाकर अपने हाथों से वह मिठार्इ तैयार करते और हमें जबतक भरपेट खिला नहीं देते उन्हें संतोष नहीं होता! राममनोहर के प्रेम-संबंधों की चर्चा, उनके बचपन की कथाएँ बड़े रस के साथ, वह मुझे सुनाते।
एक लेख में राममनोहर ने एकबार लिखा था, '' लगता है मानव विचार-धारा नये विचार-अंतरीपों की खोज की प्रेरणा ही जैसे खो चुकी है! विज्ञान के गगन-चुंबी चमत्कार से जैसे एक तरफ विचारकों की अन्तर्विचार-नेत्र अभिभूत से हो गये हैं वैसे ही दूसरी ओर मानव जाति ने धर्म और सम्प्रदाय का अंतर खो दिया है। जैसे राज्य के स्थायी ध्वज-स्तंभ के आस-पास सरकारें उठती और गिरती हैं, वैसे ही धर्म के ज्योतिस्तम्भ के नीचे संप्रदाय बनते और बिगड़ते हैं। धर्म न हिंदू होता है और न मुसलमान होता है, न इसार्इ और न बौद्ध। धर्म वह चिर सत्य है, वह सनातन ध्वजस्तंभ है, जो भौतिक और आध्यातिमक तत्त्वों का मूल आधार है। उसे जानने, छूने, अनुभव करने की चेष्टा अनंत काल से वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्रों में, मठों, मंदिरों, मसिजदों, गिरजाघरों, आश्रमों में होती रही है और अनंत तक होती रहेगी। उसी के स्पर्श से वैज्ञानिक अनुसंधान-केंद्रों, मंदिरों, मसिजदों, गिरजाघरों के छोटे-छोटे दीप जलते हैं। लेकिन अभागी मानवजाति आज इन्हीं छोटी-छोटी वैज्ञानिक और साम्प्रदायिक दीपशिखाओं को धर्म का घ्वजस्तम्भ मान बैठी। इसी के परिणाम स्वरूप आज मानवजाति चरित्रहीन और उन्मत्त हो उठी है।
1962 के चुनाव में पिटकर जब राममनोहर काशी की गंगा में मेरे साथ एक नौका पर बैठे विचार मंथन कर रहे थे, वे मुझसे पूछते रहे- ''रामनंदन, इस तरह क्यों हो रहा है? मैं उनसे कहता- ''राममनोहर चरित्रहीनता और उन्मत्तता के ताण्डवनृत्य के बीच तुम सृजन की क्रिया नहीं कर सकते। इस सड़ी हुर्इ समाज की धरती में सर्वोदय या समाजवाद जिसका भी पौधा डालोगे, वह सड़ेगा ही।
1967 के चुनाव में वे कांग्रेस को राजसत्ता के एकाधिकार से गिराने में तो सफल हो गये, लेकिन सृजन के काम सफल नहीं हुए। अतृप्त भोगों की वासना और अवसरवादिता उनकी अपनी जमात में भी जलती ही रही।
4 सितंबर 67 को जब वे दुमका में मिलने आये तो मैंने देखा, जीने का रस वे खो चुके हैंं। अगिन थी, पर सोम-रस नहीं था। इतना शीघ्र चले जायेंगे, यह तो उस समय कल्पना नहीं हुर्इ, लेकिन अपनी ही आग में वे जल रहे हैं, ऐसा स्पष्ट दीखता था।
ठीक ऐसी ही आग बलिदान के कुछ सप्ताह पहले, गांधीजी में भी मैंने देखी थी। गांधी जी ने तीव्रवेदना से कहा था- ''रामनंदन, जो लोग मेरी ओर देखते थे वे आज मुझे पिछड़ी संख्या मानते हैं। शतरंज के बादशाह या फर्जी की जगह मैं एक छोटा प्यादा बन गया हूंं। जिन्हें मैंने अपने हाथों, देश के राजसिंहासन पर बैठाया, उन्हें उन्हीं हाथों से गिराने की अभिरूचि नहीं होती । तुम इसे मेरा मोह कह सकते हो। आज अक्षरश: एक भटठी में मैं जल रहा हूं। करीब-करीब ऐसे ही वाक्य राममनोहर ने भी दुमका में कहे थे। हमलोगों ने यह निश्चय किया था कि कुछ दिनों बाद दिल्ली में मिलेंगे और नये सिरे से इन प्रश्नों पर विचार करेंगे। मैंने राममनोहर से कहा था-
'' देश इसे याद रखेगा कि विश्वराज्य का नारा तुमने ही पहले पहले भारतवर्ष में दिया। अब मेरी प्रार्थना है, उसके साथ विश्वधर्म का नारा भी तुम दो विश्वसंस्कृति के आधार पर ही विश्वराज्य का महल बन सकता है। साथ-साथ तुम इसका भी स्पष्टीकरण कर दो कि धर्म और सम्प्रदाय का अंतर क्या है। सम्प्रदाय निरपेक्षता की बात मैं समझ सकता हूं, परंतु धर्मनिरपेक्षता तो पशुता है।
दूसरी बात मैंने कही थी-'' राममनोहर, कार्यक्रम और कार्यकत्र्ता अथवा पथ और पथिक का एक गहरा संबंध है। कार्यक्रम और कार्यकत्र्ता इन दोनों में किसका ज्यादा महत्व है, यह कहना कठिन है, लेकिन आज की हालत में मेरी दृषिट में, कार्यक्रम से ज्यादा महत्व व्यकितयों का हो गया है। विश्वराज्य और विश्वधर्म की स्थापना के लिए उन्मुख इतिहास की धारा महान तपसिवयों को खोज रही हैं यह काम, जिस तरह के लाग सार्वजनिक जमातों में लगे हुए हैं, उनसे संभव नहीं होगा। इसी चटटान पर टकरा कर आनेवाली वर्षों में सर्वोदय संघ, संसोपा, कांग्रेस, कम्युनिस्ट पार्टी, सभी संस्थायें टूटेंगी। फिर नये सिरे से अच्छे लोगों को इकटठा करने की चेष्टा करो।
राममनोहर ने अपने जेब से छोटा-सा नोटबुक निकाल कर उसके किसी पृष्ठ पर लिखा 'कार्यक्रम और व्यकित, और मुझे कहा ' दिल्ली पहुंच कर मैं इस विषय पर लेख लिखूंगा।
उस समय कौन जानता था कि दिल्ली पहुंचकर वे अपने जीवन का अंतिम अध्याय ही लिखने जा रहे हैं? बहुत से लोगों ने मुझसे पूछा है- यह कैसा विधि का विधान की मौत आतताइयों को लंबी आयु देती है और डा. लोहिया जैसे लोगों को अल्पायु में ही ले जाती है? वे शायद नहीं जानते कि मुगल साम्राज्य के पतन के पीछे सिक्ख गुरूओं के बलिदान का कितना बड़ा हाथ था। युगपरिवत्र्तन की कामना से, उन्मुख इतिहास की देवी को राममनोहर के बलिदान की जरूरत थी, जैसे भवभूति ने रामचंद्र के मुख से कहलाया है-
'' स्नेहं दयां च सौख्यं च यदि वा जनकीमपि।
आराधनाय लोकस्य मु¥जतो नासित मे व्यथा।।
राममनोहर शोषित मानवता के चरणों पर अपनी बलि देकर चले गये। युगपरिवर्तन के लिए उन्मुख छिन्नमस्ता समाज की (राजनीतिक, साम्प्रदायिक, औधोगिक आदि) ऊँची कुर्सियों पर बैठे गलित कुष्ठों की बलि लेकर क्या करेगी? उसे तो सानेगुरूजी, गाँधी, राममनोहर, किंगलूथर जैसे पवित्र रक्तों की बलि चाहिए।
'' आगे क्या? इसका उत्तर इतिहास के गर्भ में छिपा है। मैं भवभूति के शब्दों में यही कह सकता हूं-
'उत्पत्स्यतेअसित मम कोअपि समानधर्मा।
कालोáयं निरवधिर्विपुला च पृथ्वी ।।