डा राम मनोहर लोहिया फिलोसोफी

  
लोहिया विचार माला- 5 प्रथम संस्करण : अगस्त, 1996 प्रकाशक : राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद- 500 095
जब तक सेना रहती है, यह सिद्धान्त आप याद रखना, तब तक उसको शकितशाली बना कर और अगर सेना को खत्म करना है तब दूसरे प्रयोग करो। दोनों चीजें साथ-साथ नहीं चल सकती कि सेना को रखो भी और उसको कमजोर रखो। या तो सेना रखो मत, और रखते हो तो उसको शकितशाली बना कर रखो जिससे दुशमन कनखियों से भी देश को देख न पाए। यह निशिचत बात है किक जब तक संसार में अन्याय है तब तक हथियार का खत्म होना असम्भव है। क्योंकि हथियार क्या होता है? हथियार होता है या तो अन्याय करने के लिए या अन्याय से लड़ने के लिए। दूसरे पर कब्जा करना है, दूसरे का माल लूटना है, दूसरे के उपर राज चलाना है, तो हथियार चाहिए, और अत्याचारी को अगर खत्म करना है तब हथियार चाहिए। अत: अन्याय खत्म करना पडे़गा। इसीलिए मैं आपको एक शुभ सन्देश देना चाहता हूं कि सारे संसार में आज एक साथ अन्यायों के खिलाफ लड़ार्इ चल रही है। यही हमारी शताब्दी की खूबी है। हमारी शताब्दी बड़ी क्रूर है, बड़ी बेरहम है। इसमें इतना अत्याचार होता है जितना दुनिया में कभी नहीं हुआ। लेकिन हमारी शताब्दी की एक खूबी यह भी है कि मनुष्य पहली दफा सभी अन्यायों के साथ एक साथ लड़ रहा है, और अगर कहीं जीत गया, तो शायद अगले 25-30 बरस में जो भी अन्याय है, कर्इ किस्म के अन्याय हैं, जाति-बिरादरी वाला अन्याय, कोर्इ उंची जाति, कोर्इ छोटी जाति, गरीब-अमी का अन्याय है, नर-नारी का अन्याय है, गोरे-रंगीन लोगों का अन्याय है, इन सब अन्यायों के खिलाफ संसार में लड़ार्इ चल रही है। अगर यह लड़ार्इ सफल हो गयी तो ऐसा समय आएगा जब हमसब लोग, संसार के आदमी पहली दफा समता, सम्भव समता, सम्पूर्ण समता नहीं, और सुख की सांस ले सकेंगे। मानवीय इतिहास के दो धूर हैं: तर्क और हथियार। सिविल नाफरमानी में तर्क और हथियार दोनों का मिश्रण है। इसमें एक ओर तो तर्क का माधुर्य है, दूसरी ओर हथियार का बल भी। शिक्षा के साथ तर्क और एक प्रकार की दृषिट का निर्माण भी जरूरी है, अन्यथा शिक्षा जिन्दगी में किसी भी प्रकार की चेतना नहीं ला सकती। तर्क जानकारी और दृषिट मं तारतम्य स्थापित करता है। 26 जुलार्इ, 1956 विश्व इतिहास की महान घटना है। उस दिन मिश्र ने स्वेज नहर का राष्ट्रीयकरण कर दिया। विदेशी पूंजी जो 20-30 दफे मूलधन को ब्याज के रूप में ले चुकी थी, उसका राष्ट्रीयकरण हुआ। मैंने इसे विश्व घटना कहा है। 15 अगस्त, 1947 विश्व-घटना नहीं है, भले ही वह हिन्दुस्तान के लिए महत्वपूर्ण हो। हां, 1 अगस्त, 1920 विश्व-घटना है। उस दिन अन्याय के खिलाफ लड़ार्इ का नया रास्ता निकला। इसी तरह 1905 का शुमार, जब जापान ने रूस का यानी एक काले मुल्क ने गोरे मुल्क को हराया, विश्व-घटना में होगा। किसी भी सम्यता में कौशल अभी तक सम्पूर्ण कौशल की दिशा में नहीं बढ़ा है। मानव सभ्यता ने अभी तक एक दिशा-विशेष में ही अधिकतम कौशल हासिल करने की कोशिश की है। उदाहरण के लिए, यूरोप की आधुनिक सभ्यता में विज्ञान का प्रयोग निरंतर बढ़ते जीवन स्तर के लिए होता आ रहा है, लेकिन राष्ट्रीय सीमाओं के अन्दर ही। इसीलिए मैं कहता हूं कि फोर्ड और स्टालिन में कोर्इ अन्तर नहीं। सभ्यता तभी कायम रह सकती है, जब उसका प्रभाव सर्वव्यापी हो, और वह भी यथासम्भव समान रूप से व्याप्त हो। इसलिए अधिकतम कौशल की जगह, सम्पूर्ण कौशल की सभ्यता बनानी है। केवल देश की अन्दरूनी समानता ही नहीं, बलिक देशों के बीच आपस में भी समानता हो। इतिहास की दो गतियों है: एक तो शकित का क्षेत्रीय परिवर्तन, और दूसरा समाज का वर्ग से जाति में, और जाति से वर्ग में परिवर्तन। अब तक की सभ्यताओं में यही गति रही है। सतह की जानकारी को ज्ञान मानना अच्छा नहीं होता है। समाजवाद समाजवाद है, उसे किसी विशेषण की जरूरत नहीं। हम शब्दों पर नहीं, उसके पीछे के अर्थ पर जाते हैं। पुश्तैनी गुलाम ये हैं, जो चाहे जिसका राज हो, जितनी बार राज बदले, हमेशा किसी-न-किसी तरह राजगिरी में हिस्सा बंटाने लगते हैं। ये जिसका राज होता है, उसकी भाषा बोलते हैं। क्या सचमुच भूख-हड़ताल से आत्मा सुधरती है। अगर कोर्इ आदमी बिना बताए प्राण छोड़ दे, तो आत्मा शुद्ध होने की बात समझ में आ सकती है। मिसाल के लिए जैनी मुनियों को लें, 70-80 साल की उम्र में वे ऐसा करते हैं। इसे हम व्यकितगत उपवास कहेंगे। इनके बारे में मुझे कुछ नहीं कहना है। यह तो निजी विश्वास की चीज है। दूसरा उपवास जेल में अपमान होने पर किया जा सकता है। वहां शरीर के अतिरिक्त मन पर भी बंधन लगाया जाता है। ऐसी हालत में उपवास के अलावा कोर्इ चारा नहीं रहता। यतीनदास ने ऐसा ही किया। वे अपनी जगह पर दुरुस्त थे। तीसरी सिथति है जनता के बीच बता कर भूख हड़ताल की। यह बड़ी खतरनाक सिथति है। सोशलिस्ट-आन्दोलन भी इसके चंगुल से मुक्त नहीं है। आंध्र के श्रीरामुलू को छोड़ कर, अब तक मुझे कोर्इ सच्चा अनशन करने वाला नहीं दिखार्इ दिया। स्वयं गांधी जी के उपवासों में शक किया जाता है, और करने की गुंजायश भी है। इस सिलसिले में एक बार मेरी उनसे बातें हुर्इ थीं। मैंने कहा, ''आपके उपवास से देश में कमजोरी फैलेगी। यदि इससे देश को आजादी मिल भी गयी, तो वह एक व्यकित का पराक्रम माना जाएगा।'' गांधी जी ने कहा- '' तुम बीच की एक कड़ी भूल रहे हो। जनता मेरे साथ सहयोग करेगी।'' इसे वे अहिंसात्मक शकित का तरीका मानते थे। मैंने फिर पूछा, '' क्या अनशन से आप मुल्क में धोखा नहीं फैला रहे हैं? '' इस बार गांधी जी हंसे, उन्होंने कहा, '' सारे संसार की बेर्इमानी के कारण मुझे क्यों बेर्इमान कहते हो? '' इतना तो साफ है कि अनशन से धोखेबाजी और व्यकितवाद फैलता है, साथ ही लक्ष्य भी गौण हो जाता है। परमार्थ के लिए कानून तोड़ना अनुशासन हीनता नहीं है। कर्तव्य करने वाला एक होता है। सैकड़ों उसकी स्तुति करने वाले होते हैं। आज हिन्दुस्तान को ऐसे ही कर्तव्य-परायण कानून तोड़ने वालों की जरूरत है, जो हर सिथति में मुसीबत और तकलीफ उठा कर अन्याय का विरोध करने के लिए कमर कस के तैयार रहें। इतिहास में अब तक जनता के दो रूप देखने को मिले हैं: गाय या शेर के। या तो वह गाय बन कर जालिम के जुल्म को बरदाश्त करती है, या शेर की तरह हिंसक बन जाती है। मैं इन दोनों स्वरूपों को नापसन्द करता हूं, क्योंकि इसके द्वारा कोर्इ बुनियादी परिवर्तन नहीं हो सकता। हथियारी इन्कलाब गाय-शेर के बीच की चीज है। मगर सिविल नाफरमानी का मतलब है मामूली इंसान की मामूली वीरता के साथ काम चलाना। सिविल नाफरमानी नया इंसान पैदा करती है, जो जालिम के सामने घुटने नहीं टेकता, लेकिन साथ ही उसकी गर्दन भी नहीं काटता। इसके प्रयोग से एक नर्इ सभ्यता का निर्माण हो सकता है। जालिम वहीं होते हैं, जहां दब्बू होते हैं। जालिम का कहामत मानो, यही सिविल नाफरमानी का मतलब है। सिविल नाफरमानी सबसे पहले हिन्दुस्तान में ही जन-साधारण के लिए सुलभ हुर्इ। मगर यहीं जम कर उसका निरादर होता है। शायद ही संसार के किसी बच्चे ने अपनी मां के पेट को इतना ठुकराया हो, जितना इस राज्य ने। सही कसौटी कड़े परिश्रम की नहीं है, बलिक र्इमानदारी से काम करने की है, जो बहुत कठोर है। अमरीकी, रूसी, अंग्रेज जो रोज के काम और जीवन में एक दूसरे से झूठ बोलते वे सामूहिक रूप में अपने देश से बाहर की दुनिया के सम्बन्ध में झूठ और क्रूरता के बहुत अधिक अभ्यस्त हैं। वे बहुत बड़े पैमाने पर विध्वंस करते हैं, रोग फैलाते हैं, और कुकर्म करते समय, कुकर्म के पहले और बाद भी झूठ बोलते हैं। वे अपने राज्य और उसके चलाने वालों को यह सब करने देते हैं, और ययह सोच कर संतोष कर लेते हैं या मन और आत्मा को विक्षिप्त होने से बचा लेते हैं कि उनका व्यकितगत तौर पर या सीधे इससे कोर्इ संबंध नहीं है। जब तक निगरानियों और मध्यवर्गीय सभ्यता का निर्ममता से विनाश नहीं किया जाता, तब तक हिन्दुस्तान और रंगीन दुनिया के एक बड़े हिस्से का कोर्इ भविष्य नहीं है। जिस्मानी और दिमागी श्रम से होने वाले फायदे के बीच न्यायपूर्ण और बराबरी का रिश्ता कायम करना होगा और निगरानीकार तथा नियंत्रण करने वालों की संख्या निर्ममता से घटानी होगी। राजनीतिक सफलता अक्सर ऐसे लोगों को मिलती है जो सच के साथ झूठ मो मिलाना जानते हैं, और जिनके लिए उदारता और सहयोग के साथ-साथ अलगाव और निर्ममता का व्यवहार आदर्श है। का्रनित के लिए विचार-दर्शन की जरूरत होती है। इसलिए का्रनित करने वालों के लिए विचार-दर्शन हर हालत में जरूरी है। सच, कर्म और चरित्र को का्रनित के बाद की चीज नहीं समझना चाहिए। इन्हें तो का्रनित के साथ-साथ चलना चाहिए। यही वजह है कि कुछ हद तक आधुनिकमानव पर राजनीतिक दल का बहुत निर्णायक असर पड़ता है। अगर राजनीतिक दल का्रनित के साथ-साथ चरित्र निर्माण का काम भी अपना लें तो राजनीति पवित्रता प्राप्त करेगी जो अभी उसको नहीं मिलती है। उंची गददी के लोगों की सुविधाएं खास कर ऐसे देश में जहां गरीबी ने सामाजिक चेतना मन्दी कर दी हो और जहां राजनीतिक गददी के साथ शानशौकत और ऐयाशी स्वाभाविक मानी जाती हो, वहां धनी से धनी लोगों को भी र्इष्र्या होगी। राजनीति में लगे लोग जीवन में स्वतंत्रता, रूतबे और अधिकार से सन्तुष्ट भी होत हैं, जो उन्हें दूसरे पेशे में नहीं मिल पाते और इसके लिए वे दूसरी सुविधाओं और आराम को भी छोड़ते हैं। अवज्ञा की आदत सम्भव है, हिंसा की आदत असम्भव। षडयन्त्र और हथियार से निरन्तर का्रनित असंगत बात है। सिविल नाफरमानी के जरिये निरन्तर क्रानित की सम्भावना निशिचत है। जीत लाजिमी तौर पर सफलता नहीं है, और न हार असफलता। अत्याचार और ऐयाशी के खिलाफ सिविल नाफरमानी की सौ वर्षीय योजना के जरिये आदमी अब भी रूतबे को अत्याचार ओर आराम को ऐयाशी का विकराल रूप लेने से बचा सकता है। अपने विशुद्ध रूप में अच्छार्इ की खोज करना सिविल नाफरमानी है। सिद्धान्त में ंव्यकितगत प्रतिष्ठा या पद का असर इसे दूषित नहीं करता। अगर ऐसा मुमकिन हो कि सिविल नाफरमानी करने वालों के झुण्ड तैयार हो और वे बढ़ते रहें, जिन्हें अन्याय की अवज्ञा के सिवा और कोर्इ महत्वाकांक्षा न हो और न्याय का अमल वेदूसरों पर छोड़ दें, तो बहुत अच्छा। इन सिविल नाफरमानी करने वालों का स्वरूप अनुपम और शुद्ध होगा। जब तक बड़े पैमाने पर ऐसा चमत्कार नहीं हो जता राजनीतिक कि्रया में न्याय यपर अमल करने के साथ रूतबा हासिल करने के लिए गददी की चाह जरूरी होगी। अत्याचार की अवज्ञा, न्याय पर अमल और रूतबे की खोज, ये तीन स्थायी तत्व मिल कर राजनीति में आदमी को अच्छे काम के लिए प्रेरित करते रहेंगे। सत्ता प्राप्त करने की सात वर्षीय योजना अच्छी है अगर, कम-से-कम मन में अन्याय से लड़ने और सच का निर्माण करने की सौ वर्षीय योजना से वह पुष्ट की जाए। जिसका ध्यान एक क्षण के लिए भी डांवाडोल नहीं होता, उसकी जीत होती है। मन और चित की ऐसी एकाग्रता अन्दरूनी भी हो सकती है। सम्पूर्ण अनुशासन वह है, जिसमें अन्दरूनी और बाहरी एकाग्रता की जरूरत होती है। हिन्दुस्तान में हमेशा से बड़े लोगों का साथ और छोटे लोगों का अलग कर देना, उनसे नफरत करना, उनको आदमी नहीं समझना, यह कम से कम पिछले हजार-डेढ़ हजार बरस से चला आ रहा है। अब वह और मजबूत हो गया है। हिन्दुस्तान में एक सबसे बड़ा रोग इस वक्त यह है कि जब आदमी हिन्दुओं के बीच बोलता है तो थोड़ा सा हिन्दू मामलों में दबक के बोलता है ताकि सुनने वाले थोड़ा खुश हों और जब मुसलमानों के बीच हैं तो मुसलमानी मामलो में थोड़ा सा दबक के बोलता है। हिन्दू और मुसलमान दोनों के दिमागों के अन्दर जो खराब बातें हुर्इ हैं, निकल नहीं पातीं। ज्यादातर हिन्दू यह सोचता है कि अपने मुल्क में आज का मुसलमान, नादिरशाह, तैमूरलंग, गजनी-गोरी के लिए जिम्मेदार है। जब तक उसके दिमाग में यह बात धंसी हुर्इ है, तब तक वह मुसलमानों को अपना भार्इ समझ नहीं सकता। यह है मोटी बात। इसको पकड़ों। इसके साथ-साथ मुसलमान-दिमाग में भी खराबी है। आम तौर से मुसलमान सोचता है किवह तो तैमूरलंग, नादिरशाह और गजनी-गोरी की औलाद है और अगर ये न आते तो वह होता कहां से। बुनियादी बात और असलियत यह है कि आज के मुसलमान को तैमुरलग या नादिरशाह से क्या मतलब पड़ा हुआ है, क्या वास्ता है। तैमुरलंग या नादिरशाह ने जो कत्लेआम किया तो कौन मरे? नादिरशाह ने करीब डेढ़ लाख आदमी 24 घंटे के अन्दर मारे थे दिल्ली में। वे सब हिन्दू नहीं थे, उनमें से एक लाख तो मुसलमान थें। नादिरशाह र्इरानी मुसलमान था। उसने जिन्हें मारा था वे थे मुगल मुसलमान। तैमूरलंग को चार दिन तक गुस्सा आया था। नादिरशाह का गुस्सा तो 24 घंटे में खत्म हो गया। चार दिन में उसने 4-5 लाख आदमियों का कत्लेआम किया था। उसमें तीन-साढे़ तीन लाख पठान मुसलमान थे। न हिन्दुओं को, न मुसलमानों को किसी को यह बात नहीं समझायी जाती। कौन हिन्दू है जो हिन्दुओं को जा कर कहेगा कि तुम मुसलमानों को अपना भार्इ समझो और कि रजिया, शेरशाह, जायसी, रहिमन वगैरह को अपना पुरखा समझो। अगर हिन्दुस्तान को एक कौम समझते हैं तो फिर आज का जो हिन्दुस्तानी है, चाहे हिन्दू, चाहे मुसलमान, उसके मां बाप में रजिया का नाम लिया जाना चाहिए। उसके मां-बाप में शेरशाह का नाम होना चाहिए। असली हिन्दुस्तानी हैं, रजिया, शेरशाह, जायसी वगैरह। हिन्दू के दिमाग में यह धंसना चाहिए कि आज का मुसलमान तो किसी जमाने का हिन्दू है और कि हमारे पुरखे इतने कमजोर थे, इतने दब गये थे, इतने नामकूल हो गये थे कि जब कोर्इ परदेसी आता था उसके सामने टिक नहीं पाते थे। गुस्सा किससे करना चाहिए? गजनी से। आज के मुसलमान का तो गजनी से कोर्इ ताल्लुक है नहीं। धर्म तो है लम्बे पैमाने की राजनीति और राजनीति है छोटे पैमाने का धर्म। इनको और ज्यादा सोचें तो इस तरह से चलेगा कि मजहब का काम है अच्छार्इ को करे और राजनीति का काम बुरार्इ से लड़े। ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। लेकिन फर्क कभी भूल नहीं जाना चाहिए कि एक बुरार्इ से लड़ता है, एक अच्छार्इ को करता है। दोनों को अगर एक दूसरे के लिए हमदर्दी हो, प्रेम हो, तो मामला अच्छा चल जाएगा। लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज दोनों में बहुत खींचातानी है। इसीलिए मजहब जब सिर्फ अच्छार्इ करने बैठ जाता है तो कुछ-कुछ बेजान हो जाता है, क्योंकि बुरार्इ से वह लड़ता नहीं और बुरार्इ से लड़ते-लड़ते सियासत जब बिलकुल बुरार्इ की लड़ार्इ में फंस जाती है, तो वह कुद कलही हो जाती है। सुलह फिर उसमें नहीं रहती, कलह आ जाती है। आज की सियासत में कलह आ गयी है और आज के मजहबमें एक सुस्ती या मुर्दनी आ गयी है। यह बीसवीं सदी बहुत बेरहम सदी है। शायद इससे ज्यादा बेरहम सदी दुनिया में कभी हुर्इ नहीं। फांसी के मामले में मेरी राय अलग है कि जब इनसान को किसी को जिन्दगी देने का तरीका नहीं मालूम है, तो फिर उसे जान लेने का भी हक नहीं होना चाहिए। ये जो हिन्दू-मुसलमान दंगों में लोग मरे थे तो आमने-सामने की लड़ार्इ मे नहीं। ऐसा नहीं हुआ था कि हिन्दुओं का एक गिरोह ओर मसलमानों का एक गिरोह एक दूसरे से लड़ रहे हों। दंगों में आमने-सामने की लड़ार्इ कभी नहीं हुर्इ। जब लड़ार्इ होती थी, तो हिन्दुओं का एक गुट बन जाता था, उसमें से चार-छह के हाथ में हथियार होते थे, उनका दिमाग खराब हो जाता था और वे मोहल्लों में निकल कर जहां कहीं कोर्इ इक्का-दुक्का मुसलमान, औरत और बच्चे मिल जाते उनका कत्ल कर देते थे। उसी तरह से मुसलमानों के गुट बन जाते थे। इन गुटों का आमने-सामने मुकाबला नहीं हुआ। हमेशा बेसहाराआदमी को पकड़ के मारा गया है। इससे बेरहम चीज और क्या हो सकती है। इस बेरहम सदी में एक बात बड़ी अजीब हो रही है, अनोखी हो रही है कि करीब-करीब सब तरह की नाइंसाफियों के खिलाफ इनसान एक साथ उठ रहा है। ऐसा कभी पहले नहीं हुआ। वह चाहे मर्द-औरत के बीच की गैरबराबरी हो, अमीर-गरीब के बीच की गैरबराबरी हो, चाहे उंची जाति, छोटी जाति के बीच की गैरबराबरी हो, चाहे गोरे और काले के बीच की गेैरबराबरी हो। दुनिया में यह बहुत अच्छा रूजझान चल रहा है कि एक नाइंसाफी के खिलाफ नहीं, सभी नाइंसाफियों के खिलाफ इनसान एक साथ उठा है। हथियार कैसे खतम होंगे? मुझे खुद बहुत मुशकिल मालूम होता है। बड़े हथियार, मान लो खतम कर दिये जाएं, तो छोटे कैसे खतम होंगे? क्योंकि छोटे हथियार खतम होने का मतलब है, पूरी तरह से नाइंसाफी खतम होना। वहीं मुझको थोड़ी आशा दिखार्इ देती है कि हथियार पूरी तरह से तब खतम होते हैं जब नाइंसाफी खतम होगी। अबकी दफे, क्योंकि सब नाइंसाफियों के खिलाफ आदमी एक साथ उठ खड़ा हुआ है, ये नाइंसाफियां भी खतम हों और शायद इस बीसवीं सदी के खतम होने तक एक अच्छी दुनिया बने। पीछे देखू दिमाग खराब होता है और बगल देखू भी खराब होता है। आज वे सब बगल-देखू हैं, जो अपने को समझते हैं कि हम आधुनिक हो गये हैं, नयी दुनिया के हो गये हैं। असल में वे सिर्फ रूस और अमरीका की नकल करते हैं, जो बगल में ताकतवर मुलक हैं उनकी नकल करना। हमको आगे-देखू बनना है। आगे-देखू दिमाग न तो बगल-दूखू होगा और न तो पीछे-देखू होगा। अच्छी चीज जो हिन्दुस्तान में हो रही है वह यह कि हमारे अन्दर से डर धीरे-धीरे, बहुत धीरे-धीरे कम हो रहा है। जब मैं 'हमारे' कहता हूं तो मेरा मतलब सिर्फ बड़े लोगों से नहीं है। ऐसे लोग हैं, जो जनता को जाहिल समझते हैं जब कि प्राय: पढ़े-लिखे लोग ही जाहिल हुआ करते हैं। अभी जो मैंने कहा है उसे इतना तो शायद साबित हुआ होगा कि हम लोग कितना पुराना नया कूड़ा मिला कर कैसा जहर पैदा करते हैं। मैं मानता हूं कि हिन्दुस्तान की जनता इस वक्त बहुत गिरी हुर्इ है, दिमागी और जिस्मानी, दोनों हालत में। लेकिन जब यह उंचा उठेगी, तभी तो हिन्दुस्तान बन पाएगा। इधर बहुत बरसों से हिन्दुस्तान के साधारण आदमी में डर, कोर्इ अंग्रेजी बोलता है तो उससे डर, अंग्रेजी से डर, गोरे से डर, सबसे डर। अब धीरे-धीरे जनता निडर हो रही है, बहुत धीरे-धीरे। और यही हिन्दुस्तान में एक नया रूझान अच्छा आ रहा है। इसमें अगर कुछ खराबी भी आ जाए लेकिन निडरार्इ आ जाए तो बहुत अच्छा होगा। मैं इसको पसन्द करूंगा। इसलिए हिन्दू-मुसलमान के मामले में मैं बराबर यही कहा करता हूं कि मुसलमानों को हिन्दुस्तान में अगर डरा कर रखना चाहते हो तो अच्छा नहीं होगा। घर में डरे हुए आदमी को कभी मत रखो, बड़ा खतरनाक हुआ करता है। डर बहुत खतरनाक चीज है, डर घर को तबाह किया करता है। वह डर धीरे-धीरे कम हो रहा है, बहुत धीरे-धीरे। अफसोस यही है कि पूरा डर खतम होने में शायद अभी 30-40 बरस और लगें। लेकिन, हम निडर बनते जा रहे हैं। यही हिन्दुस्तान का एक बढि़या रूझान है। नोट:- राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाशित किये जाएंगे। बदरीविशाल पित्ती लोहिया विचार माला- 4 प्रथम संस्करण: दिसम्बर, 1993 प्रकाशक: राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद-500 195 महात्मा गांधी का शरीर तोप-गाड़ी पर रखा गया। यह विकृति अहिंसा के मसीहा का किसी हत्यारे की गोली से मारे जाने की विकृति के दूसरे नम्बर पर ही रखी जा सकती है। र्इसा प्रेम और अहिंसा के ज्यादा महान उपदेशक रहे हों, पर अपने जीवनकाल में वे उनके प्रतीक न बन सके, जैसे गांधी चालीस बरस से ज्याद के दीर्घ व्यवहार के जरिये बन गये थे। किसी भी समय सारी दुनिया अपने अतीत का ही फल होती है। हिन्दुस्तान तो मुख्य रूप से अपने अतीत का ही फल है। किसी अन्य देश का वर्तमान जीवन अपने अतीत के सिद्धान्तों, स्मृतियों और पुराकथाओं से उतना ओत-प्रोत नहीं है, जितना हिन्दुस्तान का समकालीन बातों से ज्यादा, लोग अतीत की इन बातों को ले कर हंसते, रोते और झगड़ पड़ते हैं, फिर भी कोर्इ सही अध्ययन नहीं होता। और किसी की अपेक्षा विश्वविधालय-अध्यापकों पर जिम्मेदारी है कि वे सारे स्वस्थ ज्ञान का उदघाटन करें, जिसे क्या देशी क्या विदेशी, दोनों निहित स्वार्थों ने गहरा गाडे़ रखा है। आत्मसमर्पण की जो क्षति होती है, उसको खतम करना हम सीखे और वह तभी होगा जब हिन्दू धर्म में आप कुछ तेजसिवता लाने की कोशिश करोगे जो इस समय नहीं है। धर्म की तेजसिवता का कहीं यह मतलब मत समझना कि र्इसार्इ धर्म के मुकाबले में, या बौद्ध धर्म के मुकाबले मे ंया इसलाम धर्म के मुकाबल में, बलिक सच पूछो तो इन धर्मों के प्रति आदर रख करके ही, उनको अपने से बुरा न कह करके ही आप तेजसिवता हासिल कर सकते हो। और वह तेजसिवता कौन-सी? मर्यादा के मुताबिक परिवर्तन करना, अपनी जनता को प्राणवान बनाना। यह जातिप्रथा, जिसने हमको दु:ख, अत्याचार, बेशर्मी, अपमान को सहने के लिए मजबूर किया है, तैयार किया है, उस जातिप्रथा को खतम करना। उस ब्रहमज्ञान को पाने के सिवा मुझे और कोर्इ रास्ता दिर्इ नहीं पड़ता। एक तरफ तो अद्वैत चला रहे हैं कि सब संसार एक है, सब समान हैं, पेड़ समान, गंध समान, आदमी समान, देवता समान और दूसरी तरफ, अपने ही अन्दर ब्राहमण, बनिया, चमार, भंगी, कहार, कापू, माला, मादीगा, न जाने 50 तरह के झगड़े खड़े करके, बंटवारा करके अपने देश को हम छिन्न-भिन्न कर रहे हैं। किसी तात्पर्य को स्पष्ट करने के लिए इतिहास कभी-कभी पात्रों का निर्माण करता है। काल विचिछन्न भी करता है और एकत्र भ्ी करता है। विचिछन्न का दर्शनभेद और एकता का दर्शनभेद, दोनों अनिवार्य हैं। अक्षर समवाय होते हैं और कुछ काल बाद एक केन्द्र से पराड़ मुख होते हैं। महाकाल के इस निराशावाद में तातिवक आशावाद का समावेश होना चाहिए। कैलाश के पास एक गांव है जिसका नाम है मनसर। वह मानसरोवर नदी या झील के उपर है। उस मनसर गांव की मालगुजारी अभी कुछ दिनों पहले तक हिन्दुस्तान सरकार को मिलती थी। उस गांव की मदर्ुमशुमारी हिन्दुस्तान की मदर्ुमशुमारी के अंकों में शामिल की जाती थी। ये सब बातें मुझे मालूम हुर्इ एक ऐसे हिन्दुस्तानी अफसर से जो 1946-47 तक लददाख सरकार का नौकर था। उसने मुझे बताया कि किसी जमाने में लददाख के किसी राजा ने अपने सार्वभौमत्व, अपने राज्य के एक नमूने की तरह तिब्बत के राजा को वह इलाका भेंट स्वरूप दे दिया लेकिन मनसर गांव को रख लिया ताकि सबूत रह जाए कि यह हमारा इलाका था। मेरा उस पर यह कहना है कि एक तो वह भेंट गैरकानूनी थी, दूसरे अगर कानूनी भी थी तो वह भेंट तिब्बत की सरकार को थी, न कि चीन सरकार को। अगर इसके उपर अच्छी तरह से बहस चले तो संभव है कि कानूनी दृषिट से भी यह साबित किया जा सके। या तो तिब्बत को पूरा स्वतंत्र होना चाहिए तो कैलाश मानसरोवर वगैरह हम अपने भार्इ तिब्बत की रखवाली में रख सकते हैं। मेरा यह इरादा है और हर एक का यही इरादा होना चाहिए। लेकिन, अगर तिब्बत स्वतं़ नहीं होता है, तो फिर कैलाश मानसरोवर का इलाका हिन्दुस्तान में आना चाहिए। हिन्दुस्तान क्यों इतनी बार गुलाम हो जाता है? क्यों इतने लम्बे अरसे तक गुलाम हो जाता है? कहीं कोर्इ खराबी है और खराबी बिलकुल साफ है कि हम झुक बहुत जाते हैं, बहुत दबते हैं, हर चीज के साथ हम समझौता कर लेते हैं और हमारे सोचने के तरीके बड़े गंदे हो गये हैं। और किसी देश में, जायदाद के प्रति, और जीवन के प्रति भी इतना मोह नहीं है इसकी परवाह नहीं कि वह कितनी गहरी गरीबी में डूबा हुआ है-जितना इस देश में जहां जीवन और जायदाद दोनों को चलायमान और क्षणिक माना गया है। जिनमें किसी समझदार आदमी को अपनी आत्मा नहीं रमा देनी चाहिए। उपदेश और आचरण के बीच उसी तरह एक तरह की बात और उसके विपरीत बात के बीच की खार्इ बेहिसाब चोड़ी है। ध्यानशील तर्क के और तामासिक तर्क के बीच की विभााजन रेखा बहुत संकरी हो सकती है। कहीं तामसिक तर्क अपने-आप को पुन: स्थापित न कर दे इसलिए व्यापक और संगत परीक्षण हमेशा होना चाहिए, जो उतना ही वास्तविक हो जितना कि काल्पनिक। हिन्दुस्तान की हमेशा यह विशेषता रही है कि उसने दयाशील तर्कशकित को ही माना। इसका परीक्षण करते हुए अन्तध्र्यान से समग्र का ज्ञान हुआ। ऐसी दयाशील तर्कशकित कर अच्छार्इ यह है कि उससे शान्त प्रवृति होती है। बुरार्इ यह है किवह तामसी और गूढार्थ होती है। हिन्दुस्तान अभी बाद वाली हालत में ही है। यही तामसिक तर्कशकित उसके सामाजिक गठन की निशानी है, जो इतनी बनावटी है कि जमीन पर भी बिना सहारे और बहुत उपर हवा में भी बिना थामे वह टिकती नहीं; त्रिशंकु की तरह लटकी हुर्इ है। यह चमत्कार कायम है। कांटेदार तारों या बुजोर्ं या सशस्त्र संतरियों के बिना भी लाखों अछूतों के अतराफ घेरा पड़ा हुआ है। इससे कुछ ही कम भयानक घेरा पिछड़ी जातियों के करोड़ों लोगों के अतराफ पड़ा हुआ हुआ है। अत्यन्त कृत्रिम समाज का यह चमत्कार आदमी के मन में, उसकी धर्म-विधा में और उसके दर्शन में जम कर बैठा हुआ है और इसलिए कम कृत्रम गठन तो टूट जाता है, पर वह चलता रहता है। यह धर्म-विधा और दर्शन सभी गलत नहीं हैं क्योंकि, उनकी अच्छी हालत में, वे तर्कशकित कोदया से संयुक्त करते हैं। लेकिन, जब मध्य वर्ग और उच्च जातियां स्वार्थसिद्धि के लिए पतित हो जाते हैं तब वे बहुत गलत भी हो सकते हैं। ऐसा पतन और ऐसा सम्पूर्ण पतन, वह भी देश के पढ़े-लिखों का हुआ है। पढ़े-लिखे आदमी ने तर्कशकित से पूरा नाता ही तोड़ दिया। उसे खरीद लिया गया है। स्वच्छन्द वृतित वाला कोर्इ भी आदमी, जिसकी आमदनी या तनखा बड़ी है, सरकार की दबेलदारी करने से नहीं बचा। धर्म या और किसी सत्य के मामले में किसी एक कोने या दृषिट से ही बातें समझ में आती हैं। आज प्राथमिक शिक्षा मे इतनी खार्इ है कि देख नहीं जाता: एक तरफ ऐसी प्राथमिक शालाएं हैं जो एक बच्चे पर महीने में चार या पांच रूपया खर्च करती हैं, और दूसरी तरफ ऐसी स्कूलें हैं जो एक सौ से लेकर चार सौ रूपयों के बीच खर्च करती हैं। जो राष्ट्र शिक्षा में इतनी चौड़ी खार्इ बनाये रखता है वह टूटता ही है; ऐसी शिक्षा से राष्ट्र में खार्इ और चौड़ी और विभिन्न होगी ही। चाहे कितनी ही धीमी गति से क्यों न हो, सभी लोगों को उंचा उठाना होगा; सभी बच्चों को आम स्कूलो में ही जाना होगा। सारी दुनिया के बच्चों में हिन्दुस्तानी बच्चा बहुत ज्यादा सताया हुआ है। उसका देश उस पर इतना बोझ लाद देता है कि उसके पास उपयोगी चीजों के लिए समय, शकित या बुद्धि की कमी हो जाती है। भाषा का वह साधिकार प्रयोग, जिसके बिना प्राचीन विषयों में खोज का कोर्इ अर्थ नहीं होता, और वर्णात्मक या सैद्धानितक विषयों में भी कम ही होता है, केवल मातृभाषा के द्वारा ही सम्भव है। आदमी ने स्थायी युद्ध के सिद्धान्त को ही जाना है और शानित को दो युद्धों के बीच अन्तराल। उसको स्थायी का्रनित की बात का भी पता है, पर पर्याप्त शानित और स्वतंत्रता उसे नहीं मिली। अभी भी हिन्दुस्तान के लोग आदमी को स्थायी सिविलनाफरमानी के सिद्धान्त और अमल का रास्ता बतला सकतेे हैं। तब वे प्रगति करेंगे और उनके साथ समूची मानवता भी। इससे वे मिथ्यावाद और गतिहीनता की शकितयो को भी नष्ट करेंगे, जो प्रगति की अन्तर्धारा पर हावी हैं, और खुले में बेरोकटोक उसे बढ़ने का मौका देंगे। सबसे अधिक सम्भव रसमयता तो खोज में और दिमाग की व्यवसिथत जिज्ञासा में है, जो सौन्दर्य, शकित या ज्ञान के क्षेत्रों को उजागर करती है। हिन्दू चाहे जितना उदार हो जाए फिर भी अपने राम और कृष्ण को मोहम्मद से कुछ थोड़ा अच्छा समझेगा ही, और मुसलमान चाहे जितना उदार हो जाए, अपने मोहम्मद को राम और कृष्ण से कुछ थोड़ा अच्छा समझेगा ही। लेकिन इतना ज्यादा नहीं होना चाहिए। उन्नीस-बीस से ज्यादा का फर्क न रहे तो दोनों का मन ठीक हो सकता है। सभी भारतीय वर्णमालाएं एक ही मूल की हैं। नागरी-समेत भारत की सभी वर्णमालाएं एक-दूसरे की ही प्रकारान्तर हैं। सच को आप हमेशा किसी एक कोने से देखोगे, यह देह-धरे का घोष है। इस दोष से पूरी तरह से कभी छुटकारा हो ही नहीं सकता। सच हमेशा किसी एक कोने, किसी एक दृषिट से देखो। अब तक सूरज शायद काहिरा में और फारस देश में कुछ थोड़ा-सा ज्यादा तेज हो गया होगा, हमारे यहां अभी तेज हो रहा है। तो कोना है, एक दृषिट है, लेकिन कोशिश यह करनी चाहिए कि हमारी दृषिट जितनी ज्यादा सम्यक और सम्पूर्ण हो सके उतना बनाया जाए। कर्इ दफे मुझको ऐसा लगता हे कि यह अमरीका ओर रूस की सभ्यता शायद ''डिनोसौरस की तरह ही अपने लम्बान, चौड़ान ओर बोझिलपन से कभी खतम हो। संसार में ऐसा हुआ है। हम लोग भी इसी तरह से खतम हुए हैं। खैर, प्रकृति ने तरह-तरह के उपाय इस्तेमाल किये जिनमें बड़े ताकतवर, लम्बे चौड़े प्राणी खतम हो गये लेकिन कीड़े-मकोडे़, चींटी, छोटे-छोटे कीडे़ सब बाकी हैं। विकृत औ विपरीत कामों सेतर्क-शकित मे या सदाचार की आदत में आदमी का विश्वास नष्ट हो जाता है। दीर्घ विचार और सातिवक कर्म करने के बाद ही तर्क और सदाचार पुन: स्थापित होते हैं। सामाजिक उपादान के क्षेत्र में क्या वैज्ञानिक है, वह ज्यादातर मान्यता पर निर्भर करता है और क्या मान लिया जाता है, यह ज्यादातर शकित और सत्ता पर निर्भर करता है। सिविलनाफरमानी वह कला है, जिससे हर आदमी प्रहलाद और सुकरात के स्तर पर पहुंचने का मौका हासिल कर सकता है। जुल्म के खिलाफ अनादि संघर्ष मे आज तक आदमी एक लम्बे अर्से तक गाय-सा परवश और कुछ अर्से तक शेर-सा साहसिक रहता आया है। सिविलनाफरमानी से वह न गाय रह जाता है और न ही शेर, पर निष्कपट बुनियादी साहस वाला सरल सीधा आदमी बन जाता है। सिविलनाफरमानी सायुध तर्क-शकित है। मानवी व्यापार के वादप्रतिवाद में तर्क-शकित का बड़ा दखल होता है लेकिन जब बलात करने और हथियारों को अपना लेने की नौबत आ जाती है, तब तर्क-शकित नपुंसक हो जाती है। हथियार स्वभावत: तर्क-शकित को काटते हैं। जब लोगों ने जुल्म के खिलाफ शानितपूर्ण प्रतिरोध की कला सीखी, तब तर्क-शकित पहली बार उस शस्त्र से आयुध हुर्इ जो उसे काटता नहीं और जो उसके अनुकूल है। स्थायी सिविलनाफरमानी के सिद्धान्त में भारत की जनता को अपना विश्वास पुन: सािपित करना चाहिए। वे जुल्मी के सामने घुटने नहीं टेकेगें पर वे उस पर हाथ भी नहीं उठाएंगे या उसे मार नहीं डालेंगे। जुल्मी का सामना करने में ज्यादा लोगों को व्यकितगत सिविलनाफरमानी करने के सिद्धान्त पर अमल करना सीखना है। चमड़ी हमारी सीमा है। जैसे देश की सीमा होती है वैसे हमारी सीमा चमड़ी है। इसी के अन्दर हम हैं। इसी के अन्दर न केवल शरीर है, बलिक इसके साथ-साथ हमारा मन जुड़ा हुआ है और नतीजा यह होता है कि अपना घर, अपना बाप, अपनी बीबी, अपने बच्चे, यह सब अपनापन इसी चमड़ी के अन्दर रहते हुए आ जाया करता है। संपूर्ण सुरूचिहीनता आज के हिन्दुस्तान का चिन्ह है। जंगलियों में एक प्रकार की अन्तर्जात रूचि होती है जिसकी तरफ उन्हें प्रकृति या उपज्ञा प्रवाहित करती है। जब सभ्य लोग स्वार्थी हो जाते हैं तब वे सारी सुरूचि बिसार देते हैं। इसमें कोर्इ शक नहीं कि हिन्दुस्तान के अच्छे वक्त में, और घमंड के साथ कहना हूं कि हमारे पुरखों ने सोचा, तो ऐसा सोचा कि उससे ज्यादा अच्छा दुनिया की और किसी कौम ने नहीं सोचा। लेकिन उसको, जैसा मैंने आपसे कहा, बहुत बड़ी कीमत चुका कर हासिल किया: दो खाने बना कर और वे कौन से दो खाने? आप जानते हो शंकराचार्य के दो खाने; एक तो परमार्थिक सत्य और दूसरा लौकिक सत्य। एक तो आखिरी, असली सच्चार्इ और दूसरी दुनिया की सच्चार्इ। यह मैं कोर्इ हंसी नहीं उड़ा रहा हूं। उस वक्त के आपके सबसे अच्छे विचारकों की तरफ से सच के दो रूप रखे गये हैं। एक तो पारलौकिक, जिसको आखरी सच्चार्इ बोलते हैं, सबसे बड़ी सच्चार्इ और दुनिया की सच्चार्इ। दुनिया की सच्चार्इ के बारे में ज्यादा गड़बड़ नहीं की, नहीं तो जो आखरी सच्चार्इ है, उसमें गड़बड़ हो जाए। इसलिए आखरी सच्चार्इ के बारे में दिमाग को पूरी, बेरोकटोक आजादी दी, खूब बढि़या विचार दिया। और दुनियार्इ मामलों में, मान लें कि बहुत सी जो पुरानी चीजें चल रही हैं, उनके बारे में छेड़खानी मत करो। वही चीज आज आप देख रहे हैं, वही दिमाग आज चला आ रहा है। मैं यह हरगिज नहीं मानता कि इन दो खानों को बिलकुल मिटाया जा सकता है। ये अलग रहेंगे। एक और बड़ी बात है और वह यह कि अगर हम किसी तरह से हिन्दू मुसलमान के मन को जोड़ पाये तो शायद हम हिन्दुस्तान-पाकिस्तान के जोड़ने का सिलसिला भी शुरू कर देंगे। मैं यह मान कर नहीं चलता कि जब हिन्दुस्तान-पाकिस्तान का बंटवारा एक बार हो चुका है, वह हमेशा के लिए हुआ है। किसी भी भले आदमी को यह बात माननी नहीं चाहिए। अपनी नौकरशाही के लिए तो मैं डिक्टेटर हूं। लोकतंत्र का पहला सिद्धान्त है जो सरकारी नौकर है वह हमारा नौकर है। अगर हम मंत्री होंगे तो सरकार नौकर को डिक्टेट नहीं कर पाएगी तो कम्बख्त किस काम की। हिन्दुस्तान और पाकिस्तान के मुसलमान अन्य किसी देश के लिगों की अपेक्षा चाहे वे मुसलमान ही हों, हिन्दुओं के ज्यादा नजदीक हैं। इसी तरह हिन्दुस्तान के हिन्दू किसी और देश के लोगों की अपेक्षा इस देश के मुसलमानों के ज्यादा नजदीक हैं। रोग कब दूर होता है? जब रोग को पहले पहचाना जाता है तभी वह दूर होता है। रोग को ठीक तरह से पहचानना ही एक औषधि हो जाती है। औषधि देने पहले रोग को पहचानना होता है। रोग को पहचान लेंगे तो औषधि का रास्ता अपने-आप खुल जाता है। अपनी आंख जो सबसे नीचे है उसके उपर रखो, क्योंकि जो सबसे नीचे है और जब वह उठेगा तो बाकी सब लोग तो उठेंगे ही। गददी पर जो बैठेगा, थोड़ा-बहुत भ्रष्ट जरूर होगा। लेकिन थोड़ा भ्रष्ट बनेगा या ज्यादा भ्रष्ट बनेगा, इसका फैसला आप लोगों के हाथ में है और यही मैं आपको बताना चाहता हूं कि मन में विश्वास रखो, अपने उपर, कि जो गददी पर बैठ कर भ्रष्ट बनेगा, उसको गर्दन पकड़ कर निकाल बाहर करेंगे। यह भरोसा लाओ मन में। अपने घर की औरतों से पूछना। वे लोग झाडू देती हैं कूड़ा बुहारने को। कूड़ा कल फिर हो जाएगा। तो क्यों झाडू दिया? कल तो कूड़ा फिर हो ही जाएगा, तो आज झाडू देना फिजूल है। क्या जरूरत है? कूड़ा झाड़ने को झाडू दिया न? तो यही हम आपसे कहते हैं। यह मान करके कि कल हम गददी पर बैठ कर कुड़ा बन जाएंगे, आप लोग जो कूड़ा गददी पर बैठा है उसको झाडू देने से क्यों इनकार करते हो? देशद्रोही तो जयचन्द भी और अंग्रेजों की एक रानी, मेरी भी थी। उसने भी, जैसे जयचन्द ने मोहम्मद गोरी को बुलाया था, उसी तरह मेरी ने भी फिलिप को बुलाया था। दोनों बिलकुल एक जैसे। लेकिन हिन्दुस्तान की उदासीन जनता गुलाम बन गयी और अंग्रेजों की सचेत जनता ने मेरी को खतम कर दिया। यह फरक होता है। कभी ऐसा मत बोलना कि देशद्रोही देश को बरबाद करता है। देशद्रोही तो अपना काम करेगा ही। लेकिन अगर जनता सचेत है, तो देशद्रोही को पकड़ करके उसका काम खतम करती है और अगर जनता उदासीन हो जाती है तो फिर देशद्रोही अपना काम पूरा किया करता है। यह जनता पर है कि वह सचेत हो कर अपने देश को कितना बचाना चाहती है। जो कोर्इ बड़ा आदमी बैठ जाए गददी पर, उसकी निगाह में योग्य उसी की बिरादरी के होने लग जाते हैं। और जब कभी किसी देश की पूरी योग्यता का सदुपयोग नहीं होता, तब देश भ्रष्ट होने लग जाता है। नोट: राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाशित किये जाएंगे। बदरीविशाल पित्ती लोहिया विचार माला- 3 प्रथम संस्करण: दिसम्बर, 1993 प्रकाशक: राममनोहर लोहिया समता न्यास 4-5-46, सुलतान बाजार, हैदराबाद-500 195 हर वक्त, हर देश-काल के मुताबिक अपने साधारण सिद्धान्तों को अमली रूप, ठोस रूप देने की कोशिश जब तक इन्सान करता रहेगा, तब तक वह अपने सगुण और निगर्ुण दोनों को चलाएगा। जहां कर्म विभाजन नहीं, वहां संगठन हो ही नहीं सकता। ज्यादा से ज्यादा लोग लायक बनें और काम अपने अंग-अंग में पूरा हो, इसलिए कर्म विभाजन जरूरी है। आखिर जज में और शहरी में ऐसा रिश्ता होना चाहिए कि जज को शहरी की इज्जत करनी चाहिए तभी तो शहरी जज की इज्जत करेगा। मैं समझता हूं, गांधी जी ने भी धर्म को या र्इश्वर को या सत्यय को दरिद्रनारायण में देखा था और विशेष करके दरिद्रनारायण की रोटी में, क्योंकि दरिद्रनारायण का हित और अहित जो है, उसे ही यदि किसी अर्थ में आप धर्म समझो तो फिर करोड़ों लोगोंके फायदे ओर नुकसान की जो बातें हैं वह हमेशा दिमाग पर टकराती रहती हैं। वरना, हम लोग एक अलग-सी, हवार्इ दुनिया बसा लिया करते हैं, चाहे धर्म की, चाहे भोग की, चाहे काम की, चाहे मोक्ष की। केवल हिन्दुस्तान में दर्शन संगीत रूप मेंकहा गया। जब दर्शन ओर संगीत का जोड़ हो जाए तो मजा ही आएगा। मैं कुछ चीजें आपके सामने रखता हूं, जैसे नदियां साफ करना, खास तौर से गंगा, कावेरी, जमुना, कृष्णा वगैरह नदियां। आजकल इनमें कारखानों का गंदा पानी और शहरों का पेशाब-पाखाना सब बहाया जाता है। आप जब तीर्थयात्रा करने जाते होंगे तो वृन्दावन में आपने देखा होगा, जो वह पेड़ है जहां पर आज भी हिन्दुस्तान की ओरतें एक छोटा सा चीर का टुकड़ा बांध दिया करती हैं। कृष्ण की चीरहरण लीला हुर्इ थी। अभी तक वह प्रसंग चल रहा है। देखने में मुझे खुशी हुर्इ, अच्छा सा लगता है, कुछ हंसी भी आती है। औरतों को मालूम हो जाए किवे क्या कर रही हैं तो शायद थोड़ी देर के लिए लजा जाएं। खैर, उसी के ठीक नीचे वृन्दावन शहर का गंदा नाला बहता हुआ जमूना में गिरता है। लोग उसमें स्नान करते हैं। नरियों के साफ करने की बात किसके मुंह से निकली? जो धर्म के लोग हैं, उनमें से किसी ने नहीं कहा। नासमझ तो बेर्इमान से ज्यादा मुसीबत दुनिया के लिए पैदा करता है। इन सभी हल न होने वाले झगड़ों के पीछे निगर्ुण और सगुण सत्य के सम्बन्ध का दार्शनिक सवाल है। इस सवाल पर उदार और कटटर हिन्दुओं के रूख में बहुत कम अन्तर है। मोटे तौर पर, हिन्दू धर्म सगुण सत्य के आगे निगर्ुण सत्य की खोज में जाना चाहता है, वह सृषिट को झूठा तो नहीं मानता लेकिन घटिया किस्म का सत्य मानता है। एक तरफ तो निगर्ुण ब्रहम है जिसके मुताबिक दुनिया में हर एक चीज एक है। और जब एक है तो बराबर भी है, क्योंकि गैर-बराबर हों तो दो हो जाते हैं जहां इकार्इ होगी वहां बराबरी जरूर रहेगी। जहां इकार्इ नहीं है, वहीं पर तो गैर-बराबरी हो सकती हे। दुनिया और दुनिया के बाहर भी सारा विश्व, जो कुछ भी कहो उसको, सिर्फ एक सच्चार्इ है। चाहे घास, चाहे गधा, चाहे आदमी, चाहे सितारा, चाहे आसमान, सब एक हैं: बराबर। और उसे वे सचिचदानन्द वगैरह के नाम से भी पुकारा करते हैं, सब एक हैं। यह तो निगर्ुण ब्रहम। और उधर सगुण ब्रहम का मामला उठता है। तब घास और गधे को कौन कहे, आदमी में भी फर्क हो जया करता है। कोर्इ ब्राहमण आदमी, कोर्इ है ठाकुर-बनिया आदमी, कोर्इ है रेडडी और कापू आदमी। और तरह-तरह की बातें आ जाती हैं। कहो सचिचदानन्द कहां हैं? बराबरी कहां है? इकार्इ कहां है? सब एक निगर्ुण ब्रहम है। और जाहं सगुण वाला मामला उठता है तो घास और गधे की कौन कहे, आदमी में भी गैरबराबरी हो जाती है। ये दो खाने सबके दिमाग में कम और ज्यादा हैं। ठतना जान लेना चाहिए कि निगर्ुण सम्पूर्ण आदश्र है, एक हवा, एक भीनी किन्तु सर्वव्यापी महक, एक सपना जो बहुत जल्दी टूट भी सकता है, लेकिन जिसमें यह भी ताकत है कि दुनिया को पलट दे, और सगुण है एक ठोस तथा पकड़ में आने वाली चीज, एक इंतजाम, घटना या रस उभारने वाली प्रकि्रया, खून में प्रेम या, गुस्से की गर्मी लाने वाला किस्सा, लेकिन ऐसा भी जो आदमी को तेली के बैल की तरह एक बंधी हुर्इ लीक पर चला दे। निगर्ुण है आदश्र या सपना, सगण है उसके अनुरूप् मनुष्य या घटना। दोनों अलग हैं। दोनों को अलग रहना चाहिए। किन्तु दोनों एक-दूसरे पर आश्रित हैं और एक-दूसरे के साथ सब कोर जुड़े हुए हैं। दिमाग में दोनों के खाने अगल-अलग रहना चाहिए, लेकिन दोनों में निरन्तर आवागमन होना चाहिए। मैंने बराबरी वाली मिसाल दी, एक और दस की। उसकेमानी यह नहीं हैं कि एक ओर दस का रिश्ता हमेशा के लिए हो गया। मुमकिन है सौ, पचास, चालीस बरस के बाद यह रिश्ता बदला जा सके, एक और दस की जगह एक ओर पचास हो जाए। फिर मुमकिन है एक और दो हो सके। मुमकिन है, नहीं हो सके। ब्रहमज्ञान मे जो चीज मुझे अच्छी लगती है, वह यह कि आदमी अपने संकुचित शरीर और मन से हट कर सब लोगों से अपनापन महसूस करें। यह है असली ब्रहमज्ञान। एक ब्रहमज्ञान वह है जिसमे घंटे, आध घंटे के लिए तम करके या करके, या साधन लगा करके ब्रहम को प्राप्त करने की कोशिश की जाती है, वह जो कुछ भी ब्रहम होता हो। बाकी जो 23 घंटे रहते हैं, उसमें उसका कुछ पता नहीं रहता। ऐसा ब्रहमज्ञान किसी काम का नहीं होता। एक घंटे के लिए तो ब्रहम का खूब दर्शन कर लिया, बाकी 23 घंटे में आनी जिन्दगी, अपना व्यापार, अपना कामकाज ठीक उसी ढंग से चलाया कि जैसे कोर्इ ब्रहम हो ही नहीं। फिर वह तो एक नकली जिन्दगी हो जाती है। मर्द-औरत के प्रकाश-व्यवहार की मर्यादाएं भी रखना जरूरी है। स्वच्छन्द और उच्च शृंखल में फर्क है। आमने-सामने और रजामन्दी से बातें करना कुछ और है और पीछे से छेड़खानी करना, तिरछे घूरना और उलजलूल बकना अनुचित काम हैं। मर्यादा केवल न करने की नहीं होती, करने की भी होती है। बुरे की लकीर को मत लांघो, लेकिन अच्छे की लकीर तक चहल-पहल तो होनी ही चाहिए। हिन्दुस्तान की जिन्दगी के जो सबसे बड़े पांच मकसद है उनको अपनी समझ के मुताबिक मैं गिनाउंगा। एक बराबरी, दूसरा जनतंत्र, तीसरा विकेन्द्रीकरण, चौथा अहिंसा और पांचवां समाजवाद। साफ-सी बात है कि मुसलमान जैसी चीज नहीं रहनी चाहिए राजनीति में। टूट जाना चाहिए। जैसे हिन्दू टूटते हैं अलग-अलग पार्टियों में, वैसे मुसलमानों को भी टूटना चाहिए। लेकिन यह बात कुद मानी हुर्इ-सी है कि मुसलमान जाएगा तो एक साथ जाएगा। हमेशा वह कोर्इ न कोर्इ इत्तेहाद बनाएगा। वक्त की पाबन्दी अभी पूरी तरह नहीं की जाती, शायद इसलिए कि वक्त की पाबन्दी नौकरों की निशानी है। जब विधाथ्ी्र राजनीति नहीं करते तब वे सरकारी राजनीति को चलने देते हैं और इस तरह परोक्ष मे राजनीति करते हैं। एक साधारण और दूसरा ठोस, एक सगुण और दूसरा निगर्ुण, और उन दोनों का आपस में रिश्ता कायम होना चाहिए। लेकिन अगर कोर्इ यह समझे कि दोनों मिटाये जा सकते हैं या एक ही किये जा सकते हैं: तो वह गलती करेगा। ठोस रूप को ही हमेशा के लिए साधारण रूप समझ लिया जाए तो हम फंसे रह सकते हैं, पिछड़ जाते हैं, किसी चीज की रट में पड़ जाते हैं, दकियानूसी बन जाते हैं। इसलिए दो खाने तो रहने ही चाहिए। लेकिन इन दो खानों में, आपस में , आमद-रफत होनी चाहिए। दुनिया में गंदे विचार के पीछे कहीं कोर्इ छोटा-सा सच छिपा हुआ रहता है जिसको मौका मिल जाता है। जिस देश में समता अथवा शांति के अर्थ न केवल बाहरीऔर आर्थिक समता रहे हों बलिक सुख-दु:ख के हेर-फेर में आंतरिक समता, वहां ज्ञान सुलभ होना चाहिए। आज कोसों दूर है-दुनिया में हम सबसे गरीब और सबसे अज्ञानी देश है। किसी भी सिद्धान्त को गेंद की तरह सगुण ओर निगर्ुण दोनों दिमागी कितों में लगाातार फेंकतेरहने से ही एक सजीव आदर्श गढ़ा जाता है। पूरा अलगाव करने से पाखंड और असचता की सृषिट होती है। पूरा एकत्व कर देने से क्रूरता या बेमतलब दौड़ की सृषिट होती है। सिर्फ सगुण में ही फंस जाने से आदमी दकियानूसी हो जाता है। सगुण को पूरी तरह निगर्ुण ही मान लेने से आदमी के क्रूर होने की सम्भावना है। केवल निगर्ुण में फंसे रहने से आदमी के निषिक्रय होने की सम्भावना है। निगर्ुण को पूरी तरह और एकदम सगुण बनाने का प्रयत्न पागल कर सकता है। देश और काल को भुला देने वाली आदर्शवादिता पागलपन है। देश और काल में फंसी व्यवहारिकता तेली का बैल है। पागलों में और लीक के फकीरों अन्तर नहीं, कम से कम फल की मोटी दृषिट से। जो है, उसे सपना कभी नहीं समझना चाहिएं सपने को देश-काल के चौखटे के बाहर की कभी नहीं गढ़ना चाहिए। दिमाग में आदर्श और असलियत के दोनों खानों के बीच में लगातार आवागमन होता रहना चाहिए, और एक को दूसरे की कसौटी पर कसते रहना चाहिए। आदर्श की कसौटी है असलियत, और असलियत की कसौटी है आदर्श। लेकिन दोनों को एक करने में भी उतना ही खतरा है, जितना दोनें को बिन-सम्बन्ध अलग कर देने में। जब तक हिन्दुओं के दिमाग से वण्र्प भेद बिलकुल ही खतम नहीं होते, या स्त्री को बिलकुल पुरूष के बराबर ही नहीं माना जाता, या सम्पतित और व्यवस्था के सम्बन्ध को पूरी तरह तोड़ा नहीं जाता तब तक कटटरता भारतीय इतिहास मे अपना विनाशकारी काम करती रहेगीऔर उसकी निषिक्रयता को कायम रखेगी। अन्य धर्मों की तरह हिन्दू धर्म सिद्धान्तों और बंधे हुए नियमों का धर्म नहीं है बलिक सामाजिक संगठन का एक ढंग है, और यही कारण है कि उदारता और कटटरता का युद्ध कभी समापित तक नहीं लड़ा गया और ब्राहमण-बनिया मिल कर सदियों से देश पर अच्छा या बुरा शासन करते आये हैं जिसमें कभी उदारवादी उपर रहते हैं कभी कटटर पंथी। हिन्दुओं को अपना मन अब साफ कर लेना चाहिए कि आखिर इस मुल्क के हमस ब नागरिक हैं। अगर मान लो कि थोड़ा-बहुत मामला शक का है और कभी किसी टूट के मौके पर कुछ मुसलमानों का भरोसा नहीं किया जा सकता कि टूट के मौके पर वे यह या वह रूख अखितयार करेंगे, तो एक बात अच्छी तरह समझ लेना है कि जितना ज्यादा हिन्दू मुसलमानों के लिए शक करेेंग, मुसलमान उतना ही ज्यादा खतरनाक बनेगा और हिन्दू जितनी ज्यादा सद-भावना या प्रेम के साथ मुसलमान के साथ बर्ताव करेंगे, उतना कम खतरनाक मुसलमान बनेगा। हिन्दुस्तान-पाकिस्तान में जैसे और दो मुल्कों में दोस्ती होती है वैसे तो दोस्ती हो ही नहीं सकती, क्योंकि जहां हमारी दोस्ती शुरू होगी, वह रूक नही सकती, दोस्ती बढ़ती ही चली जाएगी और बढ़ती चली जाएगी। कहीं न कहीं वह महासंघ या एके पर रूकेगी। उसके पहले नहीं। और अगर वह दोस्ती नहीं होती तो दुश्मनी, युद्ध की जैसी सिथति बनेगी, चाहे युद्ध हो न हो लेकिन युद्ध जैसी सिथति रहेगी। हम दोनों एक ही जिस्म के दो टुकड़े हैं, इसलिए हमारे बीच में मामूली दोस्ती के सवाल को मत उठाना। अत: हिन्दू व्यकितत्व दो हिस्सों में बंट गया है। अच्छा हालत में हिन्दू सगुण सत्य को स्वीकार करके भी निगर्ुण परम सतय को नहीं भूलता और बराबर अपनी अन्र्तदृषिट को विकसित करने की कोशिश करता रहता है, और बुरी हालत में उसका पाखंड़ असीमित होता है। हिन्दू शायद दुनिया का सबसे बड़ा पाखंड़ी होता है, क्योंकि वह न सिर्फ दुनिया के सभी पाखंडि़यों की तरह दूसरों को धोखा देता है बलिक अपने को धोखा दे कर खुद अपना नुकसान भी करता है। सगुण और निगर्ुण सतय के बीच बंटा हुआ उसका दिमाग अक्सर इसमें उसे प्रोत्साहन देता है। पहले, और आज भी हिन्दू धर्म एक आश्चर्य जनक दृश्य प्रस्तुत करता है। हिन्दू धर्म अपने मानने वालों को, छोटे से छोटे को भी, ऐसी दार्शनिक समानता, मनुष्य और अन्य वस्तुओं की एकता प्रदान करता है जिसकी मिसाल कहीं और नहीं मिलता। दार्शनिक समानता के इस विश्वास के साथ ही गन्दी से गन्दी सामाजिक विषमता का व्यवहार चलता है। मुझे अक्सर लगता है कि दार्शनिक हिन्दू खुशहाल होने पर गरीबों और शूद्रों से पशुओं जैसा, पशुओं से पत्थरों जैसा और अन्य वस्तुओं से दूसरी वस्तुओं की तरह व्यवहार करता है। शाकाहार और अहिंसा गिर कर छिपी हुर्इ क्रूरता बन जाते हैं अब तक की सभ्ी मानवीय चेष्टाओं के बारे मे यह कहा जा सकता है कि एक न एक सिथति में हर जगह सत्य क्रूरता मे बदल जाता हे और सुन्दरता अनैतिकता मे, लेकिन हिन्दू धर्म के बारे में यह औरों की अपेक्षा ज्यादा सच है। हिन्दू धर्म ने सच्चार्इ और सुन्दरता की ऐसी चोटियां हासिल की जो किसी और देश में नहीं मिलती, लेकिन वह ऐसे अंधेरे गढ़ों में भी गिरा है जहाें तक किसी और देयश का मनुष्य नहीं गिरा। जब तक हिन्दू जीवन की असलियतों को, काम और मशीन, जीवन और पैदावार, ओर जनसंख्या वृद्धि, गरीबी और अत्याचार और ऐसी अन्य असलियतों को वैज्ञानिक और लौकिक दृषिट से स्वीकार करना नहीं सीखता, तब तक वह अपने बंटे हुए दिमाग पर काबू नहीं पा सकता और न कटटरता को ही खतम कर सकता है, जिसने अक्सर उसका सत्यानाश किया है। नोट: राममनोहर लोहिया की विभिन्न रचनाओं से ये विचार संकलित किये गये हैं। आगे भी इस तरह के संकलन प्रकाशित किये जाएंगे। बदरीविशाल पित्ती